कोरोना महामारी के काल में श्री गणेशमूर्ति का आगमन, पूजन और विसर्जन !

कोरोना विषाणु का प्रभाव दिनोदिन भारी मात्रा में बढ रहा है । इसलिए कुछ स्थानों पर घर से बाहर निकलने पर मनाही है । उस पृष्ठभूमि पर घरेलु और सार्वजनिक गणेशोत्सव वास्तव में कैसे मनाएं ?, ऐसा प्रश्‍न सामान्य जनता व गणेश मंडलों के प्रतिनिधियों के मन में है । वर्तमान में कोरोना और तत्सम आपातकाल में भी हिन्दू धर्म में धर्माचरण के कुछ विकल्प बताए हैं । वे विकल्प कौन-से हैं ? इस विषय में जानने के लिए ‘सनातन प्रभात’ के प्रतिनिधि और सनातन संस्था के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. चेतन राजहंस से भेंटवार्ता हुई । यह भेंटवार्ता प्रश्‍नोत्तर के स्वरूप में यहां दी है ।

१. प्रतिवर्ष गणेशोत्सव उत्साह से और मंगलमय वातावरण में मनाया जाता है । इस वर्ष कोरोना महामारी है । इसलिए ‘सोशल डिस्टन्सिंग’ (दूसरों से अंतर रखना) यात्रा इत्यादि पर बंधन हैं । ऐसी स्थिति में श्री गणेशपूजन हो अथवा सार्वजनिक गणेशोत्सव, उन्हें मर्यादा आनेवाली है । इस संदर्भ में धर्मशास्त्र क्या कहता है ?

उत्तर – कोरोना महामारी के कारण इस वर्ष घर-घर होनेवाले श्री गणेशपूजन अथवा सार्वजनिक गणेशोत्सव को मर्यादा है । प्रतिवर्ष होनेवाले श्री गणेशजी का आगमन हम सभी के लिए आनंदोत्सव होता है । मूलत: मानव उत्सवप्रिय होने से प्रतिवर्ष उत्सव के निकट आने पर हमारे मन में उत्कंठा होती है । इस वर्ष महामारी के कारण कुछ सामाजिक बंधन हैं । ऐसी स्थिति में ‘धर्मशास्त्र क्या कहता है ?’, इस विषय में जिज्ञासा होना स्वाभाविक है ।

अनेक बार अराजकता, अकाल, स्थलांतर, महामारी, युद्धजन्य स्थिति इत्यादि आकस्मिक कारणों से धर्माचरण करने में बाधा आती है । ऐसी स्थिति में सनातन धर्म ने आपद्धर्म बताया है । आपद्धर्म अर्थात ‘आपदि कर्तव्यो धर्मः ।’, अर्थात आपदा के समय, संकटकाल में आचरण में लाया जानेवाला धर्म ।

आपद्धर्म केवल आपदाओं तक ही मर्यादित होता है । आपदा टल जाने पर अथवा समाजजीवन सुचारु रूप से आरंभ हो जाने पर पुन: परिशुद्ध धर्म अपनाना चाहिए, ऐसे नियम भी धर्मशास्त्र में बताए हैं ।

वर्तमान में पूरे विश्‍व में कोरोना महामारी के कारण सर्वत्र ही लोगों की यातायात में अनेक अवरोध उत्पन्न हुए हैं । भारत में भी विविध राज्यों में यातायात बंदी (लॉकडाउन) है । कुछ स्थानों पर कोरोना का प्रादुर्भाव अल्प है, तब भी वहां लोगों को घर से बाहर निकलने पर अनेक बंधन हैं । इससे गणेशोत्सव हमेशा की भांति सामूहिक रूप से मनाने पर भी बंधन आए हैं । इस काल में भी आपद्धर्म लागू हैं ।

२. वर्तमान में कोरोना महामारी होने से क्या श्री गणेश चतुर्थी के स्थान पर माघी गणेश जयंती पर मूर्ति प्रतिष्ठापना करनी चाहिए ?

