जपमाला (मणिमाला) का उपयोग कैसे करें ?

मणियों की संख्या : हिन्दुओं की जपमाला में अधिकतर १०८ मणि होते हैं । मेरुमणि अतिरिक्त होता है । कुछ सम्प्रदायों में इससे भिन्न संख्या भी होती है, उदा. शैवपन्थी ३२ मणियोंवाली मालाका प्रयोग करते हैं ।

 

१. जपमाला के मणि फेरने के नियम

अ. मेरुमणिको न लांघिए ।

प्रश्‍न : मेरुमणितक पहुंचने पर मालाको उलटा क्यों घुमाते हैं ?
प.पू. भक्तराजमहाराज : जपक्रियाको भूलने के लिए !

जिस प्रकार साधक की दृष्टिसे इडा और पिंगला नाडियों के सक्रिय होनेका उतना महत्त्व नहीं है, जितना दोनों के बीच स्थित सुषुम्ना नाडी के सक्रिय होनेका महत्त्व है; उसी प्रकार केवल एक दिशा में माला फेरना साधक की दृष्टिसे उचित नहीं है । जैसे इडा एवं पिंगला नाडियों के मध्य सुषुम्ना नाडी होती है, उसी प्रकार माला के उलटे-सीधे फेरों के मध्य मेरुमणि होती है । यदि मेरुमणिको लांघने की चूक हो जाए, तब प्रायश्‍चित के रूप में छ: बार प्राणायाम करना चाहिए ।

आ. जपमाला के मणियों को अपनी ओर खींचना

माला के मणियोंको अपनी ओर न फेरकर बाहर की ओर फेरें और इसकी अनुभूति करें । अधिकांश लोगोंको ऐसा करनेसे कष्टदायक अनुभूति होती है । क्योंकि, अपनी ओर मालामणि फेरते समय प्राणवायु सक्रिय होती है । इसके विपरीत, बाहर की ओर मालामणि फेरतेसमय समानवायु सक्रिय होती है । प्राणवायु की सक्रियतासे समानवायु की तुलना में अधिक आनन्द मिलता है ।

इ. उद्देश्यानुसार

दाहिने हाथ में माला लेकर नीचे दी हुई पद्धतिसे जप किया जाता है ।

१. बीच की उंगली के मध्य के पोर पर माला रखकर उसके मणियों को क्रमशः अपनी ओर अंगूठे से खींचिए । परन्तु माला से तर्जनीका स्पर्श न हो ।

२.अनामिका पर माला रखकर अनामिका एवं अंगूठे के अग्रभाग एक-दूसरे से जोडिए । पश्‍चात बीच की उंगली से माला के मणियों को अपनी ओर खीचिए । बीच की उंगली से माला अपनी ओर खींचना शरीरशास्त्र की दृष्टि से भी अधिक सुविधाजनक है ।

शास्त्रका कहना है कि गले में पहनी जानेवाली माला का उपयोग जप के लिए नहीं करना चाहिए । इसी प्रकार, जपमाला गले में नहीं पहननी चाहिए । क्योंकि; कोई भी व्यक्ति दिनभर सात्त्विक नहीं रह सकता । ऐसे में यदि जपमाला गले में रही, तो उसमें जप से आई सात्त्विकता नष्ट होगी । इस हानि से बचने के लिए प्राथमिक अवस्था के साधकको जपमाला गले में नहीं पहननी चाहिए । यदि वह पहनता भी है, तो उसे केवल मानसिक स्तरका लाभ होगा; उसे स्मरण रहेगा कि मेरा आचरण सात्त्विक होना चाहिए । उन्नत साधक गले में माला पहने अथवा न पहने, इससे कुछ अन्तर नहीं पडता ।

