जीव की साधना जैसे-जैसे वृद्धिंगत होती है, वैसे-वैसे उससे अधिकाधिक सात्त्विकता प्रक्षेपित होकर उसके संपर्क में आनेवाली वस्तु, वास्तु और आसपास का वातावरण चैतन्यमय बनने लगता है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के समष्टि गुरु और जगद्गुरु होने से उनका अवतारी कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में आरंभ रहता है । यह कार्य पूर्णत्व तक ले जाने के लिए उनके कक्ष में कार्यरत पंचमहाभूत तत्त्व अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील हाते हैं । इसलिए इस अवतारी कार्य के कारण उनके सूक्ष्म देह से प्रक्षेपित होनेवाली तरंगों का परिणाम उनके कक्ष पर होकर कक्ष के वातावरण में पंचमहाभूतों के स्तर पर विविध प्रकार के परिवर्तन होते हैं । उनमें से कुछ परिवर्तन के छायाचित्र यहां प्रकाशित कर रहे हैं ।


इसके अतिरिक्त अन्य परिवर्तन भी दिखाई देते हैं । वे आगे दिए अनुसार हैं ।
१. कक्ष की खिडकियों के कांच में आपतत्त्व के कारण लहरों की भांति रेखाएं दिखती हैं । तेजतत्त्व के कारण कांच से बाहर का दृश्य सुस्पष्ट दिखाई देता है ।
२. फर्श कोमल हो गए हैं ।
३. श्वेत दीवारों पर उत्साहवर्धक हरे रंग की छटा आई है ।
४. कमरे के दीवारों से प्रक्षेपित होनेवाले अच्छे स्पंदन हाथों से स्पर्श करने पर अनुभव होते हैं ।
५. कक्ष में दैवी सुगंध आना, दैवी प्रकाश दिखना, दैवी नाद सुनाई देना आदिअनुभूति भी आती है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के देह से प्रक्षेपित हो रहे चैतन्यमय तेजतत्त्व और उच्छ्वास से चैतन्यमय वायुतत्त्व के कारण अधिक हराभरा और तरोताजे पत्ते दिखाई देनेवाला परात्पर गुरु डॉक्टरजी के कक्ष के सामने गूलर का वृक्ष !
बुद्धिअगम्य परिवर्तनों के संदर्भ में परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का विश्लेषण
‘विविध अच्छी और बुरी अनुभूति के संदर्भ में मेरे संदर्भ की वस्तुस्थिति ज्ञानेश्वरी में बताए अनुसार इस प्रकार है ।
हे मजचिस्तव जाहले । परि म्यां नाहीं केलें । – ज्ञानेश्वरी, अध्याय ४, पंक्ति ८१
इसमें ‘मजचिस्तव जाहले’ (मेरे कारण हुआ है), अर्थात मेरे अस्तित्व के कारण हुआ है, इसमें ‘मैं पन’ यह परमेश्वर है, तथा ‘म्यां नाही केलें’ (मैंने किया नहीं), अर्थात कर्तापन मेरी ओर नहीं है । इसका एक सुंदर उदाहरण अर्थात सूरज उगता है, तब सब लोग उठते हैं, फूल खिलते हैं इत्यादि । यह केवल सूर्य के अस्तित्व से होता है । सूर्य किसी को नहीं कहता कि ‘उठो’ अथवा फूलों को नहीं कहता कि ‘खिलो’ !’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले
सनातन के आध्यात्मिक शोध कोे सीखने की दृष्टि से देखें !
‘सनातन, आध्यात्मिक शोध के दृष्टिकोण से साधना के कारण व्यक्ति के अंतर्मन, बाह्यमन और शरीर पर होनेवाले परिणामों का अध्ययन कर रहा है । ये शोध का एक भाग है अर्थात परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की देह पर उभरे आध्यात्मिक चिन्ह । सनातन प्रभात समाचार पत्रिका में प्रकाशित हो रहा है, यह चिन्ह किस कारण से उभरता है, इस शोध में सहायता करने के लिए वैज्ञानिकों का आवाहन किया है । ‘जिज्ञासु ही ज्ञान का अधिकारी है’, इस उक्ति के अनुसार साधना के कारण होनेवाले परिणामों को जिज्ञासु वृत्ति से देखा, सीखने की और पूछने की वृत्ति रखी, तभी ईश्वर इस संदर्भ में अमूल्य ज्ञान देंगे अन्यथा ‘यह झूठ है !’, ‘यह कैसे हो सकता है ?’, ऐसे बुद्धिवादी प्रश्नों में अटककर ईश्वर हमें जो भरभर दे रहे हैं, उससे आप वंचित रह जाऐंगे ।’ – संपादक
विशेषज्ञ, अध्ययनकर्ता और वैज्ञानिक दृष्टि से शोध करनेवालों से निवेदन !
‘संतों की देह की विशेषता के संदर्भ में शोध कर उसके पीछे का कार्यकारणभाव शोध कर निकालने का साधक प्रयत्न कर रहे हैं ।
१. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के ब्रह्मरंध्र के स्थान पर त्वचा पर ‘ॐ’ उभरने के पीछे वैज्ञानिक कारण क्या है ?
२. प्रथम परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के जीभ पर, उसके उपरांत कुछ वर्षों में मस्तक पर तथा उपरांत कुछ वर्षों में ब्रह्मरंध्र के स्थान पर त्वचा पर ‘ॐ’ उभरना, गले के पास हार के समान लाल आकार आना, मस्तक पर त्रिशूल उभरना, कमल के समान आकार दिखाई देना, इसके पीछे कारण क्या है ?
३. संतों की देह के संदर्भ में वैशिष्ट्यपूर्ण घटना का किन वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा शोध कर सकते हैं ?
४. उच्च आध्यात्मिक स्तर के संत स्वयं की इच्छा से अपनी देह के संदर्भ में ऐसे परिवर्तन कर सकते हैं क्या ?’ (प्रत्यक्ष में उच्च आध्यात्मिक स्तर के संतों की स्वयं की इच्छा नहीं होती ।)
इस संदर्भ में अध्ययनकर्ता, इस विषय में शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों और वैज्ञानिक दृष्टि से शोध करनेवालों का सहयोग हमें मिला तो हम कृतज्ञ होंगे !’
– व्यवस्थापक, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.
संपर्क : श्री. रूपेश रेडकर,
इ-मेल : [email protected]


अखिल मानवजाति पर निरपेक्ष प्रेम (प्रीति) करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी !
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