हिन्दू धर्म के व्यापक अभ्यासी डॉ. शिबनारायण सेन संतपद पर विराजमान !

अष्टम अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन में १ जून को कोलकाता (बंगाल) की शास्त्र धर्म प्रचार सभा के ‘ट्रुथ’ पाक्षिक के संपादक तथा हिन्दू धर्म के व्यापक अभ्यासी डॉ. शिबनारायण सेन के संतपद पर विराजमान होने का, तो तेजपुर (असम) के ‘स्वामी विवेकानंद केंद्र’ की श्रीमती राणू बोरा (आयु ७१ वर्ष) तथा हावडा (बंगाल) के ‘सलकिया भारतीय साधक समाज’ के महासचिव श्री. अनिर्बान नियोगी (आयु ५३ वर्ष) द्वारा ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त किए जाने की घोषणा की गई। यहां इस समारोह का विस्तृत विवरण प्रकाशित कर रहे हैं।

पू. (डॉ.) शिबनारायण सेनजी का सम्मान करते हुए पू. नीलेश सिंगबाळजी

 

संतपद पर विराजमान होने के पश्चात पू. (डॉ.) शिबनारायण सेन द्वारा व्यक्त मनोगत

हमें भगवान का दास बनना है ! – पू. (डॉ.) शिबनारायण सेन

संतपद पर विराजमान होने के पश्चात अपना मनोगत व्यक्त करते हुए पू. (डॉ.) शिबनारायण सेन ने कहा, ‘‘मैं इस सम्मान का पात्र नहीं हूं। ईश्वर जब अपना ध्वज किसी के हाथ में देते हैं, तब वे उस ध्वजा को फहराने की शक्ति भी देते हैं। मैं यह प्रार्थना करता हूं कि जिन्होंने मुझे संत बनाया, वे ही मुझसे आगे का कार्य करवा लें।

धर्म का कार्य करनेवालों को यह जानकर लेना आवश्यक है कि विज्ञान के आगे भी ईश्वर की शक्ति है। सत्य ही शास्त्र है और शास्त्र ही धर्म है। सत्य ही शिव है और सत्य का आश्रय लेने से निश्चितरूप से ईश्वर की कृपा होती है। हमें भगवान का दास बनना है। उनकी भक्ति करनी है। आज हिन्दू धर्म की बडी मात्रा में आलोचना हो रही है। इसलिए हमें हिन्दूसंगठन हेतु हमें प्रतिबद्ध होना चाहिए। ‘शास्त्र धर्म प्रचार सभा’ के कार्य के लिए महान संतों के आशीर्वाद प्राप्त हुए हैं।’’

 

हिन्दू जनजागृति समिति के मार्गदर्शकों ने बताई
पू. (डॉ.) शिबनारायण सेनजी की गुणविशेषताएं

पू. (डॉ.) शिबनारायण सेन धर्मशिक्षा एवं धर्मजागृति हेतु अविरत कार्यरत हैं !
– सद्गुरु (डॉ.) चारुदत्त पिंगळेजी, राष्ट्रीय मार्गदर्शक, हिन्दू जनजागृति समिति

सद्गुरु (डॉ.) चारुदत्त पिंगळेजी ने कहा,‘‘पू. (डॉ.) शिबनारायण सेन धर्मशिक्षा एवं धर्मजागृति हेतु अविरत कार्यरत हैं। उन्होंने सनातन धर्म के विरुद्ध करनेवाले आरोपों का खंडन करनेवाले अनेक ग्रंथ लिखे हैं। ये ग्रंथ मार्गदर्शक हैं। इन ग्रंथों के कारण धर्मविरोधी विचारों के प्रतिकार का सामर्थ्य मिलता है। ऐसी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए बहुत परिश्रम करने पडते हैं। पू. (डॉ.) सेन एक विद्वान होते हुए भी उनमें विद्यमान प्रेमभाव, आदर एवं नम्रता इन गुणों के कारण सभी में घुल-मिल जाते हैं। भक्ति के साथ-साथ ज्ञानयोग के मार्ग से साधना करना कठिन होता है; किंतु इन दोनों माध्यमों से वे वर्तमान में आवश्यक कार्य कर रहे हैं। ‘पू. (डॉ.) शिबनारायण सेन स्वयंप्रकाशित हैं। परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने बताया है, ‘‘अब उनका मन नहीं रहा अर्थात उनका मनोलय हो चुका है।’’

पू. (डॉ.) शिबनारायण सेन का ज्ञानशक्ति प्रकट करने का कार्य अतुलनीय !
– पू. नीलेश सिंगबाळ, मार्गदर्शक, हिन्दू जनजागृति समिति

पू. नीलेश सिंगबाळ ने कहा, ‘‘एक समय में ज्ञानशक्ति के बल पर भारत विश्वगुरु के पद पर विराजमान था। उसके पश्चात के समय में धर्मद्रोहियों ने इस ज्ञानशक्ति को नष्ट कर हिन्दुआें को धर्मशास्त्र से वंचित रखा। किसी बात को नष्ट करना सरल होता है; परंतु उसे पुनः बनाना अथवा उसकी पुनर्स्थापना करना बहुत कठिन होता है। उसके लिए कठोर साधना और तत्त्वनिष्ठा की आवश्यकता होती है। ज्ञानी पुरुष इस ज्ञानशक्ति को प्रकट करने का अतुलनीय कार्य करते हैं। पू. (डॉ.) सेन का कार्य भी ऐसा ही है। बंगाल जैसे प्रतिकूल वातावरण में रहकर ऐसा कार्य करना बहुत बडी साधना है। हम जब कोलकाता में ‘शास्त्र धर्म प्रचार सभा’ के कार्यालय में जाते हैं, तब पू. (डॉ.) सेन सदैव ग्रंथलेखन में व्यस्त रहते हैं और तब भी वे हमें समय देते हैं। कतरास (झारखंड) में आयोजित सनातन के गुरुपूर्णिमा समारोह में भी वे स्मरणपूर्वक उपस्थित होकर मार्गदर्शन करते हैं।’’

 

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने पू. (डॉ.) सेन नामक रत्न को पहचाना
– डॉ. कौशिक चंद्र मल्लिक, उप-संपादक, ‘साप्ताहिक ट्रुथ’, (पू. (डॉ.) सेन के भांजे)

डॉ. कौशिक चंद्र मल्लिक ने कहा, ‘‘एक संत ही दूसरे संत को पहचान सकते हैं। रत्न का मूल्य तो रत्नपारखी को ही ज्ञात होता है। उसी प्रकार से ‘पू. (डॉ.) शिबनारायण सेन कौन हैं ?’, इसे परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने पहचाना। पू. (डॉ.) सेन के विषय में कुछ बताने की मुझ में पात्रता नहीं है; किंतु एक आज्ञा के रूप में बता रहा हूं। (डॉ.) सेन मेरे मामा हैं। मैं बचपन से उन्हें देख रहा हूं। वे जो बोलते हैं, उसी प्रकार उनका आचरण होता है। उनका जीवन आदर्शवत् है। आज उनके सम्मान के कारण मैं आनंदित हूं। परात्पर गुरु परात्पर गुरु डॉ. आठवले ईश्वर की भांति अद्भुत कार्य कर रहे हैं। महापुरुषों के चरणतले जमे रजकणों के अभिषेक से ईश्वर के पास जाने की बुद्धि मिलती है। ऐसे सभी लोग सफल होते हैं। ईश्वर जिन्हें अपना मानकर स्वीकार करते हैं, उनका कभी अधःपात नहीं होता।’’ मनोगत व्यक्त करते समय डॉ. मल्लिक का भाव जागृत हुआ था।

 

६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त श्रीमती राणू बोरा (आयु ७१ वर्ष) का मनोगत

