
१. ‘ब्लैक फंगस’ का (एक प्रकार का फफूंद का) संक्रमण कैसे होता है ?
‘ब्लैक फंगस’ एक प्रकार की फफूंद है तथा वह घासफूस तथा प्राणियों के गोबर के स्थान पर दिखाई देती है । इसका बीज हवा से वातावरण में फैलता है और श्वास द्वारा हमारी नाक में जाता है । हमारी प्रतिरोधक शक्ति अच्छी हो, तो हमारे शरीर पर उसका परिणाम नहीं होता ।
२. ‘ब्लैक फंगस’ का संक्रमण किसे होता है ?

अ. जिन रोगियों का मधुमेह नियंत्रण में नहीं होता, उनकी तथा ‘एचआईवी’ से पीडित रोगियों की प्रतिरोधक शक्ति अल्प होती है । इसलिए प्रमुखता से यह रोग उन्हें होने की संभावना अधिक होती है ।
आ. रक्त में विद्यमान ‘न्यूट्रोफिल’ नामक श्वेत कोशिकाएं न्यून होने पर इस रोग का संक्रमण होता है ।
इ. कोरोना के संक्रमण के पश्चात प्रतिरोधक शक्ति न्यून हो जाती है । इसलिए कोरोना के उपरांत मधुमेह के रोगियों में यह रोग दिखाई दे रहा है ।
ई. कोरोना के रोगियों को बिना कारण अधिक मात्रा में ‘स्टिरॉइड्स’ से युक्त औषधियां देने से उनके रक्त में शक्कर की मात्रा बढ जाती है और उनकी प्रतिरोधक शक्ति न्यून होकर उन्हें इस रोग का संक्रमण होने का संकट बढता है ।
३. ‘ब्लैक फंगस’ के ४ प्रकार और उसके प्रकार के अनुसार लक्षण
३ अ. र्हाइनोसेरेब्रल (Rhinocerebral)
इस प्रकार में मुख के एक ओर सूजन आना, सिर में वेदना, नाक में रक्तसंचय होना और ज्वर आना, ये लक्षण होते हैं । इस फफूंद के कारण आंखों और मस्तिष्क को रक्त की आपूर्ति करनेवाली रक्तवाहिनियों में बाधा उत्पन्न होती है । इसलिए ‘दृष्टि जाना’ और ‘अर्धांगवायु होना’ अर्थात लकवा जैसे रोग होते हैं ।
३ आ. पल्मोनरी (Pulmonary)
ज्वर, खांसी और सांस फूलना
३ इ. गैस्ट्रिक (Gastric)
पेट में वेदना होना, वमन (उलटी) होना और कभी-कभी रक्त की उलटियां होना
३ ई. टिनीयल (Tineal)
त्वचा पर सूजन आकर वह लाल काली होना
४. होमियोपैथी की औषधियों से उपचार
४ अ. अर्सेनिक आल्ब (Arsenic alb)
४ अ १. रोग के लक्षण
अ. आंखों में जलन होकर गरम पानी बहना, आंखों की पलकें लाल होकर आंखों के आस-पास सूजन आना, आंखों के बाहरी ओर रक्तसंचय होकर तीव्र वेदना होना, प्रकाश सहन न होना और सिंकाई करने पर ठीक लगना
आ. नाक से पतले पानी जैसा गरम स्राव बहना, नाक बंद हो गया है ऐसा लगना, निरंतर छींके आना, खुली हवा में लक्षण बढना और बंद कक्ष में ठीक लगना, नाक से रक्तस्राव होना और जलन होना
इ. मुखमंडल पर सूजन आकर वह श्वेत पड जाना और मुखमंडल में सुइयां चुभोने के समान वेदना होना
ई. भोजन तथा उसकी गंध सहन न होना, अत्यधिक प्यास लगना बार-बार पानी पीना, कुछ खाने अथवा पीने के उपरांत उलटी होना, पेट में जलन और वेदना होना, गले में खुजली होना, निरंतर डकार आना, पीली और रक्तमिश्रित उलटियां होना, अत्यधिक थकान होना, बेचैनी, चिंता और भय लगना, शीतल पेय अथवा भोजन पेट में जाने पर लक्षण बढना, मध्यरात्रि के उपरांत लक्षण बढना रोगी में इस प्रकार के लक्षण दिखाई दें, तो उसे ‘अर्सेनिक आल्ब’ नामक औषधि ३० ‘पोटेन्सी’ में (टिप्पणी) देनी चाहिए ।
उ. त्वचा में सूजन आकर जलन होना, त्वचा सूखी और खुरदुरी होना, शीतल हवा में और खुजलाने से कष्ट बढना
ऊ. ज्वर के साथ अत्यधिक थकान होना, ठंडा पसीना आना, बैचैनी होना, मध्यरात्रि के उपरांत लक्षण बढना, गरम पेय पीने पर ठीक लगना
उक्त सर्व लक्षणों के लिए यह औषधि ३० ‘पोटेन्सी’ में रात में एक बार देनी चाहिए ।
(टिप्पणी : औषधि की ‘पॉवर’ को ‘पोटेन्सी (शक्ति)’ कहते हैं ।)
४ आ. थूजा (Thuja)
इस औषधि से प्रतिरोधक शक्ति बढती है । इस औषधि का परिणाम त्वचा, अन्ननलिका, रक्त, मूत्रपिंड और मस्तिष्क पर होता है । इसका मुख्य परिणाम त्वचा पर होता है ।
४ आ १. लक्षण
