आयुर्वेदानुसार अपनी दिनचर्या बनाएं !

विदेशी सेब की अपेक्षा भारतीय फल खाएं !

१. सेब यहां का फल नहीं !

सेब मूलतः भारतीय फल है ही नहीं । अंग्रेज उसे अपने साथ लाए थे । वास्तव में इस फल में ऐसे कोई भी विशेष औषधीय गुणधर्म नहीं हैैं, जो भारतीय फलों में पाए जाते हैं ।

२. ‘एन एपल अ डे, किप्स द डॉक्टर अवे’ कहना पूर्णतः झूठा !

अति ठंडे प्रदेश में सेब के अतिरिक्त अन्य कोई बडा फल होता ही नहीं । लीची, स्ट्रॉबेरी, मलबेरी, चेरी जैसे वहां के अन्य फल बहुत पिलपिले, कोमल होते हैं । उनमें से सेब थोडा बडा और अधिक समय तक रहनेवाला फल होने से यह कहावत प्रचलित हुई । जहां सेब की उपज होती है वहां भी यह कहावत सत्य नहीं है । जबकि ऐसे ठंडे प्रदेशों में विकार और रुग्णों की संख्या भारत की अपेक्षा अधिक है ।

३. ‘एन आंवला अ डे, किप्स द डॉक्टर अवे’ कहना उचित !

फलों के गुणों के आधार पर कोई कहावत भारत के लिए बनानी हो तो ‘एन आंवला अ डे, किप्स द डॉक्टर अवे’ अर्थात ‘प्रतिदिन एक आंवला चिकित्सक को दूर रखता है’, ऐसी होनी चाहिए !

४. ठंडे प्रदेश को छोडकर अन्यत्र सेब खाने का परिणाम है, विविध विकारों को आमंत्रण देना ।

सेब की स्तुति करनेवाले स्तुतिपाठक यह ध्यानमें लें, ‘जहां जो उगता है वही वहां अनुकूल रहता है’, यह आयुर्वेद का एक सिद्धांत है । जहां सेब का पौधा उगता है, वहां बारह मास अति शीत वातावरण रहता है । उस पेड की जडों के पास हिम रहता है । इस कारण ‘वात’ बढानेवाले गुणों के साथ ही यह फल जन्मता है ! इसलिए सेब खानेवाले व्यक्तियों को और बालकों को बार-बार शीतप्रकोप होना, नाक बहना, कान से पानी निकलना, गले की गांठ, मूत्रविकार, मधुमेह जैसे रोग प्रकृति के अनुसार अल्प-अधिक मात्रा में होते ही रहेंगे । उनके आहार से सेब को हटाने मात्र से ये विकार बहुत घट जाते हैं, ऐसा कई वैद्यों का अनुभव है । आजकल सेब को मोम का लेपन किया जाता है; जिससे बाह्य वातावरण का फल के छिलके से संपर्क नहीं होता । परंतु यह शरीर के लिए घातक रहता है ! उसका मोम का पतला लेप और फफूंद आंखों से नहीं दिखते । ऐसा मोम का लेपन किया हुआ सेब खाने से मलावरोध, मूत्र की रुकावट या आंतों के विकार उत्पन्न होते हैं । ऐसे मोम लगे हुए सेब गरम पानी में डालने पर मोम की परत पानी पर तैरती स्पष्ट दिखाई देती है । खरीदते समय धीरे से नख घिसने से उसका मोम नख पर आता है ।

५. प्रत्येक ऋतु अनुसार आनेवाले करोंदा, जामुन जैसे फल खाएं !

कटहल, आम, काजू; समतल पहाडी पर दाख (अंगूर) तथा चीकू हैं, साथ ही पूरे वर्ष उपलब्ध केला, अनन्नास, पपीता, जैसे अनेक अल्प मूल्य के फलों का सक्षम पर्याय सेब के लिए उपलब्ध है !’

– वैद्य सुविनय दामले, कुडाळ, सिंधुदुर्ग, महाराष्ट्र.

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात