मनःशांति एवं निरोगी जीवन देनेवाली योगविद्या !

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‘२० वीं शताब्दी के प्रारंभ में एक नरेंद्र ने (स्वामी विवेकानंद ने) अमेरिका की सर्वधर्म परिषद में सहभाग लेकर भारतीय तत्त्वज्ञान एवं अध्यात्म की दिव्य पताका फहराकर भारत के गौरवशाली एवं वैभवशाली संस्कृति की वास्तविक पहचान संपूर्ण जगत को करवाई थी । उसीप्रकार भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्रों में योगशास्त्र का महत्त्व जगभर के अन्य देशों के मन पर अंकित किया । अत: संयुक्त राष्ट्रों ने २१ जून को ‘आंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में घोषित किया । इससे संपूर्ण विश्व में भारतीय योगविद्या की गौरवशाली पताका पुन: एक बार स्वाभिमान से ऊंचाई पर फहराने लगी है ।

२१.६.२०१५ के प्रथम ‘आंतरराष्ट्रीय योगदिन’ पर देहली के राजपथ पर आयोजित योग प्रात्यक्षिकों के महाकुंभ में ८४ देशों के नागरिकों सहित ३५ सहस्र योगसाधक सम्मिलित हुए थे । इस अवसर पर मार्गदर्शन करते समय मोदी ने कहा था कि ‘योग’ शरीर एवं मन को संतुलित करने का माध्यम होने से जीवन में प्रेम, शांति, एकता एवं वैश्विक सद्भावना निर्माण करनेवाला उपक्रम है । जगत को तनाव एवं व्याधियों से मुक्त कर मानवता का कल्याण करना, यही इस योगदिन का मुख्य उद्देश्य है ।’

 

विश्व को मनःशांति एवं व्याधिमुक्त जीवन प्रदान करनेवाली योगविद्या !

भारतीय ऋषि-मुनियों के दैवीय चिंतन से, आत्मसाक्षात्कार से आविष्कृत हुई यह योगविद्या अर्थात कोई भी धर्मभेद, जातिभेद, लिंगभेद न करते हुए संपूर्ण मानवजाति के कल्याण हेतु एक ईश्वरीय वरदान है । यह योगविद्या संसाररूपी भट्टी में झुलसते लोगों को मनःशांति देनेवाली, व्याधिग्रस्तों को शारीरिक एवं मानसिक ताप से मुक्त करनेवाली, योगसाधकों का जीव-शिव से मिलन करवानेवाली, मानव के मोक्षपद की अंतिम इच्छा पूर्ण करनेवाली है । हमारे परोपकारी पूर्वजों ने जगत के कल्याण हेतु सहेज कर रखी अनमोल धरोहर है । ऐसी इस अनमोल धरोहर के हम वारिस हैं । हमारा सौभाग्य है कि हमने इस योगभूमि पर जन्म लिया; परंतु अनेक भारतीय आज भी योगविद्या से वंचित हैं । यह हमारा दुर्भाग्य है । विश्वभर के अनेक राष्ट्रों ने योग का भरपूर लाभ लिया है और ले रहे हैं । भोगवाद, भौतिकवाद एवं अनेक प्रकार की व्याधियों से ग्रस्त पश्चिमी राष्ट्रों की जनता को मनः शांति एवं निरोगी जीवन चाहिए । इसके लिए संपूर्ण जगत भारत की ओर आशा से देख रहा है; कारण योगविद्या समान रामबाण औषध युक्त भारत के अतिरिक्त अन्य कोई भी देश जगत को मनःशांति एवं व्याधिमुक्त जीवन प्रदान नहीं कर सकता । भारतीय योगविद्या में इतना दिव्य सामर्थ्य और क्षमता है, इसकी विदेशी अभ्यासकों ने प्रत्यक्ष अनुभूति एवं प्रचीति ली है ।

 

योगाभ्यास में दुर्बल शरीर की कार्यक्षमता बढाने का सामर्थ्य होना

रासायनिक विषैली खाद एवं कीटकनाशकों का छिडकाव कर उगाया दलहन अनाज, फल, हरा शाक आदि खाकर अपना शरीर जाने-अनजाने में धीरे-धीरे व्याधिग्रस्त होता जा रहा है । इसलिए अपनी शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता में वृद्धि हुई है, यह अनेक लोगों को पता ही नहीं । ऐसे समय पर यह योगविद्या अत्यंत ही उपयुक्त है । इस योगाभ्यास में विषैले द्रव्य बाहर फेंककर दुर्बल शरीर की कार्यक्षमता बढाने का सामर्थ्य है ।

 

शरीर एक पवित्र ‘यज्ञकुंड’ होने से उसकी पवित्रता रखनी आवश्यक !

