परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का विविध क्षेत्रों में शोधकार्य

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विश्वकल्याणार्थ सनातन हिन्दू धर्म की वैज्ञानिकता सिद्ध करनेवाली परात्पर गुरु की अनमोल देन !

अखिल मानवजाति ‘आनंदप्राप्ति’ का मूलभूत ध्येय साध्य कर पाए, इसलिए अध्यात्म एवं हिन्दू धर्म की महिमा आधुनिक वैज्ञानिक परिभाषा में बताने के लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने आध्यात्मिक शोधकार्य आरंभ किया ! अध्यात्म अनुभूति का शास्त्र होते हुए भी आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण एवं सूक्ष्म परीक्षण की सहायता से अध्यात्म के ‘क्यों’ एवं ‘कैसे’ की शास्त्रशुद्ध कारणमीमांसा बतानेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी एकमेव अद्वितीय संत हैं !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को सूक्ष्म से प्राप्त होनेवाले उत्तरों के माध्यम से उनका शोधकार्य प्रारंभ हुआ, जो अब विविध वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से भी शुरू है । इस परिपूर्ण आध्यात्मिक शोधकार्य का निष्कर्ष विविध माध्यमों से आधुनिक वैज्ञानिक परिभाषा में सभी को निशुल्क उपलब्ध करवाने से आज जगभर में सहस्रोें व्यक्ति साधना समझ कर उसका लाभ ले रहे हैं । प्रस्तुत है इस अद्भुत कार्य का संक्षिप्त ब्योरा …

अनिष्ट शक्तियों के संदर्भ में ‘न भूतो न भविष्यती’ ऐसा शोधकार्य करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी !

१. स्वयं अपनी ही देह में एवं उनके द्वारा उपयोग में लाई वस्तुओं में दैवीय परिवर्तनों के विषय में शोधकार्य

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के नखों पर उभरे ॐ के शुभचिन्ह

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने समय-समय पर अपनी देह, त्वचा, केश, नख एवं वस्तुओं में हो रहे दैवीय परिवर्तन के छायाचित्र खींचकर एवं उस विषय पर लेखन कर, शारीरिक एवं आध्यात्मिक दृष्ट‌िकोण से उन परिवर्तनों का अध्ययन किया । इस शोधकार्य द्वारा उन्होंने आध्यात्मिकदृष्टि से उन्नतों के संदर्भ में होनेवाले दैवीय परिवर्तन का शास्त्र बताया ।

 

२. अपनी महामृत्युयोग का संशोधनात्मक अध्ययन

ज्योतिषशास्त्रानुसार वर्ष १९९८ से आजतक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के जीवन में अनेक महामृत्युयोग आए । हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए उनका देहधारी अस्तित्व आवश्यक है, इसलिए विविध संत एवं महर्षि उनका महामृत्युयोग टालने के लिए स्वयं ही आध्यात्मिक सहायता कर रहे हैं । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने इस महामृत्युयोग के काल में अपनी प्रकृति का आधुनिक वैद्यकीयशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र एवं अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से तुलनात्मक अध्ययन कर, अध्यात्मशास्त्र का श्रेष्ठत्व दिखा दिया ।

 

३. अपने वास्तव्य की वास्तु में अपनेआप होनेवाले परिवर्तन के विषय में शोधकार्य

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के निवासस्थान अर्थात रामनाथी, गोवा स्थित सनातन संस्था का आश्रम ! इस वास्तु में होनेवाले दैवीय परिवर्तन (उदा. फर्श पर ॐ उभरना), इसके साथ ही अनिष्ट शक्तियों के चेहरे उभरने का वैज्ञानिक पद्धति से शोधकार्य (रिसर्च) किया जाता है । इसका उद्देश्य यह है कि संतों की वास्तु में होनेवाले परिवर्तन का शास्त्र समाज समझ पाए ।

सनातन के आश्रम में निर्माण हुआ इत्र

 

सनातन आश्रम की फर्श (टाईल्स) पर उभरा ‘ॐ’

 

४. पंचमहाभूतों के कारण होनेवाली बुद्धिअगम्य घटनाओं का अध्ययन के साथ ही वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा शोधकार्य

पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश, इन पंचमहाभूतों के कारण होनेवाली बुद्धिअगम्य घटनाएं, उदा. साधकों की वस्तुओं को दैवीय सुगंध आना, कांस्य (कांसे) की कटोरी में अपनेआप इत्र निर्माण होना, दैवीय कण दिखाई देना, देवी-देवताओं एवं अन्य चित्रों का रंग बदलना, विशिष्ट नाद सुनाई देना, वास्तु की फर्श पारदर्शक होना आदि विषयों में वैज्ञानिक पद्धति से शोध हो, इसके लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी प्रयत्नशील हैं ।

४ अ. वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा हो रहा शोधकार्य

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के कुंडलिनीचक्रों के स्पंदनों का अध्ययन ‘लेकर एंटिना’ द्वारा करते हुए श्री. मयांक बडजात्या (१३.६.२०१३)

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में हिन्दू आचार, आहार, वेशभूषा, केशभूषा, धार्मिक विधियां, यज्ञ, नामजप, मुद्रा, न्यास, श्रीयंत्र आदि का व्यक्ति, वस्तु एवं वातावरण पर होनेवाले परिणामों के विषय में विविध वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा शोधकार्य शुरू है । इसमें इलेक्ट्रोसोमैटोग्राफिक स्कैनिंग, रेजोनेन्ट फील्ड इमेजिंग, इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक फील्ड, लेकर एंटिना, किर्लीयन फोटोग्राफी, यूनिवर्सल थर्मल स्कैनर, थर्मल इमेजिंग, पिप इत्यादि वैज्ञानिक उपकरणों का समावेश है ।

४ आ. लोलक के संदर्भ में शोधकार्य

परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने लकडी, विविध धातु, पत्थर, स्फटिक, रुद्राक्ष आदि विविध घटकों से बने लोलक (पेंड्यूलम) एवं लोलक की डोर के रूप में विविध धातुओं की जंजीरें, रेशम, ऊन, सूत ए‌वं केले के वृक्ष के तने के रेशों से बने धागे का उपयोग कर अनेक प्रयोग किए । इसमें उन्होंने यह ढूंढ निकाला कि उन सब में केले के ‌पेड से बने धागे को रुद्राक्ष बांधकर बनाया गया लोलक सर्वाधिक सात्त्विक होता है । इसके साथ ही उन्होंने यह भी ढूंढ निकाला कि सात्त्विक लोलक द्वारा परीक्षण करने पर एवं लोलक-परीक्षण करनेवाला व्यक्ति आध्यात्मिक कष्ट विरहित एवं ६० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर का होने से सर्वाधिक अचूक उत्तर मिलते हैं ।

 

५. आध्यात्मिक संग्रहालय के लिए आध्यात्मिक मूल्यवाली वस्तुओं का संग्रह

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक संग्रहालय की निर्मिति की जा रही है । आज तक इस संग्रहालय के लिए भारत के तीर्थक्षेत्र, मंदिर, संतों के मठ, संतों के समाधिस्थान, ऐतिहासिक स्थान इत्यादि का अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से विशिष्ट वस्तुएं, मिट्टी, पानी आदि के साथ ही पंचमहाभूतों का परिणाम दर्शानेवाली सहस्रों वस्तुएं, छायाचित्र एवं १६ सहस्र से भी अधिक दृश्यश्रव्यचक्रिका (वीडियो सीडी) का जतन किया गया है । ऐसे नानाविध आध्यात्मिकदृष्टि से मूल्यवान वस्तुओं का जतन कर परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी अध्यात्मविश्व के इतिहास में एक नया अध्याय लिख रहे हैं ।

 

६. प्राणि एवं वनस्पति की सात्त्विकता की दृष्टि से अध्ययन

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में तितलियां, मुर्गा, तोता, गाय, घोडा आदि की आध्यात्मिक विशेषताओं का वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा शोध किया गया है । इसके साथ ही तुलसी, कुरुक्षेत्र का अक्षयवट, शुकताल का वटवृक्ष, भालकातीर्थ का पीपल, देहू का नांदुरकी आदि वृक्षों की सात्त्विकता की दृष्टि से अध्ययन किया गया है ।

 

