स्वयंसूचना

स्वयंसूचना के संदर्भ में ये चूकें टालें !

स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया में स्वयंसूचना बनाना एवं स्वयंसूचना के अभ्याससत्र करना, ये दो महत्त्वपूर्ण चरण हैं । इनमें से यदि एक भी चरण पर चूक हो जाए, तो प्रक्रिया का अपेक्षित परिणाम नहीं दिखाई देता । इससे यह सोचकर निराशा आ सकती है कि ‘प्रक्रिया आचरण में लाने पर भी मेरे स्वभावदोष दूर नहीं हो रहे ।’ इस पर उपायस्वरूप स्वयंसूचना से संबंधित निम्नलिखित चूक न होने दें ।

१. स्वयंसूचना न देकर, वृत्ति के स्तर की अपेक्षा केवल कृति के स्तर पर परिवर्तन करने का प्रयास करना

२. स्वभावदोष-निर्मूलन सारणी में योग्य कृति एवं प्रतिक्रिया पर उपायस्वरूप स्वयंसूचना का स्तंभ न भरना

३. स्वभावदोष-निर्मूलन सारणी में अयोग्य कृति एवं प्रतिक्रिया लिखकर स्वयंसूचना के अभ्याससत्र करने में टालमटोल करना

४. अयोग्य कृति एवं प्रतिक्रिया का मूलभूत सही स्वभावदोष ढूंढकर उस पर स्वयंसूचना न देना

५. प्रसंगानुरूप विशेष स्वयंसूचना न देना

६. प्रसंग में योग्य प्रतिक्रिया आए, इस पर उपयुक्त स्वयंसूचना देने की अपेक्षा प्रतिक्रिया न आए, इस पर उपयुक्त स्वयंसूचना देना

७. एक ही स्वभावदोष की एक से अधिक अभिव्यक्तियों का समावेश एक ही स्वयंसूचना में करना

चरण १ – स्वयंसूचना के अभ्याससत्रों की
संख्या निश्चित करना एवं नियमितरूप से
पूरे सप्ताह उन स्वयंसूचनाओं के अभ्याससत्र करना

स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया हेतु दिनभर में न्यूनतम तीन अभ्याससत्र करें और अधिकाधिक कितने भी कर सकते हैं । प्रत्येक अभ्याससत्र में न्यूनतम १५ मिनटों का अंतर रखें ।

अभ्याससत्र की समय-सारणी

अ. सभी को स्वभावदोषों की अभिव्यक्तियों पर विजय प्राप्त करने के लिए स्वयं को निम्नलिखित पद्धति से आगे दिए नियम पर आधारित सूचना देनी चाहिए तथा अ १, अ २, अ ३, आ १ एवं / अथवा आ २ इन पद्धतियों का प्रयोग करना चाहिए ।

आ. उपचार का प्रत्येक अभ्याससत्र लगभग आठ मिनटों का होना चाहिए, यह सर्वसाधारण नियम है । इस समय का उपयोग आगे बताए अनुसार करें ।

अभ्याससत्र करते समय इन बातों पर ध्यान दें !

१. अभ्याससत्र करते समय संमोहन अवस्था का महत्त्व केवल १० प्रतिशत ही है, जबकि उपचारों की सूचनाओं का महत्त्व ९० प्रतिशत है । संमोहन-अवस्था के कारण स्वयंसूचना सहज ग्रहण होती है तथा उपचारों का प्रभाव भी शीघ्र होता है, जबकि उपचारों की सूचनाएं व्यक्ति के स्वभावदोष दूर करती हैं ।

२. अभ्याससत्र करते समय कुलदेवता अथवा उपास्यदेवता का नामजप करें ।

३. नामजप करने से पूर्व उपास्यदेवता से प्रार्थना करें ।

४. यदि अभ्याससत्र के लिए निर्धारित की गई ८ मिनट की कालावधि घट जाए अथवा बढ जाए, तो इससे विशेष अंतर नहीं पडता । अभ्याससत्र में कालावधि की अपेक्षा स्वयंसूचना प्रभावीरूप से देना अधिक महत्त्वपूर्ण है ।

