‘संगीत-चिकित्सा व उपचार’ ग्रंथ के लेखक तथा धर्मकार्य में नि:स्वार्थ सहभागी होनेवाले डॉ. विजय तारे ने प्राप्त किया ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर !

यहां के डॉ. विजय तारे (आयु ६४ वर्ष) ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कर जन्म-मृत्यु के फेरे से मुक्त हो गए । दंतचिकित्सक डॉ. तारे ने संगीत में भी बी.ए किया है । उन्होंने ‘संगीत चिकित्सा व उपचार’ नामक ग्रंथ लिखा है ।

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सनातन संस्था, हिन्दू जनजागृति समिति द्वारा रामनवमी एवं हनुमान जयंती के उत्सव में विविध स्थानों पर धर्मप्रसार

यहां के सनातन धर्म (श्रीराम) मंदिर, गौतम बुद्ध नगर में हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से श्रीरामनवमी निमित्त कार्यक्रम आयोजित किया गया था ।

खगोलशास्त्र और फलज्योतिषविज्ञान में अद्भुत शोध करनेवाले आचार्य वराहमिहिर के जन्मस्थान के प्रति मध्यप्रदेश सरकार की घोर उपेक्षा !

बताया जाता है कि आचार्य वराहमिहिर का जन्म ५ वीं शताब्दी में हुआ था । जोधपुर के ज्योतिषाचार्य पं. रमेश भोजराज द्विवेदी की गणनानुसार वराहमिहिर का जन्म चैत्र शुक्ल दशमी को हुआ था । वराहमिहिर का घराना परंपरा से सूर्योपासक था ।

अहर्निश सेवारत परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के सत्संग में श्री. रमेश शिंदे द्वारा अनुभव किया गया उनका प्रेम, सीख एवं द्रष्टापन !

प.पू. डॉक्टरजी का (प्रोस्टेट का) शस्त्रकर्म हुआ था । उस समय चिकित्सालय में भी वे ग्रंथ के लेखन संबंधी कागज पढने हेतु मंगवा लेते थे । वहां पर भी वे समय व्यर्थ नहीं गंवाते थे ।

असहनीय ग्रीष्मकाल को सहनीय बनाने के लिए आयुर्वेदानुसार ऋतुचर्या करें !

‘ग्रीष्मकाल में पसीना बहुत होता है । इससे, त्वचा पर स्थित पसीने की ग्रंथियों के साथ तेल की ग्रंथियां अधिक काम करने लगती हैं, जिससे त्वचा चिपचिपी होती है ।

अप्रैल २०१७ में केरल राज्य में अक्षय्य तृतिया के उपलक्ष्य में सनातन संस्था द्वारा किया गया धर्मप्रसार !

मुंबई में जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य स्वामी नरेंद्राचार्य महाराज का प्रवचन एवं दर्शन समारोह का आयोजन किया गया था। तदुपरांत हुई सनातन के साधकोंसे भेंट के समय सनातन संस्थापर आई बंदी के संकट के संदर्भ में उन्होंने कहा कि, ‘चिंता न करें ! ऐसा कुछ नहीं होगा।

स्वयं के कृत्य से ही ‘साधक आचरण कैसे करें ?’, इसका आदर्श सभी के समक्ष रखनेवाले प.पू. डॉक्टरजी !

किसी भी प्रकार की अर्थप्राप्ति न होते हुए भी अपना धन भी धर्मकार्य हेतु देकर त्याग करना, किसी भी प्रकार के आडंबर के बिना ‘प्रत्येक बात सादगी से तथा साधना स्वरूप करना, मान-सम्मान की अपेक्षा न रखनेवाले, कर्तापन ईश्‍वर को देकर निष्काम भावना से कार्य करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवले !

जातिभेद का विषैला कलंक पोंछकर साधनारूपी अमृत देनेवाले प.पू. डॉक्टरजी के चरणों में साधक द्वारा व्यक्त की गई कृतज्ञता !

मेरा जन्म पिछडे वर्ग के वीरशैव ढोर कक्कया जाति में हुआ है । इस जाति के लोगों का मुख्य व्यवसाय जानवरों की चमडी उतारना है ।

नृत्य करने का मूल उद्देश्य साध्य करने के लिए ‘ईश्‍वरप्राप्ति के लिए नृत्यकला’ यह दृष्टिकोण सबके सामने प्रस्तुत करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी !

हमारी संस्कृति में नृत्यकला का प्रादुर्भाव मंदिरों में ही हुआ है । इसका विकास एक उपासना माध्यम के रूप में हुआ । इसके माध्यम से भी ईश्‍वरप्राप्ति हो, इसके लिए सनातन की साधिका श्रीमती सावित्री इचलकरंजीकर और डॉ. (कुमारी) आरती तिवारी ने नृत्य आरंभ किया है ।

प.पू. डॉक्टरजी द्वारा अथक परिश्रम कर की गई ध्वनिचित्रीकरण सेवा और तैयार हुआ संस्था का पहला प्रकाशन प.पू. भक्तराज महाराजजी के गाए हुए भजनों की ऑडियो कैसेट्स !

अब तक मराठी भाषा में ३६, हिन्दी भाषा में ३८० से अधिक, तथा तेलुगु और कन्नड भाषा में हिन्दुआें के त्यौहारों की जानकारी देनेवाली धर्मसत्संगों की दृश्यश्रव्य-चक्रिकाएं बनाई हैं । मराठी, हिन्दी, तेलुगु और कन्नड भाषा के धर्मसत्संगों का १४ चैनलों पर नियमित प्रसारण किया जा रहा है ।