श्री गणेश जयंती (माघ शुद्ध चतुर्थी)

गणेशलहरी जिस दिन प्रथम पृथ्वी पर आई, अर्थात जिस दिन गणेशजन्म हुआ, वह दिन था माघ शुद्ध चतुर्थी । तब से गणपति का और चतुर्थी का संबंध जोड दिया गया । माघ शुक्ल पक्ष चतुर्थी ‘श्री गणेश जयंती’ के रूप में मनाई जाती है । इस तिथि की विशेषता यह है कि इस पर अन्य दिनों की तुलना में गणेशतत्त्व १ सहस्र गुना अधिक कार्यरत रहता है । आगे दी गई एक साधक की अनुभूति से स्पष्ट होगा कि इस तिथि पर गणेशतत्त्व कैसे जागृत होता है ।

महत्त्व

गणपति के स्पंदन तथा चतुर्थी तिथि पर पृथ्वी के स्पंदन एक समान होने के कारण, वे एक-दूसरे के लिए अनुकूल होते हैं; अर्थात उस तिथि पर गणपति के स्पंदन पृथ्वी पर अधिक मात्रा में आ सकते हैं । प्रत्येक महीने की चतुर्थी पर गणेशतत्त्व नित्य की तुलना में पृथ्वी पर १०० गुना अधिक कार्यरत रहता है । इस तिथि पर की गई श्री गणेश की उपासना से गणेशतत्त्वका लाभ अधिक होता है ।

अ. भगवान श्री गणेश के स्पंदन तथा चतुर्थी तिथि पर पृथ्वी के स्पंदन एक समान होने के कारण, वे एक-दूसरे के लिए अनुकूल होते हैं; अर्थात उस तिथि पर भगवान श्री गणेश के स्पंदन पृथ्वी पर अधिक मात्रा में आ सकते हैं । इस तिथि पर की गई भगवान श्री गणेश की उपासना से उपासक को गणेशतत्त्व का लाभ अधिक होता है ।

आ. चतुर्थी अर्थात जागृति, स्वप्न एवं सुषुप्ति के परे की तुर्यावस्था । वही साधक का ध्येय है ।

इ. ‘अग्निपुराण ‘ ग्रंथ में भोग और मोक्ष की प्राप्ति हेतु चतुर्थी के व्रत का विधान बताया गया है ।

ई. चंद्रदर्शन निषेध : इस दिन चंद्र को नहीं देखना चाहिए, क्योंकि चंद्र का प्रभाव मन पर होता है । वह मन को कार्य करने पर प्रवृत्त करता है; परंतु साधक को तो मनोलय करना है । ग्रहमाला में चंद्र चंचल है अर्थात उसका आकार घटता-बढता है । उसी प्रकार शरीर में मन चंचल है । चंद्रदर्शन से मन की चंचलता एक लक्षांश बढ जाती है । संकष्टी (शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी कहते हैं ।) पर दिनभर साधना कर रात्रि के समय चंद्रदर्शन करते हैं । एक प्रकार से चंद्रदर्शन की क्रिया साधना काल के अंत एवं मन के कार्यारंभ की सूचक है ।

प्रकार

शुक्ल पक्षकी चतुर्थीको ‘विनायकी’ एवं कृष्ण पक्षकी चतुर्थीको ‘संकष्टी’ कहते हैं ।

पुराणोंमें इससे संबंधित एक कथा

एक दिन चंद्रने गणपतिके डील-डौलका मजाक उडाया, ‘देखो तुम्हारा इतना बडा पेट, सूप जैसे कान, क्या सूंड और छोटे-छोटे नेत्र !’ इसपर गणपतिने उसे श्राप दिया, ‘अबसे कोई भी तुम्हारी ओर नहीं देखेगा । यदि कोई देखे भी तो उसपर चोरीका झूठा आरोप लगेगा ।’ उसके उपरांत चंद्रको न कोई अपने पास आने देता, न ही वह कहीं आ-जा सकता था । उसके लिए अकेले जीना कठिन हो गया । तब चंद्रने तपश्‍चर्या कर गणपतिको प्रसन्न किया एवं प्रतिशापकी विनती की । गणपतिने मन ही मन सोचा, ‘शाप तो मैं पूर्ण रूपसे वापस नहीं ले सकता । उसका कुछ तो प्रभाव रहना ही चाहिए एवं अब प्रतिशाप भी देना पडेगा । कैसे करूं कि अपना दिया हुआ शाप भी नष्ट न हो और उसे प्रतिशाप भी दे सकूं ?’ ऐसा विचार कर गणपतिने चंद्रको प्रतिशाप दिया, ‘श्री गणेश चतुर्थीके दिन तुम्हारे दर्शन कोई नहीं करेगा; परंतु संकष्टी चतुर्थीके दिन तुम्हारे दर्शन किए बिना कोई भोजन नहीं करेगा ।’

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ `श्री गणपति`

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