गुरुपूर्णिमा निमित्त परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी का संदेश (2021)

धर्मनिष्ठ हिन्दुओ, इस गुरुपूर्णिमा से धर्मसंस्थापना के लिए अर्थात धर्माधिष्ठित हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए सर्वस्व का त्याग करने की तैयारी करें और ऐसा त्याग करने से गुरुतत्त्व को अपेक्षित आध्यात्मिक उन्नति होगी, इसकी निश्‍चिति रखें !

कोरोना महामारी के काल में श्री गणेशमूर्ति का आगमन, पूजन और विसर्जन !

वर्तमान में कोरोना और तत्सम आपातकाल में भी हिन्दू धर्म में धर्माचरण के कुछ विकल्प बताए हैं । वे विकल्प कौन-से हैं ? इस विषय में जानने के लिए ‘सनातन प्रभात’ के प्रतिनिधि और सनातन संस्था के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. चेतन राजहंस से भेंटवार्ता हुई ।

‘गणेशमूर्ति खडियामिट्टी की ही क्यों होनी चाहिए ?

‘धर्मशास्त्र के अनुसार खडियामिट्टी की मूर्ति पूजन करने पर आध्यात्मिक स्तर पर उसका अत्यधिक लाभ मिलता है’, ऐसा हिन्दू धर्मशास्त्रीय ग्रंथ में बताया गया है ।

आपात्काल में गणेशोत्सव कैसे मनाना चाहिए ?

‘आजकल पुरे विश्‍व में कोरोना महामारी के कारण सर्वत्र ही लोगों के बाहर निकलने पर अनेक बंधन लगे हैं । भारत के विविध राज्यों में भी यातायात बंदी (लॉकडाउन) लागू है ।

आपातकालीन स्थिति में ‘श्रीकृष्ण जन्माष्टमी’ की पूजा कैसे करें ?

‘कोरोना विषाणुओं से प्रभावित क्षेत्रों में जहां संचार बंदी (लॉकडाउन) है, वहां एकत्र आकर पूजा करना संभव नहीं होगा । प्रति वर्ष अनेक स्थानों पर ‘श्रीकृष्ण जन्माष्टमी’ का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है ।

सनातन संस्‍था के राष्‍ट्र-धर्म कार्य को श्री विद्याचौडेश्‍वरी देवी का आशीर्वाद है और देवी ही यह कार्य आगे चलानेवाली हैं !

राष्ट्र-धर्म का यह कार्य उत्तम हो तथा सनातन संस्था का आश्रम उसका साक्षी हो ! इन सभी कार्यों को श्री विद्याचौडेश्वरी देवी के आशीर्वाद हैं और देवी यह कार्य आगे चलानेवाली हैं ।

विदेश में प्राचीन हिन्दू संस्कृति के संकेतचिह्न

‘इंडोनेशिया एक द्वीपसमूह और मुसलमानबहुल राष्ट्र है, तब भी यहां पर महान हिन्दू संस्कृति की जडें गहरी पाईं गईं हैं ।

श्रीरामनवमी

श्रीराम के जन्म के उपलक्ष्य में श्रीरामनवमी मनाई जाती है । इस दिन जब पुष्य नक्षत्रपर, माध्यान्हके समय, कर्क लग्न में सूर्यादि पांच ग्रह थे, तब अयोध्या में प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ ।

उत्सव अर्थात चराचर में व्याप्त चैतन्य वृद्धिंगत कर उसे ग्रहण करने का मानव को मिला अवसर !

‘धार्मिक समारोह मनानेवाले और उसमें सहभागी होनेवाले, इन दोनों को जिससे आनंद और चैतन्य की अनुभूति होती है, उसे उत्सव कहते हैं ।