नामजप संबंधी शंकानिरसन

‘नाम’ साधना की नींव है । श्रीकृष्ण ने महाभारत में बताया है कि ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि ।’ अर्थात कलियुग में सर्व यज्ञों में जपयज्ञ मैं हूं । इससे कलियुग में नामजप का महत्त्व स्पष्ट होता है । ३३ करोड देवी-देवताओं में से कौन-सा जप करना चाहिए, नामजप में आनेवाली बाधाएं, गलत धारणाएं इत्यादि के विषय में प्रायोगिक प्रश्नोत्तर इसमें दिए हैं ।

प्रश्न : पहले से ही मेरा नामजप चल रहा है; परंतु कुलदेवता का नहीं । अब आपकी संस्था से कुलदेवता के नाम का महत्त्व समझ में आया; परंतु पहले का नामजप चल रहा है । उसे छोडकर क्या कुलदेवता का नामजप करें ?

उत्तर : हमें जैसे ही योग्य साधना समझ में आती है, उसे तुरंत ही आचरण में लाना चाहिए । अन्यथा अयोग्य साधना करने में हमारी साधना के वर्ष व्यर्थ जाएंगे । कुलदेवता के नाम का महत्त्व ध्यान में आने से पहले हमें अपने उपास्यदेवता का नामजप करना चाहिए । संस्था के संपर्क में आना और योग्य साधना समझ में आना, यह कुलदेवता की ही कृपा है । अब कुलदेवता का नामजप अधिकाधिक करना ही ध्येय होना चाहिए । ऐसा करते हुए पहले का नामजप अपनेआप बीच-बीच में होता होगा, तो कोई हानि नहीं है । कुलदेवता के नामजप का निश्चय हो जाने से पहलेवाला नामजप अपनेआप छूट जाएगा । ऐसी अनुभूति साधकों ने ली है । अध्यात्म में आग्रह नहीं होता । सत्संग लेनेवालों का कर्तव्य है बताना, करना अथवा न करना, अंत में आपके हाथ है ।

आपमें और मुझमें यही मुख्य अंतर है । मैं (प.पू. डॉ. जयंत बाळाजी आठवले) गुरु के पास बहुत देर से अर्थात अपनी आयु के पैंतालिसवें वर्ष आया । तब तक मैं अध्यात्म में भी नहीं था । ‘भगवान इत्यादि कुछ नहीं’ ऐसी ही मेरी विचारधारा थी । मेरा ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका तक, जगभर में मान था; परंतु मुझे अपने विषय की अर्थात सम्मोहन उपचार की मर्यादा ध्यान में आई । मेरे ध्यान में आया कि मेरी तुलना में संत बहुत कुछ कर सकते हैं । सीखने की वृत्ति थी । संतों के पास गया । वे बोले, ‘तुम्हारी सीखने की पद्धति उपयोग की नहीं । हमारे तरीके से सीखो । नाम लो । सेवा करो । त्याग करो । मैंने कहा, ‘‘ठीक है । सब करता हूं !’’ नाम लिया, सेवा के लिए महाराज, गुरु, संत जहां होंगे, वहां जाता था । त्याग के लिए अपना चिकित्सालय गुरु को अर्पण कर दिया । सुनने पर तुरंत ही  किया । इसीलिए केवल पांच वर्षों में ही गुरु के सबसे निकट आ गया ।

‘मैं करूं क्या ?’, ‘मेरी बुद्धि को समझ में आता है’, ‘अब करूं कि नहीं ?’ ऐसी शंका आने पर, जीवन के अनेक वर्ष व्यर्थ चले जाएंगे ।

प्रश्न : मैं अक्कलकोट स्वामी का नामस्मरण कर रहा था । सत्संग में आना प्रारंभ करते ही कुलदेवता का नामस्मरण करता हूं । कोई भी साधना करते रहने पर आध्यात्मिक प्रगति होगी क्या ? इसका कारण यह है कि सत्संग में बताया गया है कि ‘अनेक से एक में आओ’ ।

उत्तर : संतों का जप न करें । अपना सहस्रों वर्षों का इतिहास है, उसमें प्रचंड सामथ्र्य के ऋषि-मुनि होकर गए, किसी ने भी ऐसा नहीं कहा है कि ‘हमारे नाम का जप करें ।’ किसी के मन में ऐसा विचार भी कभी आया नहीं होगा । संत मीराबाई ने कभी नहीं कहा कि संत सूरदास का नामजप करो । तदुपरांत भी इतने संत हुए किसी ने भी नहीं कहा कि संत सूरदास का नामजप करें । ‘अपने नाम का जप कोई कर रहा है’, यह यदि संत को पता चला होता, तो उन्होंने उसे थप्पड मार कर कहा होता, ‘मेरे नाम का जप क्यों करते हो, राम का जप करो !’ हमारे यहां कहीं भी ऐसी परंपरा नहीं है ।

