सनातन संस्था की स्थापना, उद्देश्य एवं विशेषताएं
अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त संमोहन चिकित्सा विशेषज्ञ परात्पर गुरु डॉ. जयंत बाळाजी आठवलेजी ने २२.३.१९९९ को सनातन संस्था की स्थापना की ।
अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त संमोहन चिकित्सा विशेषज्ञ परात्पर गुरु डॉ. जयंत बाळाजी आठवलेजी ने २२.३.१९९९ को सनातन संस्था की स्थापना की ।
कॉ. गोविंद पानसरे की हत्या के प्रकरण में पुलिस तंत्र किसी भी दबाव में आए बिना जांच करे तथा राष्ट्र्रप्रेमी सनातन संस्था को बलि का बकरा न बनाया जाए तथा शासन संभावित प्रतिबंध के विरोध में ठोस भूमिका ले इन मांगों हेतु हिन्दू संगठनोंद्वारा ज्ञापन दिया गया ।
मुंबई में जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य स्वामी नरेंद्राचार्य महाराज का प्रवचन एवं दर्शन समारोह का आयोजन किया गया था। तदुपरांत हुई सनातन के साधकोंसे भेंट के समय सनातन संस्थापर आई बंदी के संकट के संदर्भ में उन्होंने कहा कि, ‘चिंता न करें ! ऐसा कुछ नहीं होगा।
सनातन के साधकों एवं हितचिंतकों, कॉ. पानसरे हत्त्या के संदर्भ में सनातन संस्था के एक साधक को आशंका के कारण बंदी बनाया गया। इसी कारण वश सनातन संस्था तथा हिन्दू धर्म के विरोधक सनातन के बारे में अपप्रचार कर उधम मचा रहे हैं।
सनातन संस्था को किसी भी राजनैतिक पार्टी का समर्थन प्राप्त ना होने के कारण सनातन संस्था को लक्ष्य बनाया जा रहा है। अन्य हिन्दूत्ववादी संगठनोंको राजनैतिक पक्षोंका समर्थन रहता है। वे किसी भी विषय पर कठोर भूमिका नहीं लेते। इस कारण राजनैतिक पक्ष उन्हें लक्ष्य नहीं बनाते – श्री. वीरेंद्र मराठे, विश्वस्त, सनातन संस्था
अमावास्याका अंधेरा कान फाडनेवाले पटाखोंके कारण दूर नहीं होता; अपितु आंखोंके समक्ष जुगनूके समान चमककर सर्वत्र गहराता हुआ अंधकार होनेका ही भ्रम होता है ।
पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं, इस उक्ति के अनुसार अवतारी देह में से बचपन से ही चैतन्य का प्रक्षेपण हो रहा है ।
तैलाभ्यंगस्नानके लिए संकल्प किया जाता है । सुगंधित तेल एवं उबटनका लेप बनाकर, तेलके समान ही पूरे शरीरपर लगाया जाता है ।
दीपावली शब्दका अर्थ है, दीपोंकी पंक्ति । अपने घरमें सदैव लक्ष्मीका वास रहे, ज्ञानका प्रकाश रहे, इसलिए हरकोई बडे आनंदसे दीपोत्सव मनाता है । घर शुद्ध एवं सुशोभित कर दीपावली मनानेसे श्री लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं तथा वहां स्थायीरूपसे निवास करती हैं ।
वसुबारस अर्थात् गोवत्स द्वादशी दीपावलीके आरंभमें आती है । यह गोमाताका सवत्स अर्थात् उसके बछडेके साथ पूजन करनेका दिन है । शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण द्वादशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण द्वादशी गोवत्स द्वादशीके नामसे जानी जाती है । यह दिन एक व्रतके रूपमें मनाया जाता है ।