हाथ-पैर धोना तथा कुल्ला करनेके संदर्भमें आचार

सारणी

१. हाथ-पैर धोना तथा कुल्ला करनेके संदर्भमें आचार

१ अ. दुर्गंध दूर होनेतक हाथ मिट्टीसे रगडकर धोना

१ आ. पश्चिमकी ओर मुख कर पैर धोना

१ इ. कुल्ला करना एवं उसका महत्त्व

१ ई. हाथके दैवीगुण संपन्न जलको आंखोंपर लगानेसे मस्तिष्ककी रिक्तता शुद्ध होना

१ उ. आचमन करना

१ ऊ. विष्णुस्मरण करना


 

१. हाथ-पैर धोना तथा कुल्ला करनेके संदर्भमें आचार

लघुशंका तथा शौचविधिके उपरांत दुर्गंध दूर होनेतक मिट्टीसे हाथ रगडकर धोएं । (मिट्टीसे धोना संभव न हो, तो साबुनसे धोएं ।) तदुपरांत पैर धोएं और कुल्ला करें । तदनंतर अंजुलिमें जल लेकर चेहरेपर घुमाएं तथा आंखें धोएं । तदुपरांत आचमन एवं विष्णुस्मरण करें ।

शास्त्र : ‘हाथ तथा पैर धोना, ये दोनों क्रियाएं बाह्य शुद्धिसे संबंधित हैं, जबकि शरीरकी अंतर्गत शुद्धि हेतु उसके उपरांत कुल्ला करना, आचमन एवं विष्णुस्मरण आवश्यक है ।

 

१ अ. दुर्गंध दूर होनेतक हाथ मिट्टीसे रगडकर धोना

मिट्टीमें पृथ्वी तथा आप तत्त्वसे संबंधित गंधदर्शक भूमितरंगें सुप्तावस्थामें विद्यमान होती हैं । देहकी उत्सर्जित गंधप्रक्रिया पृथ्वी तथा आपतत्त्वोंसे संबंधित है । इसीसे लघुशंका एवं शौच धारणा उत्पन्न होती हैं । इसलिए इन उत्सर्जित गंधतरंगोंके उच्चाटन हेतु इस प्रक्रियामें अशुद्ध हुए हाथको मिट्टीसे रगडकर धोते हैं । हाथको हुए मिट्टीके मर्दनात्मक स्पर्शसे गंधदर्शक तरंगोंका उत्सर्जन होता है । मिट्टीके भूमितत्त्वसे संबंधित गंधतरंगोंद्वारा इन तरंगोंका उच्चाटन होता है । इससे उत्सर्जित गंधदर्शक तरंगोंका शरीरसे संपर्क कम हो पाता है ।’ – सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, १२.१२.२००७, दोपहर २.५५)

 

दुर्गंध नष्ट करने हेतु, पृथ्वी अथवा आपतत्त्वसे समृद्ध घटकके उपयोगका आधारभूत शास्त्र

संकलनकर्ता : पृथ्वीतत्त्वसे संबंधित उत्सर्जित गंधका उच्चाटन करनेके लिए मिट्टी, अर्थात् पृथ्वीतत्त्वका उपयोग करनेके स्थानपर जल, अर्थात् आपतत्त्व परिणामकारक क्यों नहीं होता ?

 

सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान : जलसे हाथ धोनेसे भी पृथ्वीतत्त्वसे संबंधित उत्सर्जित गंधका उच्चाटन हो सकता है; परंतु उत्सर्जित गंधका स्थूल स्तरपर त्वचापर घनीभूत जडत्वदर्शक दुर्गंधयुक्त परिणाम नष्ट करनेके लिए, उस स्थानपर मिट्टीकी स्थूल गंधका उपयोग अधिक उचित है । बाह्यतः भी मिट्टीकी गंधसे मन प्रसन्न करनेकी प्रक्रियाको मानसिक स्तरपर बनाए रखनेकी योजना इस प्रक्रियामें दिखाई देती है । मिट्टीके मर्दनसे त्वचामें घनीभूत जडत्वदायी उत्सर्जित गंधयुक्त परिणाम नष्ट होता है तथा त्वचाके रंध्र मृत्तिकागंधसे भर जाते हैं । इससे मनके स्तरपर जीवको दुर्गंधके प्रति प्रतीत घृणा भी नष्ट हो जाती है । स्थूल जडत्वदर्शक दुर्गंध नष्ट करने हेतु यथासंभव पृथ्वीतत्त्वसे समृद्ध घटकोंका उपयोग किया जाता है, जबकि उत्सर्जित वायुओंके कार्यसे निर्मित सूक्ष्म-दुर्गंधदर्शक परिणाम नष्ट करने हेतु यथासंभव पृथ्वीतत्त्वसे परे जाकर आपतत्त्वकी सहायता लेते हैं । – सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, १२.१२.२००७, दोपहर २.५५)

 

१ आ. पश्चिमकी ओर मुख कर पैर धोना

‘शौच एवं लघुशंका जैसी कृति करते समय पैरके संपर्कमें आई रज-तमात्मक तरंगोंका पैर धोनेसे जलमें विसर्जन होता है तथा देह शुद्ध हो जाता है ।’ – सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ११.१२.२००७, दोपहर २.३४)