उत्तर – धर्मशास्त्र कहता है कि ‘श्री गणेशमूर्ति की प्रतिष्ठापना और पूजन भाद्रपद मास में करें ।’ चातुर्मास के काल में अर्थात आषाढ पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा, इन १२० दिनों में विनाशकारी और तमप्रधान यम तरंगें पृथ्वी पर अधिक मात्रा में आती है । इस काल में उनकी तीव्रता अधिक होती है; इसीलिए इस काल में हिन्दुओं के अनेक त्योहार-उत्सव आते हैं । जिससे त्योहार, उत्सव, व्रत के माध्यम से व्यक्ति ईश्‍वर के आंतरिक सान्निध्य में रहता है । भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी के दिन गणेश तरंगें पृथ्वी पर अधिक मात्रा में आने से यम तरंगों की तीव्रता अल्प होने में सहायता मिलती है । इसलिए इस काल में की हुई श्री गणेश की उपासना से गणेशतत्त्व का अधिक लाभ होता है ।

३. बाजार में शाडू की मूर्ति मिलना कठिन है । ऐसे समय पर क्या करें ?

उत्तर – वर्तमान में ‘प्लास्टर ऑफ पेरिस’ की श्री गणेशमूर्ति बाजार में मिलती है । ‘प्लास्टर ऑफ पेरिस’की मूर्ति धर्मशास्त्रसंमत नहीं । ‘प्लास्टर ऑफ पेरिस’ रज-तमप्रधान होने से उससे बनाई मूर्ति में गणेश के पवित्रक आकृष्ट नहीं होते ।

श्री गणेशमूर्ति चिकनी मिट्टी अथवा शाडू मिट्टी से बनाएं, ऐसी शास्त्रविधि है । एक मतानुसार पार्वती माता द्वारा बनाए श्री गणेश महागणपति का अवतार हैं । पार्वती माता द्वारा मृत्तिका से आकार बनाकर उसमें श्री गणेश का आवाहन किया ।

स्कंद पुराण में श्रीकृष्ण द्वारा धर्मराज को सिद्धिविनायक व्रत करने के लिए बताया है । इसमें मूर्ति कैसी होनी चाहिए, इसका विस्तृत वर्णन है ।

‘स्वशक्त्या गणनाथस्य स्वर्णरौप्यमयाकृतिम् ।
अथवा मृन्मयी कार्या वित्तशाठ्यं न कारयेत् ॥’  स्मृतिकौस्तुभ

(मूल संदर्भ : स्कंदपुराण, सिद्धिविनायक कथा और पूजा)

इस श्‍लोक का अर्थ है कि ‘सिद्धिविनायक की पूजा के लिए अपनी क्षमता अनुसार सोना, चांदी अथवा मिट्टी की मूर्ति बनाएं । इसमें कंजूसी न करें ।’

इसलिए इसके अतिरिक्त अन्य पदार्थों से श्री गणेशमूर्ति बनाना उचित नहीं; फिर ऐसी स्थिति में हमारे पास विकल्प क्या हैं, यह अब देखेंगे ।

१. हम घर में ही चिकनी मिट्टी की ६ – ७ इंच की श्री गणेशमूर्ति बना सकते हैं ।

२. मूर्ति बनानी न आती हो अथवा कोरोना के संसर्ग के कारण आसपास का परिसर अथवा इमारत ‘प्रतिबंधित क्षेत्र’ (कंटेन्मेंट झोन) घोषित हुआ हो, तो वहां के लोग गणेशतत्त्व का लाभ होने हेतु अपने घर में श्री गणेश की मूर्ति अथवा श्री गणेश के चित्र का षोडशोपचार पूजन कर सकते हैं । यह पूजन करते समय पूजा की ‘प्राणप्रतिष्ठा’ विधि न करें । ‘प्राणप्रतिष्ठा’ की हुई मूर्ति बाद में विसर्जित करनी होती है । इस हेतु यह ध्यान रखें ।

४. आजकल घर में पंचगव्य, गोबर की मूर्ति की प्रतिष्ठापना का विकल्प दिया जाता है । क्या यह शास्त्रोक्त है ?