अ. कोई भी टीका लगाने पर होनेवाले दुष्परिणाम, कील ठोकने के समान सिर में वेदना होना, सिर के बाईं ओर वेदना होना, रात में आंखों की पलकें चिपकना, आंख के श्वेत भाग पर जलन होना
आ. नाक से हरे रंग का रक्तमिश्रित स्राव बहना, नाक के नथुनों में व्रण होना, नाक सूखना, नाक की जड पर वेदनायुक्त दाब प्रतीत होना
इ. जीभ के सिरे पर तीव्र वेदना होना
ई. भूख कम होना, खाने के उपरांत पेट में वेदना होना और पेट फूलना
उ. त्वचा पर होनेवाली सर्व प्रकार की गांठें
ऊ. ज्वर आने पर शरीर के केवल खुले भाग पर पसीना आना; परंतु सिर पर पसीना न आना, पसीने में शहद के समान गंध आना और रात में लक्षण बढना
ऐसे लक्षण हों, तो रोगी को ‘थूजा’ औषधि ३० पोटेन्सी में प्रतिदिन सवेरे दें ।
४ इ. काली आयोडाइड (Kali iodide)
४ इ १. लक्षण
अ. नाक से पानी के समान स्राव अधिक मात्रा में बहना और नाक की रिक्ति में तीव्र वेदना होना, नाक पर सूजन आकर उसका सिरा लाल होना
आ. आंखें लाल होकर उसमें से अधिक स्राव आना, आंखों की पलकों और मुख पर सूजन आना
इ. ठंडे भोजन, पेय और दूध के कारण पेट की शिकायतें बढना, अधिक प्यास लगना
ई. न्यूमोनिया हुआ हो, तो फेफडों से पीठ में वेदना होना और सीढियां चढते समय सांस फूलना
उक्त लक्षण हों, तो यह औषधि ३० ‘पोटेन्सी’ में प्रतिदिन ३ बार लें ।
४ ई. कल्केरिया कार्ब (Calcarea carb)
४ ई १. लक्षण
अ. आंखों के श्वेतपटल की अपारदर्शकता (कॉर्नियल ओपॅसिटी)
आ. विस्मरण, संदेह करने की वृत्ति और ग्रहण शक्ति अल्प होना तथा रोग, संकट, दुःखद घटना और पागलपन का भय लगना
इ. ऊंचाई पर चढते समय चक्कर आना, प्रतिदिन सवेरे सिर में वेदना प्रारंभ होना एवं मानसिक परिश्रम, नीचे झुकने तथा खुली हवा में घूमने से उसमें वृद्धि होना, (ऐसे लक्षण हों, तो ‘नक्स वॉमिका’ औषधि दे सकते हैं ।) ऐसे रोगी को अंधेरे में ठीक लगता है । ‘सिर के दाईं ओर बर्फ रखा है’, ऐसा प्रतीत होना ।
ई. गला सूखना, बच्चों में दांत निकलना कठिन होना, दांतों में वेदना होना और किसी भी आवाज एवं शीतल पेय पीने से वेदनाएं बढना
उ. भूख न होना, पकाया हुआ खाना अच्छा न लगना, स्वादिष्ट वस्तुएं खाने की इच्छा होना, दूध का पाचन न होना, बार-बार डकार आना, बच्चों को दही के समान उलटी होना, पेट फूलना
ऐसे लक्षण हों, तो यह औषधि ३० ‘पोटेन्सी (शक्ति)’ में प्रतिदिन ३ बार लें ।
४ उ. कल्केरिया फॉस (Calcarea phos)
४ उ १. लक्षण
हवा में परिवर्तन होने के उपरांत सिर में वेदना, प्रत्येक बार खाते समय पेट में वेदना होना, मस्तिष्क में जलन (Meningitis)
यह औषधि ३० पोटेन्सी में प्रतिदिन ३ बार लें ।
रोगी में जो लक्षण है, उसके अनुसार उक्त औषधियों में से उचित औषधि लेना उपयुक्त होता है ।
५. रोग के विरोध में प्रतिरोधक शक्ति निर्माण होने में सहायक कुछ औषधियां
अ. ऑसिमम स्कैन (Ocimum scan) (तुलसी) Q, + एजेडिराचिटा (Azadirachita) Q + स्वराइटा चिराइटा (Swarita chirita) + इचिनेशिया (Echinecia A.) आदि औषधियां प्रत्येक २० मि.लि. इस मात्रा में एकत्रित कर उस मिश्रण की २० बूंदें दिन में तीन बार १/४ कप पानी में लेने से इस रोग के विरोध में प्रतिरोधक शक्ति निर्माण होने में सहायता मिलती है ।
आ. R 82 की ५ बूंदें दिन में ३ बार १/४ कप पानी में लेने से फफूंदजन्य रोगों से सुरक्षा होने में सहायता मिलती है ।
होमियोपैथी में लक्षणों के अनुसार औषधियों की योजना बनाई जाती है । इसलिए उक्त औषधियां लेते समय अपने चिकित्सक से परामर्श लें ।’
– होमियोपैथी चिकित्सक प्रवीण मेहता, पुणे, महाराष्ट्र. (१८.५.२०२१)
यहां दी हुई औषधियों सहित शासन द्वारा प्राधिकृत चिकित्सा और औषधियां लेते रहें । अन्य सर्व उपाययोजनाओं का पालन करें । स्थल, काल और प्रकृति के अनुसार चिकित्सा में परिवर्तन हो सकता है । इसलिए उचित चिकित्सक का परामर्श भी लें । |
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