अपना शरीर एक पवित्र ‘यज्ञकुंड’ है । इस यज्ञकुंड की जठराग्नि में मांसाहार, दारू, तंबाखू, फास्ट फूड आदि पदार्थ डालकर (खाकर) यह पवित्र यज्ञ कोई भी भ्रष्ट न करे । ऐसा करनेवाले व्यक्तियों की योगसाधना सफल नहीं होती । ‘मोक्षप्राप्ति’ यह नरदेह का अंतिम ध्येय है । परमात्मा परमेश्वर की कृपादृष्टि संपादन करने के लिए, मोक्षपद का अधिकारी होने हेतु योगसाधक को अपने आचार, विचार एवं उच्चार से इस पवित्र यज्ञकुंड की पवित्रता को बनाए रखना चाहिए ।

 

योगी होकर परोपकारी एवं पारमार्थिक जीवन यापन करने में ही नरजन्म का सार्थक

‘योग’ इस शब्द का भावार्थ है ‘हममें विद्यमान जीवात्मा की चराचर में व्याप्त परमात्मा से एकरूप होना अथवा मिलन होना अथवा समरस होना !’ इस सृष्टि की ८४ लक्ष योनियों को (जीवमात्र को) सृष्टिकर्ता परमेश्वर से ऊर्जा की आपूर्ति की जाती है । इसीलिए हम-आप इस क्षण तक जीवित हैं । इस ऊर्जा को ही ‘जीवात्मा-अंशात्मा’ कहते हैं । हमारी भोगवादी वृत्ति के कारण, ‘मैं’पन के अहंकार के कारण, भक्तिभाव के अभाव के कारण हमारे शरीर की इस दिव्य शक्ति का, हमारे देहचालक का हमें विस्मरण हो जाता है । योगविद्या के माध्यम से योगसाधक को ‘हम परमात्मा परमेश्वर के अंश हैं’, इसका स्मरण होता है । स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों को भी प्रकाशित करने का दैवीय सामर्थ्य इस योगसाधना में है । भोगी होकर रोगी जीवनयापन करने की अपेक्षा, योगी बनकर परोपकारी एवं परमार्थिक जीवन जीने में ही नरजन्म की सार्थकता है । यह सब साध्य करने के लिए योगसाधक को स्वानुभवी योग शिक्षकों के मार्गदर्शन में योगसाधना करनी चाहिए ।

 

‘योग’ साधना से ही आध्यात्मिक दृष्टि एवं राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत भूमिपुत्र निर्माण होने !

गौरवशाली, वैभवशाली, सुसंस्कारित, व्याधिमुक्त, आत्मनिर्भर, स्वावलंबी एवं जगद्गुरुपद के लिए योग्य ऐसा भारत बनाना है, उसके लिए लगनेवाले सद्गुण, तेजस्वी विचारधारा, देव-धर्म, देश, संस्कृति के प्रति आस्था, आध्यात्मिक दृष्टि एवं राष्ट्रभक्ति से प्रभारित भूमिपुत्र इस ‘योग’ साधना से ही निर्माण हाेंंगे ।

अत: शारीरिक एवं मानसिक व्याधि से मुक्त करनेवाली, कोरोना जैसे विषाणु का सफलता से प्रतिकार करने में सक्षम, मोक्षप्राप्ति का ध्येय साध्य कर जीव-शिव का मिलन करवानेवाली, जगद्गुरुपद पर विराजमान होने की जिसमें क्षमता है, ऐसी सर्वगुणसंपन्न योगविद्या का देश-विदेश में निष्काम वृत्ति से प्रसार-प्रचार करनेवाली सर्व भारतीय संस्थाएं, योगाचार्य, योग साधक एवं योगकार्य में तन-मन-धन से योगदान देनेवाले शुभचिंतकों का योगदिन के निमित्त अभिनंदन !’

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