पंचम अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन में श्रीलंका के श्री. मरवनपुलावू सच्चिदानंदनजी ने प्राप्त किया ६४ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर

रामनाथी (गोवा) – गत चतुर्थ अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन में श्रीलंका के हिन्दुआें की रक्षा के लिए लगन से कार्य करनेवालेे श्रीलंका के श्री. सच्चिदानंदनजी का ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर घोषित किया गया था । पांचवे अधिवेशन में धर्मबंधुत्व की भावना रखनेवाले और वृद्धावस्था में भी हिन्दुआें की सुरक्षा के लिए कार्यरत श्री. सच्चिदानंदनजी का आध्यात्मिक स्तर ६४ प्रतिशत घोषित किया गया । हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक पू.(डॉ.) चारुदत्त पिंगळेजी के करकमलों से पुष्पहार पहना कर और भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा भेंट देकर श्री. मरवनपुलावू सच्चिदानंदनजी का सत्कार किया गया ।

पंचम अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन में ओडीशा के प्रेम प्रकाश कुमार ने प्राप्त किया ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर !

पंचम अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन में २२ जून को सायंकालीन सत्र में श्री. प्रेम प्रकाश कुमारजी का आध्यात्मिक स्तर ६१ प्रतिशत घोषित किया गया । सनातन संस्था के धर्मप्रसारसेवक पू. नंदकुमार जाधवजी के करकमलों से भगवान श्रीकृष्ण की सनातन-निर्मित प्रतिमा और पुष्प देकर उनका सत्कार किया गया ।

हिन्दू संस्कृति संवर्धन हेतु अमूल्य योगदान देनेवाले प्रा. शिवकुमार ओझा ने प्राप्त किया ६२ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर !

पंचम अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन के दूसरे दिन हिन्दू संस्कृति संवर्धन हेतु अमूल्य योगदान देनेवाले प्रा. शिवकुमार आेझा (आयु ८३ वर्ष ) ने ६२ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करने की आनंदवार्ता सभी को दी गई । इस अवसर पर हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक पू. डॉ. चारुदत्त पिंगळे द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा देकर प्रा. आेझा का सम्मान किया गया ।

सनातन के दो साधक संतपद पर हुए विराजमान !

पू. (कु.) रेखा दीदी की प्रगति के लिए कारणभूत उनके निरपेक्ष प्रेम और गुरु का आज्ञापालन करने की लगन आदि गुणों के दर्शन श्रीरामनवमी के दिन उपस्थित जनसमुदाय को हुए ।

विविध संतों द्वारा परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का किया गया सम्मान !

संतों का कार्य आध्यात्मिक (पारलौकिक) स्तर का होने से लौकिक सम्मान एवं पुरस्कारों के प्रति उनमें कोई आसक्ति नहीं होती । अपितु मनोलय एवं अहं का लय होने से वे सामाजिक प्रतिष्ठा को प्राप्त करनेवाले सम्मान एवं पुरस्कार के परे जा चुके होते हैं । ऐसा होनेपर भी केवल संत ही संत की पहचान कर सकते हैं और उनको ही अन्य संतों के कार्य का महत्त्व समझ में आता है ।

भगवान श्रीकृष्णद्वारा पितासमान, दिनचर्यासे संंबंधित आचार सिखाना

भगवान श्रीकृष्णकी सीख दर्शानेवाले चित्र १ . भगवान श्रीकृष्णद्वारा ‘कराग्रे वसते लक्ष्मी…’ इस श्लोक के माध्यम से एक पितासमान दिनचर्या से संंबंधित आचार सिखाना  ‘२७.१०.२०१२ को मैं ‘दिनचर्यासे संबंधित आचार एवं उनका शास्त्र’ इस ग्रंथका मराठीसे तमिलमें भाषांतर करनेकी सेवा कर रही थी । उस समय ‘कराग्रे वसत लक्ष्मी …’ इस श्लोकका भावार्थ समझते समय मेरी भावजागृति हुई … Read more

कोई भी सेवा भगवान श्रीकृष्णकी कृपासे होनेकी अनुभूति

‘पिछले सप्ताह मैं एक साधिकाके घर पंचांग और ग्रंथके संदर्भमें सेवा करने गई थी । सेवा करते समय उन्होंने मुझसे पूछा, ‘आप क्या भाव रखकर सेवा करती हैं ?’ तब मैंने उत्तरमें बताया, ‘ऐसा भाव रखते हैं कि हम भगवान श्रीकृष्णके बालक हैं और उनकी गोदमें बैठकर संगणकके साथ खेल रहे हैं ।