दूसरी बात यह है कि प्राचीन काल के संतों के मंदिर कहीं भी दिखाई नहीं देंगे ।  राम-कृष्ण अवतार हैं, इसके साथ ही शंकर, विष्णु, गणपति ये सर्व देवता हैं, वे अनादि काल से हैं और अनंत काल तक रहनेवाले हैं ।

१. एक सत्संग में साधकों से दो मिनट के लिए दो नामों का जप करने के लिए कहा गया और क्या अनुभूति आती है, वह देखें । दोनों नाम उन्होंने कभी भी सुने नहीं थे । इसलिए मानसशास्त्र का कोई संबंध नहीं आया था । सर्व लोगों ने कहा कि पहला नाम दो मिनट तक करते समय उन्हें अच्छा लगा और दूसरा नाम दो, चार, दस, बीस बार लेने से लेने का मन नहीं करता था । पहले जो नाम था, वह देवता का नाम था और दूसरा नाम वर्तमान काल के एक महान संत का था । संतों के नाम के कारण कष्ट हुआ । ऐसा क्यों ? वह इसलिए कि संत कुछ कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आते हैं । कार्य करने के लिए उन्हें शक्ति लगती है । संतों की कार्यरत शक्ति बहुत होती है । वह हमें सहन नहीं होती । ईश्वर-भगवान भी वह कार्य करते हैं; परंतु उनकी शक्ति कार्यतक ही मर्यादित रहती है, अर्थात क्षणिक होती है । वे शिवस्वरूप में चले जाते हैं । इसलिए उनकी शक्ति नष्ट हो चुकी होती है । संतों की शक्ति सहन नहीं कर सकते हैं । ईश्वर का ऐसा कभी नहीं होता ।

प्रश्न : ‘गाय के पेट में ३३ करोड देवी-देवता होते हैं’, ऐसा हम कहते हैं । तो ३३ करोड देवी-देवताओं में कुलदेवता आते हैं क्या ? कुलदेवता भी आते हैं, तो क्या गाय का ही जप करें ?

उत्तर : पूर्वकाल में क्या करते थे, वह पुराणपूर्व काल की बात है । हम गणेश चतुर्थी को गणपति की मूर्ति लाते हैं न; उस समय वे स्वयं आटे से श्री गणेश की छोटी-सी मूर्ति बनाते और उसकी पूजा होते ही, अर्थात उसमें गणपति के सर्व पवित्रक आवाहन करने पर आते ही श्री गणेश की मूर्ति खा लेते थे । हो गया विसर्जन ! इतने वे होशियार थे । अपने ऋषि-मुनियों ने भिन्न-भिन्न इतने प्रयोग किए हैं और उसमें जो सत्य है, वह बता रखा है । अब विषय यह है कि गाय के पेट में ३३ करोड देवी-देवता हैं ।

करोड शब्द के आठ-नौ विविध अर्थ हैं । संस्कृत उत्पत्ति कोष के अनुसार करोड शब्द कोट से बना है । कोट का एक अर्थ है नग्न । देवताओं का हमारे समान शरीर नहीं होता । वे वायुरूप होते हैं । हमारी आंखों को वे अच्छे दिखाई दें इसलिए हम उन्हें कपडे, साज-शृंगार, मुकुट इत्यादि परिधान करते हैं । कोट का दूसरा एक अर्थ है ‘प्रकाशमान ।’ तीसरा अर्थ है, दिशांत रहनेवाला ‘दिशोत्भव’ । जिस स्थान पर दो दिशाएं जोडी जाती हैं, उस स्थान पर वह शक्ति निर्माण होती है । ऐसे आठ-नौ विविध अर्थ हैं । यहां करोड शब्द संख्यावाचक नहीं है ।

सात प्रमुख तत्त्व हैं । उन्हें ग्रहण करने की क्षमता कुलदेवता के नाम में है । उनका नाम लेने से हममें जो तत्त्व न्यून होगा, उसे बढने में सहायता मिलती है । उदा. शिवतत्त्व न्यून होगा, तो वह बढने लगता है । विष्णुतत्त्व न्यून होगा, तो वह बढने लगता है । प्राणियों में गाय एक ऐसा प्राणि है, जिसमें सर्व देवी-देवताओं के स्पंदन, पवित्रक आकृष्ट हो सकते हैं । जैसे विविध देवताओं के विविध वाहन होते हैं, उदा. सरस्वती का वाहन मोर है, तो श्री गणेश का मूषक (चूहा) । इसका अर्थ है मोर में सरस्वती का, तो मूषक में गणेशतत्त्व आकर्षित करने की क्षमता सबसे अधिक है । ‘गाय’ सभी देवताओं का तत्त्व ग्रहण कर सकती है; इसलिए हम उसका दूध पीते हैं । उसके दूध से अपनी क्षमता बढती है ।