ई. समय

१. दिन के अन्य समय की तुलना में ब्राह्ममुहूर्त अधिक सात्त्विक होता है । इसलिए, कई योगी इस काल में अपनी सात्त्विकता बढाने के लिए साधना करते हैं; परन्तु उस समय की साधना से सात्त्विकता ०.०००१% ही बढती है । इसलिए, ब्राह्ममुहूर्त में हठपूर्वक उठकर जप करना आवश्यक नहीं है । यदि ब्राह्ममुहूर्त के समय नींद आ रही हो, तो बलपूर्वक नामजप करने की अपेक्षा, साधक की प्रवृत्ति के अनुसार जिस समय नामजप अच्छा हो, वही समय सर्वोत्तम होगा । क्योंकि, अच्छे नामजप से सात्त्विकता ५% बढती है; नींद आते समय (नींद तमोगुणी होती है ।) नामजप करने से येन-केन प्रकारेण सात्त्विकता १% ही बढती है ।

२. काल-समय ईश्‍वरने ही बनाए हैं; इसलिए अमुक समय जप करना चाहिए और अमुक समय नहीं; ऐसा कभी नहीं हो सकता । जप तो नित्य और सर्वकाल करना चाहिए ।

उ. स्थान

१. प्राथमिक अवस्था के अधिकतर साधकों के लिए देवालय में अथवा उचित आसन पर बैठकर सतत नामजप करना आवश्यक होता है; क्योंकि उनमें रजोगुण अधिक होता है । एक स्थान पर अधिक कालतक बैठे रहने से रजोगुण घटाने में सहायता होती है ।

२. देवालय में बैठकर नामजप करना, उचित आसन पर बैठकर नामजप करना आदि से साधक की सात्त्विकता ५ प्रतिशत + ०.०००१ प्रतिशत ही बढती है; परन्तु कहीं भी नामजप करने पर ५ प्रतिशत बढती है । इसलिए, नामधारक को बाहरी बातों पर ध्यान न देकर, सतत नामजप करने की ओर ध्यान देना चाहिए ।

३. सारे स्थान ईश्‍वरने ही बनाए हैं; अतः कहीं भी, यहांतक कि शौचालय में भी नामजप किया जा सकता है ।

४. सबकुछ ईश्‍वर द्वारा ही निर्मित होने से कहीं भी कभी भी उनका ले सकते है । उन्नत साधक, एक स्थान पर बैठकर नामजप करने की अपेक्षा व्यवहार के सब काम करते हुए नामजप करें; यह श्रेष्ठ स्तर की साधना है । क्योंकि, ऐसा करने से साधना में निरन्तरता बनी रहती है और साधक माया में रहकर भी उससे अलिप्त रहता है । इस प्रकार, प्रत्येक स्थिति में भगवान से आन्तरिक निकटता साधने को सहजावस्था कहते हैं । – परम पूज्य भक्तराज महाराज

ऊ. शरीर की प्रकृति

थकावट एवं आलस्य : शरीर के थकने पर नींद आती है तथा मन के थकने पर आलस्य होता है । अतः, अपनेआपको अधिक कष्ट देकर जप न करें ।

ए. मासिकधर्म (ऋतुस्राव)

भक्तियोगानुसार मासिकधर्म ईश्‍वर की ही देन है । इसलिए इस अवधि में भी नामजप करना उचित है । मासिकधर्म के समय शरीर में रजोगुण ०.०००१% ही बढता है । इसका परिणाम नामजप से ५% बढनेवाली सात्त्विकता पर किंचित् ही होता है ।

ऐ. विश्‍वास आवश्यक

नाम जपते समय सम्बन्धित देवता पर विश्‍वास होना आवश्यक है । केवल यान्त्रिक ढंग से मन्त्रका प्राणहीन उच्चारण जप नहीं कहलाता । मन्त्रोच्चारण ऐसा हो कि उससे जपकर्ता भगवद्भाव एवं भगवद्शक्ति से युक्त हो जाए । पतंजलिने ऐसे जपको मन्त्र की भावना कहा है । किसी ठोस पदार्थको किसी द्रव में बार-बार डुबानेको, उस ठोस पदाथर्र्को उस द्रव की भावना देना कहते हैं । इसी प्रकार, मन्त्रार्थ की अखण्ड भावना से जपकर्ता अपनेआपको धीरे-धीरे मन्त्रमय करे । यही जपका मुख्य उद्देश्य है ।

