यदि आप एन्‍टीबायोटिक औषध ले रहे हैं, तो एक बार विचार अवश्‍य करें !

सेंटर फॉर डिजीज डायनामिक्‍स इकोनॉमिक्‍स एंड पॉलिसी के प्रतिवेदन में छपा है कि वर्ष २०५० तक भारत में प्रतिजैविक प्रतिरोध, अर्थात एंटीबायोटिक रेजिस्‍टेंस (Antibiotics resistance) के कारण ३० करोड लोगों की मृत्‍यु हो सकती है ! भारत में प्रतिवर्ष लगभग ६० हजार छोटे बच्‍चे एंटीबायोटिक रेजिस्‍टेंस के कारण मरते हैं ।

 

१. क्‍या है एंटीबायोटिक रेजिस्‍टेंस ?

एंटीबायोटिक अथवा प्रतिजैविक का अर्थ है, बैक्‍टीरिया (जीवाणु) मारनेवाली अथवा उसे कमजोर करनेवाली औषध । हम जानते हैं कि प्रत्‍येक प्राणी अपनी रक्षा का प्रयास करता है । इसी प्रयास के एक भाग के रूप में जीवाणु भी अपने शरीर में परिवर्तन लाकर एंटीबायोटिक औषध से लडकर अपनी रक्षा का प्रयास करते हैं । इसीलिए, कुछ काल पश्‍चात इन एंटीबायोटिक से कोई लाभ नहीं होता ।

 

२. एंटीबायोटिक रेजिस्‍टेंस कैसे बनता है ?

अ. आजकल अनेक चिकित्‍सक प्रायः वायरस से होनेवाले सर्दी-खांसी जैसे सामान्‍य रोगों में भी खुलकर एंटीबायोटिक लेने के लिए कहते हैं, जो ठीक नहीं है, ऐसा आधुनिक चिकित्‍साशास्‍त्र के विशेषज्ञ कहते हैं । जीवाणुओं (वायरस) से उत्‍पन्‍न रोगों के उपचार में एंटीबायोटिक का उपयोग करना, अर्थात मच्‍छर मारने के लिए मिसाइल का उपयोग करने समान है ! झटपट आराम दिलाने के चक्‍कर में इस हानि की ओर कोई ध्‍यान नहीं देता । इस विषय में US FDA ने अपने जालस्‍थान पर विस्‍तृत जानकारी प्रकाशित की है ।

आ. एंटीबायोटिक का उपयोग डॉक्‍टर से न पूछकर, मन से करना ।

इ. एंटीबायोटिक की सूई लगे हुए पशु के मांस और दूध का सेवन करना ।

 

३. इस समस्‍या का समाधान क्‍या है ?

अ. यथासंभव शाकाहार करें । उसमें भी जैविक (ऑरगेनिक) फल-सब्‍जियों का सेवन अधिक करें । जर्सी गाय के थैलीवाले दूध के स्‍थान पर देशी गाय का दूध पीएं । देशी गायों को प्रायः एंटीबायोटिक नहीं दिया जाता । इसलिए, उनके दूध में उसका अंश आने का प्रश्‍न ही नहीं उठता ।

आ. अपना उपचार स्‍वयं न करें । चिकित्‍सा पद्धति कोई भी हो, अपने मन से उपचार करना घातक है ।

इ. रोग होने पर सबसे पहले पूर्णतः आयुर्वेदिक उपचार करनेवाले वैद्य के पास जाएं । आयुर्वेद के साथ होमियोपैथी उपचार भी किया जा सकता है । विशेषतः आजकल छोटे बच्‍चों को सर्दी, खांसी, ज्‍वर (ताप), अतिसार (जुलाब) आदि रोग होने पर एंटीबायोटिक देने की प्रथा-सी बन गई है । इससे, स्‍वास्‍थ्‍य की दीर्घकालिक हानि हो रही है । अतः, यथासंभव एंटीबायोटिक से बचना चाहिए ।

 

४. समय रहते आयुर्वेदीय औषधियों का सेवन आरंभ करें !

एंटीबायोटिक, हमारे औषधीय भाते में अंतिम शस्‍त्र के रूप में होना चाहिए । क्‍या हम मच्‍छर मारने के लिए परमाणु बम का उपयोग करने के विषय में सोच सकते हैं ? एंटीबायोटिक के विषय में भी यही बात है । यदि आप आयुर्वेद से सहायता लेगें, तो आपको छोटे-छोटे रोगों के लिए एंटीबायोटिक का सहारा नहीं लेना पडेगा । तात्‍पर्य यह कि एंटीबायोटिक रेजिस्‍टेंस इस यक्षप्रश्‍न का उत्तर नहीं है, फिर भी रोगनिवारण संभव है ।

– वैद्य परीक्षित शेवडे, (एमडी, आयुर्वेद), डोंबिवली (ये आयुर्वेदतज्ञ, लेखक तथा व्‍याख्‍याता हैं ।)

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