कुछ ईश्‍वर को मानते हैं और कुछ नहीं, ऐसा क्यों ?

जिसे आप विज्ञान समझते हैं, वह केवल भौतिक विज्ञान है । भारतीय ज्ञान का एक छोटा-सा भाग है विज्ञान ! भौतिक विज्ञान अर्थात सायंस जिस भारतीय विज्ञान का एक हिस्सा है । वह विज्ञान भी अध्यात्म (ज्ञान) का एक हिस्सा है । बहुत कम विज्ञानवादियों को यह ध्यान में आता है । वे अपनी बुद्धि को सर्वश्रेष्ठ मानकर, अपने अहंकार को और अधिक पुष्ट करते रहते हैं व अपनी बुद्धि के सामने अन्य तथ्यों को नकारते रहते हैं ।

वे यह भूल जाते हैं कि तीक्ष्ण बुद्धि, स्थिरता एवं दृढता, यह ईश्‍वर प्रदत्त उपहार हैं । परंतु, उसी ईश्‍वर को न मानने का कारण है हमारी वर्तमान शिक्षाप्रणाली ! वर्तमान शिक्षाप्रणाली को इसप्रकार बनाया गया है कि हम सांसारिक सफलता प्राप्त कर सकें; किंतु यह हमारे जीवन का उद्देश्य नहीं है । जीवन का मूल उद्देश्य प्रारब्धानुरूप लेन-देन को पूर्ण करना और आध्यात्मिक उन्नति कर ईश्‍वर से एकरूप होना; परंतु आधुनिक शिक्षाप्रणाली इस तथ्य को पूर्णतः भुला चुका है । इसकारण बहुत कम वैज्ञानिक विज्ञान की मर्यादा और अध्यात्म की संपूर्णता समझ पाते हैं ।

वैज्ञानिक बुद्धिमान ही होते हैं जो स्थूल सांसारिक घटनाओं के पीछे छिपे वैज्ञानिक कारण का पता लगाते हैं, किंतु घटनाओं के वास्तविक अथवा मूल कारण को केवल अध्यात्मशास्त्र ही समझा सकता है । जब तक मूल कारण पता नहीं चलता, वैज्ञानिक कितना ही बुद्धिमान अथवा प्रसिद्ध हो; आध्यात्मिक दृष्टि से उसे कनिष्ठस्तर का ही माना जाता है । यह जिन्हें ध्यान में आ गया, वह ईश्‍वर की शरण में आ जाते हैं ।

यदि मानव इस बात को समझ ले और धर्म के साथ चले, तो विवाद हो ही नहीं सकता । महान वैज्ञानिक आइन्स्टाइन ने कहा था, ‘‘धर्म के बिना विज्ञान अंधा है, और विज्ञान के बिना धर्म अपाहिज है ।’’ प्रत्येक उपग्रह को भगवान तिरुपति के श्रीचरणों में रखनेवाले इस्रो के वैज्ञानिक हों या फिर अब्दुल कलाम, इन्होंने विज्ञान की मर्यांदाएं भली-भांति समझ ली थीं, इसलिए वेे ईश्‍वर की शरण जा पाए ।

 

सभी को ८४ लाख योनियों से जाना पडता है क्या ?

सभी को ८४ लाख योनियों से गुजरना आवश्यक नहीं । यदि किसी के कर्म अच्छे हैं, तो वह सीधे मनुष्य जन्म को भी प्राप्त कर सकता है । कुछ लोग अपने जीवनकाल में ही साधना तथा कर्म के आधार पर जीवन्मुक्त हो जाते हैं । ८४ लक्ष योनियों के विषय में पद्मपुराण के एक श्‍लोक में जानकारी मिलती है । इस श्‍लोक में धरती पर जलचर, नभचर, स्थलचर एककोशिकीय (यूनीसेल्यूलर), बहुकोशिकीय (मल्टीसेल्यूलर) और अन्य करोडों जीव-जंतु की संख्या बताई गई है । हमारे वैज्ञानिक अब तक १३ लाख जीवों की खोज कर चुके हैं; परंतु अब भी उनका शोधकार्य जारी है । प्रत्येक वर्ष उनके शोधकार्य से नए-नए जीव सामने आ रहे हैं । हमारे पुराणों ने कई युगों पहले ही जो बात बता दी थी, वहां तक धीरे-धीरे वैज्ञानिक और खोजकर्ता अब पहुंच रहे हैं । ऐसे महान सनातन हिन्दू धर्म में हमारा जन्म हुआ है, इसके प्रति हमारे मन में कृतज्ञता भाव बढाना चाहिए ।

 

इस मनुष्य जन्म में, हमारे हाथों जो क्रियमाण कर्म होता है,
वह हमसे योग्य हो, ईश्‍वर को अपेक्षित ऐसा हो, इसके लिए क्या करना चाहिए ?

वास्तव में हमारे जन्म का उद्देश्य ही यही है कि हमें गत जन्मों के अच्छे-बुरे कर्म अर्थात प्रारब्ध भुगतकर समाप्त करना है और नए कर्म निर्माण न हों जिससे हम पुन: जन्म-मृत्यु के बंधन में अटक जाएं, ऐसे प्रयास करना है । फिर ईश्‍वर को किसप्रकार के कर्म हमसे अपेक्षित हैं ? हमारे कर्म का फल क्या होगा, इसकी तुलना में अकर्म कर्म की स्थिति में जाना सर्वश्रेष्ठ है । महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से अर्जुन ने युद्ध किया, तो उसका कर्म फल उसे नहीं लगा । जैसे हम चलते हैं, तो पैर के नीचे कीडे-मकोडे मर जाते हैं । यहां हम उद्देश्यपूर्वक किसी की हत्या नहीं करते, तो उसका पाप हमें नहीं लगता । उसीप्रकार कर्म को अकर्म करना है, तो हमें सतत भगवान का स्मरण करना होगा । भगवान का स्मरण सतत हो, इस हेतु हमें नियमित साधना करनी होगी; परंतु मन इतना चंचल है कि सतत उसे सन्मार्ग पर रखने के लिए साधना में उपासना के साथ स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन हेतु विशेष प्रयास आवश्यक हैं । इससे हमारे कर्म गलत नहीं होंगे ।

इसप्रकार की साधनासंबंधी जानकारी ‘गुरुकृपायोग के अनुसार साधना’, के अंतर्गत आप पढ सकते हैं ।

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