प्राङ्मुखोऽन्नानि भुञ्जीत्तोच्चरेद्दक्षिणामुखः ।
उदङ्मुखो मूत्रं कुर्यात्प्रत्यक्पादावनेजनमिति ।। – आपस्तम्बधर्मसूत्र, १.११.३१.१

अर्थ : पूर्वकी ओर मुख कर अन्न ग्रहण करें; दक्षिण दिशामें मुख कर मल एवं उत्तर दिशामें मुख कर मूत्रका त्याग करें तथा पश्चिममें मुख कर पैर धोएं ।

 

पश्चिमकी ओर मुख कर पैर धोनेका आधारभूत शास्त्र

‘धर्माचारके अनुसार विशिष्ट दिशामें विशिष्ट वायुमंडलमें विशिष्ट कृति करनेसे वायुमंडलको दूषित किए बिना ब्रह्मांडकी विशिष्ट शक्तिरूपी गतितरंगोंमें उचित संतुलन रखा जाता है । पश्चिम दिशा कर्मकी, अर्थात् विचारधारणाके रजोगुणकी क्रिया हेतु आमंत्रित करती है, इसलिए इस स्थानपर पैर धोकर शुद्धीकरण करनेसे आगेकी क्रियाके संबंधमें जीवके मनमें उन विशिष्ट विचारोंकी गतिके लिए पूरक चक्र निर्माण होता है तथा भविष्यकालीन कृतिविषयक कर्मरूपी सूक्ष्म विचारधाराको गति मिलती है ।

 

विशिष्ट दिशामें मुख कर, विशिष्ट तरंगोंके स्पर्शके स्तरपर विशिष्ट कर्म करना, पाप-मार्जन एवं पुण्य-प्राप्ति हेतु सहायक है ।’ – सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २.६.२००७, दोपहर १.५९)

 

१ इ. कुल्ला करना एवं उसका महत्त्व

कुल्ला करनेसे रातभर देहसे उत्सर्जित तमोगुणी वायुओंका मुखमें घनीभूत प्रवाह उत्सर्जित होना

‘हाथ-पैर धोनेके उपरांत तत्काल झुककर दाएं हाथसे मुखमें जल भरकर, तीन बार कुल्ला कर बाहर थूकें । ‘कराग्रे वसते लक्ष्मीः …’ यह श्लोकपाठ करनेसे अंजुलिमें आया देवत्व (हाथकी अंजुलिमें लिए) जलमें संक्रमित होता है । जल सर्वसमावेशक है, इसलिए यह देवत्वरूपी तरंगोंको तत्काल ग्रहण करता है । दैवीगुणोंसे संपन्न यही देवत्वरूपी जल कुल्ला करनेके लिए मुखमें भरनेसे, रातभर देहसे उत्सर्जित तमोगुणी वायुओंके मुखमें घनीभूत प्रवाह को, थूकनेकी क्रियाके माध्यमसे (जलके प्रवाहसहित) बाहर उत्सर्जित करता है ।

 

झुककर कुल्ला करनेसे मुख तथा देहकी रिक्ति स्वच्छ होकर चैतन्यमय बनना

झुककर कुल्ला करनेसे देहकी रिक्तिमें विद्यमान ऊर्ध्व दिशामें प्रवाहित सूक्ष्म-वायु कार्यरत होनेसे यह वायु ही देहकी रिक्तिमें घनीभूत अन्य त्याज्य वायुओंको ऊर्ध्वगामी पद्धतिसे बाहर धकेलनेमें सहायता करती है । इससे मुख तथा देहकी रिक्ति स्वच्छ होकर चैतन्यमय बनना आरंभ होती है ।

 

१ ई. हाथके दैवीगुणसंपन्न जलको आंखोंपर लगानेसे मस्तिष्ककी रिक्तता शुद्ध होना

अंजुलिमें भरा दैवीगुणसंपन्न जल आंखोंपर लगानेसे, आंखोंकी कोटरिकाको चैतन्य प्रदान कर वह आज्ञा-चक्रको जागृत करता है । इससे मस्तिष्ककी रिक्तिकी शुद्धि आरंभ होती है । आज्ञा-चक्रकी जागृति, क्रियाके स्तरपर देहको जागृति प्रदान करनेका प्रतीक है । इससे दिनभर हाथसे होनेवाले साधन उचित पद्धति एवं आचारसहित होते हैं ।’ – सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)

 

१ उ. आचमन करना

‘आचमन करनेसे मंत्रसहित शुद्धोदक प्राशन करनेसे देहकी अंतर्गत रिक्तियोंके रज-तमात्मक तरंगोंका विघटन होता है तथा देहकी आंतरिक शुद्धि होती है ।’ – सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ११.१२.२००७, दोप. २.३४)

 

१ ऊ. विष्णुस्मरण करना

देहके चारों ओर सुरक्षाकवचकी निर्मिति हेतु भावपूर्वक विष्णुस्मरण सहायक है । इससे जीव आगेका कर्म करनेमें शुद्धताके स्तरपर सिद्ध बनता है ।’ – सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ११.१२.२००७, दोप. २.३४)

 

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘दिनचर्यासे संबंधित आचार एवं उनका शास्त्रीय आधार’