शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आयुर्वेद के नियमों का पालन करें !

सरल आरोग्यदायी दिनचर्या

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् । अर्थात, धर्माचरण के लिए (साधना करने के लिए) शरीर का स्वस्थ रहना अत्यंत आवश्यक है । शरीर स्वस्थ रहे, इसके लिए आयुर्वेद में दिनचर्या और ऋतुचर्या के विषय में कुछ नियम बताए गए हैं । जो लोग उन नियमों का पालन करेंगे, उनका स्वास्थ्य ठीक रहने के साथ-साथ साधना भी अच्छी होगी । आज हम दिनचर्या के नियम आचरण में लाने के संबंध में समझकर लेते हैं । दिनचर्या का पालन करने के लिए अलग से समय नहीं देना है; अपितु दैनिक व्यवहार करते-करते ही इन नियमों का सरल ढंग से आचरण कैसे करना है, इसका विचार इस लेख में किया गया है ।

 

१. ब्राह्ममुहूर्त पर उठना

आयुर्वेद में ब्राह्ममुहूर्त पर उठने के लिए कहा गया है । ब्राह्ममुहूर्त का अर्थ है, सूर्योदय से ९६ से ४८ मिनट पहले का काल । इस काल में उठने पर शौच की हाजत अपनेआप उत्पन्न होकर पेट स्वच्छ होता है । जो लोग ब्राह्ममुहूर्त पर नहीं उठ सकते, वे न्यूनतम सवेरे ७ बजे तक अवश्य उठें । कुछ दिन पश्‍चात, शीघ्र उठने का प्रयत्न करें । सूर्योदय के पश्‍चात भी सोए रहने से शरीर का भारी होना, आलस बढना, पाचनतंत्र बिगडना, बद्धकोष्ठता जैसे रोग उत्पन्न हो सकते हैं ।

 

२. सवेरे उठने पर पानी न पीएं !

कुछ योगशिक्षक कहते हैं कि सवेरे उठने पर एक लोटा पानी पीना चाहिए । योगशास्त्र के सब नियमों का पालन कर प्रतिदिन आसन, प्राणायाम आदि करनेवालों को इस प्रकार पानी पीने से कोई हानि नहीं होती; परंतु जब सामान्य व्यक्ति सवेरे अनावश्यक ही पानी पीता है, तब उसकी पाचनशक्ति दुर्बल होती है । पाचनशक्ति का अर्थ है, जठराग्नि । सब रोगों का मूल कारण जठराग्नि का मंद होना ही है ।

 

३. शौच

अनेक लोग कहते हैं कि सवेरे चाय पीए बिना शौच नहीं होता । किंतु, बहुत बार यह आदत का परिणाम होता है । जिनका पेट सवेरे उठने पर स्वच्छ नहीं होता, वे रात्रि में सोने के पहले १ चम्मच त्रिफला चूर्ण गुनगुने जल से १ सप्ताह लें । सवेरे उठने पर २ मिनट भ्रमण कर शौच के लिए बैठें; परंतु शौच होने के लिए जोर न लगाएं । ऐसा आठ दिन करने पर धीरे-धीरे सवेरे उठने पर पेट स्वच्छ होने लगेगा ।

 

४. मुखमार्जन

पहले कूंची (ब्रश) से दांत स्वच्छ करें । पश्‍चात, (सनातन) दंतमंजन अथवा (सनातन) त्रिफला चूर्ण से धीरे-धीरे दांत और मसूडों को मलें । इससे मसूडे दृढ होते हैं । प्रत्येक टूथपेस्ट में (प्रसिद्ध स्वदेशी टूथपेस्ट में भी) फ्लोराइड और सोडियम लॉरिल सल्फेट नामक हानिकारक पदार्थ होते हैं । इसलिए, इनके उपयोग से बचें ।

दांत स्वस्थ रखने के उपाय

२ से ४ चम्मच काला तिल सवेरे चबाकर खाने से दांत स्वस्थ रहते हैं । पिष्टमय पदार्थ, चीनी अथवा अन्य मीठे पदार्थ अधिक एवं बार-बार खाने से दांत सड सकते हैं । आरोग्य रक्षा के लिए अधिक खट्टे पदार्थ अथवा अति शीतल अथवा उष्ण (गरम) ठोस अथवा पेय पदार्थों का सेवन न करें । कोई भी पदार्थ, विशेषतः चॉकलेट खाकर तुरंत ब्रश से दांत स्वच्छ कर कुल्ला करें ।

 

५. नाक में औषधि डालना (नस्य)

नाक में २-२ बूंद तेल अथवा घी डालने को ‘नस्य’ कहते हैं । नस्य करने से मस्तिष्क को शक्ति मिलती है । सिरपीडा, कंधे की पीडा, बालों का टूटना अथवा श्‍वेत होना, नाक के दो छिद्रों के मध्य का परदा (Nasal septum) एक ओर सरकना, दमा, पुरानी सरदी, पुरानी खांसी इन रोगों में तथा गरदन के ऊपरी भाग को निरोग रखने के लिए प्रतिदिन नस्य करना लाभदायक है । ठंड के दिनों में सवेरे नस्य न कर सकें, तो दोपहर में भोजन के पश्‍चात तुरंत कर सकते हैं ।