ओ. नामजप को श्‍वास से जोडना

हम श्‍वास लेने के कारण ही जीवित रहते हैं, नामजप के कारण नहीं । इसलिए, श्‍वास पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण होता है । इसीलिए, नाम को श्‍वास से जोडा जाता है, श्‍वास को नाम से नहीं जोडा जाता । परम पूज्य भक्तराज महाराज ।

औ. नामजप के लिए आसन और बैठक

शरीर की प्रत्येक स्थिर और सुखद अवस्था को आसन अथवा बैठक कहते हैं । नामजप ऐसे आसन में करना चाहिए कि जिससे कष्ट न हो । मान लीजिए कि आप पद्मासन में नामजप कर रहे हैं । ऐसे समय यदि पैरों में अथवा पीठ में कष्ट होने लगेगा, तब आपका ध्यान नामजप से हटकर उस कष्ट की ओर, अर्थात शरीर की ओर जाएगा । अतः, अपनी स्थिति अनुसार ऐसे आसनका चुनाव करना चाहिए कि नामजप में कोई व्यवधान न आए ।

 

२. नामजप में सहायक १० सूत्र

१. प्रत्याहार : प्रत्याहार का अर्थ है, इन्द्रियों को उनके विषयों से अलग रखना; उदा. आंख मून्द लेने पर, उसका सम्बन्ध दृश्य विषय से नहीं रहता । इससे दृश्य-सम्बन्धी संवेदनाएं ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से मन तक नहीं पहुंचतीं । ऐसा होनेपर, उनसे सम्बन्धित विचार मन में नहीं उत्पन्न होते ।

२. सत्संग (बाह्य) : सत्संग में मन में आध्यात्मिक विचार अधिक आते हैं । तब, स्वाभाविक ही अन्य विचार घट जाते हैं । सत्संग में अपनेआप नामजप होता है; इसलिए, मैं नामजप करता हूं, यह अहंकार भी नहीं होता ।

३. प्रीति : इस गुण के कारण अपना विचार घट जाता है और दूसराका विचार बढ जाता है ।

४. नामजप (आन्तरिक सत्संग) : जिस प्रकार पैर में चुभे कांटे को किसी बाहरी कांटे से निकाला जाता है, उसी प्रकार मन में घुसे अनर्गल विचारों को नामरूपी विचार से निकाल देना चाहिए और यह सम्भव है ।

५. श्रद्धा : नाम पर श्रद्धा जितनी अधिक होगी, नामजप उतना अच्छा होगा । नाम के विषय में विकल्प आने पर नामजप अल्प होता है ।

६. सत्सेवा : सत्सेवा में सेवा के अर्थात सत् के विचार पर मन एकाग्र होने से सेवासम्बन्धी विचार, अन्यथा सत्सम्बन्धी विचार, अर्थात नामजप, ऐसा अपनेआप होता है ।

७. त्याग : हमारे पास जितनी अधिक वस्तुएं होती हैं, उनसे सम्बन्धित उतने विचार मन में आते हैं । इनमें, हमारे परिजनों, सगे-सम्बन्धियों तथा धन-सम्पत्ति से सम्बन्धित विचार होते हैं । हमारे पास जो वस्तु नहीं होती और जिसकी हमें इच्छा नहीं होती, उससे सम्बन्धित विचार मन में नहीं आते । अतः, मन के विचारों की संख्या घटाने के लिए अधिकाधिक त्याग करना चाहिए ।

८. अहं घटाना : अहंकार की अधिकतावाला व्यक्ति अपने विषय में अधिक सोचता है । जिसका अहंकार अल्प होता है, वही नामजपका विचार कर सकता है ।