५. तीन विभिन्न स्वभावदोषों की अभिव्यक्तियों के लिए कम से कम एक सप्ताहतक सूचना देना आवश्यक है । ‘अ ३’ उपचारपद्धति पर आधारित स्वयंसूचना हो, तो अ १, अ २, आ १ अथवा आ २ इन उपचारपद्धतियों पर आधारित स्वभावदोषों की अभिव्यक्तियों के लिए २ एवं नामजप के लिए १ स्वयंसूचना दें । ‘अ ३’ पद्धति पर आधारित स्वयंसूचना न हो, तो अ १, अ २, आ १ अथवा आ २ इन उपचारपद्धतियों पर आधारित स्वभावदोषों की अभिव्यक्तियों पर ३ एवं नामजप के लिए १ स्वयंसूचना दें ।

६. प्रगति की सूचना, प्रत्येक अभ्याससत्र के प्रारंभ में केवल एक ही बार दें ।

७. अभ्याससत्र करते समय सर्वप्रथम एक स्वभावदोष की अभिव्यक्ति पर पांच बार स्वयंसूचना देने के उपरांत रुककर प्रार्थना करें । तत्पश्चात तुरंत ही दूसरे स्वभावदोष की अभिव्यक्ति पर स्वयंसूचना दें । उसके लिए पुनः ३ मिनट नामजप करने की आवश्यकता नहीं है ।

८. अभ्याससत्र करते समय यदि चित्त एकाग्र न हो रहा हो अथवा सूचना के शब्दों का विस्मरण हो रहा हो, तो कागज पर सूचना लिखकर प्रत्येक सूचना ५ से १० बार पढें अथवा उन्हें देखकर अथवा बिना देखे ५ से १० बार लिख सकते हैं ।

९. दिनभर में न्यूनतम तीन अभ्याससत्र करें एवं अधिक से अधिक छः तक बढाएं ।

१०. यदि कोई व्यक्ति सवेरे, दोपहर, सायंकाल एवं रात, ऐसे चार समय स्वयंसूचना के अभ्याससत्र कर रहा हो, यदि इसी बीच उससे कोई चूक हो जाए, तो उस पर स्वयंसूचना न दें । उस सप्ताह के लिए प्रक्रिया हेतु चुने तीन स्वभावदोष अथवा उनकी अभिव्यक्ति से संबंधित स्वयंसूचना अभ्याससत्र नियमितरूप से करता रहे । तदुपरांत अपनी नई चूकसंबंधी स्वभावदोष अगले सप्ताह में प्रक्रिया हेतु चुन सकता है ।

११. एक सप्ताह नियमितरूप से अभ्याससत्र करने के उपरांत किसी स्वभावदोष में यदि कुछ सुधार हो, तो उस स्वभावदोष की उस विशिष्ट अभिव्यक्ति से संबंधित स्वयंसूचना रोक दें । तदुपरांत प्रक्रिया हेतु उसी स्वभावदोष की दूसरी अभिव्यक्ति अथवा दूसरा स्वभावदोष चुनें ।

१२. यदि किसी स्वभावदोष की तीव्रता अधिक है, तो उसी स्वभावदोष के विषय में सूचना देना आरंभ करने के उपरांत सुधार होने में दो अथवा अधिक सप्ताह लगते हैं; परंतु उसके आगे नियमितरूप से अभ्याससत्र करते रहने से शीघ्र ही उस स्वभावदोष में अत्यधिक सुधार दिखाई देता है ।

१३. किसी स्वभावदोष में सुधार होने का अर्थ है उस स्वभावदोष से मुक्त होने की दिशा में मार्गक्रमण ।

१४. यदि एक सप्ताहतक सूचना देने के उपरांत भी किसी स्वभावदोष में कोई परिवर्तन न हो, तो वही सूचना तीन से चार सप्ताहतक जारी रख सकते हैं । इसके उपरांत भी यदि कोई सुधार न दिखाई दे, तब यह समझ लें कि ‘वह सूचना ग्रहण करने में अत्यधिक मानसिक विरोध है ।’ ऐसी स्थिति में….. सूचना देना रोककर, उसकी अपेक्षा दूसरे स्वभावदोष के लिए सूचना दें ।

१५. कुछ सप्ताह पूर्व मन जिस सूचना को ग्रहण नहीं कर रहा था, अर्थात जिसके लिए पहले अत्यधिक मानसिक विरोध था, वह सूचना देना आरंभ कर सकते हैं । ऐसे में वह सूचना परिणामकारक प्रमाणित होती है; क्योंकि तबतक कुछ मात्रा में मन का तनाव कम हो जाता है । परिणामस्वरूप मुक्त हुई मन की ऊर्जा उक्त सूचना से संबंधित स्वभावदोष को दूर करने के लिए उपलब्ध होती है ।

१६. स्वयंसूचना के अभ्याससत्र आरंभ करने के उपरांत भी प्रतिदिन नियमितरूप से ‘स्वभावदोष-निर्मूलन सारणी’ लिखना जारी ही रखें ।

चरण २ –  स्वयं से एवं अन्यों से स्वभावदोषों
की प्रगतिविषयक पूछताछ कर, प्रगतिविषयक सूचना बनाना

लगभग एक सप्ताहतक तीन स्वभावदोष अथवा उनकी तीन अभिव्यक्तियों पर स्वयंसूचना देने के उपरांत उनमें हुए सुधार अथवा प्रगति की समीक्षा करें ।

प्रगति की समीक्षा करते समय इन बातों पर ध्यान दें !

समीक्षा करते समय स्वभावदोष-निर्मूलन सारणी की सहायता लें । उसके अंतर्गत अयोग्य कृति अथवा अयोग्य प्रतिक्रिया, अयोग्य कृति अथवा अयोग्य प्रतिक्रिया की कालावधि, स्वभावदोष एवं प्रगति, इन स्तंभों की जानकारी प्रामाणिकता से एवं तटस्थता से अभ्यास कर स्वभावदोषों में हुए सुधार सुनिश्चित करें । प्रक्रिया हेतु चयनित स्वभावदोषों में हुआ सुधार अथवा प्रगति आगे दिए घटकों के आधार पर सुनिश्चित करें ।

१ अ. अयोग्य कृति अथवा अयोग्य प्रतिक्रिया का क्रमश: योग्य कृति अथवा योग्य प्रतिक्रियाद्वारा स्थान लिया जाना 

प्रक्रिया हेतु चयन किए गए स्वभावदोषों से संबंधित अयोग्य कृतियों अथवा प्रतिक्रियाओं के स्थान पर, योग्य कृतियां अथवा प्रतिक्रियाएं होने लगें, तब समझ लें कि उन स्वभावदोषों में सुधार हुआ है ।

१ आ. अयोग्य कृति एवं प्रतिक्रिया का भान

१ आ १. अयोग्य कृति के संदर्भ में स्वभावदोषांतर्गत सुधार के चरण : ‘हमसे अयोग्य कृति हो जाने पर अन्योंद्वारा उसका भान कराया जाना’ इसे प्रक्रिया का प्राथमिक चरण समझें । अयोग्य कृति के संदर्भ में जिस चरण की सूचना दी गई हो, उसके अनुसार उस व्यक्ति को अपने स्वभावदोष का भान होने लगे, तो मान लें कि उस स्वभावदोष में सुधार हुआ है और अगले चरण की सूचना दें ।

चरण १. अयोग्य कृति हो जाने पर स्वयं को होनेवाला भान

चरण २. अयोग्य कृति होते हुए, स्वयं को होनेवाला भान

चरण ३. अयोग्य कृति होने से पूर्व स्वयं को होनेवाला भान

चरण ४. अयोग्य कृतियों का मूलभूत अयोग्य संस्कार नष्ट होना एवं चित्त पर गुण का संस्कार निर्माण होना

१ आ २. अयोग्य प्रतिक्रिया से संबंधित स्वभावदोष में सुधार के लक्षण : इस प्रक्रिया में अयोग्य विचार अथवा अयोग्य प्रतिक्रिया के लिए उत्तरदायी स्वभावदोष का चित्त पर अयोग्य संस्कार नष्ट होता है और योग्य प्रतिक्रिया आने के लिए आवश्यक संबंधित गुण का योग्य संस्कार चित्त पर निर्माण होता है । जब प्रसंग में मन में योग्य प्रतिक्रिया उभरने लगे अथवा व्यक्त होने लगे, तब समझें कि उस स्वभावदोष में सुधार है ।

