गणेशमूर्ति के विसर्जन के समय प्रशासन ने हिन्दुओं की धर्मभावनाओं का आदर करना चाहिए – श्री. अभय वर्तक, प्रवक्ता, सनातन संस्था

एबीपी माझा समाचारप्रणाल पर आयोजित
‘क्या, गणेशविसर्जन पर्यावरणपूरक हो सकेगा ?’ चर्चासत्र में सनातन का सहभाग !

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मुंबई : सनातन संस्था के प्रवक्ता श्री. अभय वर्तक ने चर्चासत्र में यह प्रतिपादित किया कि, ‘हमारा धर्मशास्त्र यह बताता है कि, गणेशमूर्ति खडिया मिट्टी की होनी चाहिए। जिस समय हम घर में गणेश की मूर्ति की स्थापना करते हैं, उस समय वह केवल मिट्टी की मूर्ति नहीं होती, तो उसमें गणेशतत्त्व होता है !

प्रशासन तथा महानगरपालिकाद्वारा श्री गणेश भक्तों को इन मूर्तियों को कृत्रिम कुंड में विसर्जित करने का आवाहन किया जाता है। उनके कार्यकर्ता श्रद्धालुओं के हाथ से मूर्ति लेकर उन मूर्तिओं का कुंड में विसर्जन करते हैं। विसर्जन के पश्चात कृत्रिम कुंड में विसर्जित की गई मूर्ति बाहर निकाल कर कुएं तथा खानियों में भराव हेतु उसका उपयोग किया जाता है या फिर गहरे समुद्र में फेंक दिया जाता है।

यहां लक्षावधि हिन्दुओं के लिए गणपति एक पत्थर नहीं, तो एक धर्मभावना है ! अतः प्रशासन ने समस्त हिन्दुओं की भावनाओं का आदर करना चाहिए।

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वास्तव में प्रदूषणविरहित गणेशोत्सव मनाना है, तो यह अभियान अधूरा छोडने की अपेक्षा अगले वर्ष की सिद्धता अभी से हम सब मिलकर आरंभ करेंगे तथा हम इस देश में एक दिन निश्चित रूप से ऐसा लाएंगे की जिस घर में श्री गणेशजी की मूर्ति विराजमान होगी, वो शाडु मिट्टी की ही होगी !’

एबीपी माझा इस मराठी समाचारप्रणाली की ओर से, ‘पर्यावरण के लिए हानीकारक सिद्ध होनेवाले प्लास्टर ऑफ पॅरिस की मूर्ति पर पाबंदी लगा सकते हैं ?’ तथा ‘क्या, गणेशविसर्जन पर्यावरणपूरक हो सकता है ?’ इन विषयों पर एक चर्चासत्र का आयोजन किया गया था। इस चर्चासत्र में मुंबई के विख्यात मूर्तिकार श्री. विजय खातू, शाडु मिट्टी के मूर्तिकार श्री. अभिजित धोंडफळे तथा पर्यावरणवादी श्रीमती परिणिता दांडेकर सम्मिलित हुई थी। इस चर्चासत्र का सूत्रसंचालन श्री. मयुरेश कोण्णूर ने किया।

श्री. अभय वर्तक ने ‘इको फ्रेंडली गणेशोत्सव’
के नाम पर हो रही प्रतारणा स्पष्ट की !

चर्चासत्र में श्री. अभय वर्तक ने कृत्रिम कुंडों की असफलता स्पष्ट करते हुए बताया कि, हमारे यहां ‘कृत्रिम कुंड’ नाम का एक रॅकेट चलाया जा रहा है ! इन कृत्रिम कुंडों के लिए करोडो रुपएं का बजट निश्चित किया जाता है। इन कृत्रिम कुंडों में गणेशमुर्ति विसर्जन करने का आवाहन लोगों को किया जाता है। तदनंतर वह मूर्तियां कुओं, खानों का भराव करने हेतु अथवा गहरे समुद्र में फेंक दी जाती है ! अतः इको फ्रेंडली गणेशोत्सव के नाम पर लोगों के साथ सीधी सीधी प्रतारणा की जाती है।