उत्तर – शास्त्र कहता है कि सोने, चांदी अथवा मिट्टी की श्री गणेशमूर्ति बनाएं । इसलिए पंचगव्य अथवा गोबर की मूर्ति आदि वस्तुओं से बनाई श्री गणेशमूर्ति धर्मशास्त्रसंमत नहीं ।

५. शाडू की मूर्ति बनाते समय उसमें बीज रखें और फिर उस मूर्ति को गमले में विसर्जित करें, क्या यह शास्त्रसम्मत है ?

उत्तर – ऐसा करना धर्मशास्त्रसंमत नहीं । वास्तव में यह धर्म न माननेवाले पर्यावरणवादियों का प्रचार है । आपको वृक्षारोपण करना है, तो वर्ष के ३६५ दिन होते हैं । कभी भी कर सकते हैं । पर्यावरणप्रेम के लिए धर्माचरण में परिवर्तन करनेे की कोई आवश्यकता नहीं ।

६. क्या बाजार से लाई मूर्ति ‘सैैनिटाइज’ करें ?

उत्तर – बाजार से मूर्ति १ दिन पहले लाएं और १२ घंटे घर के किसी सात्त्विक स्थान पर विलगीकरण कर रखें । इससे वह कोरोनामुक्त होगी । मूर्ति सैनिटाइज न करें । सैनिटायजर में रासायनिक द्रव्यों के कारण मूर्ति का रंगभेद होने की संभावना होती है । उसी प्रकार अध्यात्मशास्त्र के नियमानुसार शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध और शक्ति एकत्र होती है । इस नियमानुसार यदि मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा भले ही न हुई हो, तब भी उस देवता का तत्त्व उसमें होता है । मूर्ति में रंगभेद होने से उसमें देवता के तत्त्व की हानि हो सकती है ।

७. कोरोना महामारी के कारण पुरोहितों को घर बुलाने में मर्यादा है । ऐसी स्थिति में कुछ स्थानों पर पुरोहित ‘ऑनलाइन’ माध्यम से पूजा कहनेवाले हैं । ऐसी ‘ऑनलाइन’ पूजा योग्य है अथवा अयोग्य ?

उत्तर – वर्तमान के संकटकाल में एक-दूसरे के पास जाना संभव न होने से ‘ऑनलाइन’ पूजा एक अच्छा विकल्प है ।  कर्मकांड में मंत्रों के उच्चार और पूजक की ईश्‍वर के प्रति भावभक्ति महत्त्वपूर्ण होती है ।

पुरोहितों की अनुपस्थिति में गणेशपूजन शास्त्रोक्त पद्धति से कर सकें, इसके लिए सनातन संस्था द्वारा ‘श्री गणेशपूजा और आरती’ चल-दूरभाष एप विकसित किए हैं । उसमें श्री गणेश की विधिवत पूजा बताई है । यह ‘एप डाउनलोड’ कर हम भी अपने ही घर में श्री गणेशमूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा कर सकते हैं ।

८. डेढ दिन के गणपति बिठाएं, ऐसी सलाह दी जा रही है । क्या ऐसा करें ?

उत्तर – सिद्धिविनायक व्रत के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को मिट्टी की श्री गणेशमूर्ति बनाते हैं । वह मूर्ति बाएं हाथ पर रखकर वहीं पर मूर्ति की ‘सिद्धिविनायक’ नाम से प्राणप्रतिष्ठा और पूजा कर तुरंत ही विसर्जन करना, शास्त्रविधि है; परंतु मनुष्य उत्सवप्रिय होने से उतने में उसका समाधान नहीं हुआ; इसलिए डेढ, पांच, सात अथवा दस दिन गणपति बिठाकर उनका उत्सव करने लगे । किसी के कुलाचार में गणपति ५ दिन के होंगे और उसे वह डेढ अथवा ७ दिनों का करना हो, तो वह वैसा कर सकते  हैं । इसके लिए किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं । पहले, दूसरे, तीसरे, पांचवें, छठे, सातवें, दसवें, ग्यारहवें अथवा घर की प्रथा अनुसार श्री गणेशमूर्ति का विसर्जन करें ।

९. कोरोना महामारी के काल में मूर्ति विसर्जन के बंधन ध्यान में आने पर क्या करें ?

