मन, संस्कार एवं स्वभाव

१. मन

आधुनिक मानसशास्त्र के अनुसार मन के दो भाग होते हैं । पहला भाग, जिसे हम ‘मन’ कहते हैं, वह ‘बाह्यमन’ है । दूसरा अप्रकट भाग ‘चित्त (अंतर्मन)’ है । मन की रचना एवं कार्य में बाह्यमन का भाग केवल १० प्रतिशत जबकि अंतर्मन का ९० प्रतिशत है ।

निरंतर आनेवाले विचार व भावनाओं का संबंध बाह्यमन (Conscious mind) से होता है । जबकि अंतर्मन (Unconscious mind) सभी भाव-भावनाओं का, विचार-विकारों का संग्रह ! इस संग्रह में सर्व प्रकार के अनुभव, भावनाएं, विचार, इच्छा-आकांक्षाएं आदि होते हैं । इसमें देह, इंद्रिय, मन, बुद्धि व अहं आदि की वृत्ति व कृत्यों की विविध स्मृतियां विभिन्न संस्कार केंद्रों में संग्रहित होती हैं तथा वे विचाररूप में प्रकट होती रहती हैं ।

१. वासना केंद्र: वासनाएं, इच्छाएं, आकांक्षाएं, अपेक्षाएं, एषणाएंं (जिस प्रकार प्राणैषणा, अर्थात् जीवित रहने की इच्छा; उसी प्रकार पुत्रैषणा, धर्मैषणा, मोक्षैषणा) के संस्कार इस केंद्र में होते हैं ।

२. रुचि-अरुचि केंद्र : रुचि-अरुचि के संदर्भ के संस्कार इस केंद्र में संग्रहित होते हैं ।

३. स्वभाव केंद्र : इस केंद्र में स्वभाव अंतर्गत गुण व दोष के संस्कारों का संग्रह होता है ।

४. विशेषता केंद्र : कला, खेल इत्यादि के क्षेत्र में कुशलता के संदर्भ में संस्कार इस केंद्र में होते हैं ।

५. लेन-देन केंद्र : इसमें संचित व प्रारब्ध कर्म अंकित होते हैं ।

 

२. संस्कार

आध्यात्मिकदृष्टि से ‘संस्कार’ शब्द का अर्थ है शरीर, पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय, मन, बुद्धि व अहं की वृत्ति एवं कृतिसंबंधी अंतर्मन में अथवा चित्त पर उभरे चिन्ह अथवा प्रभाव । वृत्ति व कृति के अधिकांश चिन्ह बाह्यमन में उभरते हैं तथा कुछ सेकंडों में अथवा मिनटों में ही वे नष्ट हो जाते हैं, उदा. मार्ग पर चलते समय दिखे मनुष्य, समाचार-पत्र में पढे निरर्थक समाचार । जिस बाह्य वस्तु, व्यक्ति, प्रसंग अथवा घटनाओं की छाप अंतर्मन में, अर्थात् चित्त में उभरती है, वह हमारे स्मरण में अधिक समय, जन्मभर या जन्म-जन्मोंतक भी रहते हैं ।

 

३. स्वभाव

जब प्रत्येक कृतिद्वारा हमारे अंतर्मन के विशिष्ट संस्कार बार-बार प्रकट होते हैं, तब उसे ‘स्वभाव’ की संज्ञा दी जाती है । सामान्यतः अच्छे संस्कारों को ‘गुण’ व बुरे संस्कारों को ‘स्वभावदोष’ कहते हैं । किसी विशिष्ट स्वभाव के कारण व्यक्ति के आचरणद्वारा उसकी व उससे संबंधित अन्य व्यक्तियों की हानि हो, तो उसे ‘स्वभावदोष’ कहते हैं । आध्यात्मिक परिभाषा में जिन्हेें ‘षड्रिपु’ कहते हैं, ऐसे काम-क्रोधादि विकारों का स्वभावदोषों के माध्यम से प्रकटीकरण होता है ।

हमसे होनेवाली क्रिया अथवा कृति तथा व्यक्त अथवा अव्यक्त (मन में उभरी) प्रतिक्रिया हमारे संस्कारों पर निर्भर करती है । हमारे जीवन की कुल क्रियाओं अथवा कृतियों व प्रतिक्रियाओं में से सामान्यतः ५० प्रतिशत उचित होती हैं, तथापि ५० प्रतिशत अनुचित होती हैं । उचित कृति व अनुचित प्रतिक्रिया गुण से और अनुचित कृति व अनुचित प्रतिक्रिया स्वभावदोष से संबंधित होती है । अनुचित कृति व अनुचित प्रतिक्रिया के कारण अन्यों के मन में प्रतिक्रिया उभरती है व तनाव बढाती हैं । स्वभावदोषों का प्रकटीकरण अयोग्य कृतियों व प्रतिक्रियाओेंं के माध्यम से होता है, इसलिए स्वभावदोषों का विचार करते समय उनका अभ्यास आवश्यक है ।

हम अपने आगे के लेखों में स्वभावदोष निर्मूलन कैसे कर सकते हैं, यह जानेंगे ।