धार्मिक संस्थाओं के लोग, नदी में मूर्ति विसर्जन करने हेतु विरोध करनेवाले कार्यकर्ताओं को धमकियां देते हैं ! – श्रीमती परिणिता दांडेकर, पर्यावरणवादी

प्लास्टर ऑफ पॅरिस अनेक माह तथा वर्षों तक पानी में घुलमिल नहीं जाता। अतः उस से जलप्रदूषण होता है। इस पानी के माध्यम से प्लास्टर ऑफ पॅरिस में अंतर्भूत भारी धातु अपने शरीर में संग्रहित होता रहता है। यह मानवी जीवन के लिए अत्यंत हानीकारक है ! अतः ‘धर्म’ के नाम पर बहते पानी में ही मूर्ति विसर्जन करने की मांग करना अनुचित है। जब सामाजिक संस्थाओं के कार्यकर्ता नदी में मुर्ति विसर्जन करने के लिए विरोध करते हैं, तब धार्मिक संस्थाओं के लोग इन कार्यकर्ताओं को ‘लक्ष्य’ कर धमकियां देते हैं।

इन लोगों को; पुणे की नदी में ८० प्रतिशत पानी गंदा है, उसमें मुर्ति विसर्जित करना उचित प्रतीत होता है किंतु यदि वहीं मूर्तियां निर्माल्य कलश में विसर्जित की गई, तो कहते हैं कि, कुएं खानों की भराव पूर्ति करने हेतु मुर्तियों का उपयोग किया जाता है ! (हिन्दुओं का यही दुर्दैव है कि, उन्हें गंदे पानी में मुर्ति विसर्जन करना पड़ता है। किंतु इस बात के लिए हिन्दुद्वेषी प्रशासन उत्तरदायी है, हिन्दु नहीं ! – संपादक, दैनिक सनातन प्रभात)

‘व्यवसाय’ के कारण हमें बडी मुर्तियां करनी पड़ती हैं
– विख्यात मूर्तिकार श्री. विजय खातू, मुंबई

मेरा स्वयं का प्लास्टर ऑफ पॅरिस की मूर्ति के लिए विरोध है। मिट्टी की मूर्ति केवल ३-४ फीट की ही बनाई जा सकती है, उससे जादा नहीं !

मुंबई का गणेशोत्सव बडी मूर्तियों के लिए पहचाना जाता है। अतः वह पहचान पोछना असंभव होता है। गणेश मंडलों की २० से २५ फीट गणेशमूर्ति की मांग रहती है। यदि हमें यह बात अच्छी नहीं लगी, तो भी हमारे व्यवसाय के कारण विवश होकर हमें बडी मूर्ति सिद्ध करनी पड़ती है। पुणे के समान मुंबई में बडी मूर्ति जतन करना असंभव है; क्योंकि यहां व्यक्ति को ही रहने के लिए क्षेत्र उपलब्ध नहीं, तो इतनी बड़ी मूर्ति जतन कैसे करें !

प्लास्टर ऑफ पॅरिस की मूर्तियां ही न बने इसलिये हमें समाज
में निचे से निचे स्तर पर जा कर जनजागृति करना आवश्यक है !
– मूर्तिकार श्री. अभिजित धोंडफळे

हम गत ७५ वर्षों से शाडु की मिट्टी से गणेशमूर्ति सिद्ध कर रहे हैं। इसी कालावधी में हम ने एक भी प्लास्टर ऑफ पॅरिस की मूर्ति नहीं सिद्ध की !

