वैदिक पद्धतिसे विवाह क्यों करते है ?

सारणी

१. विवाह मुहूर्तकी विशेषताएं क्या हैं ?
२. वैदिक विवाहके लाभ
३. ‘सौभाग्यवती’ शब्दका वास्तविक अर्थ
. पति-पत्नी वैवाहिक संबंध को आध्यात्मिक संबंध में निर्मित कैसे करे ?


 

१. विवाह मुहूर्तकी विशेषताएं क्या हैं ?

प्रातः ४ से ५ (ब्राह्ममुहूर्त, ब्राह्मकाल)

 

इस कालमें अस्त होनेवाली चंद्रमाकी तरंगें प्रखर ब्राह्मतेजके लिए तथा उदित होनेवाले अर्थात प्रकट होनेवाले सूर्यकी तेज-तरंगें शांत, संयमी क्षात्रतेजके लिए पूरक होती हैं । यह काल प्रखर ब्राह्मतेजके लिए पूरक होता है, इसलिए इसे ब्राह्ममुहूर्त कहते हैं ।

 

दोपहर ४ से ५ (गोरज काल, क्षात्रकाल)

किसी कारणवश सवेरेका मुहूर्त यदि छूट जाए, तो ही गोरज मुहूर्तपर विवाह करें । इस कालावधिमें अस्त होते सूर्यसे प्रक्षेपित तेजतरंगें प्रखर क्षात्रतेजके लिए पूरक हैं, जबकि उदित होते चंद्रसे प्रक्षेपित तरंगें शीतल, संयमी एवं शांत रहती हैं, अतः ब्राह्मतेजके लिए पूरक हैं । यह काल क्षात्रतेजके लिए पूरक रहता है, इसलिए इस कालमें अनिष्ट शक्तियोंके कष्टकी आशंका अल्प रहती है । प्राचीनकालमें अधिकांश क्षत्रियोंके विवाह गोरज मुहूर्तपर होते थे ।

 

दोपहर ५ के उपरांत (कातर काल)

यथासंभव संध्याकालमें अथवा रातमें बहुत देरसे विवाह न करें, क्योंकि इस कालमें अनिष्ट शक्तियोंके कष्टकी आशंका रहती है ।

– सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २१.२.२००५, रात्रि ९.२८)

 

२. वैदिक विवाहके लाभ

अ. पत्नीको धर्मपत्नी कहना

धर्मने पत्नी स्वीकारनेकी अनुमति दी है, इसलिए वैदिकपद्धतिसे विवाह करनेपर उस पत्नीको ‘धर्मपत्नी’ कहते हैं ।

 

आ. अधिकारकी अपेक्षा उत्तरदायित्वका भान अधिक

जब सात्त्विकताका संस्कार कर विवाहसंपन्न होता है, तब पति एवं पत्नीका एक-दूसरेसे व्यवहार केवल शारीरिक स्तरपर न होकर, मानसिक स्तरका भी होता है । वे एक-दूसरेका विचार करते हैं तथा प्रेम एवं समझदारीसे आचरण करते हैं । उन्हें अधिकारसे अधिक उत्तरदायित्वका भान रहता है ।

 

इ. विवाहित स्त्रीको देखकर उसके प्रति
मनमें एवं समाजमें आदरका स्थान निर्मित होना
तथा समाजव्यवस्था बनी रहनेमें सहायता होना

विवाहित स्त्रीके मस्तकका कुमकुम, गलेका मंगलसूत्र, हाथोंकी हरी चूडियां, पैरोंकी बिछिया एवं छह अथवा नौ गजकी साडी देखकर उसे देखनेवालेके मनमें उसके प्रति अपनेआप ही आदर निर्माण होता है । विवाहित स्त्रीको विवाहके उपरांत समाजमें अपनेआप ही पत्नी, बहू, चाची, देवरानी इत्यादि संबंधोंके कारण आदरका स्थान प्राप्त होता है ।परस्त्रीको बुरी दृष्टिसे न देख माताके रूपमें एवं आदरसे देखनेके कारण समाज-सुव्यवस्थामें सहायता मिलती है । उसका आदर्श अविवाहित लडकियोंको भी प्राप्त होता है ।

