तैलाभ्यंग एवं अभ्यंगस्नान

सारिणी

१. अभ्यंगस्नान

२. अभ्यंगस्नानका महत्त्व

३. तैलाभ्यंग एवं अभ्यंगस्नानकी प्रत्यक्ष विधि

४. नरक चतुर्दशीके दिन देहपर तेलमिश्रित उबटन लगाकर अभ्यंगस्नान करनेके परिणाम

५. स्नानके उपरांत स्नानकर्ताद्वारा मंत्रोच्चारण करना

६. अभ्यंगस्नानके समय अपामार्ग अर्थात चिचडेको देहके चारों ओर घुमानेका कारण

 


१. अभ्यंगस्नान

शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण चतुर्दशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी नरक चतुर्दशीके नामसे पहचानी जाती है । भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुरको उसके अंत समय दिए वरके अनुसार इस दिन सूर्योदयसे पूर्व जो अभ्यंगस्नान करता है, उसे नरकयातना नहीं भुगतनी पडती । अभ्यंगस्नान अर्थात सुगंधित तेल एवं उबटन लगाकर किया गया स्नान । बलिप्रतिपदाके दिन भी प्रातः अभ्यंगस्नानके उपरांत सुहागिनें अपने पतिकी आरती उतारती हैं ।

२. अभ्यंगस्नानका महत्त्व

मरते समय नरकासुरने भगवान श्रीकृष्णसे वर मांगा, कि ‘आजके दिन मंगलस्नान करनेवाला नरककी यातनाओंसे बच जाए ।’ तदनुसार भगवान श्रीकृष्णने उसे वर दिया । इसलिए इस दिन सूर्योदयसे पूर्व अभ्यंगस्नान करनेकी प्रथा है । भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुरको दिए गए वरके अनुसार इस दिन सूर्योदयसे पूर्व जो अभ्यंगस्नान करता है, उसे नरकयातना नहीं भुगतनी पडती ।

दीपावलीके दिनोंमें अभ्यंगस्नान करनेसे व्यक्तिको अन्य दिनोंकी तुलनामें ६ प्रतिशत सात्त्विकता अधिक प्राप्त होती है । सुगंधित तेल एवं उबटन लगाकर शरीरका मर्दन कर अभ्यंगस्नान करनेके कारण व्यक्तिमें सात्त्विकता एवं तेज बढता है । नरकचतुर्दशीके दिन अभ्यंगस्नान करनेसे शक्तिका २ प्रतिशत, चैतन्यका ३ प्रतिशत, आनंदका १ दशमलव पच्चीस प्रतिशत एवं ईश्वरीय तत्त्वका १ प्रतिशत मात्रामें लाभ मिलता है ।

३. तैलाभ्यंग एवं अभ्यंगस्नानकी प्रत्यक्ष विधि

तैलाभ्यंगस्नानके लिए संकल्प किया जाता है । संकल्पके उपरांत घरकी वयोवृद्ध स्त्रीद्वारा पीढेपर बैठे व्यक्तिको सर्वप्रथम कुमकुमका तिलक लगाया जाता है । तदुपरांत उसके शरीरपर सुगंधित तेल लगाया जाता है । तदुपरांत सुगंधित तेल एवं उबटनका लेप बनाकर, तेलके समान ही पूरे शरीरपर लगाया जाता है । इसके पश्चात आरती उतारी जाती है । स्नानके समय, पहले दो लोटेभर गुनगुना पानी शरीरपर डाला जाता है ।

४. नरक चतुर्दशीके दिन देहपर तेलमिश्रित
उबटन लगाकर अभ्यंगस्नान करनेके परिणाम 

भावसहित उबटन लगाए जानेसे, लगवानेवालेकी देहमें भावके वलयकी उत्पत्ति होती है । तेलमिश्रित उबटन लगानेके कारण तेजतत्त्वस्वरूप शक्तिका प्रवाह व्यक्तिकी ओर आकृष्ट होता है तथा देहमें इस शक्तिके वलयकी उत्पत्ति होती है । शक्तिके इस वलयद्वारा व्यक्तिकी देहमें शक्तिके प्रवाह एवं शक्तिके कण फैलते हैं । पातालकी बलवान अनिष्ट शक्तियोंद्वारा व्यक्तिकी देहमें एकत्रित काली शक्तिका विघटन होता है तथा व्यक्तिकी देहपर बना काला आवरण दूर होता है । उबटन लगाने के उपरांत स्नान आरंभ करनेपर देह में ईश्वरीय तत्वका प्रवाह आकर्षित होता है तथा आकर्षित देहमें उसका वलय घनीभूत होता है । ईश्वरसे चैतन्यका प्रवाह स्नानके जलमें आकर्षित होता है तथा जलमें इस चैतन्यके वलयकी उत्पत्ति होती है । इस वलयद्वारा आपतत्त्वस्वरूप चैतन्यका प्रवाह व्यक्तिकी देहकी ओर प्रक्षेपित होता है । व्यक्तिकी देहमें इस चैतन्यका वलय एकत्रित होता है । आपतत्त्वात्मक चैतन्यके वलयद्वारा चैतन्यके प्रवाह वातावरणमें प्रक्षेपित होते हैं । वातावरणमें गंधस्वरूप चैतन्यके कण संचारित होते हैं । स्नान करते समय व्यक्तिकी देहमें आनंदका प्रवाह आकर्षित होता है तथा व्यक्तिकी देहमें आनंदके वलयकी उत्पत्ति होती है ।

५. स्नानके उपरांत स्नानकर्ताद्वारा मंत्रोच्चारण करना

अपने शरीरके चारों ओर अपामार्ग अर्थात चिचड़ेका पौधा दार्इं ओरसे बार्इं ओर तीन बार घुमाते हैं । (मंत्र) उस समय पापनाश करनेके लिए अपामार्गसे अर्थात चिचडेसे प्रार्थना करते हैं । प्रार्थनाका श्लोक इस प्रकार है,

सीतालोष्ठसमायुक्त सकण्टकदलान्वित ।

हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणः पुनः पुनः ।। – धर्मसिंधु

 इसका अर्थ है, जोती हुई भूमिकी मिट्टी, कांटे तथा पत्तोंसे युक्त, हे अपामार्ग, आप मेरे पाप दूर कीजिए । जिनके लिए श्लोकपाठ करना संभव न हो, वे इसके अर्थको समझकर प्रार्थना करें । प्रार्थना कर अपामार्गको देहके चारों ओर घुमानेसे नरकका भय नहीं रहता ।

६. अभ्यंगस्नानके समय अपामार्ग
अर्थात चिचडेको देहके चारों ओर घुमानेका कारण

अपामार्ग अर्थात चिचडा प्राणशक्ति प्रदान करता है । इसके पत्तोंमें विद्यमान रंगकणोंमें तेजउत्पत्तिकी, तो गंधकणोंमें प्राणवायुको पुष्टि देनेकी क्षमता होती है । इसीलिए मांगलिक स्नानमें चिचडेका उपयोग करनेकी पद्धति है । चिचडेसे देहके चारों ओर मंडल बनानेसे, व्यक्तिकी देहके भीतर एवं बाहर विद्यमान रज-तम कण नष्ट होते हैं ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव व व्रत’