७. दैवीय (सात्त्विक) बालक की पहचान एवं तत्संबंधी शोधकार्य

सात्त्विक कृति, साधना, देवी-देवता आदि आध्यात्मिक रुचि रखनेवाले बालकों के दैवीय गुण देखकर परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने ही सर्वप्रथम बताया कि वे स्वर्ग, महर्, जन आदि उच्च लोकों से पृथ्वी पर जन्मे हैं । ऐसे बालकों का उनकी आयु के अनुरूप आध्यात्मिक स्तर के असामान्य विचार एवं आचरण सभी को समझ में आए, इस हेतु उन्होंने उनके विषय में दृश्यश्रव्य-चक्रिका (डीवीडी) भी प्रकाशित कीं । वर्तमान में बालकों की गुणविशेषताओं से वे किस उच्च लोक से पृथ्वी पर जन्मे हैं, योग्य मार्गदर्शन मिलने पर वे कितने वर्ष में संत हो सकते हैं ? आदि संबंधी शोधकार्य शुरू है ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी इन बालसाधकों के माध्यम से हिन्दू राष्ट्र चलानेवाली भावी पीढी तैयार कर रहे हैं ।

 

८. ज्योतिषशास्त्र एवं नाडीज्योतिष द्वारा शोधकार्य

८ अ. ज्योतिषशास्त्र द्वारा शोधकार्य

दैवीय बालक, सनातन के संत, आध्यात्मिक कष्टवाले आदि की जन्मपत्रिकाओं का अध्ययन कर उनके जीवन के विशेष योग का अध्ययन करनेवाले, देशभर में होनेवाली विविध आध्यात्मिक घटनाओं की ज्योतिषशास्त्रीय कारणमीमांसा करना आदि प्रकार के शोधकार्य परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में हो रहे हैं ।

८ आ. हस्तसामुद्रिक एवं पादसामुद्रिक शास्त्रों द्वारा शोधकार्य

प्राचीन काल से भारत में मनुष्य के शरीर पर विभिन्न लक्षण देखकर उनके स्वभाव, गुणदोष, भूतकाल एवं भविष्यकाल के विषय में निदान करने की सामुद्रिक विद्या प्रचलित है । हस्तसामुद्रिक शास्त्र में हाथों की, तो पादसामुद्रिक शास्त्र में पैरों के तलवे की रेखाएं, उभार-सपाट एवं अन्य चिन्हों का अध्ययन करते हैं । इन शास्त्रों द्वारा आध्यात्मिक शोधकार्य परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में चल रहा है ।

८ इ. नाडीज्योतिषशास्त्र द्वारा शोधकार्य

प्राचीन काल में विविध ऋषि-मुनियों ने नाडीपट्टियों में लिखकर रखे भविष्यानुसार मानवीय जीवन में होनेवाली घटनाओं का अध्ययन, दो भिन्न नाडीपट्टिकाओं में महर्षि द्वारा एक ही व्यक्ति के विषय में लिखे गए भविष्य का तुलनात्मक अध्ययन एवं जीवन में कोई अप्रिय घटना की संभावना टाल सकें, इसके लिए नाडीभविष्य में बताए गए उपायों के कारण होनेवाले लाभ आदि के विषय में शोधन करने के लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में ४ – ५ साधकों का एक पथक भारतभर भ्रमण कर रहा है ।

८ ई. फलज्योतिषशास्त्र

इसमें उच्च लोकों से पृथ्वी पर जन्म लेनेवाले जीव, सनातन के संत, आध्यात्मिक कष्टवाले व्यक्ति आदि की जन्मपत्रिकाओं का अभ्यास कर उनके जीवन के विशेष योग का अध्ययन करना, देशभर में होनेवाली विविध आध्यात्मिक घटनाओं की ज्योतिषशास्त्रीय कारणमीमांसा करना आदि शोधकार्य शुरू है ।

 

९. सूक्ष्मज्ञान के संदर्भ में कार्य

कु. प्रियांका लोटलीकर द्वारा बनाया सूक्ष्मस्तरीय विशेषताएं दर्शानेवाला चित्र जांचते हुए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी (२००७)

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी वर्ष १९८२ से सूक्ष्मज्ञान के (टिप्पणी) संदर्भ में अध्ययन कर रहे हैं । वर्ष १९८२ से, अर्थात साधना में आने से पहले से ही उन्हें सूक्ष्म से समझ में आने लगा था । आरंभ के काल में किसी प्रसंग अथवा प्रक्रिया के विषय में ‘हां’ अथवा ‘नहीं’, ऐसे उत्तर सूक्ष्म से समझ में आते थे । साधना में आने के पश्चात उन्हें इन उत्तरों का कार्यकारणभाव ध्यान में आने लगा । उन्होंने अध्यात्म के विविध विषयों के संदर्भ में पृथ्वी पर कहीं भी उपलब्ध नहीं, ऐसा ज्ञान ध्यान से (सूक्ष्म से) प्राप्त किया है, जो सनातन के ग्रंथों में प्रकाशित हुआ है । जिन साधकों की सूक्ष्मज्ञानेंद्रियां कार्यरत हैं, ऐसे साधकों को सूक्ष्म से ज्ञान ग्रहण करना, सूक्ष्म-परीक्षण करना, सूक्ष्म-चित्र बनाना इत्यादि सिखाया । इसलिए आज सनातन के अनेक साधकों को सूक्ष्मस्तरीय बातें समझ में आती हैं ।

