शरीर निरोगी रहने के लिए अयोग्य समय पर खाना टालें !

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१. रात्रि के समय चिप्स, चिवडा-नमकीन इत्यादि खाते हों, तो सावधान !

‘सोने-उठने का समय निश्चित नहीं, व्यायाम नहीं, नित्य ही रात को चिप्स, सेव, चिवडा-नमकीन इत्यादि खाना शुरू होने पर भी यदि आप निरोगी हैं, तो यह आपके पूर्वजन्म के पुण्यों के कारण है; परंतु ध्यान रहे कि पुण्य समाप्त होते ही अब जो गलत आदतें हैं उनका परिणाम रोगों के रूप में दिखाई देने लगेगा । तब यह कहने का समय आएगा कि ‘उस समय अच्छी आदतें डाली होतीं, तो बहुत अच्छा होता !’ हम साधक हैं । शरीर निरोगी रहने से साधना अच्छी होती है । इसलिए हमें साधना के लिए निरोगी शरीर चाहिए । शरीर निरोगी रहने के लिए केवल दो ही बातें करें ! २ समय पर्याप्त आहार लें और नियमित व्यायाम करें !’

 

२. कोई भी रुचिकर पदार्थ अयोग्य समय पर न खाते हुए भोजन के समय ही खाएं !

‘क्या आयुर्वेद में चटपटा एवं स्वादिष्ट खाना मना है ? इसका उत्तर है नहीं ! इसके विपरीत रुचि लेकर खाने से संतोष होता है । इसलिए खाद्यपदार्थाें के स्वाद में विविधता होनी ही चाहिए; परंतु कोई पदार्थ कितना भी रुचिकर क्यों न हो, तब भी योग्य समय एवं योग्य मात्रा में उसका सेवन करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । ऐसा न करने पर, आज नहीं तो कल उसका कष्ट होने ही वाला है । ‘कोई भी रुचिकर पदार्थ यदि पच जाता हो, तो खाने में कोई रोक-टोक नहीं; परंतु उसे भोजन के समय ही खाएं । अयोग्य समय पर न खाएं ।’ यह नियम पालने से शरीर निरोगी रखने में सहायता होगी एवं साधना भी अच्छी होगी ।’

 

३. केवल २ बार ही आहार लेने की आरोग्यदायी आदत डालने के लिए यह करें !

प्रश्न : मुझे शरीर निरोगी रखने के लिए दिनभर में केवल २ बार ही आहार लेना है; परंतु सवेरे अथवा शाम को अल्पाहार न करने पर थरथराहट होती है । कई बार पेट में आग होने लगती है । ऐसा होते हुए मेरा केवल २ बार आहार लेना, मेरे आरोग्य की दृष्टि से योग्य है क्या ?

उत्तर

अ. निरोगी जीवन के लिए केवल २ बार ही आहार लेने की अच्छी आदत डालनी चाहिए !

हम शरीर को जैसी आदत डालेंगे, वैसा शरीर आचरण करता है । हम अच्छी आदत डालेंगे, तो स्वास्थ्य अच्छा रहता है । हम गलत आदतें डालेंगे, तो रोगग्रस्त हो जाएंगें । अब तक हमें ४ – ४ बार खाने की गलत आदत थी । अब हमने एकाएक २ बार आहार लेना तय किया है; परंतु पहले की आदत के कारण भोजन का समय होते ही, शरीर में पित्त का रिसाव होगा ही । कुछ लोगों की शारीरिक क्षमता अच्छी होती है । उन्हें इस पित्त के रिसाव का कोई कष्ट नहीं होता और वह सहजता से ४ बार खाने की गलत आदत को छोडकर, केवल २ बार आहार लेने की अच्छी आदत डाल सकते हैं । इसमें मन की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होती है । मन का दृढ निश्चय होगा, तो गलत आदतें छोडकर अच्छी आदतें डालना सरल हो जाता है ।

आ. थरथराहट होना अथवा पेट में आग होने के कारण

आधुनिक शास्त्रानुसार भोजन के समय जठर में आम्ल (हायड्रोक्लोरिक एसिड) और अंतडियों के पहले भाग में (‘ड्युओडीनम’में) पित्त (बाईल) एवं स्वादुपिंड का स्राव (पैन्क्रिटिक ज्यूस) का रिसाव होता है । जब हम खाते हैं, तब ग्रहण किया हुआ अन्न इन स्रावों में मिल जाता है और उन स्रावों की तीक्ष्णता (तीव्रता) न्यून होती है । यदि न खाएं, तो स्रावों की तीक्ष्णता न्यून नहीं होती । कुछ को यह तीक्ष्णता (तीव्रता) सहन नहीं होती । इसलिए थरथराहट अथवा पेट में आग होने समान लगता है ।

इ. देसी घी की सहायता से ४ – ४ बार खाने की गलत आदत सहजता से छोडना संभव !

अच्छे स्वास्थ्य की कामना हो, तो ४ – ४ बार खाने की गलत आदत छोडकर २ बार आहार लेने की अच्छी आदत डालना आवश्यक है । इसके लिए बढे हुए पित्त पर नियंत्रण पाना आवश्यक है । ‘पित्तस्य सर्पिषः पानम् ।’ अर्थात ‘पित्त पर ‘देसी घी का सेवन’ सर्वश्रेष्ठ औषधि है’, ऐसा आयुर्वेद में (अष्टांगहृदय, सूत्रस्थान, अध्याय १३, श्लोक ४ में) कहा है । देसी घी का उपयोग कर, आहार ४ बार से २ बार तक लाना अत्यंत सरल है ।

ई. यह करें !

१. आरंभ में अपने मन को यह समझाएं कि ‘२ बार आहार लेने की आदत डालने से अच्छा स्वास्थ्य मिलनेवाला है और देसी घी का उपयोग करने से बढे हुए पित्त का शमन होकर आरोग्य पर भी कोई दुष्परिणाम नहीं होगा ।’ ऐसा करने से आपका मन इस मुहिम में आनंद से सहभागी होगा ।

२. अब दिन में २ बार ही आहार लेना आरंभ करें ।

३. आहार पर कोई भी बंधन न डालें । जो भी पच सके, वह खाएं । जो भी रुचिकर पदार्थ पच जाता हो, उसे खा सकते हैं । केवल इस बात का ध्यान रहे कि उसे भोजन के समय ही लें ।

४. भोजन के २ समय छोडकर कभी भी अयोग्य समय पर भूख लगे, तो चम्मचभर घी चुभलाकर खाएं । चुभलाने से शरीर की उष्णता से घी तरल हो जाता है । केवल देसी घी खाना कठिन लगता है, तो उसमें थोडी शक्कर अथवा गुड मिलाकर खा सकते हैं । (घी की मात्रा नापने के लिए चाय के चम्मच का उपयोग करें । तरल (पतला) हुआ घी १ चम्मच लेना अपेक्षित है । इसलिए यदि घी जमा हुआ हो, तो उस अनुमान से लें ।)

५. देसी घी खाने पर लगभग १५ मिनटों में भूख का शमन होगा । यदि शमन न हो, तो पुन: १ चम्मच घी लें । इसप्रकार भूख का शमन होने के लिए कितना घी लेना होगा, इसका अनुमान लेकर अगली बार सीधे उतनी ही मात्रा में घी ले सकते हैं । सामान्यतः अधिक से अधिक ४ चम्मच देसी घी से भूख मिट जाती है । शरीर की बनावट अनुसार यह मात्रा कम-अधिक हो सकती है ।

६. गलती से यदि घी की मात्रा अधिक हो जाए और शंका हो कि कहीं अपचन न हो जाए, तो आधा कटोरी गरम पानी लें ।

७. औषधि लेने के लिए खाना पडे, तो अपने वैद्यकीय चिकित्सक से आप अपने आहार के निर्धारित समय बताकर पूछ लें कि औषधि कब लें ।

८. देसी घी के पचन के लिए प्रतिदिन सवेरे खाली पेट व्यायाम करें ।

उ. देसी घी के लाभ

अयोग्य समय पर भूख लगने पर देसी घी के सेवन से भूख मिट जाती है । थरथराहट नहीं होती । पेट में आग-सी हो रही हो, तो वह भी तुरंत न्यून हो जाती है । बढे हुए पित्त का योग्य ढंग से शमन होता है । (‘शमन होना’ अर्थात ‘शांत होना’) देसी घी उत्तम शक्तिवर्धक है । इसलिए थकान भी दूर होती है । कुछ दिनों में शरीर को २ ही बार आहार लेने की आदत पड जाती है । फिर अयोग्य समय पर भूख लगनी बंद हो जाती है । उस समय घी के सेवन की आवश्यकता नहीं रहती । तदुपरांत भोजन में ही २ – २ चम्मच घी लें । ऐसा नियमित शुरू रखने पर भोजन के समय शरीर की आवश्यकतानुसार ही भूख लगती है और उस अनुसार ही आहार लिया जाता है । इसलिए कृश व्यक्ति को संदेह न रहे कि २ बार आहार लेने से उसका वजन कम हो जाएगा । स्थूल व्यक्ति का आहार पर नियंत्रण रखने से उसका वजन न्यून होने में सहायता होती है ।

ऊ. सारांश

इसका सारांश व्यावहारिक भाषा में ऐसे समझ सकते हैं । ‘पित्त’ एक कर्मचारी है । उसे अपने स्थान अर्थात पेट में यदि काम न मिले, तो वह दूसरे स्थान पर जाकर अर्थात रक्त इत्यादि के स्थान पर उत्पात करेगा । यह उत्पात अर्थात थरथराहट अथवा पेट में आग होना । उस पित्तरूपी कर्मचारी को तूप पचाने का काम देने पर वह काम में उलझा रहता है और अन्यत्र कष्ट नहीं देता ।

ए. अपनी क्षमता अनुसार लेख के सूत्रों का आचरण करें !

मन का निश्चय होगा और ४ दिन भूख सहने की तैयारी हो, तो इस लेख में दिए अनुसार आहार के समय ४ से २ पर लाना सहज संभव है; परंतु अनेक लोगों की वैसी तैयारी नहीं होती । ऐसों के मन में आरंभ करने से पूर्व ही अनेक शंका-कुशंकाएं आती रहती हैं । ऐसे लोग इस लेख में दी गई बातें हडबडी में आरंभ न करें । अन्य भी उन्हें आग्रह न करें । जिन्हें संदेह है, वे साधक नित्य की भांति ही आचरण करें और साधना के लिए निरोगी रहने का महत्त्व स्वयंसूचना देकर मन पर उसे अंकित करें, साथ ही https://www.sanatan.org/hindi/tips-for-health पर दी गई चौखटें पढकर मन का निश्चय करें । जो दृढनिश्चयी साधक निःशंक मन से इन कृतियों को आचरण में लाएंगे, उन्हें निश्चित ही उसका अच्छा फल मिलेगा । उनका अच्छा अनुभव सुनकर साशंक साधकों का आत्मविश्वास बढेगा । मन का निश्चय भी होगा । वह होने पर सभी यह सहजता से कर पाएंगे ।’

एक बार जो खाता है यह योगी । दोन बार जो खाता है वह भोगी । तीन और उससे अधिक बार जो खाता है वह है रोगी ।

 

– वैद्य मेघराज माधव पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.

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