एक बार मुंबई के अभ्यासवर्ग में हमने (प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजी ने) एक सूक्ष्म का प्रयोग किया था । बाहर से समान दिखाई देनेवाले चार डिब्बे रखे थे । एक में फल रखे थे, दूसरे में साबुदाना की खिचडी और तीसरे में रोटी-भात इत्यादि सदा का अन्न रखा था और चौथे में मछली रखी थी । जिन साधकों की साधना को दो वर्ष हो गए थे, उन्होंने अचूकता से पहचान लिया । एक डिब्बे की ओर देखने का मन नहीं कर रहा था । खोलकर देखा, तो उसमें मछली थी । दो डिब्बों में जिसमें फल और साबुदाना की खिचडी इत्यादि उपवास के पदार्थ थे, उनकी ओर देखकर अनेक लोगों को प्रसन्न लगा । साबुदाना की खिचडी इत्यादी उपवास के पदार्थ और फल थे । यह सर्व बुद्धि द्वारा समझ में नहीं आता है, साधना बढने पर यह सर्व शास्त्र की अनुभूति हमें अनुभव होती है ।

प्रश्न : नामस्मरण करते समय मन में अनेक विचारों की शृंखला होती है और मन में बहुत संभ्रम होता है । ऐसे में क्या करना चाहिए ?

उत्तर : सर्वप्रथम ३० प्रतिशत स्तर पर हम जब नाम लेना आरंभ करते हैं, तब ७० प्रतिशत अन्य विचार मन में आते ही हैं । जो नाम नहीं लेते, उनके नाम लेने का प्रयत्न करने पर दो-तीन मणि फेरने पर, ध्यान में आएगा कि एक अलग ही विचार मन में आकर जाता है । आगे ऐसा ही अभ्यास करते रहने पर विचार आने का प्रमाण न्यून होने लगता है । नामजप करते समय विचार न आना, मन एकाग्र होना, यह हमारा साध्य है, साधन नहीं । नाम का पुनः पुन: प्रयत्न करना, यह साधन है । ३० सेकंद (एक चौथाई माला) मन एकाग्र करते आ गया, तो समझें कि हमें धारणा साध्य होने लगी है । मन में एक भी ही विचार नहीं आया और माला कर पाए, तो उसे ‘ध्यान लग गया’, ऐसा कह सकते हैं । यह इतना कठिन है ।

नामजप नहीं होता; इसलिए प्रयत्न करते रहने के स्थान पर सत्संग में जाना चाहिए । सत्संग में अनेक सात्त्विक लोग एकत्र आते हैं । अनेक लोगों की एकत्रित सात्त्विकता किसी भी एक व्यक्ति की तुलना में बहुत अधिक होती है । इसलिए एकत्रित सात्त्विकता का हमारे मन पर परिणाम होता है । सत्संग के पश्चात घर लौटने पर थोडी-बहुत सात्त्विकता हम घर ले आते हैं । उसका लाभ हमें नामस्मरण बढाने के लिए होता है ।

नाम मन की साधना है । वह नहीं होती, तो तन की साधना अर्थात सेवा करें, उदा. मंदिर झाडना, आश्रम झाडना, बिजली का काम, रंगाई-पुताई का काम जो भी संभव हो वह करनी चाहिए । उस स्थान पर जो आवश्यक है, वह करते रहना है । वह सत्सेवा अर्थात साधना ही है । वह करते-करते नाम ले सकते हैं ।

अनेक लोगों को प्रथम पूजा-पाठ, मंदिर जाना, पोथी पढना इतनी ही साधना संभव है । जिसे साधना में थोडी रुचि है, वह साधना का आरंभ यहां से करे । देवपूजा करते समय उसे मन लगाकर करें । भगवान को लगना चाहिए कि आज मेरी सचमुच कितने प्रेम से पूजा की । अन्यथा केवल निबटाना है तो भगवान को फटाफट लोटे से पानी लेकर उडेल देना, साथ ही में किसी से बातें भी करते जाना अथवा बच्चों को कुछ बताते जाना…। यह योग्य नहीं है । भगवान की पूजा एकाग्र मन से करनी चाहिए । यदि गुरु हैं तो स्नान कैसे करवाएंगे, ऐसा विचार रखने से ध्यान यहां-वहां नहीं जाएगा । जिस भाव से हम गुरु की ओर देखते हैं, उस भाव से उस देवता की मूर्ति की ओर देखना चाहिए । पोथी वाचन, मंदिर जाना इत्यादि के विषय में भी यही नियम है । जैन लोग नामस्मरण करने के लिए मंदिर जाते हैं । घर की तुलना में मंदिर अधिक सात्त्विक होता है । जिसे सत्संग नहीं मिल सकता है, वह मंदिर में जाकर कम से कम दो-तीन माला तो करे । दो-तीन वर्षों में पूजा में मन को अच्छा लगने लगा, मन में अष्टसात्त्विक भाव जागृत होने लगे, आनंद मिलने लगा कि समझ लें कि पूजा का चरण पूर्ण हो गया । अब नामजप निश्चित रूप से हो सकेगा । ऐसे चरण दर चरण आगे जाना है ।

प्रश्न : मैं खाली समय में नामस्मरण करता हूं । उस समय मन एकाग्र नहीं होता है । मन में अन्य विचार आते हैं । इसके लिए क्या करें ?

उत्तर : मन एकाग्र होना, यह हमारा साध्य है । साधन नहीं । जिस समय मन एकाग्र होने लगे, तब आप संत हो जाएंगे ! मन एकाग्र होने हेतु मन की आसक्ति, अर्थात जिसके संदर्भ में मन में विचार आते हैं, जैसे ‘मेरा बेटा’, ‘मेरी पत्नी’, ‘मेरा धंधा’, ‘मेरी समाजसेवा’ इत्यादि सभी हम छोड देते हैं । तब मन में विचार नहीं आते हैं । अफ्रीका में क्या चल रहा है, अमेरिका में राष्ट्राध्यक्ष के चुनावों में क्या हो रहा है, ऐसे विचार हमारे मन में नहीं आता है; इसलिए कि हमारा इन बातों से संबंध ही नहीं है । एक-एक पाश तोडते गए कि नामस्मरण अच्छा होता है ।

प्रथम हमारे लिए पाश तोडना संभव नहीं होता । इसलिए नामजप के साथ थोडी-बहुत तो सेवा करनी चाहिए । थोडा – बहुत त्याग करें । ऐसा करते-करते हमारे ध्यान में आता है कि हम जितनी सेवा करते हैं, जितना हम त्याग करते हैं, उतना आनंद मिलने लगता है । अपने पास अधिकोष में (बैंक में) जितने पैसे हैं; इसलिए हमें जितना सुख मिलता है, उससे भी अधिक आनंद ‘हमारे पास कुछ नहीं’, ‘हमने सर्व अर्पण कर दिया है’, ऐसा होने पर मिलता है । मैंने स्वयं अनुभव किया है । मेरा चिकित्सालय था, तब मेरी बहुत अच्छी ‘प्रैक्टिस’ थी । महीने में २० – २५ सहस्र रुपये मिलते थे । पैसों से अधिक संशोधन में रुचि थी । वर्ष १९८५ – १९८६ में तीन-चार घंटों में उतना मिलता था; परंतु जब चिकित्सालय गुरु को अर्पण किया, तब अब वे जो भी देंगे उतने ही पैसों में संसार करना चाहिए’ ऐसा लगने लगा । फिर गुरु के पास अधिकाधिक जाना होने लगा । तदुपरांत २५ सहस्र की ‘प्रैक्टिस’ १० सहस्र और फिर दो सहस्र रुपयों तक आ गई । अधिकोष (बैंक) के सर्व पैसे समाप्त होने लगे । अधिकोष में पैसे नहीं हैं । यह होने पर गुरु ने दिखा दिया कि अधिकोष में एक पैसा भी न होते हुए भी तुम्हारा सब कुछ पहले समान ही चल रहा है । गाडी है, छपाई का खर्च बढ गया है, गांव-गांव जाना हो रहा है, खर्च बढता ही जा रहा है; परंतु गुरु कुछ भी कम नहीं पडने दे रहे हैं । आप यदि अपना पैसा अपने पास ही रखेंगे, तो भगवान आपकी किसलिए सहायता करेंगे ? आपको अपने अधिकोष के खाते पर अधिक विश्वास है, परमेश्वर पर नहीं । भगवान कहेंगे, ‘तुम और तुम्हारे अधिकोष के खाते ।’ तुम सर्व अर्पण करो, फिर उसका (भगवान का) जो अधिकोष है, वह भगवान आपके लिए खोल देेंगे ।

नाम नहीं होता, तो सत्संग में आते जाओ । घर में बैठकर नामजप करना, कठिन होता है । वास्तु में सर्व विचार होते हैं । घर के सभी लोग सामने होते हैं, तो उनके विषय में विचार आएंगे । जैन लोगों में एक अच्छी पद्धति है । प्रतिदिन सवेरे वे डिब्बी लेते हैं जिसमें उनकी जपमाला होती है, उसे लेकर वे मंदिर जाते हैं और वहीं नामस्मरण करते हैं । एक तो घर के वातावरण से दूर जाते हैं और साथ ही मंदिर में सात्त्विकता होती है । जहां सात्त्विकता है, वहां अपना नामस्मरण अच्छा होता है । ये दो बातों के साथ-साथ सेवा, त्याग में यदि वृद्धि करते हैं, तो नामस्मरण कैसे अच्छा होता है, इसकी अनुभूति लें ।

