साधकों को प्रत्यक्ष कृति से सिखानेवाले परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवलेजी !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की जीवन यात्रा देखें तो उनकी प्रत्येक कृति आदर्श है, यह पग-पग पर दिखाई देता है । साधक भी वैसे ही तैयार होें, वह सेवा की बारीकियों का अध्ययन कर प्रत्येक कृति ईश्‍वर को अपेक्षित ऐसी परिपूर्ण करें, ऐसी उनकी लगन है ।

सहस्रों वर्षों के काल-पटल पर अपना प्रभाव अंकित करनेवाले अवतारी पुरुष !

साधारण व्यक्ति का जीवन पक्षियों की भांति होता है, ४ तिनकों से बनी गृहस्थी ! उनमें से भी जो व्यक्ति अपने स्वार्थ को त्याग कर समाज, राष्ट्र एवं धर्म हेतु अपना जीवन अर्पित करते हैं, वे विभूति कहलाते हैं । ऐसी अनेक विभूतियों को भारत मां ने अपनी गोद में खेलाया है । कुछ व्यक्ति सही समय पर अपने कार्य छाप अंकित कर, कीर्ति अर्जित करते हैं ।

स्वयं के कृत्य से ही ‘साधक आचरण कैसे करें ?’, इसका आदर्श सभी के समक्ष रखनेवाले प.पू. डॉक्टरजी !

किसी भी प्रकार की अर्थप्राप्ति न होते हुए भी अपना धन भी धर्मकार्य हेतु देकर त्याग करना, किसी भी प्रकार के आडंबर के बिना ‘प्रत्येक बात सादगी से तथा साधना स्वरूप करना, मान-सम्मान की अपेक्षा न रखनेवाले, कर्तापन ईश्‍वर को देकर निष्काम भावना से कार्य करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवले !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का आदर्श जीवन

प.पू. डॉक्टरजी की अलौकिकता का शब्दों में वर्णन करना असंभव है’, ऐसा महर्षि बताते हैं और साधकों ने प्रत्यक्ष में यह अनुभव भी किया है । मैं पिछले १६ वर्ष से प.पू. डॉक्टरजी के सान्निध्य में साधना कर रहा हूं । इस कालखंड में उनके संदर्भ में अनेक अनुभूतियां मुझे भी हुई हैं ।