वास्तु शुद्धि की पद्धतियां

वास्तु (घर) अथवा वाहन के अनुचित और कष्टदायक स्पंदन (वाइब्रेशन्स) दूर कर, उसमें अच्छे स्पंदन उत्पन्न करने की क्रिया को शुद्धि करना कहते हैं । वास्तु में कोई दोष न रह जाए, इसके लिए आजकल के वास्तुनिर्माण व्यवसायी (बिल्डर) एवं ग्राहक वास्तुशास्त्र का गंभीरता से विचार कर रहे हैं । परंतु, इस क्षेत्र में भी भ्रष्ट लोग प्रवेश कर चुके हैं । इसलिए, वास्तुशुद्धि के लिए अनावश्यक महंगी पूजा, वास्तु रचना में परिवर्तन आदि करना पडता है । ऐसा न करना पडे, इसके लिए, वास्तुदोष के दुष्परिणामों के कुछ उदाहरण और उन्हें दूर करने के लिए प्रचलित महंगी पद्धतियों की अपेक्षा सस्ती एवं सरल पद्धतियां आगे बताई जा रही हैं ।

 

वास्तुशुद्धि करनेवाले को वास्तुशुद्धि करने से पहले
१५ मिनट तक श्री गणेश अथवा उपास्यदेवता का नाम जपना चाहिए !

वास्तुशुद्धि करते समय उपास्यदेवता का नामजप मन में अथवा जोर से बोलकर करें । इसके अतिरिक्त, वास्तुशुद्धि आरंभ करने से पहले भी नामजप करना लाभदायक है । इसका कारण इस प्रकार है – संपूर्ण वास्तु से अनिष्ट शक्तियों को सदा के लिए निकालना, यह एक प्रकार से उन्हें दी हुई बडी चुनौती ही होती है । इसलिए, वास्तुशुद्धि करते समय अनिष्ट शक्तियों की ओर से विरोध होने की संभावना अधिक रहती है । इससे हमें आध्यात्मिक कष्ट हो सकता है । ऐसा न हो अथवा हमारी प्राणशक्ति घटकर थकान न आए, इसके लिए वास्तुशुद्धि आरंभ करने के १५ मिनिट पहले श्री गणेश का अथवा उपास्यदेवता का नामजप करना विशेष लाभदायक होता है । श्री गणेश के नामजप से प्राणशक्ति (जीवनी शक्ति) बढती है ।

 

वास्तुशुद्धि आरंभ करने से पहले प्रार्थना करें !

वास्तुशुद्धि आरंभ करने से पहले उपास्यदेवता से प्रार्थना करें, ‘हे देवता, आपकी कृपा से मैं (अपना नाम लें) के सर्व ओर रक्षाकवच बने, इस वास्तु से अनिष्ट शक्तियां निकाल जाएं और यहां के अनिष्ट स्पंदन नष्ट हों, यह प्रार्थना करता हूं ।’ वास्तुशुद्धि करते समय भी बीच-बीच में भी प्रार्थना करते रहें ।

 

वास्तुदोष से उत्पन्न होनेवाले दुष्परिणामों के कुछ उदाहरण

अ. शारीरिक

पेट के रोग, संधिवात, अपंगता इत्यादि ।

आ. मानसिक

चिंता, निराशा इत्यादि ।

इ. आर्थिक तथा पारिवारिक

लगातार आर्थिक हानि होना, घर में झगडे होना ।

ई. आध्यात्मिक

नामजप में बाधा आना; घर में अनिष्ट शक्तियां हैं, ऐसा आभास होना ।

 

वास्तुशुद्धि की कुछ सरल पद्धतियां

१. भंगार (निरुपयोगी वस्तुएं) निकालना

वास्तुशास्त्र के अनुसार प्रत्येक घर में, प्रत्येक कक्ष में लगभग ४७ प्रतिशत वस्तुएं अनावश्यक होती हैं; इन्हें वहां से बाहर कर शेष वस्तुओं को उचित ढंग से रखना चाहिए ।

२. भभूत की फूंक मारना

तीर्थक्षेत्र की अथवा यज्ञ की भभूत घर में बाहर की दिशा में फूंकना चाहिए । भभूत की सात्त्विकता से अनिष्ट शक्तियों को कष्ट होता है; इसलिए भभूत की फूंक मारने पर वे घर से निकल जाती हैं । घर में भभूत मिला जल छिडकने पर, उसका प्रभाव अधिक समय तक रहता है ।

३. गोमूत्र छिडकना

गोमूत्र छिडकते समय

घर में गोमूत्र छिडकने पर वहां से अनिष्ट शक्तियां निकल जाती हैं । गोमूत्र का धार्मिक कृत्य और शारीरिक आरोग्य की दृष्टि से विशेष महत्त्व है । अर्थात, गोमूत्र आरोग्यदायी होनेके साथ-साथ आध्यात्मिक दृष्टि से भी लाभदायक होता है । गोमूत्र न मिले, तब पानी में अगरबत्ती की राख मिलाकर वह घर में छिडकें । छिडकने की क्रिया प्रदक्षिणा के विरुद्ध होनी चाहिए ।

