अनुक्रमणिका
पूजा करते समय देवता, संत अथवा गुरु वहां प्रत्यक्ष हैं, ऐसा भाव रखकर उनकी पूजा करें !

१. पूजा के समय होनेवाली अयोग्य कृतियां
आगे दी गई अयोग्य कृतियां घर-घर में होती हैं ।
अ. देवता के चित्र अथवा मूर्ति एक हाथ से और सिर से पकड कर उठाई और लटकाकर पकडी जाती है ।
आ. देवी-देवता के चित्र / मूर्ति अथवा संत / गुरु का छायाचित्र अनुचित ढंग से पोछे जाते हैं ।
इ. चंदन, कुंकू इत्यादि लगाने का तरीका भी गलत होता है । वह देवता की आंखों में जाता है । कुंकू अथवा चंदन से उनका मुख तक ढक जाता है ।
ई. फूल चढाने का तरीका भी सही नहीं होता । चित्र अथवा मूर्ति के अनुरूप उनका आकार नहीं होता यानी फूल तुलना में बडा होने से चित्र अथवा मूर्ति ढक जाती है ।
उ. पूजा करते समय अन्यत्र ध्यान रहता है या फिर अन्यों से अनावश्यक बोलना होता है ।
ये सभी उदाहरण ईश्वर के प्रति भाव न होने के लक्षण हैं । इसलिए पूजा करने का आध्यात्मिक लाभ तो होता नहीं, अपितु भगवान की अवकृपा होती है । इससे ध्यान में आता है कि हिन्दुओं को छोटी-छोटी बातों में भी धर्मशिक्षा देने की आवश्यकता है !
२. पूजा के समय की जानेवाली योग्य कृतियां
आगे दिए समान पूजा करने से पूजा का लाभ निश्चितरूप से होता है ।
अ. देवताओं के चित्र अथवा मूर्ति को दोनों हाथों से, धीरे से और मध्यभाग से पकडकर उठाएं ।
आ. देवता, संत अथवा गुरु को पोछते हुए वे वहां साक्षात हैं, ऐसा भाव रखें । उन्हें बताएं कि हम पोछने जा रहे हैं । तत्पश्चात ऊपर से नीचे तक एक-एक अंग धीरे-धीरे पोछें । ठीक उसीप्रकार जैसे मां बच्चे को नहलाती है । वह बच्चे से बातें करते हुए कि अब मैं तुम्हें स्नान करवाने जा रही हूं । तुम अपनी आंखें बंद कर लो । इससे आंखों में पानी नहीं जाएगा । इसप्रकार उसका ध्यान रखते हुए स्नान करवाती है । उसीप्रकार हमें भी देवता का चित्र / मूर्ति अथवा संत / गुरु का छायाचित्र पोछना चाहिए । प्रत्येक कृति भावपूर्ण करनी चाहिए । चित्र अथवा छायाचित्र पोछते समय पहले देवी-देवता, संत अथवा गुरु को पोछना चाहिए और फिर उसका शेष भाग पोछें ।
इ. चंदन अथवा कुंकू देवी-देवता को अथवा गुरु को लगाते समय यह ध्यान रखें कि वह आंखों में न जाने पाए, अत: उचित आकार का लगाएं । मूर्ति पर कुंकू चढाना हो, तो उसे चरणों पर चढाएं ।
ई. ऐसे फूल चढाएं, जो उस अमुक देवी-देवता को प्रिय हों । उसका आकार भी उचित हो । इसके साथ ही फूलों की रचना भी सात्त्विक होनी चाहिए ।
उ. पूजा करते समय अन्यत्र ध्यान नहीं रहना चाहिए । तल्लीन होकर मनोभाव से पूजा करनी चाहिए । ऐसा करने पर वह देवता, संत अथवा गुरु का तत्त्व जागृत होकर हमें उसका लाभ होगा ।
– (प.पू.) डॉ. आठवले (२०.१.२०१४)
३. खरी क्षमायाचना !
पूजा का अंत में क्षमायाचना करते हुए श्लोक कहते हैं ।
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर ॥
अर्थ : हे भगवन, मैं प्रतिदिन सहस्रावधि अपराध करते हैं । हे परमेश्वर, मैं आपका दास हूं, ऐसा समझ कर मुझे क्षमा करे ! मैं भगवान का दास हूं, इस उत्कट भाव सहित अपराधीभाव जागृत होकर अहंभाव न्यून हुआ, तब भी खरे अर्थ में क्षमा मांगी जाती है और उसी समय ईश्वर भी क्षमा करती है । अन्यथा क्षमा मांगना, यह केवल शाब्दिक कर्मकांड होता है ।
– वैद्य मेघराज पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२१.१.२०१४)
४. देवता एवं गुरु की पूजा भावपूर्ण करने पर वे हम पर प्रसन्न होकर हमें भरपूर आशीर्वाद देंगे !
भाव कैसा रखें ? इस विषय में श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ का मार्गदर्शन

‘अध्यात्म में कोई भी कृति करते समय भाव महत्वपूर्ण होता है । प्रार्थना, नामजप सहित देवता और गुरु की पूजा भावपूर्ण करने पर ही उसका आध्यात्मिक स्तर पर अधिक लाभ होता है । देवता को श्रद्धायुक्त अंतःकरण से विधियुक्त किया हुआ उपचारसमर्पण अर्थात देवपूजा है । देवता की प्रतिमा अथवा मूर्ति की शास्त्रोक्त पद्धति से की जानेवााली पूजा देवता को अपेक्षित करने से वह खरे अर्थ में ‘पूजा’ होती है । इसीप्रकार सनातन के आश्रम और सेवाकेंद्र के ध्यानमंदिर में अथवा घर के पूजाघर में पूजा करते समय ‘देवता, संत अथवा गुरु वहां प्रत्यक्ष हैं’, ऐसा भाव रखकर उनकी पूजा करनी चाहिए । भावपूर्ण पूजा से चैतन्य प्रक्षेपित होकर उसका पूजक को और उस वास्तु में रहनेवालों को लाभ होता है । देवता और गुरु के आशीर्वाद मिलते हैं । इसके साथ ही वातावरण की सकारात्मक ऊर्जा और सात्त्विकता बढती है और आध्यात्मिक स्तर पर अनुभूति भी होती है; परंतु पूजा भावपूर्ण न करने पर भगवान की अवकृपा होकर उसका आध्यात्मिक स्तर पर लाभ नहीं होता, इसके साथ ही वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा बढती है और वास्तु का चैतन्य भी कम हो जाता है । इसलिए घर के अन्य कामों समान पूजा एक काम अथवा केवल एक नित्यकर्म के रूप में न करें । सभी के पालनपोषण का ध्यान रखनेवाले भगवान की पूजा इसप्रकारे ‘निबटाना’, इसे देवपूजा कह सकते हैं क्या ? ऐसा करने पर भगवान भी हम पर कृपा क्यों करें ? यह ध्यान में रखकर देवता और गुरु की यथाशक्ति और भक्तिभाव से पूजा करने पर ही वे हम पर प्रसन्न होकर हमें भरपूर आशीर्वाद देंगे ।’
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ (६.७.२०२१)
देवपूजा
वास्तुशास्त्रानुसार घर में देवघर कैसे होना चाहिए ?
देवघर में देवताओं की रचना कैसे करनी चाहिए ?
पूजाविधि के संदर्भ में शंकानिरसन – भाग २
पूजाविधि के संदर्भ में शंकानिरसन – भाग १
पूजा की थाली में विभिन्न घटकों की रचना किस प्रकार करें ?