५ अ. नाक में तेल डालने की तैयारी

ड्रॉपरयुक्त छोटी खाली शीशी पानी से धोकर सुखा लें । पश्‍चात उसमें नारियल का तेल भरें । सवेरे दांत स्वच्छ करने के पहले यह शीशी गरम पानी में रख दें । इससे, दांत स्वच्छ करने तक यह तेल गुनगुना हो जाता है ।

५ आ. क्रिया

दांत स्वच्छ करने के पश्‍चात नाक छिनककर स्वच्छ कर लें । पश्‍चात, मुख पर गुनगुना पानी छिडक कर उसे थोडा सेंक लें । पश्‍चात, उतान लेटकर तकिया गरदन के नीचे रखें और नाक के दोनों छेद ऊपर की ओर । अब उन दोनों नासिका छिद्रों के मध्यवाले परदे पर (Nasal septum पर) नारियल के दो-दो बूंद तेल छोड कर उसी स्थिति में १ मिनिट तक लेटे रहें । पश्‍चात, गले में आया तेल पर थूक दें, पीएं नहीं । क्योंकि, नस्य करते समय गले में आया तेल तेल पीने से पाचनशक्ति दुर्बल होती है । १ मिनट के पश्‍चात पहले की भांति – गुनगुने पानी से मुख सेंक कर कुल्ला कर लें ।

नस्य के लिए गाय के घी अथवा तिल के तेल का भी उपयोग कर सकते हैं । जिन्हें अम्लता-संबंधी कष्ट है, वे नारियल तेल अथवा घी का उपयोग करें ।

 

६. मुख में तेल लेना (गंडूष)

नस्य के पश्‍चात, २ चम्मच कुनकुना तेल (तिल का अथवा नारियल का) ५ मिनट तक मुख में रखें । इससे दांत और मसूडे निरोग रहते हैं । जिनके दांतों में झनझनाहट होती है अथवा जिनके मुख में लार अल्प बनती है, वे यह क्रिया अवश्य करें । मुख में तेल रखकर आगे बताई कर्णपूरण आदि क्रिया भी करें । इससे समय की बचत होती है । ५ मिनट के पश्‍चात मुख का तेल थूक दें, पीएं नहीं । पश्‍चात, गुनगुने पानी से कुल्ला कर लें ।

 

७. कान में तेल डालना (कर्णपूरण)

जब मुख में तेल हो, तब उसी स्थिति में तकिया पर सिर रखकर एक कान में गुनगुने तेल की ३-४ बूंद डालें । २ मिनिट उसी स्थिति में रहें । पश्‍चात, उस कान को कपास के फाहे से बंद कर दें । इसी प्रकार, दूसरे करवट लेटकर दूसरे कान में तेल डालें । कान में तेल डालने के लिए नारियल का तेल, तिल का तेल अथवा बिनौला तेल (कपास के बीजों का तेल) का भी उपयोग कर सकते हैं ।

७ अ. लाभ

कान में तेल डालने से कान का आरोग्य सुधरता है । कान दुखना, चक्कर आना, खडा होने पर रक्तदाब घटना, चलते समय शरीर का संतुलन न रहना जैसे रोगों में नियम से कानों में तेल डालने पर लाभ होता है । जो लोग अधिक समय कान में इयरफोन लगाए रहते हैं, उन्हें प्रतिदिन कान में तेल डालना चाहिए ।

७ आ. कान में तेल डालते समय सावधानी बरतना

कर्णपूरण के लिए तेल अच्छे से तपा कर ठंडा करें; पश्‍चात स्वच्छ सूखी शीशी में भरें । क्योंकि, तेल में अथवा शीशी में पानी का अंश रहने पर तेल को फफूंद लग सकती है । ऐसा तेल कान में डालने पर कान को भी फफूंद लग सकती है । कान परदे में छिद्र हो अथवा उसमें जीवाणुओं का संक्रमण हुआ हो, तब कान में तेल न डालें । कान में तेल डालने पर यदि वह गले में पहुंच जाए, तब समझिए कि कान के परदे में छिद्र हो गया है । ऐसा होने पर कान के चिकित्सक से कान की जांच करवाएं । कभी-कभी कान में तेल डालने पर कान का मैल फूल जाता है; तब कान सुन्न हो जाता है । ऐसी स्थिति में कपासयुक्त सलाई से कान का मैल धीरे से निकालना चाहिए । मैल कठोर होने पर विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच करवाएं ।

 

८. औषधीय धूमपान

नाक अथवा मुख से औषधीय धुआं लेना ।

८ अ. लाभ

बार-बार सरदी होना, दमा, सिर का भारीपन, खांसी जैसे रोगों में धूमपान से लाभ होता है । वातावरण में ठंड बढने से और औषध लेने पर भी ठीक न होनेवाली खांसी में धूमपान बहुत लाभदायक होता है । धूमपान से श्‍वासनली में जमा कफ निकल जाता है, जिससे श्‍वसनतंत्र स्वस्थ होने में सहायता होती है ।

