‘राम से बडा राम का नाम’ उक्ति सार्थ करनेवाले भक्तशिरोमणि हनुमान !

 

१. प्रभु श्रीराम ने हनुमानजी को वरदान देना

‘एक बार हनुमानजी की निस्सीम भक्ति देखकर प्रभु श्रीराम ने हनुमानजी से वर मांगने के लिए कहा । ‘जो कोई प्रभु श्रीराम का स्मरण करेगा, उसकी सुरक्षा हनुमानजी करेंगे और उस व्यक्ति का कोई भी अहित नहीं कर सकेगा’, ऐसा वर हनुमानजी ने मांगा । प्रभु श्रीराम ने ‘तथाऽस्तु’ कहा ।

 

२. प्रभु श्रीराम से मिलने के लिए निकले महर्षि
विश्‍वामित्र और काशीनरेश सौभद्र की शिवमंदिर में भेट होना

त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम अयोध्या का राज्य कर रहे थे । तब काशीनरेश सौभद्र के मन में प्रभु राममिलन की इच्छा जागृत हुई । उसी समय महर्षि विश्‍वामित्र के भी मन में प्रभु श्रीराम से मिलने की इच्छा निर्माण हुई । दोनों ही अयोध्या की दिशा में निकले । रास्ते में एक शिव मंदिर में दोनों की भेट हुई । विश्‍वामित्र के शिष्य शिव के मंदिर में विश्‍वामित्र की जयजयकार कर रहे थे । राजा सौभद्र को लगा कि ‘शिव के मंदिर में केवल भगवान शिव की ही जयजयकार होनी चाहिए, अन्य किसी की नहीं । अन्यथा शिवजी का अपमान होता है ।’ उन्होंने विश्‍वामित्र की जयजयकार का विरोध किया । इससे महर्षि विश्‍वामित्र उन पर कुपित हो गए और दोनों में वाद-विवाद हुआ ।

 

३. महर्षि विश्‍वामित्र और सौभद्र राजा में विवाद का
निर्णय अगले दिन न्यायसभा में होगा, प्रभु श्रीराम द्वारा घोषित करना

दोनों ही जब अयोध्या पहुंचे, तब उन्होंने एक ही समय पर प्रभु श्रीराम के दर्शन हुए । महर्षि विश्‍वामित्र ने प्रभु श्रीराम को काशीनरेश को कठोर दंड देने की आज्ञा की । प्रभु श्रीराम ने अगले दिन न्यायसभा में उपरोक्त प्रसंग का न्याय देने की घोषणा की ।

 

४. नारदमुनि के कहने पर सौभद्र राजा हनुमानजी की माता अंजनीदेवी
की शरण गए और अंजनीमाता द्वारा सौभद्र की रक्षा का दायित्व हनुमानजी को देना

‘प्रभु श्रीराम महर्षि विश्‍वामित्र के कहने पर मुझे कठोर दंड देंगे’, इस विचार से सौभद्र भयग्रस्त हो गया । इतने में ही वहां नारदमुनि प्रगट हुए और उन्होंने राजा सौभद्र को हनुमानजी की माता अंजनीदेवी की शरण जाने के लिए कहा । नारदमुनि के कहने पर सौभद्र सुमेरू गया और माता अंजनी के चरण पकड लिए । अंजनीमाता ने उसकी स्थिति जानकर उसकी रक्षा करने का वचन दिया । उन्होंने हनुमान को काशीनरेश की रक्षा का दायित्व सौंपा । हनुमान ने उसे स्वीकारा और अगले दिन सौभद्र को साथ लेकर पवन वेग से अयोध्या पहुंचे । उन्होंने राजा सौभद्र से निर्भय होकर सरयू नदी के किनारे अखंड रामनाम का स्मरण करते रहने के लिए कहा ।

 