उत्तर – मूर्ति विसर्जन के समय जलस्रोतों के स्थान पर भीड होती है । वर्तमान में कोरोना महामारी के कारण सोशल डिस्टन्सिंग के (सामाजिक अंतर के) सरकारी नियम पालने आवश्यक हैं । इसलिए श्री गणेशमूर्ति लाते समय और विसर्जन करते समय घर में गिने-चुने व्यक्ति ही जाएं । मूर्ति विसर्जन करते समय अपने घर के निकट ही तालाब अथवा कुएं में विसर्जन करें । इस काल में भीड की संभावना होने से शासन द्वारा कोरोना के संदर्भ में बताए मार्गदर्शक सूत्रों का यथावत पालन करना, हम सभी का कर्तव्य है ।

किसी भाग में कोरोना संसर्ग के कारण अडचन निर्माण हो सकती है, ऐसे में भीडवाले स्थान पर जाकर मूर्ति विसर्जित करना संभव नहीं । ऐसे समय पर क्या करना चाहिए ? ऐसा प्रश्‍न आपके मन में उत्पन्न हो सकता है ।

श्री. चेतन राजहंस

घर में ६ – ७ इंच के लघु श्री गणेशमूर्ति का पूजन करना हो तो अकाल अथवा आपातकालीन परिस्थिति में उत्तरपूजा के उपरांत श्री गणेशमूर्ति घर के बाहर ले जाएं । तुलसी वृंदावन के समीप अथवा आंगन में बडे बर्तन में पानी लेकर उसमें मूर्ति विसर्जित करें । शहर में रहनेवालों के लिए तुलसी वृंदावन अथवा आंगन उपलब्ध न हो, तो घर में ही बडे बर्तन में पानी लेकर उसमें मूर्ति का विसर्जन करें । मूर्ति पानी में पूर्णरूप से घुल जाने पर वह मिट्टी पैरों तले न आए; इसलिए उसे शमी, मदार, गूलर, बरगद, पीपल जैसे सात्त्विक वृक्षों की जड में डालें ।

यदि बडी श्री गणेशमूर्ति का पूजन किया हो, तो उसे पूजाघर के निकट अथवा अन्य सात्त्विक स्थान पर रखें । इस मूर्ति की पूजा करने की आवश्यकता नहीं । धूूल न बैठे; इसलिए उसे बक्सा अथवा आच्छादन से ढककर रखें । आगे श्राद्धपक्ष पूर्ण होने पर भीड न हो, तब मूर्ति को बहते पानी में विसर्जित करें ।

संकटकाल की दृष्टि से हम गणेशभक्तों को सूचित करना चाहते हैं कि इस संकटकाल में संभवत: श्री गणेशजी की छोटी मूर्ति की ही पूजा करें । यथासंभव श्री गणेश की बडी मूर्ति का पूजन टालें ।

१०. इस वर्ष कोरोना महामारी होने से श्री गणेशमूर्ति क्या अगले वर्ष विसर्जित करें ?

उत्तर – श्री गणेशमूर्ति की उत्तरपूजा होने पर उसमें से गणेशतत्त्व निकल जाता है, ऐसा शास्त्र है । इसलिए कोरोना महामारी का संकट अल्प होने पर वह मूर्ति विसर्जित करें । तब तक वह मूर्ति अपने घर में वस्त्र से ढककर रखें । यहां महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है कि श्री गणेशमूर्ति का विसर्जन करने के लिए अगले वर्ष तक रुकने की आवश्यकता नहीं ।

११. धातु की मूर्ति की प्रतिष्ठापना करने पर विसर्जन का शास्त्र क्या है ?

उत्तर – सिद्धिविनायक के व्रत में सोने अथवा चांदी की मूर्तियों की प्रतिष्ठापना करने पर, उसे मिट्टी की मूर्ति समान ही विसर्जित करें । जो नियम मिट्टी की मूर्ति के लिए हैं, वही धातु की मूर्ति पर भी लागू हैं ।

१२. क्या प्रदूषित नदी में मूर्तिविसर्जन योग्य है ?