८ आ. तैयारी

२ वर्ग इंच कागद की बीडी समान नली बनाएं । इस नली के संकरे सिरे पर सेलोटेप चिपकाएं, इससे नली का कागद नहीं खुलेगा । अब नली में अजवाइन भरें । अजवाइन के स्थान पर तुलसी के पत्तों का चूर्ण भी ले सकते हैं । चिलम उपलब्ध हो, तो कागद के स्थान पर उसका प्रयोग कर सकते हैं ।

८ इ. क्रिया

अजवाइन से भरी कागद की नली का संकरा सिरा मुख से पकड कर विरुद्ध सिरे को लाइटर अथवा दियासलाई से जलाएं । नली सहित अजवाइन जब जलने लगे, तब उसका धुआं सावधानी से भीतर खींचें और मुंख से ही बाहर निकालें । धुआं छोडते समय नली को मुख से निकाल दिया करें । यह क्रिया ३-४ बार करें । इसके बाद नली में बची अजवाइन एक डिब्बी में रखें और जला हुआ कागद कूडे में डाल दें । इस डिब्बी की अजवाइन का उपयोग दूसरे दिन कर सकते हैं ।

 

९. अभ्यंग (तेल मालिश)

इसके पश्‍चात, पूरे शरीर को तेल लगाएं । इसके लिए नारियल तेल, तिल का तेल, बिनौले का तेल में से कोई भी चलेगा ।

९ अ. लाभ

प्रतिदिन अभ्यंग करने से त्वचा स्वस्थ रहती है, शरीर शीतल रहता है, आंखों की ज्योति सुधरती है और शरीर पुष्ट होता है । जोडों को चिकनाई मिलती है । ठंड के दिनों में सूखी ठंडी (ड्राई कोल्ड) के कारण त्वचा फटती है तथा एडियों में बेवाइयां पडती हैं । ऐसे समय अभ्यंग से तुरंत लाभ होता है । अभ्यंग से मोटे व्यक्ति का मेद (चरबी) घटता है और दुबले व्यक्ति का मेद बढकर शरीर पुष्ट होता है । यह कार्य, मेद धातु की सूक्ष्म अन्न वाहक नाडियों के अवरोध दूर होने से साध्य होता है । प्रतिदिन अभ्यंग करने से त्वचा पर झुर्रियां नहीं पडतीं ।

९ आ. तैयारी

एक बोतल में अभ्यंग के लिए तेल भरें । उसमें १०० मिली में २ ग्राम कपूर का चूर्ण पिघला कर मिलाएं । शरीर को गुनगुना तेल ही लगाएं । अभ्यंग का तेल (सनातन) गोमूत्र की छोटी खाली बोतल में भी भर कर रख सकते हैं । सवेरे दांत स्वच्छ करने के पहले तेल की इस बोतल को गरम पानी में डुबाकर रखेंगे, तो अभ्यंग के समय यह तेल गुनगुना मिलेगा ।

९ इ. क्रिया

सिर छोडकर शरीर के शेष भाग में लगाने के लिए एक बार में २० मिली तेल की आवश्यकता होती है । यह तेल मुख से पैर तक पूरे शरीर पर मलें । इसके लिए ५ मिनट पर्याप्त होता है । तेल मलते समय आवश्यकतानुसार दाब देना चाहिए ।

९ इ १. विविध अवयवों पर तेल मलने की दिशा

मालिश करने की अनेक पद्धतियां हैं । हमने यहांपर मालिश की ऐसी पद्धति बताई है, जिसमें समय कम लगता है ।

९ इ २. अभ्यंग के विषय में विशेष सूचना

अ. एक हाथ को तेल लगाना हो जाने पर, उस हाथ में लगा अतिरिक्त तेल दूसरे हाथ को लगा सकते हैं । इसी पद्धति से पैरों में भी तेल लगा सकते हैं । ऐसा करने पर कम तेल में कार्य पूरा होता है ।

आ. धर्मशास्त्रानुसार विशिष्ट दिन अभ्यंग के तेल में मिलाया जानेवाला पदार्थ

अभ्यंग के तेल में रविवार को फूल, मंगलवार को मिट्टी, गुरुवार को दूब और शुक्रवार को गाय का गोबर मिलाकर अभ्यंग करने से उस दिन अभ्यंग करने से लगनेवाले दोष दूर होते हैं ।

इ. भोजन के पश्‍चात ३ घंटे तक अभ्यंग न करें । क्योंकि, ऐसा करने पर जठर और अंतडियों मेंहोनेवाला रक्तसंचार कुछ मात्रा में घट कर, त्वचा की ओर बढ जाता है । ऐसी स्थिति में विषसमान आम (अपचित अन्न) के सूक्ष्म कण त्वचा और स्नायु की ओर बढ जाते हैं, जिससे त्वचा और स्नायु के रोग होते हैं ।

 

१०. व्यायाम

१० अ. व्यायाम की मात्रा

अभ्यंग के पश्‍चात, आधी शक्ति से व्यायाम करना चाहिए । व्यायाम करते समय मुख से श्‍वास आरंभ होने पर समझें कि व्यायाम आधी शक्ति से हो रहा है । अधिक व्यायाम करना हो, तो थोडा रुक करें । श्‍वास लेने की क्रिया नाक से आरंभ होने पर कर सकते हैं । न्यूनतम २० मिनट व्यायाम करें । सूर्यनमस्कार भी कर सकते हैं ।