प्रश्न : अनेक वर्षों से मेरे मन में एक शंका है । मुझे स्वप्न में एक जप मिला । मैं वह जप नियमितरूप से करता हूं । आगे जैसे-जैसे मैं जप करता गया मुझे लगने लगा कि मुझे उससे कष्ट होने लगा है । इसलिए मैं अब प्रतिदिन १०८ बार नामजप करता हूं । इस प्रकार का जप करना चाहिए या नहीं ?

उत्तर : स्वप्न में मंत्र समझ में आने के उपरांत जागृतावस्था में वैसे अनुभूति आई, उदा. कोेई पुस्तक पढते समय वही मंत्र पढा, कोई मिला और उसने भी वही मंत्र बताया, तो फिर उसे स्वप्नदृष्टांत मानना चाहिए । यदि ऐसे नहीं हुआ तो सतत तीन रात्रि स्वप्न में वही मंत्र मिला, तो उसे सत्य समझें । स्वप्न के विषय में ये दो नियम ध्यान में रखने चाहिए ।

भुवलोक में ऐसी अनेक आत्माएं हैं जो यहां-वहां भटक रही हैं । उन्हें लगता है कि वे किसी को कुछ बताएं, किसी से हंसी-मजाक करें । इसलिए वे ऐसे ही कुछ तो बताती रहती हैं । उनकी सुनकर हम वह जप करने लगे तो उन्हें अच्छा लगने लगता है । उत्पाती लडके जैसे किसी को गलत पता बताकर, जब वह व्यक्ति उस दिशा में चलने लगता है, तब वे हंसने लगते हैं । उसी प्रकार इन आत्माओं का भी होता है । इनके भुवलोक में एक प्रकार की अनिष्ट शक्ति होती है, जिसे अच्छा नहीं लगता है कि कोई साधना करे । साधना करने से हम परमेश्वर के निकट जा सकते हैं । वे सभी शक्तियां परमेश्वर के विरोध में होती हैं और वे सदैव बाधाएं उत्पन्न करती हैं । विकल्प निर्माण करती हैं । झूठी साधना बताती हैं; इसलिए स्वप्नों में बताई बातों पर तुरंत ही विश्वास नहीं रखना चाहिए । शास्त्र के नियमों के अनुसार साधना करनी चाहिए ।

प्रश्न : स्त्रियों को कोई भी उपासना करते समय मासिक धर्म की बार-बार अडचन आती है । कोई ग्रंथ पढने के लिए लिया हो अथवा कोई उपासना करने का निश्चय किया, तो वह उपासना खंडित हो जाती है । अनेक धार्मिक ग्रंथों में लिखा है कि नामस्मरण करते समय मासिक धर्म की रूढि का पालन नहीं किया, तब भी कोई बात नहीं । यह कहां तक सत्य है ?

उत्तर : भक्तिमार्ग में दो भाग हैं । उनमें से एक है कर्मकांड । संपूर्ण भक्तिमार्ग में कर्मकांड एक छोटा-सा भाग है । उसमें सर्व नियमों का पालन करना होता हैं । हम भक्तिमार्ग का अनुसरण करते हैं । प्रत्येक बात यदि परमेश्वर ने ही निर्माण की है, तो मासिकधर्म भी उन्होंने ही निर्माण किया है । शौच भी उन्होंने ही निर्माण किया है । नाम लेते हुए कोई भी अडचन नहीं आती है । नाम कहीं भी और कैसे भी लें ।

व्रत के विषय में यदि बीच में ही कोई अडचन आ गई, तो क्या करना चाहिए, यह हमारे शास्त्रों में लिखा है और उसी अनुसार पुरोहित बताते हैं । जैसे ‘किसी अन्य स्त्री को बैठा दें जो आपका व्रत पूरा कर सकेगी’ अथवा ‘यह प्रायश्चित लें’, ‘अगली बार पुन: आरंभ करें’ । कुछ व्रत और उपासना पद्धति में ऐसा भी लिखा है कि जो हुआ वह ठीक है । अंतर हो गया न, उसके अगला भाग पुन: आरंभ कर सकेंगे , अर्थात उस-उस प्रमाण में नियम में परिवर्तन होता जाता है ।

प्रश्न : घर में महिलाओं की मासिक अडचन होते हुए नाम लें अथवा नहीं ?

