माघी श्री गणेश जयंती (Ganesh Jayanti 2024)

माघी श्री गणेश जयंती क्यों मनाते हैं ?

श्री गणेशजी की तरंगें जिस दिन प्रथम पृथ्वी पर आयी, अर्थात जिस दिन भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ, वह दिन था माघ शुक्ल पक्ष चतुर्थी । इसलिए माघ शुक्ल पक्ष चतुर्थी ‘श्री गणेश जयंती’ के रूप में मनाई जाती है । इसी दिन से गणपति का एवं चतुर्थी का संबंध जुड गया ।


माघी श्री गणेश जयंती एवं चतुर्थी का महत्त्व

माघ शुक्ल पक्ष चतुर्थी अर्थात माघी श्री गणेश जयंती की विशेषता यह है कि इस दिन अन्य दिनों की तुलना में श्री गणेशजी का तत्त्व १ सहस्र गुना अधिक कार्यरत रहता है । श्री गणेश का जन्म चतुर्थी की तिथि पर होने से, गणपति के स्पंदन तथा चतुर्थी तिथि पर पृथ्वी के स्पंदन एक समान होते है । अर्थात किसी भी चतुर्थी पर गणपति के स्पंदन पृथ्वी पर अधिक मात्रा में आ सकते हैं । प्रत्येक महीने की चतुर्थी पर गणेश-तत्त्व अन्य दिनों की तुलना में पृथ्वी पर १००० गुना अधिक कार्यरत रहता है । इस तिथि पर की गई श्री गणेश की उपासना से गणेश-तत्त्व का लाभ अधिक होता है ।



माघी श्री गणेश जयंती कैसे मनाएं ?

  • श्री गणेश का नामजप तथा प्रार्थना अधिकाधिक करें ।
  • श्री गणेशजी की भावपूर्ण पूजा एवं आरती करें ।
  • संध्या के समय श्री गणेशजी का स्तोत्र पठन करें ।
  • श्री गणेशजी को लाल फुल एवं दूर्वा (दूब) अर्पण करें ।
  • घर में श्री गणेशजी की सात्त्विक नामजप पट्टी लगाएं ।

श्री गणेश का मंत्र जाप करें !

देवता की विविध उपासना में, देवता का जप सबसे श्रेष्ठ एवं सरल साधना है जो कलियुग में देवता के साथ निरंतर हमारा अनुसंधान बनाए रखता है । हम में भक्ति शीघ्र बढे एवं देवता के तत्त्व का अधिक लाभ हो, इसलिए भगवान के मंत्र अथवा जप का उचित उच्चारण करना आवश्यक है । देवता का मंत्र जाप भावपूर्ण करने पर ही वह भगवान तक पहुंचता है । जप करते समय उसका अर्थ समझकर बोलने पर वह अधिक भावपर्ण होने में सहायता होती है । आइए सुनते है भगवान श्री गणेश का मंत्र जप कैसे करें ।

सात्त्विक अक्षरोंमें चैतन्य होता है । सात्त्विक अक्षर एवं उनके चारों ओर निर्मित देवता-तत्त्व के अनुसार चौखट से युक्त श्री गणेश की नामजप -पट्टी सनातन संस्था ने बनाई है । यह नामजप-पट्टी संबंधित देवता का तत्त्व अधिक मात्रा में आकर्षित एवं प्रक्षेपित करती हैं । इस नामजप-पट्टी को घर में लगाने से घर में सात्त्विकता का अनुभव होता है । उस पर  नामजप करने का स्मरण भी होता है।


श्री गणेशजी का स्तोत्र पठन करें !

