नामजप कौनसा करें ?

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जीवन के दुःखों का धीरज से सामना करने का बल एवं सर्वोच्च श्रेणी का स्थायी आनंद केवल साधनाद्वारा ही प्राप्त होता है । साधना अर्थात् ईश्वरप्राप्ति हेतु आवश्यक प्रयत्न । गुरु की कृपा बिना साधनाद्वारा ईश्वरप्राप्ति साध्य करना अत्यंत कठिन है । गुरुकृपाद्वारा ईश्वरप्राप्तिकी दिशामें बढना, अर्थात् ‘गुरुकृपायोग’ । गुरुप्राप्ति हेतु व गुरुकृपाका वर्षाव निरंतर होने हेतु आवश्यक साधना है ‘गुरुकृपायोगानुसार साधना’ ।

 

आध्यात्मिक उन्नति हेतु कुलदेवता का नामजप

पूजा, आरती, भजन इत्यादि उपासना-प्रकारोंके कारण देवताके तत्त्व का लाभ मिलता है; परंतु इन सर्व उपासनाओं के आचरण पर मर्यादा लागू होने के कारण लाभ भी मर्यादित ही मिलता है । देवता के तत्त्व का लाभ निरंतर होने हेतु देवता की उपासना भी निरंतर होना आवश्यक है । निरंतर संभव उपासना एक ही है और वह है नामजप । कलियुग हेतु सरल व सर्वोत्तम उपासना है नामजप । ‘गुरुकृपायोगानुसार साधना’ की नींव है, नामजप ।

१. कुलदेवता के नामजप का महत्त्व

गुरुप्राप्ति हुई हो और गुरुमंत्र मिला हो, तो वही जपें; अन्यथा ईश्वरके अनेक नामोंमेंसे कुलदेवताका नामजप प्रमुखतः आगे दिए दो कारणों से प्रतिदिन १ से २ घंटे तथा अधिकाधिक निरंतर करें ।

अ. जिस कुल के देवता, अर्थात् कुलदेवी या कुलदेव, हमारी आध्यात्मिक उन्नतिके लिए अत्यंत उपयुक्त होते हैं, ऐसे कुल में ईश्वर हमें जन्म देते हैं ।

आ. अंतिम श्वासतक प्रत्येक को अपने प्रारब्ध की तीव्रता भुगतनी पडती है । कुलदेवता के नामजप से यह कम होती है ।

कुलदेवता और कुलदेवी दोनों हों, तब कौन-सा नामजप करें ?
  • हम बचपन में पिताजी की अपेक्षा मां से अधिक हठ करते हैं; क्योंकि वह हमारा हठ शीघ्र पूरा करती है । उसी प्रकार कुलदेवता की अपेक्षा कुलदेवी शीघ्र प्रसन्न होती हैं ।
  • कुलदेवी, कुलदेवाता की अपेक्षा पृथ्वीतत्त्व से अधिक संबंधित होती हैैं । उसके नाम से साधना आरंभ करने पर कष्ट नहीं होता ।
  •  जिनके केवल कुलदेवता हैं, वे उन्हीं का जप करें; उदा. श्री व्यंकटेश कुलदेवता हों, तो श्री व्यंकटेशाय नमः जप करें ।
  •  परात्पर गुरु का दिया नामजप आध्यात्मिक उन्नति में १००, कुलदेवी का ३० तथा कुलदेवता का २५ प्रतिशत उपयोगी होता है ।

२. कुलदेवता के नामको जपने की पद्धति

कुलदेवता के नाम के आगे ‘श्री’ जोडें एवं नाम को संस्कृत भाषानुसार चतुर्थी (य, वे, व्यै) प्रत्यय लगाकर अंत में ‘नमः’ जपें, उदा. यदी कुलदेवता गणेश हों, तो ‘श्री गणेशाय नमः’, कुलदेवी भवानीमां हों, तो ‘श्री भवानीदेव्यै नमः’ जपें । चतुर्थी प्रत्ययका अर्थ है ‘को’ । इसका आशय है, जिस देवताका हम नाम जपते हैं, उस ‘देवताको नमस्कार’ ।

सनातन-निर्मित नामपट्टी
सनातन-निर्मित नामपट्टी

 

३. कुलदेवता ज्ञात न हो तो कौनसा नामजप करें ?

यदि कुलदेवता ज्ञात न हो, तो इष्टदेवता के नाम का अथवा ‘श्री कुलदेवतायै नमः’ जपें । इसके पूर्ण होने पर कुलदेवता का नाम बतानेवाले व्यक्तिसे भेंट हो जाती है । कुलदेवता का जप पूर्ण होनेपर साधकके जीवनमें गुरु स्वयं आकर गुरुमंत्र देते हैं ।

 

पितृदोष निवारण हेतू दत्तात्रेय देवताका नामजप

१. श्री दत्तात्रेय देवताका नामजप

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कुलदेवता के नामजप के साथ ही दत्तात्रेय देवता का नामजप भी आवश्यक है ।

वर्तमान में पूर्व की भांति कोई श्राद्ध-पक्ष इत्यादि नहीं करते तथा न ही वे साधना करते है । इसलिए अधिकतर सभी को पूर्वजों की अतृप्ति के (पितृदोष के) कारण कष्ट हो सकते हैं । आगे पितृदोष की संभावना है या वर्तमानमें हो रहा कष्ट पितृदोष के कारण है, यह केवल उन्नत पुरुष ही बता सकते हैं । ऐसे किसी उन्नत पुरुष से भेंट संभव न हो, तो यहां अतृप्त पितरों के कुछ लक्षण दिए हैं – विवाह न होना, पति-पत्नीमें अनबन, गर्भधारण न होना, गर्भधारण होनेपर गर्भपात हो जाना, संतानका समयसे पूर्व जन्म होना, मंदबुद्धि वा विकलांग संतान होना, संतान की बचपन में ही मृत्यु हो जाना आदि । व्यसन, दरिद्रता, शारीरिक रोग, ऐसे लक्षण भी हो सकते हैं । ऐसे में आगे दिए अनुसार साधना करें ।