 

ई. पारिवारिक स्वास्थ्य बना रहना एवं
संतानको धर्माधिष्ठित जीवन जीनेकी प्रेरणा प्राप्त होना

जीवनभर माता-पिताद्वारा व्यतीत किया गया आदर्श जीवन एवं त्यौहार, व्रत और कुलाचार पालन (धर्माचरण) के कारण परिवारका स्वास्थ्य बना रहता है । इससे उनकी संतानको भी धर्माधिष्ठित जीवन जीनेकी प्रेरणा मिलती है ।’

– ईश्वर (कु. मधुरा भोसलेके माध्यमसे, १८.११.२००५, दोपहर३.३०)

 

३. ‘सौभाग्यवती’ शब्दका वास्तविक अर्थ

‘गुरुप्राप्ति बिना मोक्षप्राप्ति कठिन है । इसलिए जीवनमें गुरुका स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । जब कन्याका विवाह होता है, तब उसे पतिके रूपमें ‘गुरुप्राप्ति’ होती है ।भावभक्तिसे पतिकी सेवा करनेसे, उसे मोक्षप्राप्ति हो सकती है । इस अर्थसे कन्याका विवाह होनेपर उसे ‘सौभाग्यवती’ कहा जाता है । ‘एक क्षणमें गुरुप्राप्ति होना’, यही उसका सौभाग्य है । विवाहके उपरांत ‘धर्माचरण करनेवाले पतिकी सेवा करना’ ही सौभाग्यवतीका कर्तव्य है । ‘धर्माचरण करनेवाले पतिका पग-पगपर साथ निभानेवाली’ इस आशयसे ‘भार्या’ शब्दका वास्तविक अर्थ है ‘सहधर्मचारिणी’ । – श्री. नितीनसहकारी, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.

 

४. पति-पत्नी वैवाहिक संबंध को
आध्यात्मिक संबंध में निर्मित कैसे करे ?

मनुष्यजन्मके दो उद्देश्य हैं – एक प्रारब्ध भोग भोगना और दूसरा अध्यात्मके विविध स्तर प्राप्त कर मार्गदर्शन लेकर आध्यात्मिक प्रगति करना । विवाहसे उपरोक्त दोनों ही उद्देश्य सहजतासे साध्य होते हैं । अपने मायाके अर्थात व्यवहारिक कर्तव्यको निभाते हुए अपना पति-पत्नीका संबंध केवल मायाके व्यवहारिक कर्तव्यपूर्तिके लिए न रखते हुए उसका एक-दूसरेकी साधनाके लिए कैसे उपयोग कर सकते हैं, ऐसा विचार करनेपर संबंधका मायाका भाग अल्प होकर आध्यात्मिक संबंध निर्माण होनेमें सहायता होती है । इससे दोनों जीव एक-दूसरेको केवल मायाकी दृष्टिसे नहीं, आध्यात्मिक उन्नतिके दृष्टिसे पूरक बनते हैं । अनेक ऋषि-मुनि तथा उनकी पत्नीका संबंध आध्यात्मिक स्तरपर था । इसलिए अनेक ऋषि, ऋषि-पत्नियोंके लिए गुरुस्थानपर थे और ऋषिपत्नी शिष्या बनकर उनसे आध्यात्मिक मार्गदर्शन लेती थी । इस संसारमें सभी संबंध मायाके हैं, मात्र गुरु-शिष्य संबंध ही खरा आध्यात्मिक संबंध है ।’

– ईश्वर (कु. मधुरा भोसलेके माध्यमसे २०.१२.२००६, दिन १०.००)

संदर्भ : सनातन-निर्मित लघुग्रंथ ‘विवाह संस्कार’