यमदीपदान करते समय १३ दीपक क्यों अर्पण करते हैं ?

यमदीपदान करते समय यमदेवता को १३ दीपक अर्पण किए जाते हैं । १३ संख्या का शास्त्र, यमदीपदान का महत्त्व और उससे होनेवाला लाभ इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयत्न करेंगे ।

 

१. यमदीपदान १३ संख्या में करने का कारण

अ. दीपकों की संख्या १३ मानकर, पूजा की जाती है । इस दिन यमदेवता द्वारा प्रक्षेपित लहरें ठीक १३ पल नरक में निवास करती हैं । इसका प्रतीक मानकर यमदेवता को आवाहन करते हुए १३ दीपकों की पूजा कर, उन्हें यमदेवता को अर्पण किया जाता है । इस विधि को ‘यमदीपदान’ कहा जाता है । – सूक्ष्म जगत का ‘एक विद्वान’ (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से १८.५.२००५, सवेरे ११.३४)

आ. जीव की देह में कुल १३ प्रकार की सूक्ष्म वायु विद्यमान होते हैं, जिससे देह का संचालन होता है । इनमें से किसी भी एक वायु के कम होने पर रोग होना, अचेत होना अथवा मृत्यु तक हो सकती है । १३ दीपदान करने से प्रत्येक वायु का अनिष्ट आवरण नष्ट होकर शरीर में बहनेवाली १३ वायु नियमित कार्य करती हैं । (१३ वायु – पंचप्राण, पंचउपप्राण और उत्पत्ति स्थिति तथा लय से संबंधित हैं । )

इ. १० वायु और पंचउपप्राण, ये क्रियात्मक और प्रत्यक्ष संचालन करनेवाली वायु हैं, जिनसे हम परिचित हैं । जीव, प्रत्यक्ष कालवाचक से अर्थात कालचक्र के सूक्ष्मदेह के प्राणों की विविध स्थितियों की कालमय संलग्नता से दर्शक, स्वरूप से संबधित अप्रकट स्वरूप में प्रत्यक्ष कार्य करनेवाले तीन प्रमुख वायु हैं ।

ई. ये तीन वायु प्रत्यक्ष उत्पत्ति, स्थिति और लय, इन तीन अवस्थाआें से साधर्म्य स्थापित कर देह में क्रिया स्वरूप कार्य करनेवाले वायु जीव के व्यष्टिचक्र के उस अवस्था से, स्वयं के उस अवस्था की प्रकटता के उस स्वरूप के कार्य को एकरूपता प्रदान कर प्रत्यक्ष जीव के सूक्ष्म और स्थूल स्वरूप देहात्मकता का पोषण करते हैं । इन तीनों वायु का कार्य प्रत्यक्ष निर्गुणात्मक स्वरूपजन्यात्मक क्रियावलयात्मकता के स्वरूप का होने के कारण ये वायु अप्रकट स्वरूप के कार्यस्वरूप ग्रहण होकर कार्य करते हैं ।

 

२. महत्त्व

अ. अपमृत्यु का योग टाल सकते हैं : जीव का मृत्युकाल १३ दिन के कालचक्र का रहता है । इन १३ दिनों के कालचक्र में उसपर मृत्यु के काले आच्छादन का प्रक्षेपण बढते-बढते धीरे-धीरे उसकी मृत्यु होती है । इसके बाद १३ दिन में वह जीव भूलोक से अन्य लोक में जाने के लिए काल की प्रत्येक सूक्ष्म-कक्षा पार कर जाता है । इसी कारण जीव की मृत्यु के १३ दिनों तक श्राद्ध करने का विधान है । अपमृत्यु आते समय वह भी १३ कालचक्र पार कर आती है । इन सूक्ष्म १३ कालचक्रों में रहनेवाले अपमृत्यु को टाला जा सके, इसलिए १३ दीपदान कर मृत्यु से छुटकारा मिल सकता है ।

आ. अकालमृत्यु टाली जा सकती है : यमलहरियों के आकर्षण से किसी जीव का व्यष्टिचक्र कालरेखा पर होनेवाला उसका आकर्षण छोडकर, यमलहरियों के प्रभाव से बाईं ओर अर्थात यमलोक के आधिपत्य की दिशा में जाकर काल की रिक्ति में गिरता है, इसे ही अकालमृत्यु कहते हैं । यह अकालमृत्यु टालने के लिए यमलहरियों को १३ दीपकों का दान कर शांत किया जाता है ।

इ. ‘१३’ अंक में यम को तृप्त करने की क्षमता होती है । ‘१३’ अंक में यम को तृप्त करने का शब्दबीजात्मक स्वरूप की क्षमता होने के कारण तेरस (त्रयोदशी) के दिन, १३ दीपकों के स्वरूप में मृत्यु के बंधन से मुक्त होने के लिए यमदेवता से प्रार्थना की जाती है ।

– श्री. निषाद देशमुख के माध्यम से, ७.१०.२००६, दोपहर २.५७

 

यमदीपदान संबधी प्रश्‍न और उत्तर

प्रश्‍न : यमदीपदान हेतु १३ दीपक लगाने चाहिए, ऐसा बताने पर भी उपरोक्त चित्र में एक ही दीपक दिखाया गया है, इसका क्या कारण है ?
उत्तर : ‘१३ दीपक लगाने चाहिए’, ऐसा ग्रंथ में स्पष्ट नहीं बताया गया है । वह आचार है । ग्रंथ के श्‍लोक के अनुसार केवल एक ही दीपक लगाना है ।

प्रश्‍न : यमदीपदान करते समय संकल्प कैसे करना चाहिए ? यदि संकल्प संस्कृत भाषा में हो, तो क्या उसका अनुवाद प्रांतीय भाषा में किया जा सकता है ? इसलिए कि पंचांग की उपलब्धि अथवा विधि करने हेतु पुरोहित मिलना, सदैव संभव होगा, यह निश्‍चित नहीं होता ।
उत्तर : श्‍लोक का अर्थ ध्यान में रखते हुए यम देवता को प्रार्थना कर, दीपक लगाने से भी फलप्राप्ति होती है ।

प्रश्‍न : यमदीपदान क्या निश्‍चित समय (सायंकाल ६ से रात्रि ८) में ही करना आवश्यक है ? यदि किसी कारणवश उस समय दीपदान न हो पाए, तो क्या अन्य समय में किया जा सकता है ?
उत्तर : सूर्यास्त के पश्‍चात अर्थात सायंकाल ६ से रात्रि ८ के बीच दीपदान का अधिक लाभ होता है । इसके पश्‍चात भी यमदीपदान कर सकते हैं किंतु, लाभ की दृष्टि से उसका महत्त्व कम है ।

– सनातन साधक-पुरोहित पाठशाला के संचालक श्री. दामोदर वझे