मूर्ति आकर्षक करने हेतु प्लास्टर ऑफ पॅरिस का उपयोग किया जाता है; किंतु मिट्टी की भी मूर्ति आकर्षक की जा सकती है। प्लास्टर ऑफ पॅरिस का उपयोग टालने के लिए समाज में निचे से निचे स्तर पर जा कर जनजागृति करने की आवश्यकता है। यह अभियान जारी रखना है, तो यह कला अगली पीढ़ी तक पहुंचनी चाहिए। यदि हरएक ने अपने ही घर में यह मूर्ति सिद्ध की, तो अधिक अच्छा होगा ! बडी मूर्ति का भार कम करने के लिए कागज के लगदे का उपयोग किया जा सकता है !

क्षणिकाएं

१. सूत्रसंचालक श्री. कोण्णूर लगातार दर्शकों पर यह बात अंकित करने का प्रयास कर रहे थे कि, ‘प्लास्टर ऑफ पॅरिस की मूर्ति पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत धोखादायक है। अतः इस मूर्ति का बहते पानी में विसर्जन करने की अपेक्षा कृत्रिम कुंड में ही विसर्जन करना उचित है !’

२. जिस समय श्री. वर्तक कृत्रिम कुंड में मूर्ति विसर्जन का वास्तव बता रहे थे, उस समय श्री. कोण्णूर ने उन्हें रोक कर विषय अन्यत्र घुमाने का प्रयास किया। (इससे श्री. कोण्णूर को क्या यह प्रतीत होता है कि, हिन्दुओं का प्रबोधन हो और वे धर्माचरण न करें ? – संपादक, दैनिक सनातन प्रभात)

३. जब सामाजिक संस्था के कार्यकर्ता नदी में मूर्ति विसर्जन के लिए विरोध प्रदर्शित करते हैं, उस समय धार्मिक संस्थाओं के लोग उन कार्यकर्ताओं को लक्ष्य कर धमकियां देते हैं। यह बात जब पर्यावरणवादी श्रीमती दांडेकर ने बताई, उस समय श्री. कोण्णूर ने त्वरित यह वक्तव्य किया कि, ‘हां, यह बात सही है, सनातन तथा हिन्दू जनजागृति समिति के कार्यकर्ता सदैव नदी के पास ही खड़े होते हैं !’ (इससे श्री. कोण्णूर का ‘सनातन द्वेष’ तथा ‘समिति द्वेष’ ही प्रकट होता है ! साधक तथा कार्यकर्ता ‘घटनादत्त’ अधिकार का उपयोग तथा वैध मार्ग से, हाथ में फलक पकडकर श्रद्धालुओं का प्रबोधन करते हैं तथा उन्हें शास्त्र बताकर नदी में मूर्ति विसर्जन करने की विनती करते हैं ! इस में धमकाने की क्या, बात है ? यदि श्री. कोण्णूर को ऐसी घटनाओं का पता था, तो क्या उन्होंने वो बात पुलिस को सूचित की ? केवल हिन्दुत्वनिष्ठों की अपकीर्ति करने हेतु श्री. कोण्णूर इस प्रकार का वतव्य कर रहे हैं !- संपादक, दैनिक सनातन प्रभात)

४. मूर्तिकार श्री. अभिजित धोंडफळे ने यह सूचित किया कि, ‘बडी मूर्तियों का भार कम करने के लिए मूर्ति में कागज के लगदे का उपयोग कर सकते हैं !’ उस समय श्री. वर्तक ने उनके इस सूत्र के कारण ही अधिक मात्रा में जलप्रदूषण कैसे होता है, यह स्पष्ट किया !

५. इस चर्चासत्र में श्री. वर्तक ने यह बताया कि, सनातन संस्था ने ‘गणेश कला केंद्र’ के माध्यम से आज तक अनुमान से ५० सहस्र से भी अधिक शाडु मिट्टी की मूर्तियां समाज में वितरित की हैं। साथ ही यह भी बताया कि; सनातन संस्था ‘आदर्श गणेशोत्सव अभियान’ के माध्यम से, अधिक परिणामकारकता से जनजागृति कर रही है !

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात