दीपावलीका पूर्वायोजन

सारिणी

१. दिवाली अर्थात दीपावली
२. दीपावलीका पूर्वायोजन
३. दीपावलीमें बनाई जानेवाली विशेष रंगोलियां
४. तेलके दीप जलाना
५. दीपावलीका एक आकर्षण है, आकाशदीप अथवा आकाशकंदील
६. दीपावली पर्वपर बच्चोंद्वारा बनाए जानेवाले घरौंदे एवं किले
७. दीपावली शुभसंदेश देनेवाला एक महान पर्व है, दीपावलीके शुभेच्छापत्र
८. दीपावली मनानेका एक अन्य महत्त्वपूर्ण अंग है, पटाखे
९. दीपावली पर्वके अंतर्गत आनेवाले महत्त्वपूर्ण दिन हैं, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मीपूजन एवं बलिप्रतिपदा

 


 

१. दिवाली अर्थात दीपावली

दीपावली शब्द दीप एवं आवली की संधिसे बना है । आवली अर्थात पंक्ति । इस प्रकार दीपावली शब्दका अर्थ है, दीपोंकी पंक्ति । दीपावलीके समय सर्वत्र दीप जलाए जाते हैं, इसीलिए इस त्योहारका नाम दीपावली है । भारतवर्षमें मनाए जानेवाले सभी त्यौहारोंमें दीपावलीका सामाजिक एवं धार्मिक इन दोनों दृष्टियोंसे अत्यधिक महत्त्व है । इसे दीपोत्सव भी कहते हैं । ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय ।’ अर्थात अंधेरेसे ज्योति अर्थात प्रकाशकी ओर जाइए’ यहउपनिषदोंकी आज्ञा है । अपने घरमें सदैव लक्ष्मीका वास रहे, ज्ञानका प्रकाश रहे, इसलिए हरकोई बडे आनंदसे दीपोत्सव मनाता है । प्रभु श्रीराम चौदह वर्षका वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे, उस समय प्रजाने दीपोत्सव मनाया । तबसे प्रारंभ हुई दीपावली ! इसे उचित पद्धतिसे मनाकर आप सभीका आनंद द्विगुणित हो, यह शुभकामना !

 

२. दीपावलीका पूर्वायोजन

दीपावली आनेसे पूर्व ही लोग अपने घर-द्वारकी स्वच्छतापर ध्यान देते हैं । घरका कूडा-करकट साफ करते हैं । घरमें टूटी-फूटी वस्तुओंको ठीक करवाकर घरकी रंगाई करवाते हैं । इससे उस स्थानकी न केवल आयु बढती है, वरन आकर्षण भी बढ जाता है । वर्षाऋतुमें फैली अस्वच्छताका भी परिमार्जन हो जाता है । स्वच्छताके साथ ही घरके सभी सदस्य नए कपडे सिलवाते हैं । विविध मिठाइयां भी बनायी जाती हैं । ब्रह्मपुराणमें लिखा है, कि दीपावलीको श्री लक्ष्मीसदगृहस्थोंके घरमें विचरण करती हैं । घरको सब प्रकारसे स्वच्छ, शुद्ध एवं सुशोभित कर दीपावली मनानेसे श्री लक्ष्मीप्रसन्न होती हैं तथा वहां स्थायीरूपसे निवास करती हैं ।

 

३. दीपावलीमें बनाई जानेवाली विशेष रंगोलियां

दीपावलीके पूर्वायोजनका ही एक महत्त्वपूर्ण अंग है, रंगोली । दीपावलीके शुभ पर्वपर विशेष रूपसे रंगोली बनानेकी प्रथा है । रंगोलीके दो उद्देश्य हैं – सौंदर्यका साक्षात्कार एवं मंगलकी सिद्धि । रंगोली देवताओंके स्वागतका प्रतीक है । रंगोलीसे सजाए आंगनको देखकर देवता प्रसन्न होते हैं । इसी कारण दिवालीमें प्रतिदिन देवताओंके तत्त्व आकर्षित करनेवाली रंगोलियां बनानी चाहिए तथा उस माध्यमसे देवतातत्त्वका लाभ प्राप्त करना चाहिए ।

 

४. तेलके दीप जलाना

रंगोली बनानेके साथही दीपावलीमें प्रतिदिन किए जानेवाला यह एक महत्त्वपूर्ण कृत्य है । दीपावलीमें प्रतिदिन सायंकालमें देवता एवं तुलसीके समक्ष, साथ ही द्वारपर एवं आंगनमें विविध स्थानोंपर तेलके दीप लगाए जाते हैं । यह भी देवता तथा अतिथियोंका स्वागत करनेका प्रतीक है । आजकल तेलके दीपके स्थानपर मोमके दीप लगाए जाते हैं अथवा कुछ स्थानोंपर बिजलीके दीप भी लगाते हैं । परंतु शास्त्रके अनुसार तेलके दीप लगानाही उचित एवं लाभदायक है । तेलका दीप एक मीटरतककी सात्त्विक तरंगें खींच सकता है । इसके विपरीत मोमका दीप केवल रज-तमकणोंका प्रक्षेपण करता है, जबकि बिजलीका दीप वृत्तिको बहिर्मुख बनाता है । इसलिए दीपोंकी संख्या अल्प ही क्यों न हो, तो भी तेलके दीपकी ही पंक्ति लगाएं ।