उत्तर – ‘श्री गणेशमूर्ति का नदी के बहते पानी में अथवा कुएं, तालाब आदि प्राकृतिक जलाशय में विसर्जन करें’, ऐसा शास्त्र कहता है । नदी के बहते पानी में श्री गणेशमूर्ति का विसर्जन करने से मूर्ति का गणेशतत्त्व पानी के साथ दूर-दूर तक पहुंचता है और उसका चराचर सृष्टि को लाभ होता है । अब प्रश्‍न यह है कि यदि नदी प्रदूषित हो, तो क्या करें ? इस प्रश्‍न के उत्तर के २ – ३ पहलू हैं । वास्तव में नदी का प्रदूषण रोकने का मुख्य दायित्व स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं का है । नदी का मुख्य प्रदूषण प्रमुख रूप से उसमें छोडे जानेवाले दूषित रासायनिक पानी और बिना प्रक्रिया के छोडी जानेवाली गंदगी के कारण होता है । नदी को प्रदूषित करनेवाले घटकों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करने पर नदी की निर्मलता अबाधित रहेगी । ऐसा नहीं हो रहा, इसलिए धार्मिक विधियां संपन्न होने में बाधा निर्माण हो गई है । इसलिए नदी प्रदूूषणरहित करने के लिए स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं को आवश्यक कदम उठाने चाहिए । विसर्जन के दिन नदी में अधिक पानी छोडा जाए, इसके लिए नागरिक ही शासन से पूछताछ करें ।

अब श्रद्धालुओं की दृष्टि से यदि विचार करें तो अपने क्षेत्र में नदी अधिक प्रदूषित हो, तो उस स्थान पर मूर्ति विसर्जन करें जहां पानी अच्छा हो । शास्त्र के अनुसार आचरण करने को प्रधानता दें ।

१३. कुछ आध्यात्मिक संस्थाएं निर्माल्य एकत्र करती हैं और उसे गड्ढे में डाल देती हैं । क्या यह शास्त्रसंमत है ?

उत्तर – नहीं । यह शास्त्रसंमत नहीं । यदि अपने क्षेत्र में आध्यात्मिक संस्थाएं ऐसे धर्मविरोधी कृत्य कर रही हों, तो उनका वैध मार्ग से विरोध करना चाहिए । वैसे श्री गणेशमूर्ति के साथ निर्माल्य का भी विसर्जन करना चाहिए । इससे निर्माल्य का चैतन्य पानी में विसर्जित होने से पानी द्वारा उस चैतन्य का समष्टि स्तर पर लाभ होता है; परंतु वर्तमान के आपातकाल में बाहर जाना संभव नहीं है, ऐसे में कम से कम निर्माल्य के चैतन्य का लाभ मिले, इसलिए निर्माल्य पानी में डुबाकर निकालें और फिर स्नान के लिए अथवा आंगन के पौधों के लिए उसका उपयोग करें । तदुपरांत उस निर्माल्य का उपयोग खाद-निर्मिति के लिए करें ।

१४. गणेशोत्सव मंडल द्वारा श्री गणेशपूजन रहित करना एक प्रकार से ईश्‍वरीय अधिष्ठान नकारना है !

भगवान गणेश, कार्य के ईश्‍वरीय अधिष्ठान हैं । किसी भी कार्य की सफलता के लिए ईश्‍वरीय अधिष्ठान की आवश्यकता होती है । इसलिए श्री गणेशपूजन रहित करना, यह एक प्रकार से ईश्‍वरीय अधिष्ठान नकारने समान होगा । श्री गणेशोत्सव मंडल में श्री गणेश की छोटी मूर्ति की पूजा करना और स्वास्थ्य संबंधी उपक्रम करना, ये दोनों ही बातें मंडल के लिए संभव हैं । भीड न हो; इसलिए ‘सोशल डिस्टन्सिंग’ रखी जाए, ऐसी व्यवस्था करना अथवा ‘ऑनलाइन दर्शन’की सुविधा करना, ऐसी कुछ व्यवस्था भी की जा सकती है ।

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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