(टिप्पणी – सूक्ष्मज्ञान : पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि का उपयोग न करते हुए प्राप्त ज्ञान ।)

 

१०. अनिष्ट शक्तियों के कष्टों पर उपाय करने की उपचारपद्धतियों पर शोधकार्य

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की रुचि पहले से ही ‘साध्य’ की ओर (end result की ओर) नहीं, अपितु उस साध्य के पीछे कारण जानने की ओर (wanting to know the basic laws) अधिक है । यह सूत्र हम एक उदाहरण से समझ लेंगे । वर्ष २००० से सनातन के साधकों को सूक्ष्म की अनिष्ट शक्तियों के कष्ट होने लगे । तब आरंभ में इसप्रकार के कष्टों पर आध्यात्मिक उपाय करनेवाले अनेक संतों द्वारा सनातन के साधकों पर उपाय किए गए । उन उपायों को कुछ मात्रा में सफलता भी मिली; परंतु इन उपायों के चलते परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का ध्यान केवल ‘साधकों का कष्ट कम हो रहा है न ?’ यहां तक सीमित न रहते हुए ‘वे संत वास्तव में करते क्या हैं ? सूक्ष्म स्तर पर क्या प्रक्रिया होती है ?, साधक के कष्ट कम कैसे होते हैं ?’, इस ओर भी उनका ध्यान रहता था । वर्ष २००० से वर्ष २००३-२००४ तक, अनेक संतों द्वारा किए गए उपायों का परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने बारीकी से निरीक्षण और अध्ययन किया ।

‘अनिष्ट शक्तियों का जिन्हें कष्ट है, ऐसों पर नामजपादि उपाय कैसे करें’, यह सीखने के लिए वे ३ माह तक प्रतिदिन ही एक संत के पास गए । तदुपरांत उनसे सीखने मिले मूलभूत सूत्रों पर आधारित उन्होंने ‘अनिष्ट शक्तियों के कष्ट वास्तव में क्या हैं’, ‘उनके प्रकार क्या होते हैं’, ‘उन पर उपाय कैसे करना है’, ‘संतों द्वारा किए नामजपादि उपायों को साधक व्यक्तिगत स्तर पर किए जानेवाले कौन से उपायों की जोड दे सकते हैं’ आदि सूत्रों का बारीकी से अध्ययन किया । इससे उन्होंने सूक्ष्मकी अनिष्ट शक्तियों के विश्व संबंधी ज्ञान का एक विशाल दालान जगत के लिए खोल दिया । अनिष्ट शक्तियों के विषय की, इसके साथ ही उनका कष्ट कैसे पहचानें, उनके कष्ट पर पीडित व्यक्ति द्वारा स्वयं किए जानेवाले विविध उपायों की जानकारी सनातन के नियतकालिक, ग्रंथ, दृश्यश्रव्यचक्रिका (वीडियो सीडी) एवं जालस्थल के माध्यम से संपूर्ण जगत को निशुल्क उपलब्ध करवाई । आज यह जानकारी जगभर के लोगों को घर बैठे मिल रही है । इसप्रकार ये अत्यंत जटिल सूक्ष्मस्तरीय समस्याएं, इसके साथ ही उन पर उपायों के विषय में भी उन्होंने प्रत्येक स्तर पर मूलभूत शास्त्र ढूंढ निकालने से इन समस्याओं से पीडित जगभर के व्यक्तियों को उपायों के संदर्भ में स्वयंपूर्ण बनाया ।

(आध्यात्मिक उपायों के विषय में विस्तृत जानकारी सनातन के ‘आध्यात्मिक कष्टोंको दूर करने हेतु उपयुक्त दृष्टिकोण’ ग्रंथमाला में दी है ।)

१० अ. अनिष्ट शक्तियों के संदर्भ में शोधकार्य

अनिष्ट शक्तियों के प्रकार, उनका कार्य, मानवी जीवन एवं वातावरण पर होनेवाले उनके परिणाम, उनके द्वारा मनुष्य को दिए जानेवाले कष्टों के लक्षण आदि विषयों पर परात्पर गुरु डॉक्टर वर्ष २००० से शोधकार्य कर रहे हैं । इस संदर्भ में सहस्रों दृश्य-श्रव्यचक्रिका एवं सैकडों ग्रंथ तैयार होंगे, इतनी जानकारी उन्होंने संग्रहित की है । इस शोधकार्य द्वारा उन्होंने अनिष्ट शक्तियों के कष्टों पर उपाय करने की अनेक पद्धतियां ढूंढकर, उन्हें वे सब सिखाईं ।

 

११. आध्यात्मिक उपायों की नई-नई पद्धतियों का शोध

११ अ. देवताओं की सात्त्विक नामजप-पट्टियों के उपाय

देवताओं की सात्त्विक नामजप-पट्टी से उन देवताओं की शक्ति प्रक्षेपित होती है । इस शक्ति के कारण आध्यात्मिक उपाय होते हैं । परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा नामजप-पट्टियों के उपयोग के संदर्भ में विविध प्रयोग किए एवं नामजप-पट्टियों की सहायता से आध्यात्मिक कष्ट दूर करने की आगे की पद्धतियां ढूंढ निकालीं ।

११ अ १. अनिष्ट शक्तियों के आक्रमणों से रक्षा होने हेतु व्यक्ति रात में सोने से पूर्व अपने चारों ओर नामजप की पट्टियों का मंडल बनाए (अधिक विवेचन के लिए पढें : ग्रंथ शांत निद्रा के लिए क्या करें ?)

११ अ २. वास्तुशुद्धि के लिए वास्तु में नामजप-पट्टियों की छत तैयार करना

११ अ ३. वाहनशुद्धि के लिए दुपहिया वाहन के आगे और पीछे नामजप की पट्टियां लगाना और चौपहिया वाहन में नामजप-पट्टियां चारों ओर से एवं छत को लगाकर कवच तैयार करना (सनातन के स्थानीय वितरकों को वास्तुशुद्धि और वाहनशुद्धि के लिए आवश्यक नामजप-पट्टियों का संच और उन पट्टियों को लगानेसंबंधी पत्रक उपलब्ध होता है ।)

११ आ. कुंडलिनीचक्रों के स्थान पर देवताओं के सात्त्विक चित्र अथवा नामजप-पट्टियां लगाना

ब्रह्मांड की प्राणशक्ति मनुष्य की देह में कुंडलिनीचक्रों के माध्यम से प्रक्षेपित होती है । विशिष्ट कुंडलिनीचक्रों का व्यक्ति को होनेवाले कष्टों से संबंध होनेवाले विशिष्ट कष्टों से संबंध होता है; इसलिए कुंडलिनीचक्रों के स्थान पर उपाय करने से व्यक्ति का कष्ट शीघ्र घटने में सहायता होती है । कुंडलिनीचक्रों के स्थान पर देवताओं के सात्त्विक चित्र अथवा नामजप-पट्टियां लगाने से उपाय होते हैं, इसका शोध परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने लगाया ।

११ ‌इ. सनातन-निर्मित सात्त्विक गणेशमूर्ति को प्रदक्षिणा लगाना

११ ई. संतों द्वारा दीर्घकाल तक निवास की हुई वास्तु में अथवा कक्ष में बैठकर नामजपादि उपाय करना

११ उ. संतों द्वारा लंबे समय तक उपयोग में लाई वस्तुओं का आध्यात्मिक उपायों के लिए उपयोग करना

११ ऊ. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के आंखों के छायाचित्र एवं उनके कक्ष की अलमारी के छायाचित्रों का उपाय के लिए उपयोग करना

११ ए. पंचतत्त्वोंनुसार उपाय

मानवी शरीर पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश, इन पंचतत्त्वों से (महाभूतों से) बना है । उस-उस तत्त्व के (महाभूत के) स्तर पर उपाय करने पर उस-उस तत्त्व से संबंधित कष्ट दूर होने में सहायता होती है । पंचतत्त्वों के स्तर पर उपाय करने के विषय के विविध प्रयोग परात्पर गुरु डॉक्टर द्वारा आगे दिए अनुसार किए ।