सर्वसाधारणतः वास्तुशुद्धि की क्रिया (उदा. गोमूत्र छिडकना) वास्तु में दाएं से बाएं भीत (दीवार) के किनारे चलते हुए करें ।

वास्तु के कष्टदायक स्पंदन समाप्त करना, यह वास्तुशुद्धि का उद्देश्य होता । अर्थात, वास्तुशुद्धि एक प्रकार की मारक क्रिया है । यह कार्य अधिक प्रभावकारी ढंग से होने के लिए घर में गोमूत्र छिडकना, नीम के पत्तों का धुआं करना, धूप अथवा अगरबत्ती जलाकर पूरे घर में घुमाना, भभूत फूंकना जैसी क्रिया घर में दाएं से बाएं (प्रदक्षिणा के विरुद्ध) भीत के किनारे चलते हुए करें ।

वास्तुशुद्धि की क्रिया घर में दाएं से बाएं करने पर वातावरण की शुद्धि अधिक होना

वास्तुशुद्धि की क्रिया दाएं से बाएं करने पर वातावरण में स्थित ईश्‍वर की मारक शक्ति सक्रिय होती है । यह जागृत शक्ति वायुमंडल में स्थित रज-तम के स्पंदनों को तुरंत नष्ट कर सकती है; क्योंकि मारक स्पंदनों के घूमने की गति दाएं से बाएं होती है । इस गति और पद्धति के अनुसार वास्तुशुद्धि की क्रिया करने से वातावरण अधिक मात्रा में शुद्ध होता है ।

४. धूप जलाना

धूप दिखाना
घर में धूप अथवा सात्त्विक अगरबत्ती जलाना अथवा नीम के पत्तों का धुआं करना ।

स्वभाव से ही कुछ अच्छी शक्तियां सुगंध की ओर आकर्षित होती हैं । इसीलिए, घर में धूप जलाने पर वे घर में आती हैं । इससे घर सात्त्विक बनता है । इसी प्रकार, धूप जलाने से कष्ट होने के कारण कुछ बुरी शक्तियां घर से निकल जाती हैं । धूप से प्रक्षेपित होनेवाले रजोगुणी पृथ्वी और जल तत्त्व से संबंधित तरंगों के कारण घर में कनिष्ठ देवताओं की तरंगें सक्रिय होती हैं । प्रथम, कनिष्ठ देवताओं को प्रसन्न करने पर, घर में अनिष्ट शक्तियों का आना घट जाता है ।

 

५. नामजप करना

वास्तुशुद्धि के लिए नामजप, अपने उपास्यदेवता और वास्तुदेवता से प्रार्थना करने के पश्‍चात, आरंभ करना चाहिए । ४ स्थूल उपायों से अधिक लाभदायक सूक्ष्म नामजप है । अर्थात, नामजप से सबसे अधिक लाभ होता है ।

अ. सनातन संस्था के प्रेरणास्रोत प.पू. भक्तराज महाराज के गाए हुए भजन उपलब्ध न हों, तब अन्य संतों के गाए भजन लगाएं ।

६. देवताओं के नामजप की पट्टियां लगाना

नामजप का निरंतर स्मरण रहे, इसके लिए अपनी आंखों के सामने देवता के नामजप की पट्टियां लगाना अधिक उपयोगी होता है । सनातन निर्मित इन पट्टियों पर नामजप के अक्षर और उसका चौखटा इस प्रकार बनाए गए हैं कि उनसे संबंधित देवता के स्पंदन घर में अधिकतम आते हैं । अनेक बार घर अथवा उसमें बने कक्ष की छत पृथ्वी के समांतर न होकर, थोडी ढालू होती है । पक्के भवनों की तुलना में खपडेवाले घरों में यह समस्या अधिक रहती है । इससे घर में अनुचित स्पंदन उत्पन्न होते हैं । यह समस्या ठीक करने के लिए देवताओं के नामजप की पट्टियां कक्ष की दीवारों पर एक सीधी रेखा में, समान ऊंचाई और समान अंतर पर लगाएं । इन नामपट्टियों से निकलनेवाली चैतन्यतरंगें अधिक मात्रा में भूमि के समांतर और सामने की ओर जाती हैं; इससे घर में सूक्ष्म-छत बनती है । इसी प्रकार, घर में अच्छे स्पंदन उत्पन्न होने के कारण उसकी अनिष्ट शक्तियों से रक्षा होती है । आगे दिए हुए चित्र से शुद्धीकरण की यह क्रिया ठीक से समझ में आएगी ।

 

नामपट्टियों का वास्तु-छत

 

घर की दीवारें उपदिशाओं में हों, तब वास्तु-छत लगाने की पद्धति

घर की दीवारें (पूर्व, पश्‍चिम आदि मुख्य दिशाओं के समांतर न होकर) आग्नेय, नैऋत्य आदि उपदिशाओं के समांतर हों, तब दो दीवारों के बीच डोरी लगाकर नामपट्टियों का वास्तु-छत बनाएं ।