हिन्दू राष्ट्र स्थापना हेतु साधना आवश्यक है ! – श्रीमती राणू बोरा, स्वामी विवेकानंद केंद्र, तेजपुर, असम

श्रीमती राणू बोराजी का सम्मान करते हुए पू. श्रीमती संगीता जाधवजी

सम्मान के पश्चात अपना मनोगत व्यक्त करते हुए श्रीमती राणू बोरा ने कहा, ‘‘मैं इस सम्मान के पात्र नहीं हूं। मैंने कुछ नहीं किया है। पहले मैं संकोची स्वभाव की थी। ‘स्वामी विवेकानंद केंद्र’ के साथ जुडने के पश्चात मैंने स्वामी विवेकानंद का साहित्य पढा और तब से मुझ में साहस उत्पन्न हुआ और मुझे ‘राष्ट्र एवं धर्म के लिए कार्य करना चाहिए’, ऐसे लगने लगा। हिन्दू राष्ट्र स्थापना हेतु साधना अत्यंत आवश्यक है। असम के ९ जनपदों में मुसलमानों की जनसंख्या ८० प्रतिशत है। असम में मैं अकेली कार्य करती हूं। वहां ‘मैं हिन्दू हूं’, ऐसा कहने पर भी लोग हंसते हैं। वहां सार्वजनिक पूजा करनी हो, तो स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेनी पडती है। वहां के हिन्दुआें की दयनीय स्थिति बदलने के लिए उन्हें जागृत करने की आवश्यकता है।’’

 

श्रीमती राणू बोरा में देश एवं धर्म हेतु कार्यरत रहने की लगन !
– शंभू गवारे, हिन्दू जनजागृति समिति

श्री. शंभू गवारे ने कहा, ‘‘पिछले वर्ष अगस्त मास में श्रीमती राणू बोरा से मेरा पहली बार परिचय हुआ। तब मुझे ‘उनके साथ पहले से परिचित हूं’, ऐसे लगा। उनमें बहुत प्रेमभाव है। उनमें ‘देश और धर्म के लिए कुछ तो करते रहने की आस है’, ऐसा लगा। सनातन के आश्रम में आने पर उन्हें ‘अब यही रहना चाहिए’, ऐसा लगा। वाराणसी के प्रांतीय हिन्दू अधिवेशन में वे अन्य महिलाआें को भी अपने साथ लेकर आई थीं।’’

श्रीमती राणू बोरा का परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के प्रति भाव

श्रीमती राणू बोरा ने कहा, ‘‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के साथ हुई भेंट के पश्चात ‘अब मुझे सबकुछ मिल गया है’, ऐसा लगा और ‘अब हिन्दू राष्ट्र बहुत दूर नहीं है’, ऐसा भी लगा।’’

 

६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त श्री. अनिर्बान नियोगी द्वारा व्यक्त मनोगत

समष्टि सेवा करने हेतु साधना बढाना आवश्यक !
– अनिर्बान नियोगी, महासचिव, ‘सलकिया भारतीय साधक समाज’, हावडा (बंगाल)

श्री. अनिर्बान नियोगीजी का सम्मान करते हुए पू. नीलेश सिंगबाळजी

सम्मान के पश्चात अपना मनोगत व्यक्त करते हुए श्री. नियोगी ने कहा, ‘‘मैं ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करूंगा’, ऐसा कभी विचार भी मैंने नहीं किया था। यह ईश्वर की कृपा से हुआ है। आध्यात्मिक स्तर जितना अधिक होता है, उतनी उसमें ईश्वर के प्रति दृढ श्रद्धा होती है और शंकाएं भी अल्प होती हैं। हम अंतर से जितना शुद्ध होंगे, उतनी हमें ईश्वर की अनुभूति होती है। हम उनके निकट जाते हैं। मन से शुद्ध व्यक्ति ही दूसरों को साधना से जोड सकता है। समष्टि सेवा करने हेतु साधना बढाना आवश्यक है। ईश्वर को श्रद्धा के साथ पुकारने से उनकी कृपा होती है। हम आध्यात्मिक शक्ति के बिना कुछ नहीं कर सकते। धर्मकार्य में आनेवाली बाधाएं केवल ईश्वर की कृपा से ही दूर होती हैं।’’