 

५. दीपावलीका एक आकर्षण है, आकाशदीप अथवा आकाशकंदील

विशिष्ट प्रकारके रंगीन कागज, थर्माकोल इत्यादिकी विविध कलाकृतियां बनाकर उनमें बिजलीके दिये लगाए जाते हैं, उसे आकाशदीप अथवा आकाशकंदील कहते हैं । आकाशदीप सुशोभनका ही एक भाग है ।

 

६. दीपावली पर्वपर बच्चोंद्वारा बनाए जानेवाले घरौंदे एवं किले

दीपावलीके अवसरपर उत्तर भारतके कुछ स्थानोंपर बच्चे आंगनमें मिट्टीका घरौंदा बनाते हैं, जिसे कहींपर ‘हटरी’, तो कहीं पर ‘घरकुंडा’के नामसे जानते हैं । दीपसे सजाकर, इसमें खीलें, बताशे, मिठाइयां एवं मिट्टीके खिलौने रखते हैं । महाराष्ट्रमें बच्चे किला बनाते हैं तथा उसपर छत्रपति शिवाजी महाराज एवं उनके सैनिकोंके चित्र रखते हैं । इस प्रकार त्यौहारोंके माध्यमसे पराक्रम तथा धर्माभिमानकी वृद्धि कर बच्चोंमें राष्ट्र एवं धर्मके प्रति कुछ नवनिर्माणकी वृत्तिका पोषण किया जाता है ।

 

७. दीपावली शुभसंदेश देनेवाला एक महान पर्व है । 

दीपावलीके मंगल पर्वपर लोग अपने सगे-संबंधियों एवं शुभचिंतकोंको, आनंदमय दीपावलीकी शुभकामनाएं देते हैं । इसके लिए वे शुभकामना पत्र भेजते हैं तथा कुछ लोग उपहार भी देते हैं । ये साधन जितने सात्त्विक होंगे, देनेवाले एवं प्राप्त करनेवालेको उतना ही अधिक लाभ, होगा । शुभकामना पत्रोंके संदेश एवं उपहार, यदि धर्मशिक्षा, धर्मजागृति एवं धर्माचरणसे संबंधित हों, तो प्राप्त करनेवालेको इस दिशामें कुछ करनेकी प्रेरणा भी मिलती है । हिंदू जनजागृति समिति एवं सनातन संस्थाद्वारा इस प्रकारके शुभेच्छापत्र बनाए जाते हैं ।

 

८. दीपावली मनानेका एक अन्य महत्त्वपूर्ण अंग है, पटाखे

दीपावलीपर छोटे-बड़े, हर आयुवर्गके लोग पटाखे जलाकर आनंद व्यक्त करते हैं; परंतु क्या वास्तवमें पटाखोंका ऐसा उपयोग उचित है ? पटाखे जलानेका अर्थ है, बारूदके माध्यमसे उत्सवकी शोभा बढानेका एक प्रयास ! इसकी तुलनामें, उससे होनेवाली हानि कहीं अधिक है । पटाखे जलानेसे होनेवाले प्रदूषणके कारण आरोग्यकी हानि होनेके साथ ही आर्थिक हानि भी होती है । आजकल पटाखोंपर देवता, राष्ट्रपुरुषोंके चित्र बने होते हैं, उदा. लक्ष्मी छाप बम, कृष्णछाप फुलझडी, नेताजी छाप पटाखा इत्यादि । ऐसे पटाखे जलाकर देवताओंके चित्रोंके चिथडे कर, हम अपनी ही आस्थाको पैरोंतले रौंदते हैं । इससे हमारी आध्यात्मिक हानि भी होती है । हिंदू जनजागृति समिति, सनातन संस्था जैसे अन्य समविचारी संगठनोंके साथ सन २००० से पटाखोंके कारण होनेवाली हानिको रोकने हेतु जनजागृति अभियान चला रहीं हैं । आप भी इसमें सहभागी हो जाइए ।

 

९. दीपावली पर्वके अंतर्गत आनेवाले महत्त्वपूर्ण
दिन हैं, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मीपूजन एवं बलिप्रतिपदा

ये तीन दिन दीपावलीमें विशेष उत्सवके रूपमें मनाए जाते हैं । वसुबारस अर्थात गोवत्स द्वादशी, धनत्रयोदशी अर्थात धनतेरस तथा भाईदूज अर्थात यमद्वितीया, ये दिन दीपावलीके साथ ही आते हैं । इसलिए, भले ही ये त्यौहार भिन्न हों, फिर भी इनका समावेश दीपावलीमें ही किया जाता है । इन दिनोंको दीपावलीका एक अंग माना जाता है । कुछ प्रदेशोंमें वसुबारस अर्थात गोवत्स द्वादशी को ही दीपावलीका आरंभदिन मानते है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव व व्रत’