‘स्तोत्र’ अर्थात भगवान का स्तवन, अर्थात भगवान की स्तुति । स्तोत्रपठन करने से व्यक्ति के सर्व ओर सूक्ष्म स्तर पर सुरक्षा-कवच निर्माण होकर, उसकी अनिष्ट शक्तियों से रक्षा होती है । श्री गणेशजी के २ स्तोत्र सुपिरिचित हैं । उनमें से एक है संकष्टनाशन स्तोत्र । ‘गणपति अथर्वशीर्ष’ यह श्री गणेशजी का दूसरा सुपरिचित स्तोत्र है । जब निर्धारित लय एवं सुर में कोई स्तोत्र कहा जाता है, तब उस स्तोत्र से एक विशेष चैतन्यमयी शक्ति की निर्मिती होती है । इसलिए स्तोत्र उसी लय में कहना आवश्यक है ।


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श्री गणेश जयंती के दिन श्री गणेश तत्त्व अधिक मात्रा में होने के कारण साधना करनेवाले भक्तों को विविध प्रकार की अनुभूतियां होती है । विविध त्योहार कैसे मनाएं, साधना कैसे करें, यह जानने के लिए हमारे ऑनलाइन सत्संग से जुडें !


माघी श्री गणेश जयंती पर कैसे करें गणेशजी की पूजा ?

श्री गणेश पूजा आरंभ  करने से पूर्व ये प्रार्थना करें –

अ. हे श्री गणेश, इस पूजा से मेरे अंतःकरण में आपके प्रति भक्ति-भाव निर्माण हो ।

आ. ‍इस पूजा से प्रक्षेपित होनेवाला चैतन्य मुझे आपकी कृपा से अधिक मात्रा में ग्रहण होने दीजिए ।

श्री गणपति को तिलक किस उंगली से लगाएं ?अनामिका
पुष्प कौन से चढाएं ?अडहुल एवं लाल रंग के पुष्प
किस सुगंध की अगरबत्ती का उपयोग करें ?चंदन, केवडा, चमेली एवं खस (संख्या – २)
अगरबत्ती की संख्या कितनी होनी चाहिए ?दो
किस सुगंध का इत्र अर्पित करें ?हीना
श्री गणपति की न्यूनतम कितनी परिक्रमाएं करें ?न्यूनतम आठ अथवा आठ की गुना में
भगवान गणेश की पूजा में गंध, हल्दी-कुमकुम, लाल फूल, दूर्वा (दूब) चढाएं । इसकी पद्धत एवं लाभ नीचे दिए हैं ।

श्री गणेश को गंध, हलदी-कुमकुम कैसे चढाएं ?

श्री गणेश की पूजा करते समय दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली से तिलक लगाना चाहिए । श्री गणेश को हलदी-कुमकुम लगाते समय पहले हल्दी फिर दाहिने हाथ के अंगूठे एवं अनामिका के बीच हलदी-कुमकुम लेकर चरणों पर चढाएं । अंगूठा एवं अनामिका को मिलाकर बनाई गई मुद्रा उपासक के शरीर में अनाहत चक्र को क्रियान्वित करती है । जिससे भक्तिभाव बढने में सहायता होती है ।

श्री गणेशजी को कौनसे पुष्प अर्पित करें ?

देवताओं को पुष्प क्यों अर्पित करते है ? देवताओं से प्रक्षेपित स्पंदन अधिकतर निर्गुण तत्त्व से संबंधित होते हैं । देवताओं को पुष्प अर्पित करने पर वे भगवान का तत्त्व ग्रहण कर पूजा करनेवालों को प्रदान करते हैं । कौनसा पुष्प किस देवता का तत्त्व आकर्षित करता है यह शास्त्रोंद्वारा निर्धारित है, उदा. अडहुल – गणेश-तत्त्व, मदार के पत्ते एवं पुष्प – हनुमान तत्त्व आदि । श्री गणपति का वर्ण लाल है; उनकी पूजा में लाल वस्त्र, लाल फूल एवं रक्तचंदन का प्रयोग किया जाता है । इस लाल रंग के कारण वातावरण से गणपति के पवित्रक मूर्ति में अधिक मात्रा में आकर्षित होते हैं एवं मूर्ति के जागृतिकरण में सहायता होती है ।

