आध्यात्मिक कष्ट क्यो होते है ?

साधना करते हुए सूक्ष्म की विविध शक्तियां साधक को कष्ट देती हैं । उसे साधना के परमार्थ पथ से परावृत्त करने हेतु वे प्रयत्नरत होते हैं । इस पर कौन-सा उपाय करें इत्यादि के विषय के प्रश्नोत्तर प्रस्तुत स्तंभ में अंतर्भूत हैं ।

कर्मकांड संबंधी शंकानिरसन

कर्मकांड साधना का प्राथमिक परंतु अविभाज्य भाग है । कर्मकांड में पालन करने योग्य विविध नियम, आचरण कैसे होना चाहिए, इस विषय में अनेक लोगों को जानकारी होती है; परंतु उसके पीछे का कारण और शास्त्र के विषय में हम अनभिज्ञ होते हैं ।

अध्यात्म संबंधी शंकानिरसन

गांव-गांव के जिज्ञासु और साधकों के मन में सामान्य तौर पर निर्माण होनेवाली अध्यात्मशास्त्र के सैद्धांतिक और प्रायोगिक भाग की शंकाओं का निरसन सनातन संस्था के प्रेरणास्रोत प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजी ने किया है ।

गुरुकृपायोगानुसार साधना के प्रकार

इस लेख में गुरुकृपायोगानुसार साधना की व्यष्टि साधना और समष्टि साधना के विषय में जान लेंगे । व्यष्टि साधना अर्थात् व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति हेतु किए जानेवाले प्रयत्न । समष्टि साधना अर्थात् समाज की आध्यात्मिक उन्नति हेतु किए जानेवाले प्रयत्न ।

नामजप के लाभ

ईश्वर का नाम, साधना की नींव है । अपने जीवन में नामजप से शारीरिक एवं मानसिकदृष्टि से क्या-क्या लाभ होते हैं, यह देखेंगे ।

स्वसूचना

स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया में स्वसूचना बनाना एवं स्वसूचना के अभ्याससत्र करना, ये दो महत्त्वपूर्ण चरण हैं । इनमें से यदि एक भी चरण पर चूक हो जाए, तो प्रक्रिया का अपेक्षित परिणाम नहीं दिखाई देता ।

स्वभावदोष के लिए स्वसूचना की उपचारपद्धति निश्चित करना और स्वसूचना बनाना

प्रक्रिया के अंंतर्गत प्रत्येक स्वभावदोष के लिए स्वसूचना की उपचारपद्धति निश्चित करना और स्वसूचना बनाना

स्वभावदोष-निर्मूलन सारणी का स्वरूप एवं लिखने की पद्धति

१. स्वभावदोषोंका चयन १ अ. ‘स्वभावदोष सारणी’से तीव्र स्वभावदोष पहचानें प्रत्येक में अनेक स्वभावदोष होते हैं। जो स्वभावदोष तीव्र हैं, उन्हें पहले दूर करना महत्त्वपूर्ण है। तीव्र स्वभावदोष ‘स्वभावदोष सारणी’से पहचानें। मान लो, किसीकी सारणी में ‘आलस्य’ इस दोषसे सम्बन्धित अनेक प्रसंग हों, तो समझ लो कि उसमें ‘आलस्य’ यह दोष तीव्र है । यदि … Read more

मन, संस्कार एवं स्वभाव

आधुनिक मानसशास्त्र के अनुसार मन के दो भाग होते हैं । पहला भाग, जिसे हम ‘मन’ कहते हैं, वह ‘बाह्यमन’ है । दूसरा अप्रकट भाग ‘चित्त (अंतर्मन)’ है । मन की रचना एवं कार्य में बाह्यमन का भाग केवल १० प्रतिशत जबकि अंतर्मन का ९० प्रतिशत है ।