साक्षात विष्णुस्वरूप गुरुमाता के चरणोंपर कृतज्ञता से भरी भावसुमनांजली समर्पित करनेवाला गुुरुपूर्णिमा महोत्सव १०९ स्थानोंपर संपन्न !

कुछ नररत्न जैसे परमेश्वर का अवतारकार्य पूरा करने के लिए ही पृथ्वीपर जन्म लेते हैं ! सहस्रों वर्षों के कालपटलपर अपनी मुद्रा अंकित करनेवाले अवतारी सत्पुरुष परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी उन्हीं में से एक हैं !

सनातन संस्था तथा हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से उत्तरप्रदेश तथा बिहार में मनाया गया गुरुपूर्णिमा महोत्सव

वाराणसी के साधक वेदप्रकाश गुप्ता ने प्राप्त किया ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर | उस समय सनातन के संत पू. नीलेश सिंगबाळ के हाथों श्री. गुप्ता का श्रीकृष्ण की प्रतिमा देकर आदर किया गया ।

साधना में अति शीघ्र प्रगति का मार्ग कौन सा है ?

घर-द्वार का त्याग कर गुरुसान्निध्य में रहना साधना में अति शीघ्र प्रगति का मार्ग है । गुरु के प्रति खरे प्रेम की उत्पत्ति हेतु इस सान्निध्य की आवश्यकता है । गुरु के साथ रहने पर ही विषयों पर अंकुश रहता है ।

शिष्य में कौन-से गुण होने आवश्यक हैं ?

आज्ञा की पृष्ठभूमि से शिष्य कदाचित अनभिज्ञ हो; परंतु उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है कि ‘गुरु की विचारधारा कल्याणकारी है’; अतः सत्शिष्य सद्गुरु की आज्ञा का पालन निस्संदेह करता है । वे कहें ‘नामजप कर’, तो वह उसी अनुसार करता है ।

शिष्य

आध्यात्मिक उन्नति हेतु जो गुरु द्वारा बताई साधना करता है, उसे ‘शिष्य’ कहते हैं । शिष्यत्व का महत्त्व यह है कि उसे देवऋण, ऋषिऋण, पितरऋण एवं समाजऋण चुकाने नहीं पडते ।

गुरुपूर्णिमाके दिन गुरुतत्त्व १ सहस्त्र गुना कार्यरत रहता है

गुरु ईश्वरके सगुण रूप होते हैं । उन्हें तन, मन, बुद्धि तथा धन समर्पित करनेसे उनकी कृपा अखंड रूपसे कार्यरत रहती है ।

विश्वको सनातन धर्मकी एक अनमोल देन है ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ !

गुरुदेव वे हैं, जो साधना बताते हैं, साधना करवाते हैं एवं आनंदकी अनुभूति प्रदान करते हैं । गुरुका ध्यान शिष्यके भौतिक सुखकी ओर नहीं, अपितु केवल उसकी आध्यात्मिक उन्नतिपर होता है ।