उत्तर :नाम भक्तिमार्ग का है । भक्तिमार्ग में ऐसे कोई बंधन नहीं होते हैं । जहां कर्मकांड का भाग है, वहां सोयर-सुतक, शौच-अशौच इत्यादि पालना होता है । परंतु नामजप आते-जाते, उठते-बैठते, राजद्वार, स्मशान, मैथुन करते समय भी कर सकते हैं ।

प्रश्न : क्या नाम गुरु से ही लेना चाहिए ? मैं ज्योतिषी हूं । मेरे पास अनेक लोग आते हैं । उनकी पत्रिका देखकर मैं उनसे अमुक देवता की उपासना करने के लिए कहता हूं । जिनकी पत्रिका नहीं होती, उन्हें ‘अपनी पंसद के अनुसार देवता की उपासना करो’, ऐसे कहता हूं; परंतु उतने में उनका समाधान नहीं होता । ऐसे में मैं क्या कर सकता हूं ?

उत्तर : ‘गुरुमंत्र’ ऐसा शब्द है, ‘ज्योतिषमंत्र’ ऐसा शब्द नहीं है । अनेक ज्योतिष स्वयं को गुरुपद पर समझकर लोगों को कुछ तो बताते रहते हैं । ज्योतिषों को गृहपीडा के संदर्भ में अभ्यास होता है । उस संदर्भ में उपासना होगी, तो उन्हें कुछ बताना अत्यंत उचित है । संस्कृत में एक अच्छा सुवचन है । जैसे किसी को कोई अडचन आती है, तो वह वैद्य के पास जाता है, तो वैद्य कहेंगे, ‘‘अरे, तुम्हें वात-पित्त-कफ में कोई अडचन होगी !’’ वही रोगी यदि मांत्रिक के पास जाता है, तो मांत्रिक कहता है, ‘‘भूतबाधा, करनी जैसे कुछ होगा ।’’ ज्योतिष के पास जाने पर वे कहेंगे, ‘‘अमुक एक ग्रह के कारण ऐसा हुआ है ।’’ फिर सत्य क्या है कैसे समझ में आएगा ? प्राचीन काल से ही सभी के लिए यह प्रश्न उठता है कि अडचन वास्तव में कैसे निर्माण होती है ?

अनेक अडचनें इस सूक्ष्म के कारणों से निर्माण हुई होंगी । स्थूल के कारण बहुत कम होते हैं । पंचज्ञानेंद्रिय, मन और बुद्धि को जो समझ में आता है, वह सभी को स्थूल कहेंगे और जो पंचज्ञानेंद्रिय, मन और बुद्धि को समझ में नहीं आती, उसे सूक्ष्म कहना होगा । ६५ से ७० प्रतिशत बातों के कारण सूक्ष्म के होंगे । सूक्ष्म के कारण हमें बुद्धि द्वारा समझ में नहीं आते हैं । उसके लिए ज्योतिषशास्त्र है । ज्योतिषशास्त्र में बुद्धि द्वारा सूक्ष्म की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न किया था; परंतु उसे मर्यादा आती है । नीचे दिए गए एक-दो उदाहरणों से सूक्ष्म के कारण कैसे होते हैं, यह हमें ध्यान में आता है । अथक प्रयत्न करने पर भी किसी का धंधा नहीं चल रहा है । किसी का विवाह ही नहीं तय हो रहा है । किसी के यहां केवल लडकियां ही जन्म ले रही होती हैं अथवा हमेशा गर्भपात होते हैं । अनेक डॉक्टरों की सलाह लेकर भी कोई लाभ नहीं होता है । भरपूर मानवी प्रयत्न करने पर भी सफलता नहीं मिलती । ऐसे में समझ में आता है कि बुद्धि के परे कुछ तो होता है । बुद्धि के परे जानने के लिए ज्योतिषशास्त्र थोडा-बहुत उपयोगी होता है । ज्योतिषी जन्मकुंडली अनुसार जो बताते हैं, उनमें से सामान्यत: ३० से ३५ प्रतिशत ठीक आता है । जिन ज्योतिषों का बहुत अभ्यास है, स्वयं की साधना है, तो उनकी सत्यता का प्रमाण और बढता जाता है । बालक का जन्म होते समय, उसका सिर नीचे दिखाई देने लगे और वह समय ध्यान में आते ही जन्मकुंडली बनाने पर, वह ३८ प्रतिशत तक अचूक आती है । उससे पहले जब गर्भाशय का आकुंचन प्रथम होने लगता है, तब वह पहला सेकंद ध्यान में आकर यदि कुंडली बनाई जाए, तो वह लगभग ४४ प्रतिशत तक अचूक आती है । उससे पहले अर्थात गर्भाशय की हलचल होते समय स्त्री को पहली बार जब समझ में आता है, वह क्षण ध्यान में रखकर जन्मकुंडली बनाने पर, वह लगभग ४७ से ४८ प्रतिशत अचूक आती है । सबसे अचूक अर्थात जिस क्षण स्त्रीबीज फलित होता है, वह क्षण समझ में आए, तो कुंडली १०० प्रतिशत अचूक आती है; परंतु वह समझ में किसके आएगा ? हमारे शरीर की करोडों पेशियों में से एक पेशी में क्या हो रहा है, वह हमारी समझ में नहीं आ सकता है । जो स्त्री स्वयं संत के स्तर पर है, उसे ही यह समझ में आ सकता है । पूर्वकाल में ऋषि-मुनियों की पत्नियों को उसी क्षण समझ में आता है कि अब गर्भधारणा हो गई । आजकल हमारी समझ में नहीं आता है । हमारी सदिच्छा से दूसरों का भला हो, इस सात्त्विक इच्छा से कुछ तो सहायता कर रहे हैं, इसका उन्हें अवश्य लाभ होगा ।

