दिनचर्या

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‘जो समयपर सोकर समयपर उठे, वह स्वस्थ और दीर्घायु बने ।’ ऐसी शिक्षा पूर्वकालमें बच्चोंको दी जाती थी । आजकल बच्चे विलम्बसे सोते और उठते हैं । प्राचीनकालमें ऋषि-मुनियोंका दिन ब्राह्ममुहूर्तसे आरम्भ होता था, जबकि आज यन्त्रयुगमें ‘रात्रिकी पारीमें काम और दिनमें नींद’ होती है । पूर्वकाल की दिनचर्या प्रकृतिके अनुरूप थी । दिनचर्या जितनी अधिक प्रकृतिके अनुरूप, उतनी ही वह स्वास्थ्यके लिए पूरक होती है । आज वह ऐसी नहीं है, इसलिए मनुष्य (पेट, गले, हृदय आदि) नाना प्रकारकी व्याधियोंसे त्रस्त हो गया है ।

 

१. दिनचर्या

अ. व्याख्या

प्रातः उठनेसे लेकर रातको सोनेतक किए गए कृत्योंको एकत्रितरूपसे ‘दिनचर्या’ कहते हैं ।

आ. महत्त्व

आ १. प्रकृतिके नियमोंके अनुरूप दिनचर्या आवश्यक : सम्पूर्ण मानव जीवन स्वस्थ रहे, उसे कोई भी विकार न हों, इस दृष्टिसे दिनचर्यापर विचार किया जाता है । कोई व्यक्ति दिनभरमें क्या आहार-विहार करता है, कौन-कौनसे कृत्य करता है, इसपर उसका स्वास्थ्य निर्भर करता है । स्वास्थ्यकी दृष्टिसे दिनचर्या महत्त्वपूर्ण है । दिनचर्या प्रकृतिके नियमोंके अनुसार हो, तो उन कृत्योंसे मानवको कष्ट नहीं; वरन लाभ ही होता है । इसलिए प्रकृतिके नियमोंके अनुसार (धर्मद्वारा बताए अनुसार) आचरण करना आवश्यक है, उदा. प्रातः शीघ्र उठना, मुखमार्जन करना, दांत स्वच्छ करना, स्नान करना इत्यादि ।

‘ऋषिगण सूर्यगतिके अनुसार ब्राह्ममुहूर्तमें प्रातःविधि, स्नान एवं सन्ध्या करते थे, तत्पश्चात वेदाध्ययन एवं कृषिकार्य करते तथा रातको शीघ्र सो जाते थे; इसलिए वे शारीरिकरूपसे स्वस्थ थे । आज लोग प्रकृतिके नियमोंके विरुद्ध आचरण करते हैं । इससे उनका शारीरिक स्वास्थ्य बिगड गया है । पशु-पक्षी भी प्रकृतिके नियमोंके अनुसार अपनी दिनचर्या व्यतीत करते हैं ।’ – परात्पर गुरु परात्पर गुरु पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल.

आ २. आह्निकका यथार्थ पालन करनेवाला व्यक्ति बहुधा दरिद्रता, व्याधि, दुर्व्यसन, मनोविकृति इत्यादि आपत्तियोंसे ग्रस्त न होना : ‘धर्मशास्त्रमें आह्निकको प्रधानता दी गई है । एक ओर शरीरके लिए अत्यन्त उपयुक्त एवं पोषक विज्ञान, तो दूसरी ओर मनकी उत्क्रान्ति एवं विकास साधनेवाला मानसशास्त्र, ऐसा दोहरा विचार कर शास्त्रने आह्निकके नियम बनाए हैं । बहुधा आह्निकका यथार्थ पालन करनेवाले व्यक्ति दरिद्रता, व्याधि, दुर्व्यसन, मनोविकृति इत्यादि आपत्तियोंसे ग्रस्त नहीं होते ।’

 

२. आचारोंका पालन करना ही अध्यात्मकी नींव है ।

पूर्वकालमें स्नानके उपरान्त तुलसीको जल चढाकर पूजा की जाती थी, जबकि आज अनेक लोगोंके घर तुलसी वृन्दावन भी नहीं होता । पूर्वकालमें गोधूलि बेलामें दीप जलानेके समय सन्ध्यास्तुति ‘शुभं करोतु…’ कहते थे, किन्तु आज इस समय बच्चे दूरदर्शनपर कार्यक्रम देखनेमें मग्न रहते हैं । हिन्दू धर्मद्वारा बताए गए आचारोंके पालनसे हिन्दू बहुत दूर होते जा रहे हैं । आचारोंका पालन करना ही अध्यात्मकी नींव है । सभीको यह तत्त्व ध्यानमें रखना चाहिए कि विज्ञानद्वारा निर्मित सुख-सुविधाओंसे नहीं, अपितु अध्यात्मके आधारपर ही मनुष्य वास्तवमें सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है । प्रत्येक कृत्यसे स्वयंमें रज-तम न्यून हो, सत्त्वगुण बढे एवं अनिष्ट शक्तियोंके कष्टसे रक्षा हो, इस दृष्टिसे हमारे प्रत्येक आचारकी व्यवस्था की गई है । यह हिन्दू धर्मकी अद्वितीय विशेषता है । ज्ञानयोग, कर्मयोग इत्यादि साधनामार्गोंके समान ही आचारधर्म भी ईश्वरप्राप्तिकी दिशामें अग्रसर करता है ।

 

३. समयपर सोकर प्रातःकाल में जागने से मिलनेवाले लाभ

 

आज की इस भागदौडभरे जीवन में लोगों की जीवनशैली बहुत बिगड चुकी है । लोग सुबह देरतक सोए रहते हैं और देररात सोते हैं । कदाचित इसके कारण ही सुबह शीघ्र नहीं जग जाते । एक शोध से प्रातःकाल जागने के अनेक लाभ सामने आए हैं ।

१. जो लोग रात में समयपर सोकर सुबह शीघ्र जग जाते हैं, उन्हें दिनभर उत्साहित लगता है ।

२. जिन्हें अपने माता-पिता से वंशपरंपरा से सुबह शीघ्र जग जाने की देन मिली है, वे शांत होते हैं । ऐसे लोग शीघ्रकोपी नहीं होते । उन्हें निराशा और सिजोफ्रेनिया जैसे मनोविकारों का भय नहीं होता । उनका मानसिक स्वास्थ्य भी अच्छा होता है ।

३. इस विषय में नेचर कम्युनिकेशन नामक नियतकालिक में छापे गए एक शोधपत्र में मनुष्य की दिनचर्या के संदर्भ में बडा स्पष्टीकरण दिया गया था । ‘देर से सोना और देर से जागने’ के कारण मानसिक स्वास्थ्यपर कैसे विपरीत प्रभाव पडता है, इस संबंध में इस शोधचित्र में उल्लेख है । इसके साथ ही ऐसे व्यक्तियों को अन्य कुछ रोग भी हो सकते हैं ।

४. ब्रिटैन का एक्सटर विश्‍वविद्याल तथा अमेरिका का मेसेच्युसेट्स जनरल हॉस्पिटल के मार्गदर्शन में इसके संबंध में शोध किया गया है ।

साभार : सनातन-निर्मित ग्रंथ, ‘स्नानपूर्व आचारोंका अध्यात्मशास्त्रीय आधार’

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