गुडहल के फूल की विशेषता दिखानेवाला सूक्ष्म-चित्र

दूर्वा (दूब) में गणेश-तत्त्व आकर्षित करने की क्षमता सर्वाधिक होती है, अतः श्री गणेश को दूर्वा (दूब) चढाते हैं । ‍इससे देवत्त्व में वृद्धि होकऱ हमें चैतन्य के स्तर पर उसका लाभ होता हैं । दूर्वा अधिकतर विषम संख्या में (न्यूनतम 3 अथवा 5, 7, 21 आदि) अर्पण करते हैं । विषम संख्या के कारण मूर्तिमें अधिक शक्ति आती है । गणपति को विशेषरूप से 21 दूर्वा (दूब) चढाते हैं । जैसे समिधा को एकत्रित बांधते हैं, उसी प्रकार दूर्वा को भी बांधते हैं । ऐसे बांधने से उनकी सुगंध अधिक समय टिकी रहती है । उसे अधिक समय चैतन्यमय (ताजा) रखने के लिए जल में भिगोकर चढा सकते हैं । इन दोनों कारणोंसे गणेशजी के पवित्रक बहुत समय तक मूर्ति में रहते हैं । गणपति को चढाई जानेवाली दूर्वा (दूब) कोमल हो । इसे ‘बालतृणम्’ कहते हैं । दूब चढाते समय उसका डंठल भगवान की ओर हो ऐसे रखें ।

दूर्वा (दूब) की विशेषता दिखानेवाला सूक्ष्म-चित्र

श्री गणेश की आरती

श्री गणेश की पूजा करने के बाद आरती की जाती है । उपासक के हृदय में भक्ति जगाने के लिए तथा देवता का कृपाशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सबसे अधिक सरल मार्ग है आरती । आरती गाने से हमें उन संतों के संकल्प एवं आशीर्वाद का भी लाभ होता है । आरती गाने पर हमें देवताओं के चैतन्य एवं शक्ति का भी अधिक लाभ होता है । ऐसी आरतियों को जब हम शास्त्रोक्त पद्धति से, अंतर्मन से, लगन से तथा भाव से गाते हैं तभी हमारा आरती गाने का उद्देश्य सफल होता है ।

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श्री गणेश से संबंधित विषय में जान लें!

यहा गणपति की पूजा कैसे करें, पूजाविधि के लिए आवश्‍यक सामग्री, पूजा की आवश्‍यक पूर्वतैयारी, भोग लगाना आदि जानकारी भी उपलब्ध है। श्री गणेश की संपूर्ण जानकारी दी है जिसे पढकर हममें भक्‍तिभाव जागृत होगा । इसके साथ ही श्री गणेशजी के तीर्थस्‍थान, श्री अष्‍टविनायक मंदिरों का इतिहास एवं पौराणिक कथाएं भी अंतर्भूत हैं

गणेश पूजा आणि आरती अ‍ॅप

संकेतस्थल

सनातन संस्था के संकेतस्थळ पर सात्त्विक पुरोहित द्वारा कहे गए श्रीदुर्गासप्तश्‍लोकी, श्री गणेश अथर्वशीर्ष, श्रीरामरक्षास्तोत्र, मारुतिस्तोत्र, श्रीकृष्णाष्टक, अगस्त्योक्त-आदित्यहृदय-स्तोत्र हैं । इसके साथ ही संतों द्वारा विशिष्ट लय में कहे गए श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री गणेश, श्री दुर्गादेवी, दत्तात्रेय एवं शिव के नामजप हैं । भावपूर्ण लय में साधकों द्वारा गाए विविध देवताओं की आरतियों सहित सालभर में आनेवाले विविध त्योहारों के समय एवं प्रतिदिन कहे जानेवाले विविध श्‍लोकों का भी समावेश इस लिंकपर किया गया है ।

श्री गणेश पूजा में आवश्यक साधन-सामग्री का शास्त्राधार बतानेवाला वीडियो !

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