प्रश्न : नामस्मरण का महत्त्व स्पष्ट है; परंतु ‘नामस्मरण नहीं होता’, ऐसा कहने पर बताया जाता है कि ‘सेवा हो रही है ना, फिर होे गया !’, परंतु महत्त्व किसे दें सेवा को अथवा नामस्मरण को ?

उत्तर : हम प्रत्येक जन भिन्न हैं । नामस्मरण, मन की साधना है । सेवा, तन की साधना है । त्याग, धन की साधना है । आज नहीं तो कल, सब कुछ करना ही है; परंतु पहले क्या और बाद में क्या, कल सबकुछ करना ही है; परंतु किसे पहले और किसे बाद में, ऐसा अनुभव होता है, तो वह आपकी जो प्रकृति है, उस अनुसार करें । अर्थात जिस शरीर द्वारा सेवा करना संभव होता है, उससे आप प्रारंभ करना चाहिए । तदुपरांत नाम का प्रयत्न करना चाहिए । जिसे नामस्मरण संभव होता है, उससे शरीर द्वारा सेवा करने का प्रयत्न करना चाहिए । अंत में सब कुछ करना है । कहां से प्रारंभ करना चाहिए, कहां उसका अंत हुआ, उससे कुछ बिगडेगा नहीं ।

हमारी जो प्रकृति होती है, अर्थात कुछ लोगों का आध्यात्मिक स्तर जरा ऊपर होगा, तो उन्हें मन की सेवा तुरंत करना संभव होता है । और कुछ ऊंचा स्तर होगा, तो उन्हें धन का त्याग संभव होता है स्तर अल्प होगा, तो शरीर की सेवा संभव होती है; परंतु प्रत्येक बार शरीर की सेवा करता है तो स्तर अल्प है, ऐसा कुछ नहीं होता है । जिससे जो साधना उसकी प्रगति के लिए आवश्यक होती है, भगवान उससे वह करवा लेता है । मैं गुरु के पास जाता था । प्रथम अध्यात्म समझकर लेना, प्रश्न पूछना इत्यादि चलता था । अर्थात मेरी वह पूरी बुद्धि और मन की साधना होती है । फिर करते-करते गुरु ने ऐसे किया कि सभी प्रश्नों के उत्तर अंदर से समझ में आने लगे । मुझे शब्द से कुछ पूछना नहीं चाहिए । इस अवस्था में एक-डेढ वर्षों में लाए; परंतु मेरी वह बुद्धि का भाग हुआ । शरीर का भाग नहीं हुआ था । गुरु के पास जाने पर उन्हें प्रश्न पूछता था । एक-दो घंटे में वह उत्तर देते थे । कभी पचास प्रश्न होते थे, कभी सौ प्रश्न होते थे । कभी मुझे सूत्र समझ में नहीं आते थे । मैं पुन: पुन: पूछता था, बाबा मुझे यह समझ में नहीं आया है । यह जरा आप मुझे पुन: बताएं । फिर वे उसे उदाहरण देकर समझाते थे । इससे बुद्धि का भाग समाप्त हो गया है । फिर मन का भाग समाप्त होने पर उन्होंने बताया, ‘‘डॉक्टर, अब तुम आश्रम में आए हो न, तो यहां के पत्थर हटाकर स्थान एकदम स्वच्छ करो ।’’ नासिक-पुणे मार्ग पर बाबा के कांदली के आश्रम में मेरे तन की सेवा का प्रारंभ हो गया । कुछ भक्त उनके पास आए थे, उन्हें पहले तन की सेवा करने के लिए कहा और फिर मन और बुद्धि की सेवा करवा ली । अर्थात पहले क्या करना चाहिए, बाद में क्या करना चाहिए, इसका विचार न करें । हमें सब कुछ करना चाहिए । सर्व साधना, यह सत् के संबंध में है, असत् के विषय में नहीं । यह ध्यान में रखें ।

