हिन्दू अपने घर में वास्तुशांति करते हैं, मुस्लिम तथा ईसाई अपने घरों में यह विधि नहीं करते । तो क्या उन्हें भी कष्ट होता है ?

इस्लाम और ईसाइयत का इतिहास केवल २००० वर्ष पुराना है; परंतु सनातन हिन्दू धर्म सृष्टि के प्रारंभ से है । इसलिए आज जो अलग-अलग पंथ हैं अथवा भिन्न विचारधारा के कारण जो अलग हुए हैं, वे भी कभी हिन्दू ही थे । सनातन धर्म अनादि अर्थात सृष्टि के प्रारंभ से होने के कारण उसके जो नियम हैं अथवा शास्त्र है, उसका सभीपर परिणाम होता ही है । जैसे श्राद्ध हो अथवा वास्तु से संबंधित कोई कृति, यह शास्त्र है; कोई विचारधारा नहीं है । इसलिए हर व्यक्ति पर उसका परिणाम अवश्य होगा ।

हिन्दू धर्म और उसके तत्त्व विश्‍वव्यापक हैं । जैसे भगवान सूर्य का कार्य प्रकाश के साथ सृष्टि को ऊर्जा देना है । वह सभी को समान रूप से दे ही रहे हैं ना ? हिन्दू, मुसलमान अथवा ईसाई, ऐसा कुछ भेद वे करते हैं क्या ? यदि तब भी कोई सूर्यनमस्कार का विरोध करे, तो यह उनकी संकुचित मनोवृत्ति का लक्षण है ।

हमारे यहां ‘वास्तुशास्त्र’ है । अब यह शास्त्र है, इसलिए सब पर परिणाम होगा । मुसलमान-ईसाई छोड दीजिए । चायना ने भी इस शास्त्र का अध्ययन कर, उसे ‘फेंगशुई’ नाम से प्रचारित किया । उन्होंने ‘विंड चाइम’, ‘लाफिंग बुद्धा’, ‘लुक-फुक-साऊ की प्रतिमा’, ऐसे विविध शो-पीस सकारात्मक ऊर्जा निर्मिति के लिए बाजार में प्रचारित किए । हम हिन्दू भी उसे खरीदकर अपने घरों में लगा रहे हैं ।

इसलिए अच्छा यही होगा कि हम भूखंड खरीदने से लेकर वास्तु निर्माण तक, प्रत्येक कृति शास्त्र के अनुसार करें । जिन भवनों की निर्मिति इसप्रकार नहीं हुई है और वहां निवास करनेवाले लोग कुछ कष्ट अनुभव कर रहे हैं, तो वास्तुशास्त्र के अनुसार उसमें सुधार करें । यदि यह संभव नहीं है तो आंगन में तुलसी का पौधा लगाना, अगरबत्ती अथवा नीम के पत्तों से वास्तु की शुद्धि करना, प्रतिदिन गोमूत्र छिडकना, वास्तु में देवता का नामजप यंत्रपर निरंतर लगाकर रखना आदि उपायों से आप वास्तु में होनेवाले कष्ट को दूर कर सकते हैं ।

इस संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि घर के सदस्य साधना करें । इसका कारण यह है कि वास्तु पर सबसे अधिक प्रभाव घर में रहनेवाले व्यक्तियों के स्वभाव अथवा आचरण का होता है । साधना से आपकी और वास्तु की भी सुरक्षा होगी ।

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