दूधजन्य पदार्थ किसने और कब खाने चाहिए ?

इंटरनेट (अंतरजाल) आजकल उपलब्ध जानकारी का महाभंडार है । उसपर मनचाहे पदार्थ कैसे बनाना चाहिए ?, यह एक क्लिकपर देखने मिलता है । इसके साथ ही यदि आपके पास उपलब्ध कच्चे माल का पक्का माल बनाना हो, तो उसके लिए न्यूनतम १० मार्ग सुझाए जाते हैं । इसी समूह के दही, पनीर, क्रीम, मलाई, दूध का चूर्ण जैसे विविध पदार्थों का मुक्त उपयोग कर बनाए हुए पदार्थ भी आजकल बहुत लोकप्रिय हैं और उसके कारण घर-घर के रेफ्रिजरेटर खचाखच भरे पडे होते हैं ।

जानकारी की अतिमार से तथाकथित स्वास्थ्य से संबंधित जागरूक महिलाएं अब अलग ही भाषा बोल रही हूं । प्रथिनयुक्त आहार के रूप में पनीर खाना चाहिए, कोलेस्ट्रॉल बढता है इसलिए घी नहीं खाना चाहिए आदि सिद्धांत इन महिलाओं के मुख से सुनते हुए बहुत रोचक लगते हैं । ऐसे में यह प्रश्‍न उठता है कि यही महिलाएं आईस्क्रीम, केक, मिठाई आदि बनाते समय जब मिल्कमेड और क्रीम का उपयोग करती हैं, तब इन सिद्धांतों को क्यों भूल जाती हैं ? मूलतः दूध अच्छा है; इसलिए दूधजन्य पदार्थ भी खाने में अच्छे होते हैं, ऐसा कुछ नहीं है । दूध और उससे बननेवाले सभी पदार्थों के गुणधर्म एक जैसे नहीं होते । पनीर, क्रीम, मलाई, चक्का, दूध का पाऊडर, औटाया हुआ गाढा दूध इन सभी के गुणधर्म अलग-अलग होते हैं । अतः प्रत्येक पदार्थ का अलग विचार और उसके अनुसार उनका चयन करना आवश्यक हो जाता है ।

 

१. पनीर

आजकल के बच्चों का यह अत्यंत प्रिय पदार्थ है । उनकी विविध व्यंजन बनाए जा सकते हैं; इसलिए यह पदार्थ महिलाओं के लिए भी प्रिय है । साथ ही आहार विशेषज्ञ इस पदार्थ की प्रथिनों से भरपूर पदार्थ के रूप में प्रशंसा करते हैं और उसे खाने का सुझाव भी देते हैं । प्रत्येक मनुष्य के आहार में प्रथिन होने चाहिए, यह उचित ही है; परंतु भरपूर प्रथिनों की आवश्यकता केवल शारीरिक परिश्रम उठानेवाले व्यक्ति और व्यायाम करनेवाले खिलाडियों को होती है, अन्य लोगों को पारंपरिक भारतीय आहार से पर्याप्त प्रथिन मिलते हैं । कोई भी प्रथिनयुक्त आहार पाचन के लिए भारी होता है और शारीरिक परिश्रम उठानेवाले लोग ही उनका पाचन कर सकते हैं । जिनके दिनभर के शारीरिक परिश्रम अल्प होते हैं, उनके लिए उनका पाचन कठिन होता है । आज के शहरी छात्र अत्यल्प शारीरिक परिश्रम उठाते हैं । महाविद्यालय, निजी वर्ग और घर में अध्ययन के कारण वे दिन के १२ से १४ घंटों तक एक ही स्थान पर बैठे होते हैं, जिससे उनकी भूख और पाचनक्षमता धीमी होती है और उसके कारण ही वे भोजन के समय किटकिट करते हैं और केवल विशिष्ट चटपटे और प्रिय पदार्थ ही खाते हैं । आज की माताएं भूल गई हैं कि यदि जोर से भूख लगी हो, तो भूसा भी स्वादिष्ट लगता है ।

दुर्भाग्यवश ऐसे ही बच्चों पर इन प्रथिनों की मार की जाती है (साथ ही प्रथिनयुक्त पदार्थों में पनीर कोई श्रेष्ठ पदार्थ अथवा ‘फूड ऑफ चॉईस’ नहीं है ।) दूध को फाडकर पनीर बनाया जाता है । अतः वह विरुद्ध आहार में अंतर्भूत है । भारत के पूर्व के बंगाल आदि प्रदेशों में बडी मात्रा में पनीर खाया जाता है । वहां त्वचाविकार और कर्करोग की मात्रा बहुत अधिक है । अत: सभी दृष्टि से देखने पर ध्यान में आता है कि पनीर ऐसा आहार नहीं है, जिसे बार-बार आहार में अंतर्भूत किया जा सके । स्वाद के लिए बदलाव के रूप में मास में एक बार उसके खानेपर कोई आपत्ति नहीं है । जिन्हें नींद नहीं आती अथवा जिन्हें बार-बार भूख लगती है, ऐसे लोगों को वैद्य की सलाह से ही पनीर खाना चाहिए ।

 

२. मावा

दूध पर अग्निसंस्कार कर और उसे औटाकर मावा बनाया जाता है । मावा स्वादिष्ट, पाचन के लिए भारी, स्निग्ध, मांस और मेद की वृद्धि करनेवाला, शुक्रवर्धक, निद्राकर और वजन बढानेवाला होता है । त्योहारों के समय मिलावटरहित मावा खाने में कोई आपत्ति नहीं है; परंतु आजकल बाजार में मिलनेवाला मावा विश्‍वसनीय नहीं है । मूलरूप से दूध ही मिलावटयुक्त होता है, तो मावे की क्या बात है ? उसमें भी जब मांग अधिक होती है अर्थात त्योहार, उत्सव इत्यादि के समय बाजार में मिलनेवाला मावा खरीदना संदेहजनक है । केवल मावा ही नहीं, अपितु कोई भी दूधजन्य पदार्थ अधिक समयतक नहीं टिक पाता है । अतः उसे टिकाए रखने के लिए उसमें कौनसे रसायन मिलाए जाते हैं, यह बताया नहीं जा सकता; इसलिए मावा चाहिए हो, तो उसे घर में ही दूध औटाकर बनाने से वह स्वास्थ्यजनक होगा ।

 

३. दूध का पाऊडर

पतले दूध को बहुत बडे दबाव में एक छोटे छेद से हवा में फुहारा जाता है । उससे वह सूखकर उसका पाऊडर बनता है । इस पाऊडर में बडी मात्रा में नाईट्रेटस् बनते हैं और दूध में विद्यमान कोलेस्ट्रौल जलकर उसके ऑक्साईडस् बनते हैं । ये दोनों ही पदार्थ शरीर के लिए घातक हैं । इसमें विद्यमान कोलैस्ट्रौल के ऑक्साईडस् नसों में जमकर उससे एथैरोस्क्लेरोसिस (Artherosclerosis) होने की संभावना होती है, जो हृदयरोग की नींव होती है । अतः उपयोग के लिए सरल और टिकाऊ होने के लाभ भले ही हों; परंतु इसका उपयोग अनिवार्य स्थिति के समय ही करना चाहिए ।

 

४. क्रीम अथवा मलाई

सब्जियों को गाढापन और मीठा स्वाद आए; इसके लिए आज के स्वघोषित विशेषज्ञ उसमें क्रीम अथवा मलाई मिलाने का सुझाव देते हैं । यदि क्रीम बाजार से खरीदा गया हो, तो उसपर टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है । मलाई यदि घर की हो, तो जिसमें नमक डाला जाता है, ऐसे पदार्थों में उसे मिलाने से वह विरुद्ध आहार बन जाता है । ऐसे पदार्थ नियमितरूप से खाने योग्य नहीं होते । कभी-कभी खाना हो, तब भी ऋतु , उत्तम पाचनशक्ति इत्यादि का विचार कर ही खाएं । यदि ऐसे पदार्थ (विरुद्ध आहार) नहीं खाए, तो कुपोषण से मृत्यु नहीं होगी । अतः इसे न खाने से कोई हानि नहीं होती ।

 

५. गाढा दूध

बाजार में मिलनेवाला गाढा दूध, शहरों में नौकरी करनेवाली महिलाओं को सुविधाजनक लगता है । विविध पदार्थ बनाते समय इस दूध के उपयोग से समय और परिश्रम ये दोनों बच जाते हैं । बडे प्रतिष्ठान लोकप्रिय होने से हम भोलेपन से विश्‍वास करते हैं; परंतु उक्त सभी पदार्थों से जो खतरे लगते हैं, वहीं खतरे गाढे दूध के संदर्भ में भी होते हैं । साथ ही एक सूत्र यह है कि हमारे यहां वस्तु लेते समय उसकी कालबाह्य तिथि (expiry date) देखकर लेने की आदत बडे शिक्षितों को भी नहीं है । दूध और दूधजन्य पदार्थ लेते समय यह दिनांक अवश्य देखनी चाहिए ।

 

६. आईस्क्रीम

छोटे बच्चों से लेकर बडों तक सभी को रुचिकर लगती है आईस्क्रीम ! ऐसे व्यक्ति ढूंढकर भी नहीं मिलेंगे जिन्हें आईस्क्रीम अच्छी न लगती हो और यदि मिले भी तो उसकी ओर ऐसे देखा जाएगा मानो वह किसी परग्रह से आया हो ! भारत में लोकसंख्या की तुलना में दुधारु पशुओं की संख्या बहुत कम है । फिर इतने लोगों को दूध और दूध के पदार्थ की आपूर्ति कैसे हो सकती है, इसकी शंका आनी चाहिए । आईस्क्रीम बनाते समय उपयोग में किया जानेवाला वनस्पति घी, शक्कर, रंग का उपयोग होता है । आईस्क्रीम, जीवनावश्यक पदार्थ न होकर जीभ के स्वाद और बाद में शरीर को कष्ट देनेवाला पदार्थ है । उसे अपने आहार में कितना महत्त्व देना है, यह प्रत्येक को निश्‍चित करना होगा । परंतु यह बात तो निश्‍चित है कि पानी की अशुद्धि दूर करने के लिए जैसे फिटकरी का एक टुकडा पानी में घुमाने से काम हो जाता है, उसीप्रकार शरीर में गई आईस्क्रीम का जो शरीर पर दुष्परिणाम होता है, उसे टालनेवाली ‘फिटकरी’ की खोज अब तक तो किसी ने नहीं की है । इसलिए यदि आईस्क्रीम खानी हो, तो अपने दायित्व पर खाएं । बचपन में हम घर पर ही औटाए हुए दूध में आमरस अथवा गुलकंद डालकर आईस्क्रीम बनाते थे । यह आईस्क्रीम ठंडी, बलदायक, तृप्त करनेवाली, ठंडी और पित्तशामक होती थी । गर्मियों में इसे बनाकर खाने में कोई हानि नहीं है । परंतु भोजन के उपरांत ‘डेजर्ट’ के रूवरूप में न लेकर भोजन अथवा भोजन के स्थान पर पर्याय के रूप में लें । इसका कारण यह है कि यह पचने में अत्यंत भारी होती है  । मोटे और मधुमेही व्यक्तियों को तो इसका विचार तक छोड देना चाहिए । शास्त्र में बताए अनुसार यदि दूध से बने पदार्थों के लाभ चाहिए, तो मूलत: दूध भारतीय गोवंश का होना चाहिए । यह सर्व पदार्थ घर पर बनाए हों, तो अधिक उत्तम । सामान्यत: गाय के दूध से बनाए पदार्थ पचने में भारी होते हैं; इसलिए भूख न हो अथवा कोई बीमारी हो, तो इसे न खाएं । यह पदार्थ मीठा, ठंडा, वात और पित्त कम करनेवाला, कफ बढानेवाला, वजन बढानेवाला, शुक्रधातू बढानेवाला अर्थात बल वर्ण-स्वर-ओज-आयुष्य के लिए हितकारी है । उनका आहार में सोच-समझकर समावेश करने पर, वह अवश्य ही फलदायी होगा । जो इन नियमों का पालन कर सकते हैं, वे प्रतिदिन दिन भर भरपूर शारीरिक काम करें और फिर नि:संकोच दूध के पदार्थ पेटभर खाएं । बच्चों को खाने के लिए देना हो, तो उन्हें २ से ३ घंटे मैदानी खेल खेलने के लिए भेजेें; फिर भारतीय गाय के दूध से घर पर बनाए पदार्थ ही दें ।

– वैद्य सुचित्रा कुलकर्णी (संदर्भ : दैनिक तरुण भारत)