गुरुपूर्णिमाका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

 

सारणी

 

१. गुरुपूर्णिमा

२. गुरुका महत्त्व

३. गुरुपूर्णिमा दिनविशेष

४. गुरुपूर्णिमाका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

५. गुरुपूर्णिमा उत्सव मनानेकी पद्धति

६. भावपूर्ण विधिसे पाद्यपूजा करनेसे सूक्ष्म स्तरपर क्या परिणाम होते हैं ?

७. पाद्यपूजाके उपरांत संतोंके चरणोंका सूक्ष्म-चित्र

८. संकटकालीन स्थिति में (कोरोना की पृष्ठभूमि पर) धर्मशास्त्र के अनुसार गुरुपूर्णिमा मनाने की पद्धति !


 

१. गुरुपूर्णिमा

विश्वको सनातन धर्मकी एक अनमोल देन है ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ !

संत गुलाबराव महाराजजीसे किसी पश्चिमी व्यक्तिने पूछा, ‘भारतकी ऐसी कौनसी विशेषता है, जो न्यूनतम शब्दोंमें बताई जा सकती है ?’ तब महाराजजीने कहा, ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ । इससे हमें इस परंपराका महत्त्व समझमें आता है । ऐसी परंपराके दर्शन करवानेवाला पर्व युग-युगसे मनाया जा रहा है, तथा वह है, गुरुपूर्णिमा ! हमारे जीवनमें गुरुका क्या स्थान है, गुरुपूर्णिमा हमें इसका स्पष्ट पाठ पढाती है ।

 

२. गुरुका महत्त्व

गुरुदेव वे हैं, जो साधना बताते हैं, साधना करवाते हैं एवं आनंदकी अनुभूति प्रदान करते हैं । गुरुका ध्यान शिष्यके भौतिक सुखकी ओर नहीं, अपितु केवल उसकी आध्यात्मिक उन्नतिपर होता है । गुरु ही शिष्यको साधना करनेके लिए प्रेरित करते हैं, चरण दर चरण साधना करवाते हैं, साधनामें उत्पन्न होनेवाली बाधाओंको दूर करते हैं, साधनामें टिकाए रखते हैं एवं पूर्णत्वकी ओर ले जाते हैं । गुरुके संकल्पके बिना इतना बडा एवं कठिन शिवधनुष उठा पाना असंभव है । इसके विपरीत गुरुकी प्राप्ति हो जाए, तो यह कर पाना सुलभ हो जाता है । श्री गुरुगीतामें ‘गुरु’ संज्ञाकी उत्पत्तिका वर्णन इस प्रकार किया गया है,

 

गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते ।
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः ।। – श्री गुरुगीता

अर्थ : ‘गु’ अर्थात अंधकार अथवा अज्ञान एवं ‘रु’ अर्थात तेज, प्रकाश अथवा ज्ञान । इस बातमें कोई संदेह नहीं कि गुरु ही ब्रह्म हैं जो अज्ञानके अंधकारको दूर करते हैं । इससे ज्ञात होगा कि साधकके जीवनमें गुरुका महत्त्व अनन्य है । इसलिए गुरुप्राप्ति ही साधकका प्रथम ध्येय है । गुरुप्राप्तिसे ही ईश्वरप्राप्ति होती है अथवा यूं कहें कि गुरुप्राप्ति होना ही ईश्वरप्राप्ति है, ईश्वरप्राप्ति अर्थात मोक्षप्राप्ति- मोक्षप्राप्ति अर्थात निरंतर आनंदावस्था । गुरु हमें इस अवस्थातक पहुंचाते हैं । शिष्यको जीवनमुक्त करनेवाले गुरुके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेके लिए गुरुपूर्णिमा मनाई जाती है ।

 

३. गुरुपूर्णिमा दिनविशेष

 

आषाढ शुक्ल पूर्णिमाको गुरुपूर्णिमा एवं व्यासपूर्णिमा कहते हैं । गुरुपूर्णिमा गुरुपूजनका दिन है । गुरुपूर्णिमाका एक अनोखा महत्त्व भी है । अन्य दिनोंकी तुलनामें इस तिथिपर गुरुतत्त्व सहस्र गुना कार्यरत रहता है । इसलिए इस दिन किसी भी व्यक्तिद्वारा जो कुछ भी अपनी साधनाके रूपमें किया जाता है, उसका फल भी उसे सहस्र गुना अधिक प्राप्त होता है ।