९. आज्ञापालन : आज्ञापालनसे, साधना में बाधक बुद्धिका तर्क-वितर्क स्वभाव समाप्त होता है, अर्थात बुद्धिलय हो जाता है । इससे नामजप करना सरल होता है ।

१०. गुरुकृपा : मन में आनेवाले अनावश्यक विचारों को केवल अपने प्रयत्नों से रोक पाना असम्भव है । यह कार्य गुरुकृपा से ही हो पाता है ।

 

३. नामजपकर्ता के लिए धर्माचरण आवश्यक

नामधारक को धर्माचरण करना चाहिए । ऐसा न करनेपर, अपराधों के परिमार्जन में ही पूरी साधना व्यय हो जाती है । इससे आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती ।

नामजपकर्ता को इन १० अपराधों से बचना चाहिए !

१. गुरुजनों की अवज्ञा, २. साधुनिन्दा, ३. हरि के नाम-रूप-गुणों में भेद मानना, ४. वेद-शास्त्र-पुराणों की निन्दा, ५. नाम की आड में पापाचार करना, ६. नाम के माहात्म्यको अतिशयोक्ति मानना, अर्थात कहना कि नामजप में रुचि उत्पन्न होने के लिए नाम के प्रभावका बढा-चढाकर वर्णन किया गया है । ७. नाम के विषय में पाखण्ड-मत फैलाना, ८. जिसमें भाव, श्रद्धा एवं श्रवण की अभिरुचि न हो, उसे आग्रहपूर्वक नामका उपदेश करना, ९. नाम भूलना तथा १०. नाम की महिमा समझते हुए भी उसके प्रति अश्रद्ध रहना । इन १० भयंकर दोषों से साधक को दूर ही रहना चाहिए ।

उपर्युक्त दस अपराध नामजप में अहितकर माने गए हैं । अतः, नामधारकको इनसे बचना चाहिए; अन्यथा उन अपराधों के परिमार्जन में पूरी साधना व्यय हो जाती है तथा आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती, उदा. एक बार अपशब्द बोलने से तीस माला, घूस लेने से पांच सौ माला जप व्यर्थ जाता है । कहनेका तात्पर्य यह है कि मनुष्य की प्रवृत्ति सात्त्विक होने पर ही वह खरे अर्थों में नामजप कर सकता है ।

नामसाधना में निरन्तरता ही परिणामकारक

किसी पत्थर पर कितना भी पानी गिराएं, वह थोडे समयतक गीला रहेगा, पश्‍चात सूख जाएगा । परन्तु, जब वही पानी उस पत्थर पर एक ही स्थान पर बून्द-बून्द छोडा जाता है, तब उसमें छेद पड जाता है और वह कुछ दिन पश्‍चात टूट भी जाता है । उसी प्रकार, साधना कभी-कभी बहुत करने की अपेक्षा अत्यल्प परन्तु नियमसे, निश्‍चित समय और निश्‍चित स्थान पर की जाए, तो उससे विशेष लाभ होता है ।

नामजप चरण दर चरण बढाएं ।

१. प्रतिदिन कम से कम ३ माला अथवा १० मिनट जप करें ।
२. जब कोई काम न हो, तब जप करें ।
३. स्नान करते समय, रसोई बनाते समय, गाडी अथवा रेलगाडी से यात्रा करते समय इत्यादि शारीरिक काम करते समय जप करें ।
४. समाचारपत्र पढते समय, टीवी देखते समय इत्यादि दैनंदिन जीवन की दृष्टि से कुछ भी महत्त्व नहीं है, ऐसे मानसिक काम करते समय जप करें ।
५. कार्यालयीन कागदपत्र पढते समय अथवा लिखते समय
६. दूसरों से बोलते समय जप करें ।
चरण ५ और ६ में शब्दों में नामजप नहीं अपितु नामजप से मिलनेवाले आनंद की अनुभूति की ओर ध्यान रहता है । ऐसा होने पर नींद में भी नामजप चलता है, अर्थात २४ घंटे अखंड नामजप होता है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ नामसंकीर्तनयोग