शनि की साढेसाती दूर करने के लिए हनुमानकी पूजा कैसे करनी चाहिए ?

भगवान शनि की साढेसाती एवं हनुमान की पूजा में क्या समानता है ?

अ. पहले पौराणिक कथा के अनुसार समझकर लेते है

एक बार पवनसुत हनुमानजी अपने आराध्य देव भगवान श्रीराम का स्मरण कर रहे थे, तब न्याय के देवता शनिदेव हनुमानजी के पास आए और बोले कि मैं आपको सावधान करने यहां आया हूं कि भगवान श्रीकृष्ण ने जिस क्षण अपनी लीला का अंत किया था, उसी समय से इस पृथ्वी पर कलयुग का प्रभुत्व कायम हो गया था । इस कलयुग में कोई भी देवता पृथ्वीं पर नहीं रहते हैं. क्योंकि इस पृथ्वीं पर जो भी व्यक्ति रहता है, उस पर मेरी साढेसाती की दशा अवश्य ही प्रभावी रहती है । अब मेरी यह साढेसाती की दशा आप पर भी प्रभावी हो जाएगी ।

शनिदेव की इस बात सुनकर हनुमानजी ने उनसे श्रीराम की महानता बताते हुए कहा कि जो भी प्राणी या देवता भगवान श्रीराम के चरणों में अपनी शरण ले लेते हैं उन पर काल का भी प्रभाव नहीं होता है । यमराज भी रामभक्त के सामने विवश हो जाते हैं । इसलिए आप मुझे छोडकर कहीं और चले जाएं क्योंकि मेरे शरीर पर केवल श्रीराम ही प्रभाव डाल सकते हैं ।

यह सुनकर शनिदेव ने कहा कि मैं सृष्टिकर्ता के विधान से विवश हूं । इसलिए आप पर मेरी साढेसाती आज इसी समय से प्रभावी हो रही है । मैं आज और इसी समय से आपके शरीर पर आ रहा हूं और इसे कोई भी नहीं टाल सकता है । शनिदेव की बात सुनकर हनुमानजी बोले कि मैं आपको नहीं रोकूंगा, आप अवश्य आएं । तब शनिदेव हनुमानजी के मस्तक पर जाकर बैठ गए । इससे हनुमानजी के मस्तक में खुजली होने लगी और हनुमानजी ने अपनी उस खुजली को मिटाने के लिए बडा-सा पर्वत उठाकर अपने सिर पर रख लिया । शनिदेव उस पर्वत से दबकर घबरा गए और हनुमानजी से बोले, ‘‘आप यह क्या कर रहे हैं । हनुमानजी ने उत्तर दिया, ‘‘आप सृष्टिकर्ता के विधान से विवश हैं और मैं अपने स्वभाव से । मैं अपने मस्तक की खुजली इसीप्रकार मिटाता हूं । आप अपना काम करते रहें और मैं अपना ! ऐसा कहते हुए हनुमानजी ने एक और बडा-सा पर्वत अपने मस्तक पर रख लिया । पर्वतों से दबे हुए शनिदेव अब पूरी तरह से चिंतित हो गए । उन्होंने हनुमानजी से निवेदन किया कि आप इन पर्वतों को नीचे उतारें । अंजनीनंंदन मैं आपसे सुलह करने के लिए तैयार हूं । हनुमानजी ने एक और पर्वत उठाकर अपने सिर पर रख लिया था । हनुमानजी ने जब अपने मस्तक पर तीसरा पर्वत रखा, तो शनिदेव पीडा से चिल्लाते हुए बोले, ‘‘मुझे क्षमा करें और अब मुक्त करें । हनुमान मैं आप तो क्या उन लोगों के समीप भी नहीं जाऊंगा जो आपका स्मरण करते हैं । कृपया आप मुझे अपने सिर से नीचे उतर जाने दीजिए । अब मैं प्रस्थान करूंगा । शनिदेव के यह वचन सुनकर हनुमान जी ने अपने सिर से सभी पर्वतों को हटाकर, उन्हें मुक्त कर दिया । तब से शनिदेव हनुमानजी के समीप नहीं जाते और हनुमानजी के भक्तों को भी वह नहीं सताते हैं । जिनपर हनुमानजी की कृपा रहती है, उन्हें शनि प्रकोप नहीं सताता है ।

आ. अब आध्यात्मिक दृष्टि से समझते हैं

शनि सूर्यपुत्र हैं और हनुमानजी वायुपुत्र ! इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि सूर्य तेज से संबंधित है, जबकि हनुमानजी वायुतत्त्व से संबंधित हैं । पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश, इन पंचतत्त्वों में तेजतत्त्व से वायुतत्त्व अधिक प्रभावी माना गया है । इसकारण वायुतत्त्व के हनुमानजी की प्रकट शक्ति तुलना में तेजतत्त्व के शनिदेव की प्रकट शक्ति से अधिक है, इस कारण शनि के साढेसाती का परिणाम हनुमानजी पर नहीं होेता ।

 

शनि की साढेसाती दूर करने के लिए हनुमानकी पूजा कैसे करनी चाहिए ?