 

४. गुरुपूर्णिमाका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

 

इस दिन गुरुस्मरण करनेपर शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होनेमें सहायता होती है । इस दिन गुरुका तारक चैतन्य वायुमंडलमें कार्यरत रहता है । गुरुपूजन करनेवाले जीवको इस चैतन्यका लाभ मिलता है । गुरुपूर्णिमाको व्यासपूर्णिमा भी कहते हैं, गुरुपूर्णिमापर सर्वप्रथम व्यासपूजन किया जाता है । एक वचन है – व्यासोच्छिष्टम् जगत् सर्वंम् । इसका अर्थ है, विश्वका ऐसा कोई विषय नहीं, जो महर्षि व्यासजीका उच्छिष्ट अथवा जूठन नहीं है अर्थात कोई भी विषय महर्षि व्यासजीद्वारा अनछुआ नहीं है । महर्षि व्यासजीने चार वेदोंका वर्गीकरण किया । उन्होंने अठारह पुराण, महाभारत इत्यादि ग्रंथोंकी रचना की है । महर्षि व्यासजीके कारण ही समस्त ज्ञान सर्वप्रथम हमतक पहुंच पाया । इसीलिए महर्षि व्यासजीको ‘आदिगुरु’ कहा जाता है । ऐसी मान्यता है कि उन्हींसे गुरु-परंपरा आरंभ हुई । आद्यशंकराचार्यजीको भी महर्षि व्यासजीका अवतार मानते हैं ।

 

५. गुरुपूर्णिमा उत्सव मनानेकी पद्धति

 

सर्व संप्रदायोंमें गुरुपूर्णिमा उत्सव मनाया जाता है । यहांपर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि गुरु एक तत्त्व हैं । गुरु देहसे भले ही भिन्न-भिन्न दिखाई देते हों; परंतु गुरुतत्त्व तो एक ही है । संप्रदायोंके साथही विविध संगठन तथा पाठशालाओंमें भी गुरुपूर्णिमा महोत्सव श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है ।

 

गुरुपूजनके लिए चौकीको पूर्व-पश्चिम दिशामें रखिए । जहांतक संभव हो, उसके लिए मेहराब अर्थात लघुमंडप बनानेके लिए केलेके खंभे अथवा केलेके पत्तोंका प्रयोग कीजिए । गुरुकी प्रतिमाकी स्थापना करने हेतु लकडीसे बने पूजाघर अथवा चौकीका उपयोग कीजिए । थर्माकोलका लघुमंडप न बनाइए । थर्माकोल सात्त्विक स्पंदन प्रक्षेपित नहीं करता । पूजन करते समय ऐसा भाव रखिए कि हमारे समक्ष प्रत्यक्ष सदगुरु विराजमान हैं । सर्वप्रथम श्री महागणपतिका आवाहन कर देशकालकथन किया जाता है । श्रीमहागणपतिका पूजन करनेके साथ-साथ विष्णुस्मरण किया जाता है । उसके उपरांत सदगुरुका अर्थात महर्षि व्यासजीका पूजन किया जाता है । उसके उपरांत आद्य शंकराचार्य इत्यादिका स्मरण कर अपने-अपने संप्रदायानुसार अपने गुरुके गुरुका पूजन किया जाता है । यहांपर प्रतिमापूजन अथवा पादुकापूजन भी होता है । उसके उपरांत अपने गुरुका पूजन किया जाता है । इस दिन गुरु अपने गुरुका पूजन करते हैं ।

 

६. भावपूर्ण विधिसे पाद्यपूजा करनेसे सूक्ष्म स्तरपर क्या परिणाम होते हैं ?

नीचे दिया सूक्ष्म-चित्र बडे आकारमें देखने हेतु चित्रपर ‘क्लिक’ कीजिए !