खपडैल घर की भांति अनेक बार वास्तु की अथवा उसके कक्ष की छत भूमि के समांतर नहीं होती । इसलिए, उसमें अनुचित स्पंदन उत्पन्न होते हैं । इन्हें ठीक करने का सबसे सरल उपाय एक ही है, देवताओं की नामपट्टियां प्रत्येक कक्ष की दीवारों पर चित्र १ में दर्शाए अनुसार एक सीधी रेखा में लगाना । नामपट्टियों से निकलनेवाली चैतन्यतरंगें भूमि के समांतर और सामने की ओर जाती हैं । इससे, उस कक्ष में मुख्य छत के नीचे देवता के नाम का सूक्ष्म-छत बनता हैै और उस कक्ष में रहनेवाले की अनिष्ट स्पंदनों से रक्षा होती है । दो नामपट्टियों के बीच का अंतर १ मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए ।

 

घर की दीवारें उपदिशाओं में हों, तब वास्तु-छत लगाने की पद्धति

कभी-कभी घर की दीवारें आग्नेय, नैऋत्य आदि उपदिशाओं के समांतर होती हैं । ऐसे समय दो दीवारों के बीच डोरी बांधकर उसके नीचे चित्र में दिखाए अनुसार नामपट्टियां लगाएं और सूक्ष्म वास्तु-छत बनाएं । इससे, वास्तु के चारों ओर सुरक्षाकवच बनेगा ।

 

वास्तुशुद्धि संच की सात्त्विकता लोलक उपकरण से प्रमाणित हुई !

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यताप्राप्त लोलक चिकित्सा-पद्धति’ से विविध वस्तुओं, वातावरण, व्यक्ति आदि में स्थित सकारात्मक अथवा नकारात्मक शक्ति को पहचाना जा सकता है । सकारात्मक शक्ति होने पर लोलक घडी की सूइयों की दिशा में घूमता है तथा नकारात्मक शक्ति होने पर वह घडी की सूइयों के विपरीत दिशा में घूमता है ।

वास्तुशुद्धि के विषय में एक साधक ने लोलक की सहायता से एक प्रयोग किया था । उसने एक वास्तु के दो चित्र बनाए । एक चित्र में वास्तुशुद्धि की नामपट्टियां लगाईं । दूसरे चित्र में कुछ नहीं लगाया । इसके पश्‍चात, दोनों चित्रों के ऊपर बारी-बारी से लोलक लटकाया । जिस चित्र में नामपट्टियां लगी थीं, उसके ऊपर लोलक लटकाने पर उसने सकारात्मक स्पंदन होने का संकेत किया तथा जिस चित्र पर नामपट्टियां नहीं लगी थीं, उसके ऊपर लोलक लटकाने पर उसने नकारात्मक स्पंदन का संकेत किया । इससे पता चलता है कि देवताओं की नामपट्टियां सात्त्विक होती हैं ।’

– श्री. प्रकाश करंदीकर, सनातन संस्था

 

धर्मशास्त्रानुसार वास्तुशुद्धि अवश्य करनी चाहिए !

पू. राजेंद्र शिंदे

कुछ साधक नए घर में प्रवेश करते समय पूछते हैं कि हमारे यहां प्रतिदिन साधकों का आना-जाना लगता रहता है, सत्संग भी होता रहता है । अतः, हम वास्तुशुद्धि नहीं करेंगे, तो चलेगा न ?’ ऐसे समय उन्हें निम्नांकित बातें ध्यान में रखनी चाहिए ।

१. घर आनेवाले साधकों में अनेक शौकिया और कार्यकर्ता भी होते हैं । उनका आध्यात्मिक स्तर हमें पता नहीं होता । इसलिए, उनके आने से अपेक्षित अध्यात्मिक लाभ नहीं होगा ।

२. किसी वास्तु में संत अथवा ६० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के साधक स्थायीरूप से रहते होंगे, तब वहां वास्तुशुद्धि करना आवश्यक नहीं रहता ।

३. किसी संत ने वास्तुशुद्धि करना मना किया हो, तब वास्तुशुद्धि न करें; क्योंकि वहां उस संत का संकल्प कार्य करता है ।

४. धर्मशास्त्रानुसार वास्तुशुद्धि करने से साधना अच्छी होने में सहायता होती है ।

– श्री. राजेंद्र शिंदे (सनातनके ६ वे संत पू. राजेंद्र शिंदे), सनातन आश्रम, देवद

 

अंत में कृतज्ञता व्यक्त करें !

वास्तुशुद्धि का कार्य पूरा होने पर उपास्यदेवता और वास्तुशुद्धि में सहायक हुए उपकरणों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें ।

नामजप कैसे और कौन-सा करें,  इस विषय में विस्तृत जानकारी यहां देखिए !