मैं पेण नामक एक स्थान पर गया था । वहां अपना सत्संग, व्याख्यान था । मंदिर थे । मंदिर जाने पर देखा कि सभी ओर मकडी के जाले थे । तो क्या हमें ऐसे स्थान पर रहना अच्छा लगेगा ? तो फिर भगवान कैसे रहेंगे ? जहां कचरा पडा है, गंदगी है, वहां हमें रहना अच्छा नहीं लगता । तो भगवान को तो बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा । ये सर्व साधना हमें करनी है । कौन-सी पहले और कौन-सी बाद में, यह प्रश्न वैसे गौण है ।

प्रश्न : जप करते समय कभी-कभी भगवान का कोई अवयव दिखाई देता है, उदा. जटा, धुंधला-सा चेहरा आदि । संपूर्ण मूर्ति दिखाई नहीं देती । यह अच्छा है अथवा बुरा ?

उत्तर : यह अच्छी अनुभूति है । साधना करते-करते धीरे-धीरे दर्शन होने लगते हैं । अनेक साधकों को संपूर्ण चेहरा दिखाई नहीं देता है । प्रथम थोडा-सा भाग दिखाई देता है और साधना बढने पर दूसरा भाग दिखाई देता है । तीसरा भाग दिखाई देता है । ऐसा होते-होते संपूर्ण दर्शन होते हैं । अर्थात अनिष्ट शक्तियों का प्रश्न ही नहीं उठता है ।

प्रश्न : दत्त का जप करने से शरीर में परिवर्तन होने लगता है । जैसे हलके लगना, शरीर का थरथराना इत्यादि । कुछ ही देर में कुछ भी भान नहीं रहता है । ऐसे लगता है कि ‘अपने शरीर में कुछ शेष नहीं रह गया है ।’, परंतु कुलदेवता का जप करने से वैसा कुछ नहीं लगता, तो किसका जप करना इष्ट होगा ?

उत्तर : ‘भान नहीं रहता’, ‘थरथराना’, यह हमें साधना में नहीं चाहिए । भान न रहने से कैसे चलेगा ? साधना के कारण चित्त पर अनेक जन्मों की वासना, रुचि-अरुचि, स्वभावदोष, लेन-देन, ये सर्व संस्कार पोछ डाले जाने चाहिए । इसीलिए ही तो हम साधना करते हैं । शक्ति के कारण शरीर कांपना अथवा बेभान होकर जाना, यह साधना में अपेक्षित नहीं है । दत्त का नामजप करते हुए वह जो कुछ भी हो रहा है, वह उन्हें इसलिए हो रहा है कि उन्हें पूर्वजों का कष्ट है । पहले के जन्मों का लेन-देन होने से कुछ पूर्वजों को अपने वंशजों को कष्ट देना होता है । कुलदेवी के नाम में इस प्रकार का कष्ट सहसा नहीं होता है । इसलिए ऐसे लोग दत्त भगवान का भी नामजप करें । २ – ३ महिने होने पर शरीर का थरथराना अथवा भान न रहना इत्यादि बंद हो जाएगा ।’

प्रश्न : ‘दिगंबरा दिगंबरा’ का वास्तविक अर्थ क्या है ? इस जप में दत्त का नाम नहीं आता है, तब वहीं जप क्यों करते हैं ? उसके स्थान पर ‘दत्त’, ‘जयदत्त’, ‘श्रीदत्त’ इन नामों का जप क्यों नहीं करते ?

उत्तर : ‘दिगंबरा’ दत्त का ही नाम है । श्रीपाद और श्रीवल्लभ, ये दत्त के अवतारों के नाम हैं । साईबाबा, गजानन महाराज और अक्कलकोट स्वामीजी का कुछ लोग जप करते हैं । ईश्वर के अवतार का जप करने की अपेक्षा प्रत्यक्ष ईश्वर का जप करने से अधिक लाभ होनेवाला है, यह लोगों को पता नहीं होता; इसलिए सनातन के साधकों को गांव-गांव जाकर ‘अध्यात्म’ क्या है ?, यह सिखाना पडता है । सर्व अवतार अंशात्मक, कलात्मक होते हैं । उनमें ईश्वर का पांच से दस प्रतिशत अंश होता है । उनकी उपासना करने की अपेक्षा सौ प्रतिशत जो ईश्वर है, उसकी उपासना करने पर निश्चित ही लाभ होगा ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित दृश्यश्रव्य-चक्रिका ‘अध्यात्मसंबंधी शंकानिरसन’