५. प्रभु श्रीराम द्वारा सूर्यास्त होने से पूर्व सौभद्र का वध करने का प्रण करना

सौभद्रराजा के अचानक पलायन करने का समाचार अगले दिन महर्षि विश्‍वामित्र ने जब सुना तो वे और अधिक कुपित हुए । उन्होंने श्रीराम को सौभद्र का वध करने की आज्ञा दी । उस अनुसार प्रभु श्रीराम के सूर्यास्त होने से पूर्व ही सौभद्र का वध करने का प्रण किया । प्रभु श्रीराम के सैनिक सौभद्र को सर्वत्र ढूंढ रहे थे । उन्होंने देखा कि वह सरयू नदी के तट पर हनुमानजी सहित रामनाम में मग्न है । तो इसकी सूचना महर्षि विश्‍वामित्र और श्रीराम को दी ।

 

६. प्रभु श्रीराम का धर्मसंकट में पडना

महर्षि विश्‍वामित्र सहित प्रभु श्रीराम धनुष्य बाण लेकर सरयू तट पर आए, तो देखा कि हनुमानजी आगे बैठे हैं और उनके पीछे सौभद्र राजा बैठा है । दोनों ही रामनाम का अखंड जप कर रहे हैं । प्रभु श्रीराम ने हनुमानजी को एक ओर हटने के लिए कहा, तब हनुमान ने श्रीराम को पहले दिए हुए वचन का स्मरण करवाया । महर्षि विश्‍वामित्र ने सौभद्र पर बाण चलाने का आग्रह किया । प्रभु श्रीराम को समझ नहीं आया कि, ‘हनुमानजी को दिया वरदान अथवा विश्‍वामित्र के कहने पर अपना प्रण पूर्ण करें ?’

 

७. प्रभु श्रीराम द्वारा सौभद्र पर बाण चलाना;
परंतु हनुमानजी की कृपा से सौभद्र को बाण न लगना

अंत में गुरुस्थान पर महर्षि विश्‍वामित्र की आज्ञावश प्रभु श्रीराम ने सौभद्र पर बाण चलाया । हनुमानजी की कृपा से सौभद्र के सर्वओर रामनाम का सुरक्षाकवच निर्माण हो गया था। इसलिए प्रभुु श्रीरामजी द्वारा चलाए बाण सौभद्र को नहीं लग रहे थे । प्रभु श्रीराम ने अनेक बाण चलाए; परंतु एक भी बाण सौभद्र को नहीं लग रहा था । ‘रामबाण विफल हो रहे हैं’, यह चमत्कार देख महर्षि विश्‍वामित्र चौंक गए । उन्होंने अंतर्मुख होकर विचार किया और तब ध्यान में आया कि भगवान को अपने से अधिक भक्त को दिया वरदान पूर्ण होना अधिक महत्त्वपूर्ण लगता है । इसलिए उन्होंने श्रीराम को भी अपना प्रण वापस लेने के लिए कहा । हनुमानजी ने काशीनरेश सौभद्र से महर्षि विश्‍वामित्र के चरण पकडकर क्षमा मांगने के लिए कहा । उसी अनुसार सौभद्र ने महर्षि विश्‍वामित्र से क्षमा मांगी और महर्षि विश्‍वामित्र ने उसे क्षमा किया ।

 

८. भक्तशिरोमणि हनुमान के कारण ‘राम से बडा राम का नाम’ सार्थक होना

इसप्रकार हनुमानजी द्वारा प्रभु श्रीराम को धर्मसंकट से मुक्त किया और सौभद्र राजा की रक्षा भी की । वरदान और प्रण के युद्ध में वरदान की विजय हुई । यदि कोई रामनाम का जप करता हो और साक्षात प्रभु श्रीराम भी उस पर बाण चलाएं, तब भी उसका कोई अहित नहीं होता, यह इस प्रसंग से ज्ञात होता है । भक्तशिरोमणि हनुमान ने ‘राम से बडा राम का नाम’ सार्थक किया ।’

श्रीकृष्ण का अंश, कु. मधुरा भोसले, सनातन आशम, रामनाथी, गोवा. (संदर्भ : ‘जय हनुमान’ श्रृंखला)