बचपन से ही धर्माभिमानी होना

श्री. नियोगी ने आगे कहा, ‘‘बचपन में खेलने जाने से पहले मेरी दादी मुझे रामायण सुनाती थी। मुझ में पहले से हिन्दुत्व था। मेरी शिक्षा मिशनरी विद्यालयों में हुई। वहां हमें ईसा मसीह के सामने खडे रहकर प्रार्थना करनी पडती थी; किंतु मुझ में हिन्दू संस्कृति का बीज होने से मैं केवल खडा रहता था। मैं बचपन से ही हिन्दू संस्कृति की रक्षा हेतु कार्यरत था। मैंने कर्मयोग की अनेक पुस्तकें और भगवद्गीता पढी है। देहली में महाविद्यालयीन शिक्षा लेते समय मुझे इसका बोध हुआ कि मेरा जन्म व्यक्तिगत जीवन व्यतित करने हेतु नहीं, तो समाज के लिए हुआ है। महाविद्यालयीन शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात मैंने बंगाल में धर्मकार्य आरंभ किया। मुझे अयोध्या आंदोलन में सहभागी होने का अवसर मिला। वर्ष १९९८ से २००४ की अवधि में मुझे विविध संतों से मिलने का भी अवसर मिला।’’

 

पैर में गंभीर घाव होते हुए भी श्री. अनिर्बान नियोगी की
धर्मकार्य की तडप अनुकरणीय ! – शंभू गवारे, हिन्दू जनजागृति समिति

श्री. अनिर्बान नियोगी की गुणविशेषताएं बताते हुए श्री. शंभू गवारेजी ने कहा, ‘‘श्री. अनिर्बन नियोगी में धर्मकार्य की तडप प्रशंसनीय है। हम जब कोलकाता में हिन्दुत्वनिष्ठों से मिलने जाते हैं, तब हमारा समय व्यर्थ न जाए; इसके लिए वे प्रयासरत होते हैं। एक बार एक हिन्दुत्वनिष्ठ व्यक्ति से मिलने जाना था। तब श्री. अनिर्बान नियोगी के पैर में घाव था। उनके पैर से रक्त बह रहा था; परंतु तब भी उन्होंने मेरे साथ आने के लिए प्रधानता दी। तब मैंने उन्हें ‘हम कुछ समय पश्चात जाएंगे’, ऐसे कहा; परंतु वे उसी समय जाने के लिए आग्रही थे। उन्होंने उस हिन्दुत्वनिष्ठ व्यक्ति से मिलने का आग्रह लगाए रखा। मैंने उनका घाव देखकर उनसे आग्रह कर चिकित्सालय लेकर गया, तब उनके पैर में ४ टांके डालने पडे। गंभीर घाव होते हुए भी धर्मकार्य की उनकी तडप सभी के लिए मार्गदर्शक हैं।

एक बार उनकी माताजी का स्वास्थ ठिक नहीं था; किंतु तब भी वे हिन्दू अधिवेशन में उपस्थित रहे। उनमें सदैव ‘ईश्वर सब चिंता करते हैं’, यह भाव होता है। श्री. नियोगी में निरंतर ‘राष्ट्र एवं धर्म के लिए मैं और क्या कर सकता हूं ?’, यह विचार होता है। कोई नई कल्पना सूझने पर वे उसे तुरंत लिखकर लेते हैं और उस पर चर्चा करते हैं। परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के जन्मोत्सव के समय उन्हें स्वप्न में परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के दर्शन हुए और स्वप्न में श्री. नियोगी ने परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी से ‘मेरा नामजप चल रहा है’, ऐसा कहा। श्री. नियोगी ने मुझे इस स्वप्न के विषय में बताया। इससे उनका नामजप की आेर झुकाव दिखाई देता है।’’