शनि की साढेसाती के प्रभाव को न्यून (कम) करने के लिए हनुमानजी की पूजा करते हैं । यह विधि इसप्रकार है – कहते हैं कि हनुमानजी को वैसे चमेली का तेल प्रिय है, परंतु अपने क्षेत्र की उपलब्धता के अनुसार तेल चढा सकते हैं । अब यह तेल कैसे चढाना है, इसकी विधि समझकर लें । यह विधि शनिवार अथवा मंगलवार के दिन की जाती है । एक कटोरी में यथाशक्ति तेल लें । उसमें काली उडद के चौदह दाने डालें । अब उस तेल में अपना चेहरा देखें । इसके उपरांत यह तेल हनुमानजी के देवालय में जाकर हनुमानजी को चढाएं । जो व्यक्ति बीमारी के कारण हनुमानजीके देवालय में नहीं जा सकता, वह भी इसप्रकार हनुमानजी की पूजा कर सकता है तथा देवालयमें हनुमानजी को तेल चढाने के लिए किसी अन्य व्यक्ति को भेज सकता है । तेल चढाकर उसे वहीं छोड दें । तेल में मुख प्रतिबिंबित होता है, तब अनिष्ट शक्ति भी प्रतिबिंबित होती है । वह तेल हनुमानजी पर चढाने से उसमें विद्यमान अनिष्ट शक्ति का नाश होता है ।

खरा तेली शनिवार के दिन तेल नहीं बेचता, क्योंकि जिस अनिष्ट शक्ति के कष्ट से छुटकारा पाने के लिए कोई मनुष्य हनुमान पर तेल चढाता है, उस शक्ति द्वारा तेली को भी कष्ट दिए जाने की आशंका रहती है । इसलिए हनुमान मंदिर के बाहर बैठे तेल का विक्रय करनेवालों से तेल का क्रय न कर, घर से ही तेल ले जाकर अर्पित करें ।

यदि विधि के प्रति भाव न टिका रहे, तो इस उपासना का प्रभाव कुछ समय उपरांत अल्प होता है । वैसे ही मदार के पत्र एवं पुष्प के परिणामस्वरूप अल्प हुआ अनिष्ट शक्तिका प्रभाव, पत्र तथा पुष्प का चैतन्य घटने पर पुनः बढने की आशंका रहती है । कष्ट को समूल अल्प करने के लिए हनुमानजी का नामजप निरंतर करना, यही एक उत्तम साधन है ।

शनिवार के दिन हनुमानजी के मंदिर में तेल चढाया जाता है और कहा जाता है कि हनुमानजी की उपासना करनेवाले को शनि भगवान कष्ट नहीं देते, तो शनि तथा हनुमानजी में क्या संबंध है ?

‘हनुमत्सहस्रनाम’ स्तोत्र में शनि, यह हनुमान का एक नाम बताया गया है । सूर्य संहिता में ऐसा कहा गया है कि हनुमान का जन्म शनिवार के दिन हुआ; परंतु शनि और हनुमानजी में भेद भी बताए गए हैं, वो इसप्रकार हैं –

१. शनि सूर्यपुत्र हैं, तो हनुमानजी वायुपुत्र ।

२. शनि और सूर्य के संबंध में अनबन हो गई, तो हनुमानजीने सूर्य से सभी विद्याएं ग्रहण कीं । सूर्य ने अपने तेज का १०० वां भाग हनुमान को दे दिया ।

३. शनि को पापग्रह माना जाता है, जबकि हनुमानजी लोकप्रिय देवता हैं ।

४. शनि और हनुमान दोनों ही ब्रह्मचारी हैं; परंतु शनि देवता के मंदिर में स्त्रियों का प्रवेश निषिद्ध है । जबकि हनुमानजी की उपासना महिलाएं भी करती हैं ।

 

हनुमानजी की उपासना से नवग्रह का कष्ट दूर हो सकता है क्या ?

हनुमानजी की उपासना के संदर्भ में बताया गया है कि शनिदेवता की पीडा में हनुमानजी की उपासना से सहायता होती है, नवग्रह के संदर्भ में नहीं ।

शनिदेवता को यद्यपि पापग्रह कहा गया है, पर वह न्याय के देवता हैं और हमें हमारे कर्मों का ही फल देते हैं । साढेसाती में हनुमानजी की उपासना करने से प्रारब्धकर्म को सहन करना सहज होता है ।

वैसे भी अन्य ग्रहों के कष्ट के संदर्भ में ज्योतिषशास्त्र अधिक जानकारी दे सकता है । हिन्दू धर्म में ग्रहों की तुलना में देवताओं को श्रेष्ठ माना गया है ।

आप यदि कुलदेवता की उपासना करते हैं, तो अन्य ग्रहों के कष्ट की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है ।

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