१० आ. व्यायाम के विषय में कुछ प्रायोगिक सूचना

१. व्यायाम प्रथम बार ही कर रहे हों, तो पहले दिन अधिक व्यायाम न करें । व्यायाम प्रत्येक दिन थोडा-थोडा बढाएं और अपनी क्षमता के अनुसार ही करें ।

२. व्यायाम से शरीर का तापमान बढता है । शीतऋतु में सवेरे उठने पर ठंड बहुत लगती हो, तब २ मिनट तक एक ही स्थान पर दौडने की क्रिया करें, इससे ठंड लगना तुरंत कम हो जाएगा ।

३. व्यायाम के उपपरांत २ मिनट तक शरीर को गमछे से अथवा हाथ से ही रगडें । ऐसा करने से व्यायाम के कारण स्नायुओं में बढा वात घट जाता है । इसी प्रकार, इस घर्षण से शरीर में एक प्रकार का विद्युतप्रवाह उत्पन्न होता है, जिससे शरीर के रोग नष्ट होते हैं ।

४. व्यायाम के ३० मिनट उपरांत ही स्नान करें । उसके पूर्व कपडे धोना, पढना अथवा नामजप कर सकते हैं ।

५. अभ्यंग के पश्‍चात व्यायाम न करना हो, तब २० मिनट बाद स्नान कर सकते हैं । बहुत शीघ्रता हो, तब अभ्यंग के ५ मिनट बाद भी स्नान कर सकते हैं । वैसे तो शरीर पर तेल मलने पर तेल ५ मिनट में त्वचा में समाने लगता है । इसलिए, तेल लगाकर २० मिनट रुक सकें, तो उत्तम ।

६. सवेरे प्रशिक्षणवर्ग में जाना हो, तो औषधीय धूमपान कर जाएं । प्रशिक्षण पूरा होने पर १५ मिनट शांत बैठकर वाचन, नामजप अथवा ध्यान करें । पश्‍चात, ५ मिनट शरीर को तेल लगाएं और थोडा समय रुककर स्नान करें ।

७. अभ्यंग के उपरांत भी व्यायाम करने पर पसीना निकलता है; परंतु लाभ अधिक होता है ।

 

११. स्नान

११ अ. स्नान का पानी

शरीर को तेल लगाया है, तो स्नान के लिए गुनगुना पानी लें । स्नान करते समय पहले सिर गीला करें, पश्‍चात पैर । पहले ही पैर गीला करने पर, शरीर की गर्मी ऊपरी अवयवों में जाती है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है । सिर पर गरम पानी डालने पर बाल झडते हैं । इसलिए, सिर पर हमेशा -गुनगुना पानी ही डालना चाहिए । ठंडे पानी से स्नान करनेवाला सिर पर ठंडा पानी ले सकता है । शीतऋतु में ठंडे पानी से स्नान न करें ।

११ आ. स्नान करते समय मुख से नामजप अथवा स्तोत्र बोलने के लाभ

शरीर पर अचानक पानी डालने पर प्राण और उदान वायुओं का गति-संतुलन बिगड जाता है । कुछ लोगों को स्नान के पश्‍चात अचानक थकान लगती है, तब उसका एक कारण प्राण और उदान वायुआें की गति में असंतुलन हो सकता है । लोटे का पानी पहली बार सिर पर डालते समय जोर से नामजप करने अथवा कोई स्तोत्र बोलने पर प्राण और उदान वायु की गति संतुलित रहती है और स्नान के पश्‍चात थकान का अनुभव कम होता है ।

११ इ. उबटन लगाना

अभ्यंग से शरीर पर लगा अतिरिक्त तेल, उबटन लगाने से निकल जाता है । इसके लिए (सनातन) उबटन अथवा बेसन का भी उपयोग कर सकते हैं । उबटन लगाने से शरीर की अतिरिक्त चरबी घटती है । इसलिए, मोटे लोगों को उबटन लगाना चाहिए ।

११ ई. बिना चीनी की चाय अथवा कशाय के पाउडर का उपयोग उबटन के समान करना

पानी खौलते समय न डालें चाय में चीनी, चाय छानने के पश्‍चात डालें । ऐसा करने से ईंधन (गैस) की बचत होती है, चीनी कम लगती है और वह चाय के पाउडर में नहीं मिलती । बिना चीनीवाली चाय का यह चूर्ण धूप में सुखाकर उसका उपयोग उबटन के समान कर सकते हैं । चाय न बनाकर, धनिया-जीरे का कशाय पीते हों, तो उसके चूर्ण का उपयोग भी उबटन की भांति कर सकते हैं ।

११ उ. साबुन लगाकर स्नान न करें !

स्नान के समय साबुन न लगाएं । साबुन में स्थित कृत्रिम द्रव्यों के कारण त्वचा रूखी हो जाती है । साबुन के बदले ऊपर बताए अनुसार उबटन लगाएं । एक बार लगाने के लिए २ चम्मच उबटन पर्याप्त होता है । उबटन की ही भांति मुलतानी मिट्टी अथवा बांबी की मिट्टी का उपयोग किया जा सकता है । इसी प्रकार, शिकाकाई, सूखा आंवला, रीठा, तिल के चूर्ण से बने मिश्रण का उपयोग साबुन के समान किया जा सकता है ।

स्नान करते समय साबुन न लगाना उत्तम होने पर भी कुछ लोगों को शरीर पर का अतिरिक्त तेल धोने के लिए साबुन लगाना सुविधाजनक लगता है । ऐसे समय साबुन लगाकर शरीर को अधिक न रगडें; त्वचा के ऊपर का पूरा तेल साबुन से न धोएं, थोडा-सा तेल लगा रहने दें । शरीर पोंछने पर त्वचा पर आवश्यक तेल लगा रहता है, जो कपडों को नहीं लगता और त्वचा मुलायम भी रहती है ।

११ ऊ. शैम्पू के स्थान पर शिकाकाई का उपयोग करें !

स्नान करते समय बालों में शैम्पू न लगाएं । साबुन के समान झाग देनेवाले शैम्पू में सोडियम लॉरिल सल्फेट नाम का विष होता है । शैम्पू की अपेक्षा (सनातन) शिकाकाई का उपयोग कर सकते हैं ।

११ ए. स्नान कब नहीं करना चाहिए ?

जब शरीर में ज्वर (ताप), मुख को स्वाद न रहना, अपचन, पेट फूलना, अतिसार (जुलाब), भूख बहुत जोर की लगना, -आंखे और कान में वेदना, मुख अचानक टेढा होना ऐसी स्थितियों में स्नान न करें । इसी प्रकार, कुछ खाकर अथवा भोजन के पश्‍चात भी स्नान न करें । आवश्यक होने पर, खाने के ३ घंटे पश्‍चात स्नान करें ।

 

१२. सिर में तेल लगाना

स्नान के पश्‍चात सिर में तेल लगाएं । जब केश थोडे गीले हों, तब तेल लगाना अच्छा रहता है । तेल इस ढंग से लगाएं कि वह केश की जडों में लगे । इससे केश झडने और श्‍वेत होने की समस्या घट जाती है ।

आजकल दुकानों में केश चिपचिपे न हों, ऐसे तेल मिलते हैं । उनमें वनस्पति तेल नहीं, खनिज तेल होता है । ऐसे तेल केश के लिए लाभकारी नहीं होते हैं ।डबल रिफाइण्ड, ट्रिपल रिफाइण्ड तेल भी केश के लिए हानिकारक होते हैं । इनके स्थान पर रिफाइन न किया हुआ साधारण शुद्ध (कच्ची घानी, कोल्हू का) नारियल तेल, तिल का तेल अथवा बिनौला (कपास के बीज) का तेल उपयोग करें, इनमें पौष्टिक तत्त्व भरपूर होता है ।

 

१३. आहार के विषय में मार्गदर्शक सूत्र

सदैव पहले का खाया हुआ पदार्थ पचने पर ही, दूसरा हितकर और हलका आहार करें । भोजन का समय होने पर भी यदि भूख न लगे, तब १ सेमी लंबा अदरक का टुकडा नमक लगाकर खाएं, आधे घंटे में भूख लगेगी । इतना करने पर भी भूख न लगे, तब भोजन ४ कौर कम खाएं । उचित समय पर भूख लगना, अच्छे स्वास्थ्य का लक्षण है । जलपान (अल्पाहार) अथवा भोजन के उपरांत तुरंत स्नान न करें; यदि स्नान करना ही हो, तो ३ घंटे उपरांत करें । परंतु, स्नान के उपरांत तुरंत भोजन कर सकते हैं ।

 

१४. भोजन करने के उपरांत वज्रासन में बैठना और बायीं करवट लेटना

जिन्हें संभव हो, वे भोजन करने के पश्‍चात ५-१० मिनिट तक वज्रासन में बैठें । इससे पाचनतंत्र को रक्त की पूर्ति बढती है, जिससे पाचनक्रिया की गति बढ जाती है । इस समय नामजप अथवा स्वसूचनाआें के सत्र कर सकते हैं । दोपहर में भोजन करने के पश्‍चात वयोवृद्ध (६० वर्ष से अधिक वय के) लोग लेटकर विश्राम कर सकते हैं । इसी प्रकार, जो प्रातः शीघ्र उठते हैं, वे भी दोपहर में २० मिनट बायीं करवट लेट सकते हैं । अन्य लोग यथासंभव दोपहर को न सोएं । सोना आवश्यक हो, तो बैठे-बैठे सोएं । दोपहर में सुपाच्य (सरलता से पचनेवाला) भोजन करेंगे, तो नींद नहीं लगेगी ।

 

१५. पानी पीने के विषय में सूत्र

१५ अ. पूरे दिन में कितना पानी पीना चाहिए ?

पानी कितना पीना चाहिए, इस विषय में मतभेद हैं । इन मतभेदों के कारण सामान्य व्यक्ति भ्रमित हो जाता होता है । आयुर्वेद ने पानी पीने के विषय में निम्नांकित सूत्र बताया है ।

ऋते शरन्निदाघाभ्यां पिबेत् स्वस्थोऽपिचाल्पशः ।
अष्टांगहृदय, सूत्रस्थान, अध्याय ५

अर्थ : शरद और ग्रीष्म ऋतु छोडकर अन्य ऋतुआें में निरोग मनुष्य को थोडा ही पानी पीना चाहिए । भूख और प्यास लगना, यह भगवान का मनुष्य को दिया हुआ वरदान है । जब हमें भोजन और पानी की आवश्यकता होती है, तभी भूख-प्यास लगती है । प्यास लगने पर एकदम से गटागट पानी न पीएं, घूंट-घूंट कर पीएं, यह आयुर्वेद कहता है ।

संस्कृत में, ‘क’ का अर्थ है, ‘पानी’ और ‘क’ से जो फलित होता है, वह है ‘कफ’ । इसलिए, अनावश्यक पानी पीने से शरीर में ‘कफ’ दोष बढता है, जिससे पाचनशक्ति मंद होती है । परंतु, कुछ लोगों को वैद्य किसी विशेष कारण से अधिक पानी पीने के लिए कहते हैं । यह पानी भी एक बार में न पीएं, पूरे दिन में थोडा-थोडा कर ही पीएं । जो लोग पाव, ब्रेड जैसे मैदा के पदार्थ खाना नहीं छोड सकते, वे ऐसे पदार्थ खाने के समय बीच-बीच में -गुनगुना पानी पीएं, इससे यह ठीक से पचेगा ।

१५ आ. भोजन करते समय पानी पीना चाहिए अथवा नहीं ?

इस विषय में मार्गदर्शक सूत्र निम्नांकित अनुसार है ।

समस्थूलकृशा भक्तमध्यान्तप्रथमाम्बुपाः ।
अष्टांगहृदय, सूत्रस्थान, अध्याय ५

अर्थ : भोजन करते समय बीच-बीच में थोडा-थोडा पानी पीया करें । इससे भोजन अच्छा पचता है । भोजन के उपरांत (भरपूर) पानी पीने से व्यक्ति मोटा होता है, अर्थात शरीर में अनावश्यक चर्बी बढती है । भोजन से पूर्व पानी पीने पर भूख मंद हो जाती है, भोजन की मात्रा घट जाती है और व्यक्ति दुबला होता है; किंतु यह दुबलापन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है ।

भोजन करते समय थोडा-थोडा पानी पीना ही उचित है । भोजन में यदि तरल पदार्थ भरपूर हो, तब अलग से पानी पीना आवश्यक नहीं है ।

 

१६. संगणक पर सेवा करते समय पालन करने के कुछ नियम

संगणक के आगे लगातार बैठे रहने से शरीर की, विशेषतः अंतडियों की क्रिया मंद हो जाती है । इसलिए, ऐसे लोगों को बद्धकोष्ठता होती है और कालांतर में शरीर में पित्त बढता है । इसी प्रकार, अधिक समय तक संगणक की ओर देखने से भी आंखों पर तनाव आता है । संगणक का यह दुष्परिणाम टालने के लिए लगभग प्रत्येक घंटे पर २ मिनट चलें । चलते-चलते गरदन, कंधे और हाथ को ढीला करें ।

प्रत्येक २० मिनट बाद आंखों को २० सेकेंड का विश्राम दें, आंखें बंद करें और इधर-उधर घुमाएं । पश्‍चात, २० फुट से अधिक अंतर पर रखी वस्तु की ओर २० सेकेंड देखें । इसे, २०-२०-२० का नियम कहते हैं ।

वैद्य मेघराज पराडकर, आयुर्वेदाचार्य, सनातन आशम, रामनाथी, गोवा (१६.१२.२०१३)

 

१७. चाय पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक !

१७ अ. चाय पीने के दुष्परिणाम

चाय का स्वाद कसैला होने के कारण यह बद्धकोष्ठता उत्पन्न करता है । कुछ लोगों को चाय न पीने पर शौच नहीं होता, ऐसा आदत पडने के कारण होता है । शौच को गति देना (हाजत बढाना) चाय का काम नहीं है । चाय पीने से रक्त में अम्लता बढती है । चाय प्रतिदिन पीने से शरीर की हड्डियां दुर्बल होती हैं, रक्तवाहिनियां (नसें) सिकुड जाती हैं, जिससे रक्तदाब और अम्लता बढती है । चाय के साथ अनेक लोग कुछ खाते हैं । उस खाद्य पदार्थ में नमक होने पर, चाय के दूध से नमक का संपर्क होता है, इससे चाय शरीर के लिए घातक हो जाती है । चाय पीने से शरीर की हानि ही अधिक होती है । चाय की लत लग जाने पर, सामान्य व्यक्ति से चाय नहीं छुटती ।

१७ आ. चाय का विकल्प

१७ आ १. धनिया-जीरे का कशाय

यह चाय से अच्छा है; इसलिए यथासंभव कशाय पीएं ।

१७ आ २. बडी सौंफ आदि का कशाय

प.पू. गोंदवलेकर महाराज के संप्रदाय में आगे बताई औषधियों का उपयोग कर कशाय बनाने और पीने की परंपरा है । बडी सौंफ, धनिया, जीरा, अजवायन, महीन सौंफ, गोखरु, बायविडंग, सोंठ और मुलहठी समान मात्रा में लेकर, हलका-सा भूनकर, पीस लें । प्रतिदिन काढा बनाने के लिए कपभर पानी में यह चूर्ण पौन चम्मच डालें । काढा बन जाने पर छानकर गरम-गरम ही पीएं; उसमें चीनी, दूध आदि कुछ न मिलाएं ।

१७ आ २ अ. लाभ

यह काढा पेट के लिए बहुत लाभदायक है । इनमें बडी सौंफ और धनिया पेट को स्वच्छ रखने में सहायक हैं, जीरा शरीर की गरमी कम करना है, अजवायन पेट में वायु (गैस) नहीं बनने देती, बायविडंग से पेट के कृमि (कीडे) नहीं होते हैं, सोंठ से कफ नहीं बनता और मुलहठी से काढा मीठा बनता है तथा गला ठीक रहता है ।

१७ आ ३. तुलसी का काढा

ऋतु के अनुसार अलग-अलग औषधीय वनस्पतियों का काढा पीना शरीर के लिए बहुत लाभदायक होता है । वर्षाऋतु और शीतऋतु के दिनों में तुलसी का काढा आवश्यकतानुसार चीनी मिलाकर पी सकते हैं । इस काढे में दूध न मिलाएं । वर्षा और ठंड के दिनों में तुलसी का काढा पीने से सर्दी, खांसी, ज्वर (ताप) आदि विकार नहीं होते । तुलसी विष नाशक है; इसलिए यह शरीर के विषैल द्रव्य नष्ट करती है तथा पाचनतंत्र में सुधार कर भूख बढाती है ।

१७ आ ३ अ. तुलसी का काढा बनाने की विधि

मंजरी सहित तुलसी के २५-३० पत्ते १ कप पानी में उबालें । जब पानी खौलने लगे, तब गैस बंद कर दें । यह काढा छानकर गरम-गरम ही आवश्यकतानुसार चीनी मिलाकर अथवा बिना मिलाए पीएं । तुलसी का काढा बनाने से ३ घंटा पूर्व पत्तों को पानी में भिगोकर रखने से काढा में तुलसी का रस अधिक आता है । सवेरे-संध्या समय काढा बनाते हों, तब एक बार उपयोग किए हुए पत्तों के साथ नए पत्ते मिलाकर दूसरी बार भी काढा बना सकते हैं ।

आयुर्वेद में बताए अनुसार दिनचर्या करने के लिए अतिरिक्त समय नहीं लगता । यह दिनचर्या प्रतिदिन कर हम अनेक रोगों से बचकर जीवन का अमूल्य बचा सकते हैं और इस बचे समय का उपयोग साधना के लिए कर सकते हैं ।

 

१८. शरीर के प्राकृतिक वेग न रोकें !

अधोवायु (गुदा से निकलनेवाली वायु), शौच, मूत्र, छींक, प्यास, भूख, नींद, खांसी, सांस फूलना, जंभाई, आंसू, उलटी और वीर्यपात ये शरीर के १३ प्राकृतिक वेग हैं । इन वेगों को कभी रोकने का प्रयास न करें । इसी प्रकार, ये वेग जानबूझकर उत्पन्न भी न करें; उदाहरण के लिए, जब शौच लगे तब उसे रोकें नहीं और शौच होने के लिए बल (जोर) भी न लगाएं । प्राकृतिक वेगों के विषय में बताया गया यह नियम पालने से शरीर स्वस्थ रहता है । कुछ लोगों को गाडी लगती है, इसलिए स्वाभाविक ही गाडी में बैठने पर उन्हें उलटी होने लगती है । तब वे उसे रोकने के लिए गोली खाते हैं । ऐसा करना भविष्य में अनेक बडे रोगों को जन्म दे सकता है । इसलिए, शरीर के प्राकृतिक वेग बलपूर्वक न रोकें, उन्हें होने दें । शरीर का कार्य हो जाने पर वे वेग अपनेआप थम जाते हैं ।

१८ अ. मनोवेग रोकना चाहिए !

ऊपर बताए गए शरीर के १३ प्राकृतिक वेग रोकने नहीं चाहिए; परंतु लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, मत्सर और आसक्ति मन के ये वेग प्राकृतिक होने पर भी, इन्हें रोकने का प्रयत्न करें ।

 

१९. अच्छी नींद और नेत्रों की स्वास्थ्यरक्षा के लिए कुछ क्रियाएं

१९ अ. रात्रि में अच्छी नींद के लिए सिर में तेल लगाएं !