१. गुरुमें निर्गुण तत्त्व स्थिर रूपमें विद्यमान होता है ।

२. जब उनके सहस्रारचक्रमें निर्गुण तत्त्वका स्थिर वलय विद्यमान रहता है, तब ईश्वरसे उनका संधान होता है । तदुपरांत वे शिवदशामें रहते हैं ।

३. साथही शांतिका वलय भी धीमी गति से घूमता रहता है ।

४. उनमें आनंदका कार्यरत वलय घूमता रहता है ।

५. उनकी देहसे वातावरणमें आनंदके कणोंका प्रक्षेपण होता है । इन कणोंमें प्रीति भी अंतर्भूत होती है ।

६. ईश्वरीय चैतन्यका प्रभाव गुरुकी ओर आकृष्ट होता है ।

७. उनकी देहमें चैतन्यके वलय कार्यरत रहते हैं । इन वलयोंसे वातावरणमें चैतन्यके प्रवाहोंका प्रक्षेपण होता है ।

८. गुरुके चरणोंसे चैतन्यके वलयोंका प्रक्षेपण होता है ।

९. साथही सगुण शक्तिका प्रक्षेपण होता है ।

१०. तदुपरांत चैतन्यके वलयोंका भी प्रक्षेपण होता है ।

११. पाद्यपूजा करते समय उनके चरणोंसे प्रक्षेपित शक्तिकी तरंगें भावपूर्वक पूजा करनेवालेकी देहमें प्रविष्ट होती हैं ।

१२. इस शक्तिके कण व्यक्तिकी देहमें लंबे समयतक कार्यरत रहते है एवं उसे कार्य करनेके लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं ।

१३. पाद्यपूजा करनेवालेमें शरणागत भाव जागृत होता है एवं इसका रूपांतर अव्यक्त भावमें होता है ।

१४. पाद्यपूजा करनेवाले व्यक्तिका गुरुके साथ संधान साध्य होता है ।

१५. गुरुद्वारा कृपाशीर्वादके प्रवाह व्यक्तिकी ओर प्रक्षेपित होते हैं ।

 

७. पाद्यपूजाके उपरांत संतोंके चरणोंका सूक्ष्म-चित्र

१. गुरुके चरणोंमें शांतिका स्थिर वलय विद्यमान रहता है ।

२. चरणोंद्वारा वातावरणमें चैतन्यके वलयोंका प्रक्षेपण होता है एवं साथमें आनंदके कण भी प्रसारित होते हैं ।

३. साथही उनके चरणोंमें शक्तिके वलय कार्यरत रहते हैं एवं उससे शक्तिके प्रवाह प्रक्षेपित होते हैं ।

इस सूक्ष्म-चित्रद्वारा गुरुपूर्णिमाके दिन भावपूर्वक पाद्यपूजा करनेका महत्त्व स्पष्ट होता है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत’

 

८. संकटकालीन स्थिति में (कोरोना की पृष्ठभूमि पर)
धर्मशास्त्र के अनुसार गुरुपूर्णिमा मनाने की पद्धति !

प्रतिवर्ष अनेक लोग एकत्रित होकर अपने-अपने संप्रदाय के अनुसार गुरुपूर्णिमा महोत्सव मनाते हैं; परंतु इस वर्ष कोरोना विषाणु के प्रकोप के कारण हम एकत्रित होकर गुरुपूर्णिमा महोत्सव नहीं मना सकते । यहां महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है कि हिन्दू धर्म ने धर्माचरण के शास्त्र में संकटकाल के लिए भी कुछ विकल्प बताए हैं, जिसे ‘आपद्धर्म’ कहा जाता है । आपद्धर्म का अर्थ है ‘आपदि कर्तव्यो धर्मः ।’ अर्थात आपदा के समय आचरण करना आवश्यक धर्म ! वर्तमान कोरोना संकट की पृष्ठभूमि पर देशभर में यातायात बंदी (लॉकडाऊन ) है । इसी अवधि में गुरुपूर्णिमा होने से संपत्काल में बताई गई पद्धति के अनुसार इस वर्ष हम सार्वजनिक रूप से गुरुपूर्णिमा नहीं मना सकेंगे । इस दृष्टि से प्रस्तुत लेख में वर्तमान परिस्थिति में धर्माचरण के रूप में क्या किया जा सकता है, इस पर भी विचार किया गया है । यहां महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है कि इससे हिन्दू धर्म ने कितने उच्च स्तर तक जाकर मनुष्य का विचार किया है, यह सीखने को मिलता है । इससे हिन्दू धर्म की विशालता ध्यान में आती है ।

अ. गुरुपूर्णिमा के दिन सभी को अपने-अपने घर भक्तिभाव के साथ
गुरुपूजन अथवा मानसपूजा करने पर भी गुरुतत्त्व का एक सहस्र गुना लाभ मिलना

गुरुपूर्णिमा के दिन अधिकांश साधक अपने श्री गुरुदेवजी के पास जाकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं । प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा के अनुसार कुछ लोग श्री गुरु, कुछ माता-पिता, कुछ विद्यागुरु (जिन्होंने हमें ज्ञान दिया, वे शिक्षक), कुछ आचार्यगुरु (हमारे यहां पारंपरिक पूजा के लिए आनेवाले गुरुजी), तो कुछ लोग मोक्षगुरु (जिन्होंने हमें साधना का दिशादर्शन कर मोक्ष का मार्ग दिखाया, वे श्री गुरु) के पास जाकर उनके चरणों में कृतज्ञता व्यक्त करते हैं । इस वर्ष कोरोना संकट की पृष्ठभूमि पर हमें घर पर रहकर ही भक्तिभाव से श्री गुरुदेवजी के छायाचित्र का पूजन अथवा मानसपूजन किया, तब भी हमें गुरुतत्त्व का एक सहस्र गुना लाभ मिलेगा । प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा के अनुसार भले ही इष्टदेवता, संत अथवा श्री गुरु अलग हों; परंतु गुरुतत्त्व एक ही होता है ।

आ. सभी भक्तों ने एक ही समय पूजन किया, तो उससे संगठित शक्ति का लाभ मिलना

संप्रदाय के सभी भक्त पूजन का एक विशिष्ट समय सुनिश्‍चित कर संभवतः उसी समय अपने-अपने घरों में पूजन करें । ‘एक ही समय पूजन करने से संगठित शक्ति का अधिक लाभ मिलता है । अतः सर्वानुमत से संभवतः एक ही समय सुनिश्‍चित कर उस समय पूजन करें ।

१. सवेरे का समय पूजन हेतु उत्तम माना गया है । जिन्हें सवेरे पूजन करना संभव है, वे सवेरे का समय सुनिश्‍चित कर उस समय पूजन करें ।

२. कुछ अपरिहार्य कारण से जिन्हें सवेरे पूजन करना संभव नहीं हो, वे सायंकाल का एक समय सुनिश्‍चित कर उस समय; परंतु सूर्यास्त से पहले अर्थात सायंकाल 7 बजे से पूर्व पूजन करें ।

३. जिन्हें निर्धारित समय में पूजन करना संभव नहीं है, वे अपनी सुविधा के अनुसार; परंतु सूर्यास्त से पहले पूजन करें ।

४. सभी साधक घर पर ही अपने-अपने संप्रदाय के अनुसार श्री गुरु अथवा इष्टदेवता की प्रतिमा, मूर्ति अथवा पादुकाओं का पूजन करें ।

५. चित्र, मूर्ति अथवा पादुकाओं को गंध लगाकर पुष्प समर्पित करें । धूप, दीप एवं भोग लगाकर पंचोपचार पूजन करें और उसके पश्‍चात श्री गुरुदेवजी की आरती उतारें ।

६. जिन्हें सामग्री के अभाव में प्रत्यक्ष पूजा करना संभव नहीं है, वे श्री गुरु अथवा इष्टदेवता का मानसपूजन करें ।

७. उसके पश्‍चात श्री गुरुदेवजी द्वारा दिए गए मंत्र का जप करें । जब से हमारे जीवन में श्री गुरुदेवजी आए तब से जो अनुभूतियां हूई है उनका हम स्मरण कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें ।

८. इस समय, ‘पिछले वर्ष हम साधना में कहां अल्प पडे’, ‘हमने श्री गुरुदेवजी के सीख का प्रत्यक्षरूप में कितना आचरण किया’, इसका भी अवलोकन कर उस पर चिंतन करें ।’