११ ए १. पृथ्वीतत्त्व के उपाय

मस्तक पर सात्त्विक कुंकू लगाना, सात्त्विक इत्र की सुगंध लेना इत्यादि

११ ए २. आपतत्त्व के उपाय

तीर्थ प्राशन करना, खडे-नमक के पानी में १५ मिनट दोनों पैर डुबो कर रखना इत्यादि

११ ए ३. तेजतत्त्व के उपाय

विभूति लगाना, देसी घी के दीप की ज्याति की ओर कुछ समय तक एकटक देखना इत्यादि

११ ए ४. वायुतत्त्व के उपाय

सात्त्विक वस्तु से (उदा. मोरपंख से) व्यक्ति का कष्टदायक शक्तिदायक शक्ति का आवरण निकालना इत्यादि

११ ए ५. आकाशतत्त्व के उपाय

११ ए ५ अ. निरभ्र आकाश की ओर देखना, निरभ्र आकाश के नीचे नामजपादि उपाय करना
११ ए ५ आ. प.पू. भक्तराज महाराज अथवा अन्य संत की आवाज में भजन सुनना
११ ए ५ इ. रिक्त खोके के उपाय करना

 

१२. विकार-निर्मूलन के लिए उपयुक्त उपायपद्धतियों का शोध

१२ अ. स्पर्शविरहित बिंदूदाबन (ए‍क्यूप्रेशर)

शारीरिक एवं मानसिक विकार दूर करने के लिए शरीर पर दाब देकर बिंदूदाबन करने की पद्धति प्रचलित है । वर्ष २००७ में परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने आध्यात्मिक कष्टों पर उपयुक्त ऐसी स्पर्शविरहित बिंदूदाबन (एक्युप्रेशर) की पद्धति ढूंढ निकाली । (इस विषय में विवेचन शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्टों के निवारण के लिए बिंदूदाबन ग्रंथ में किया है ।)

१२ आ. रिक्त खोकों के उपाय

रिक्त खोके में रिक्ती होती है और उस रिक्ती में आकाशतत्त्व होता है । परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने खोके के आकाशतत्त्व के कारण होनेवाले आध्यात्मिक उपायों के संदर्भ में स्वयं प्रयोग किया और साधकों द्वारा भी प्रयोग करवा लिए । इस शोधन के आधार पर उन्होंने रिक्त खोकों के उपाय की उपायपद्धति ढूंढ निकाली । (इस विषय में विस्तृत विवेचन ग्रंथ ‘विकार-निर्मूलन के लिए रिक्त खोकों के उपाय (२ भाग)’ में किया है । यह उपायपद्धति पढें बक्सों से उपचार।)

१२ इ. नामजप-उपाय

विविध प्रकार के नामजप करने से विविध प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक कष्ट दूर होने में सहायता होती है, इस संदर्भ में परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने अनेक प्रयोग कर आगे की बातों का शोध लगाया ।

१२ इ १. नामजप की प्रयोगपद्धति

उच्च देवताओं के नामजपों का प्रयोग कर उनसे स्वयं के कष्ट दूर होने के लिए आवश्यक नामजप ढूंढना

१२ इ २. उपायों के लिए उपयुक्त नामजप : शून्य, महाशून्य, निर्गुण एवं ॐ इन निर्गुणवाचक शब्दों के जप; ० से ९ इन अंकों के जप एवं पंचमहाभूतों के जप (उदा. श्री वायुदेवताय नमः।)

१२ इ ३. नामजप की परिणामकारकता बढानेवाली पद्धति : नामजप के आरंभ एवं / अथवा अंत में १ अथवा २ ॐ लगाना, एक के बाद दूसरा ऐसे नामजप करना (पहले एक नामजप, फिर दूसरा नामजप, तदुपरांत पुन: पहला जप और उसके पश्चात दूसरा नामजप, इस पद्धति से नामजप करना) (इस विषय में विस्तृत विवेचन विकार-निर्मूलन के लिए नामजप (३ भाग) ग्रंथ में किया है ।)

१२ ई. प्राणशक्तिवहन उपाय

मानव की स्थूलदेह में रक्ताभिसरण, श्वसन, पचन, मज्जा इत्यादि विविध संस्थाएं कार्यरत होती हैं । उन्हें कार्य करने के लिए जो शक्ति लगती है, उसकी आपूर्ति प्राणशक्तिवहन संस्था करती है । किसी स्थान पर उसके प्रवाह में बाधा आने पर संबंधित शरीरसंस्था की (अथवा इंद्रिय की) कार्यक्षमता अल्प होकर विकार निर्माण होते हैं । प्राणशक्तिवहन संस्था में निर्माण हुई बाधाएं कैसे ढूंढें, उसे दूर करने के लिए कौन-सा जप, मुद्रा एवं न्यास करें इत्यादि के विषय में परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा स्वयं पर विविध प्रयोग किए एवं उपायपद्धतियों के परिणामों का अनुभव लिया । इस शोधन के परिणामस्वरूप ‘प्राणशक्तिवहन उपाय पद्धति’ का उगम हुआ । (इससे विषय में विस्तृत विवेचन ‘ प्राणशक्ति (चेतना) वहन संस्था की बाधाओं के कारण निर्माण होनेवाले विकारों पर उपाय (२ भाग) ‘ इन ग्रंथों में किया है ।)

 

१३. अनिष्ट शक्तियों के कारण हुए कष्टदायक परिवर्तनों के विषय में, साथ ही अच्छी शक्तियों के कारण हुए दैवीय परिवर्तनों संबंधी शोध

सनातन के रामनाथी आश्रम की वास्तु एवं आश्रम की अनेक वस्तुओं में अनिष्ट शक्तियों के आक्रमणों के कारण कष्टदायक, तो अच्छी शक्तियों के कारण अनेक दैवीय परिवर्तन हुए हैं । ये परिवर्तन पंचमहाभूतों के स्तरों पर हैं । वस्तुओं को दुर्गंध आना, उनका रंग अच्छा न लगना, उन्हें स्पर्श तक करने का मन न होना, कष्टदायक नाद सुनाई देना इत्यादि कष्टदायक परिवर्तनों के कुछ उदाहरण हैं । वस्तुओं को सुगंध आना, उनके रंगों में सुखद परिवर्तन होना, उनका स्पर्श सुखद लगना, भौतिक कारण बिना दैवीय नाद सुनाई देना, दैवीय कण दिखाई देना, वास्तु की फर्श पारदर्शक होना, ये दैवीय परिवर्तन के कुछ उदाहरण हैं । परात्पर गुरु डॉक्टरजी के बताए अनुसार ऐसी असंख्य वस्तुएं अथवा उनके छायाचित्र संग्रहित रखे हैं जिनमें दैवीय परिवर्तन हुए हैं । आध्यात्मिक शोधन द्वारा ऐसे परिवर्तन होने के पीछे कार्यकारणभाव ढूंढा जा रहा है ।

 

१४. हिन्दू धर्म के आचार, धार्मिक कृत्य आदि की उपयुक्तता प्रमाणित करनेवाला शोधकार्य

धोती-कुर्ता अथवा साडी परिधान करने जैसे हिन्दू धर्म के आचार, दोनों हाथ जोडकर नमस्कार करना जैसी धार्मिक कृतियों आदि के कारण व्यक्ति पर आध्यात्मिक स्तर पर कौन से अच्छे परिणाम होते हैं; यज्ञयाग आदि से चैतन्य की प्राप्ति कैसी होती है इत्यादि के विषय में परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक शोधन किया गया है ।

 

१५. प्रार्थना, नामजप, विविध योगमार्ग आदि के कारण होनेवाले लाभ के विषय में शोधकार्य

प्रार्थना, नामजप, मंत्रजप, प्राणायाम, आसन, बंध, मुद्रा, न्यास, आध्यात्मिक यंत्र (उदा. श्रीयंत्र), कुंडलिनीचक्र, इसके साथ ही विविध योगमार्गों का शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्ट एवं आध्यात्मिक गति के संदर्भ में कौन-सा लाभ होता है, इसका भी परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में सैकडों व्यक्तियों पर शोधकार्य किया जा रहा है ।

 

१६. विविध कलाओं के सात्त्विक प्रस्तुतीकरण होने के संदर्भ में शोधकार्य

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में सनातन के साधक-कलाकार अपनी-अपनी कलाओं का सात्त्विक सादरीकरण होने के संदर्भ में सूक्ष्म-स्तर का अध्ययन एवं शोधकार्य कर रहे हैं । इस शोध के अनुसार चित्रकला, मूर्तिकला आदि कलाक्षेत्रों के साधक-कलाकार सात्त्विक कलाकृति भी बना रहे हैं ।

१६ अ. चित्रकला एवं मूर्तिकला

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में बनाए गए देवी-देवताओं के चित्रों में २७ से २९.२ प्रतिशत, तो श्री गणेशमूर्ति में २८.३ प्रतिशत उस देवता का तत्त्व आया है । (कलियुग में देवता के चित्र में अथवा मूर्ति में अधिकाधिक ३० प्रतिशत ही उस-उस देवता का तत्त्व आ सकता है ।) वर्तमान में (मार्च २०१७) परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में श्री दुर्गादेवी के मारक तत्त्वयुक्त मूर्ति बनाई जा रही है ।

(श्री गणेशमूर्ति के विषय में विस्तृत विवेचन श्री गणेशमूर्ति शास्त्रानुसार हो ! इस लघुग्रंथ में किया है ।)

१६ आ. अक्षर एवं अंक का लेखन

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में निर्मित किए गए देवनागरी अक्षर एवं अंकों में ३१ प्रतिशत सात्त्विकता आई है । (कलियुग में अक्षर अथवा अंकों में अधिकाधिक ३० प्रतिशत ही सात्त्विकता आ सकती है ।) बच्चे अक्षर एवं अंक योग्य प्रकार से लिख पाएं, इसलिए सनातन ने ‘सात्त्विक देवनागरी लिपिके अक्षर और अंक लिखने की पद्धति’ नामक ग्रंथ प्रकाशित किया है ।

१६ इ. सात्त्विक रंगोलियां

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में सनातन की साधिकाओं द्वारा विविध देवताओं के तत्त्व एवं आनंद, शांति आदि स्पंदन आकर्षित एवं प्रक्षेपित करनेवाली रंगोलियों की अनेक कलाकृतियां बनाई हैं । ये कलाकृति सात्त्विक रंगोलियां (२ भाग) ग्रंथ में प्रकाशित की गई हैं । इन रंगोलियों में लगभग ३ से ४ प्रतिशत देवताओं का तत्त्व एवं स्पंदन आ गए हैं । इसके साथ ही श्री गणेश की एक रंगोली में १० प्रतिशत गणेशतत्त्व आ गया है । रंगोलियों में अधिकाधिक १० प्रतिशत देवतातत्त्व एवं स्पंदन ला सकते हैं । रंगोली बनानेवाले साधक का भाव एवं आध्यात्मिक स्तर बढते जाने पर ‍तत्त्व की मात्रा भी बढती जाती है ।

१६ ई. सात्त्विक मेंहदी

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शनानुसार सनातन की साधिकाओं ने विविध देवताओं के न्यूनतम २ प्रतिशत तत्त्व युक्त मेंहदी की कलाकृतियां बनाई हैं । (कलियुग में मेंहदी की कलाकृति में अधिकाधिक ५ प्रतिशत देवतातत्त्व आ सकता है ।) इस विषय पर अधिक विवेचन मेंहदी की सात्त्विक कलाकृतियों के प्रकार एवं सात्त्विक मेंहदी ग्रंथ में किया है ।

१६ उ. संगीत एवं नृत्यकला

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने विविध देवताओं के नामजप से उन उन देवताओं के तत्त्व एवं भाव जागृत करनेवाली चाल दी, इसके साथ ही क्षात्रगीतों को क्षात्रवृत्ति जागृत करनेवाली चाल दी । इस विषय में विस्तृत विवेचन देवताओं का नामजप एवं उपासनाशास्त्र (३ भाग) एवं क्षात्रगीत इन श्रव्यचक्रिकाओं में (ऑडियो सीडी में) किया है ।

वर्तमान में शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्टों के कारण होनेवाले इन विकारों पर संगीत द्वारा उपचार करने के विषय में, इसके साथ ही अक्षरों के योग्य उच्चारों के संदर्भ में शोधकार्य शुरू है । नृत्य की विविध शारीरिक स्थिति एवं मुद्राओं के विषय में भी आध्यात्मिक शोधकार्य शुरू है ।

विशेषज्ञ, अध्ययनकर्ता एवं शिक्षा ग्रहण करनेवाले विद्यार्थियों को, साथ ही वैज्ञानिक दृष्टि से शोध करनेवालों से विनती !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के निवासस्थान की वास्तु, अर्थात रामनाथी, गोवा के सनातन संस्था के आश्रम में होनेवाले दैवीय परिवर्तन (उदा. फर्श पर ॐ उभऱना), इसके साथ ही अनिष्ट शक्तियों के चेहरे उभरने का वैज्ञानिक पद्धति से शोध किया जा रहा है । संतों की वास्तु में होनेवाले परिवर्तनों के पीछे कौनसी वैज्ञानिक प्रक्रिया होती है ? इस संदर्भ में वैज्ञानिक दृष्टि से शोध करने में सहायता मिलेगी, तो हम आभारी होंगे । – व्यवस्थापक, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.

(संपर्क : श्री. रूपेश रेडकर, ई-मेल : [email protected])

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