रात्रि को सोते समय सिर में अच्छे से तेल लगाने पर नींद अच्छी लगती है । जिस प्रकार सवेरे स्नान के पहले तेल मालिश करते हैं, उसी प्रकार कपूर मिला तेल सिर में लगाएं । सिर का तेल बिछौना में न लगे, इसके लिए सिर पर कपडा बांध लें । पुरानी गांधीटोपी अथवा पुरानी कानटोपी भी पहन सकते हैं ।

१९ आ. तलवों में घी लगाना

प्रतिदिन रात में सोने के पहले पैर के तलवों में आधा चम्मच देसी गाय का घी ५ मिनट तक मलें । इससे, आंखें स्वस्थ रहती हैं और नींद भी अच्छी लगती है । घी मलने के लिए कांसे की कटोरी मिले तो उत्तम; परंतु यह न मिले, तब हाथ से ही रगडें । घी लगाने पर वह बिछौना में न लगे, इसके लिए दोनों पैरों में अलग-अलग कपडे लपेटना चाहिए । पुराने मोजे भी पहन सकते हैं । सवेरे उठने पर पैर साबुन से धो डालें । तलवों में लगाने के लिए देसी गाय का घी न मिले तब, नारियल का तेल लगाएं ।

१९ इ. आंखों में घी डालना

प्रतिदिन रात में सोने से पहले दोनों आंखों में १-१ बूंद डालने पर वे स्वस्थ रहती हैं और चश्मा का अंक (नंबर) नहीं बढता ।

१९ इ १. तैयारी :  कांच की एक छोटी शीशी स्वच्छ धोकर सुखा लें । इसके लिए सनातन इत्र की खाली शीशी ले सकते हैं । शीशी के साथ अलग से ड्रापर रखें । देसी गाय के शुद्ध घरेलू (दही मथकर निकाले गए मक्खन से बने) घी में जो ऊपरी सतह पर पतला हो, वह इस शीशी में भर दें । पतला घी न मिले, तब घर में कैसे भी बना देसी गाय का शुद्ध घी लें । शुद्ध घी न मिले, तब आयुर्वेदिक औषधालयों में मिलनेवाला त्रिफला घृत नाम का घी लें । घी, प्लास्टिक की बोतल में न भरें; क्योंकि ऐसा करने पर घी में प्लास्टिक का कुछ अंश आ जाता है, जो आंखों में डालने पर थोडा कष्ट होता है । शीशी का घी जम गया हो, तब रात्रि में सोने के पहले उसे गरम पानी में रखकर पिघला लें । पश्‍चात शीशी को निकाल कर उसमें लगा पानी कपडे से पोंछ लें ।

१९ इ २. क्रिया : रात में बिछौना बिछाकर सोने की तैयारी हो जाने पर, लेटे-लेटे ही दोनों आंखों में १-१ बूंद घी डालें और घी की शीशी बाजू में रखकर सो जाएं ।

 

२०. रात में दूध पीने के विषय में सूत्र

रात्रि में सोते समय दूध पीने से पाचनशक्ति मंद होती है और कफ बढता है । इसलिए, यथासंभव रात में सोते समय दूध न पीएं, सवेरे उठकर स्नान के बाद दूध पीएं । दूध पीने के बाद अथवा दूध के साथ कुछ न खाएं । क्योंकि, पदार्थों में नमक रहता है । इस नमक का दूध से संयोग शरीर के लिए हानिकारक होता है । दूध पीने के बाद खाना ही हो, तो एक घंटा रुककर खाएं । रात्रि में दूध पीना ही हो, तो १ कप दूध में आधा चम्मच हलदी मिलाकर पीएं ।

दूध गरम ही पीएं और एक बार में १ कप ही पीएं । अधिक पीने पर वह पचेगा ही, ऐसा नहीं है । अनेक लोग शरीर में अम्लता बढ जाने के कारण ठंडा दूध पीते हैं । अम्लता में ठंडा दूध पीने से तात्कालिक लाभ होने पर भी, इससे पाचनशक्ति बिगडती है । पाचनतंत्र बिगडने से बद्धकोष्ठता (कब्ज) उत्पन्न होती है अम्लता और बढती है । इसलिए, ठंडा दूध कभी न पीएं ।

 

२१. नींद

यथासंभव पूर्व अथवा दक्षिण दिशा में सिर कर ही सोएं । पश्‍चिम अथवा उत्तर दिशा में सिर कर सोने से आयु घटती है, यह विष्णु पुराण और वामन पुराणा में लिखा है । सोते समय अधिक वायु का सेवन न करें; क्योंकि ऐसा करने से शरीर में रूखापन बढता है, त्वचा का स्वास्थ्य बिगडता है तथा शरीर के जोड अकड जाते हैं ।

प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आवश्यकतानुसार नींद लेनी चाहिए । सामान्य मनुष्य के लिए ६ से ८ घंटे नींद पर्याप्त होती है । दिन में कितना सोने पर कार्यक्षमता अच्छी रहती है, यह पता लगाकर उसके अनुसार नींद के घंटे निश्‍चित करें और उचित समय पर नामजप करते हुए सोएं ।

आयुर्वेद में बताए अनुसार दिनचर्या करने के लिए अतिरिक्त समय नहीं देना पडता । इस प्रकार दिनचर्या प्रतिदिन कर, हम अनेक रोगों से बच सकते हैं और जीवन का अमूल्य समय बचाकर साधना अच्छे ढंग से कर सकते हैं ।

– वैद्य मेघराज पराडकर, आयुर्वेदाचार्य, सनातन आशम, रामनाथी, गोवा. (१६.१२.२०१३)

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