१ इ. अयोग्य कृति एवं प्रतिक्रिया की संख्या एवं पुनरावृत्ति में हुई कमी

 विगत सप्ताह में प्रक्रिया हेतु चुने गए स्वभावदोषों की अभिव्यक्तियों की संख्या में, उसी प्रकार अयोग्य कृति एवं प्रतिक्रिया की पुनरावृत्ति में कमी हुई हो, तब यह समझ सकते हैं कि स्वभावदोष में सुधार हुआ है ।

उदाहरण :‘क्रोध’ इस स्वभावदोष के कारण श्री. शरद दिनभर में अनेक बार वस्तुओं को फेंकते-पटकते थे, ऊंचे स्वर में बोलते तथा वाद-विवाद करते थे । इस प्रक्रिया का महत्त्व समझ में आने पर उन्होंने लगातार एक सप्ताहतक ‘वस्तुएं फेंकना-पटकना’ एवं ‘ऊंचे स्वर में बोलना’ इन अभिव्यक्तियों पर स्वयंसूचना दी । तत्पश्चात उनके द्वारा दिनभर में वस्तुएं फेंकना-पटकना एवं ऊंचे स्वर में बोलने के प्रसंग कम हुए । इससे स्पष्ट होता है कि श्री. शरद के ‘क्रोध’ इस स्वभावदोेष में सुधार हुआ है ।

१ ई. अयोग्य प्रतिक्रियाओं की कालावधि में घटौती

 प्रक्रिया हेतु चुने गए किसी स्वभावदोष से संबंधित अयोग्य प्रतिक्रिया की कालावधि घट गई हो, तब समझें कि उस स्वभावदोष में सुधार है । उदाहरणार्थ, कु. नंदा प्रायः निराश हो जाती थीं और यह अवस्था लगातार ४ घंटेतक बनी रहती थी । स्वयंसूचना देना आरंभ करने के पश्चात एक सप्ताह में निराशा की कालावधि २ घंटे घट गई । इससे स्पष्ट होता है कि ‘निराशा’ इस स्वभावदोष में सुधार हुआ है ।

१ उ. निकटवर्तियोंद्वारा प्रगति की समीक्षा

 कई बार स्वयंसूचना देना आरंभ करने के उपरांत हमें लगता है कि ‘हमारे स्वभावदोष में सुधार हुआ है’; परंतु पूछताछ करने पर स्वभावदोष में हुए सुधार की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होती है तथा अगले सप्ताह के लिए प्रक्रिया हेतु स्वभावदोषों की प्राथमिकता निश्चित करने में सहायता होती है । इसलिए प्रक्रिया हेतु चयनित स्वभावदोषों में हुए सुधार के बारे में अपने निकटवर्तियों से पूछताछ करें ।

चरण ३ – प्रगति के ब्यौरे के आधार
पर अगले सप्ताह के लिए प्रक्रिया के लिए
प्राथमिकता के आधार पर तीन स्वभावदोषों का चयन करें !

अगले सप्ताह की प्रक्रिया हेतु प्राथमिकता के क्रमानुसार अन्य स्वभावदोषों का चयन करते समय इन बातों पर ध्यान दें !

अ. सप्ताहभर निरंतर तीन स्वभावदोषों पर नियमितरूप से स्वयंसूचना देने के उपरांत उन तीन स्वभावदोषों में से जिनमें मध्यम से अधिक मात्रा में सुधार दिखाई दे, उन स्वभावदोषों पर स्वयंसूचना देना बंद करें एवं प्रक्रिया हेतु स्वभावदोषों की सूची से अन्य स्वभावदोषों का चयन प्राथमिकता के क्रमानुसार कर अगले सप्ताह में उन स्वभावदोषों पर स्वयंसूचना दें ।

आ. जिन स्वभावदोषों में कुछ भी सुधार न हो अथवा अल्पमात्र सुधार हो, उन स्वभावदोषों पर अगले आठ दिन पुनः स्वयंसूचना दें ।