<br />सनातन-निर्मित ‘दत्ताची नामजप-पट्टी’
सनातन-निर्मित ‘दत्त नामजप-पट्टी’

श्री गुरुदेव दत्त का नामजप (Audio)

१. श्री गुरुदेव दत्त तारक नामजप

२. श्री गुरुदेव दत्त मारक नामजप

३. ॐ ॐ श्री गुरुदेव दत्त ॐ ॐ तारक नामजप

४. ॐ ॐ श्री गुरुदेव दत्त ॐ ॐ मारक नामजप

यह विविध प्रकारके ‘श्री गुरुदेव दत्त’ के नामजप सुनने हेतु भेंट दे !

भगवान दत्तात्रेय के विविध प्रकार के नामजप

१ अ. पितृदोष से सुरक्षा हेतु कष्ट की तीव्रता के अनुसार उचित उपासना

१. किसी भी प्रकारका कष्ट न हो रहा हो तो भी भविष्य में कष्ट न हो इसलिए, साथ ही यदि थोडासा भी कष्ट हो तो ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ का नामजप १ से २ घंटे करें । शेष समय प्रारब्ध के कारण कष्ट न हो इस हेतु एवं आध्यात्मिक उन्नति हो इसलिए सामान्य मनुष्य अथवा प्राथमिक अवस्था का साधक कुलदेवता का नामजप अधिकाधिक करे ।

२. मध्यम कष्ट हो तो कुलदेवता के नामजप के साथ ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ नामजप प्रतिदिन २ से ४ घंटे करें । गुरुवारको दत्तमंदिर जाकर सात परिक्रमाएं करें एवं बैठकर एक-दो माला जप वर्षभर करें । तत्पश्चात् तीन माला नामजप जारी रखें ।

३. तीव्र कष्ट हो तो कुलदेवता के नामजप के साथ ही ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ नामजप प्रतिदिन ४ से ६ घंटे करें । किसी ज्योतिर्लिंग के पवित्र स्थान जाकर नारायणबलि, नागबलि, त्रिपिंडी श्राद्ध, कालसर्पशांति आदि विधियां करें । साथ ही किसी दत्तक्षेत्र में रहकर साधना करें अथवा संतसेवा कर उनके आशीर्वाद प्राप्त करें ।

४. पितृपक्ष में दत्तात्रेय देवता का नामजप करने से पितरों को शीघ्र गति मिलती है; इसलिए उस काल में प्रतिदिन दत्तात्रेय देवता का न्यूनतम ६ घंटे (७२ माला) नामजप करें ।

परिवार के सदस्य प्रतिदिन दत्तात्रेय देवता का नामजप उपरोक्त अनुसार अपने-अपने कष्ट की तीव्रता के अनुपात में न्यूनतम तो करें अथवा अधिकाधिक निरंतर करें ।

२. दत्त का नामजप करने पर पितृदोष से रक्षा कैसे होती है ?

२ अ. सुरक्षा-कवच निर्माण होना : दत्त के नामजप से निर्मित शक्ति से नामजप करनेवाले के सर्व ओर सुरक्षा-कवच का निर्माण होता है ।

२ आ. पूर्वजों को गति प्राप्त होना : अधिकांश लोग साधना नहीं करते । अतएव वे मायामें अत्यधिक लिप्त होते हैं । इसलिए मृत्यु के उपरांत ऐसे व्यक्तियों के लिंगदेह अतृप्त रहते है । ऐसे अतृप्त लिंगदेह मर्त्यलोक में (मृत्युलोक में) अटक जाते हैं । (मृत्युलोक भूलोक एवं भुवर्लोक के मध्यमें है ।) दत्त के नामजप के कारण मृत्युलोक में अटके पूर्वजों को गति मिलती है । इसलिए आगे चलकर वे उनके कर्म के अनुसार आगे-आगे के लोक में जाते हैं । इससे स्वाभाविक रूप से उनसे व्यक्ति को होनेवाले कष्ट की तीव्रता घट जाती है ।

२ इ. जब कोई व्यक्ति ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ यह नामजप करता है, उस समय उसके किस अतृप्त पितर को इस नामजपसे सर्वाधिक लाभ होता है ?

कोई व्यक्ति जब ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ यह नामजप करता है, उस समय जिस पितरमें, अगले लोकों में जाने की तीव्र इच्छा होती है, उस पितर को इस नामजपसे सर्वाधिक लाभ होता है । ‘यदि ऐसा है, तो अधिकतर पूर्वज नामजप करनेवाले उत्तराधिकारीको ही लक्ष्य क्यों बनाते हैं’, यह प्रश्न किसीके भी मनमें आ सकता है । इसका कारण इस प्रकार है – ‘मेरी आध्यात्मिक प्रगति हो’, यह इच्छा करनेवाले पितर साधना करनेवाले वंशजसे सहायता लेते हैं, तो जिन पितरों की इच्छा भौतिक विषयों से (खाना-पीना आदिसे) संबंधित होती है, वे पितर उसी प्रकार की वासनावाले अपने वंशजसे सहायता लेते हैं ।

संदर्भ : सनातन – निर्मित ग्रंथ गुरुकृपायोगानुसार साधना एवम् भगवान दत्तात्रेय