गुरुमंत्र का महत्त्व
गुरुमंत्र देवता का नाम, मंत्र, अंक अथवा शब्द होता है जो गुरु अपने शिष्य को जप करने हेतु देते हैं ।
गुरुमंत्र देवता का नाम, मंत्र, अंक अथवा शब्द होता है जो गुरु अपने शिष्य को जप करने हेतु देते हैं ।
गुरु अर्थात ईश्वर का साकार रूप व ईश्वर अर्थात गुरु का निराकार रूप, ऐसे शास्त्र बताते हैं ।
समाज यदि सात्त्विक बने तो समाज में अंतर्गत तनाव दूर होना संभव है । हम कितना भी प्रयास करें पर अन्यों के कर्म तथा मानसिकता में बदलाव करना हमारे लिए संभव नहीं होता है । इस कारण ही रामराज्य जैसे हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करनी आवश्यक है ।
सनातन संस्था आयोजित ‘ऑनलाईन साधना प्रवचन शृंखला’ का आयोजन किया गया है ।
जगद्गुरु रामभद्राचार्य का मूल नाम गिरिधर मिश्र है । इनका जन्म १४ जनवरी १९५० को जौनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश) के सांडीखुर्द गांव में हुआ है ।
वैदिक संस्कृत मंत्रों के उच्चारण से स्मरणशक्ति बढती है, अमेरिका के एक समाचार-पत्र ने ऐसा दावा किया है । इस समाचार के अनुसार डॉ. जेम्स हार्टजेल नामक न्यूरो शोधकर्ता ने अमेरिका की एक मासिक पत्रिका में अपना यह शोध प्रकाशित किया है ।
माध्यमिक पाठशालाओं के स्तर पर संस्कृत की शिक्षा विशेष विषय के रूप में स्वीकारना अनिवार्य है । इससे विद्यार्थियों में देश की प्राचीन संस्कृति तथा अपने पूर्वजों के साहित्य के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होगी । उनके मन और चरित्र पर सकारात्मक परिणाम होकर उनके शुद्ध ज्ञान में बढोतरी होगी ।
‘मैं एक साधक के लिए नामजपादि उपचार कर रहा था । उसका चैतन्य सहन न होने के कारण साधक का कष्ट अधिक बढ गया तथा उसके द्वारा मेरी ओर कष्टदायक शक्ति प्रक्षेपित होने लगी ।
जनपद के मात्तूर गांव की भाषा संस्कृत होने से इस गांव के रहनेवाले मूल निवासियों में ३० प्राध्यापक बेंगळूरु, मैसूरु और मंगळूरु के विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढा रहे हैं । विशेष बात यह कि इस गांव में प्रत्येक घर में न्यूनतम एक व्यक्ति संस्कृत का जानकार और तंत्रज्ञान क्षेत्र का अभियंता है ।
संत जनाबाईने ‘काम में राम’ को ढूंढा । उन्होंने अपने प्रत्येक कार्य के साथ ईश्वर को जोडा इसलिए उन्हें लगता था कि मेरे कार्य मैं नहीं, अपितु ईश्वर स्वयं ही कर रहे हैं ।