श्री महालक्ष्मीदेवी के मंदिर में हुए किरणोत्सव का सूक्ष्म-परीक्षण

 

प्रतिवर्ष कार्तिक मास में लगभग ९, १० और ११ नवंबर को तथा माघ मास में ३१ जनवरी, १ और २ फरवरी तीन दिन श्री महालक्ष्मीदेवी के मंदिर में देवी का किरणोत्सव मनाया जाता है । इस किरणोत्सव का सूक्ष्म-परीक्षण और सूक्ष्म-चित्र इस लेख में देखेंगे ।

 

१. किरणोत्सव के तीन दिनों में सूर्यकिरणों की स्थिति

पहला दिन

सूर्यदेव की किरणें देवी के चरणों पर पडती हैं ।

दूसरा दिन

सूर्याचे किरण देवीच्या मध्यभागावर येतात

तीसरा दिन

सूर्य-किरणें देवी की संपूर्ण मूर्ति पर पडती हैं ।

 

२. उत्सव मनाने की पद्धति

किरणोत्सव के अवसर पर, देवी को पूरे आभूषण पहनाकर पूजा की जाती है । सूर्यकिरणें मूर्ति पर पडने से पहले सब विद्युत दीप बुझाकर, गर्भगृह में केवल दो दीवट जलते हुए रखे जाते हैं । कुछ मिनट पश्‍चात, जब सूर्यकिरणें चली जाती हैं, तब देवी की कर्पूर-आरती तथा घंटानाद किया जाता है ।

 

३. श्री महालक्ष्मीदेवी के किरणोत्सव का
रामनाथी (गोवा) स्थित सनातन के आश्रम में किया गया सूक्ष्म-परीक्षण

९.११.२००७ को कोल्हापुर के श्री महालक्ष्मीदेवी मंदिर में किरणोत्सव प्रारंभ हुआ । इस उत्सव के पहले दिन सूर्यास्त के समय सूर्यदेव की किरणें देवी के चरणों पर पडती हैं । इस घटना का सनातन के रामनाथी (गोवा) स्थित आश्रम में दो साधिकाआें ने जो सूक्ष्म-परीक्षण किया और उस समय जो विचार आए, उन्हें आगे दे रहे हैं ।

‘सूक्ष्म-चित्र और सूक्ष्म-परीक्षण’ देने का कारण यह है कि जब हम कोई कार्य (स्थूलरूप में) करते हैं, तब उसका सूक्ष्म परिणाम क्या होता है, यह जानने की क्षमता अधिकतर लोगों में नहीं होती । सूक्ष्म परिणाम जानने पर (स्थूलरूप में) कार्य करने के विषय श्रद्धा उत्पन्न होती है । इसी प्रकार, सूक्ष्म-चित्र और परीक्षण से सैद्धांतिक ज्ञान का कठिन अंश समझना सरल होता है । इसीलिए, सनातन के ग्रंथों में और सूचना जालस्थल पर भी ‘सूक्ष्म-चित्र’ तथा सूक्ष्म-परीक्षण’ प्रकाशित किए गए हैं ।

३ अ. निम्नांकित सूक्ष्म-ज्ञानसंबंधी परीक्षण कुमारी प्रियांका लोटलीकर ने किया है ।

१. सूर्य देवता तेजतत्त्व के प्रकट रूप और कोल्हापुर की श्री महालक्ष्मीदेवी कार्यरत शक्ति का सगुण रूप प्रतीत होना

अ. सूर्य, तेजतत्त्व का प्रकट रूप है । इसलिए, ऐसा लगा कि सूर्य-किरणों से तेजतत्त्व प्रसारित हो रहा है ।

आ. प्रतीत हुआ कि कोल्हापुर की श्री महालक्ष्मीदेवी, कार्यरत शक्ति-तत्त्व की सगुण रूप हैं ।

२. सूर्य के तेजतत्त्व और देवी की कार्यरत प्रकट शक्ति के मिलन से वातावरण चैतन्यमय होकर, वायुमंडल में देवी की शक्ति-तरंगें और अनिष्ट शक्तियों की काली शक्ति में युद्ध होना

अ. जब सूर्य के तेजतत्त्व और देवी की कार्यरत प्रकट शक्ति के मिलन से वातावरण चैतन्यमय हुआ, तब प्रतीत हुआ कि वायुमंडल में शक्ति की तरंगे और अनिष्ट शक्तियों की काली शक्ति के बीच युद्ध हो रहा है ।

आ. मुझे लग रहा है कि वातावरण में ऊर्जा की तरंगें प्रवेश कर रही हैं ।

इ. लगभग एक घंटे पश्‍चात वातावरण में युद्ध की तीव्रता घटी है और वातावरण चैतन्यमय हुआ है, इससे बहुत उत्साह अनुभव हो रहा है ।

३. देवी के सगुण रूप का दर्शन होना, उनका तेज देखकर आंखें चौंधियाना और भावजागृति होना

अ. मुझे देवी का सगुण रूप दिखाई दे रहा है । देवी की मनोहर मूर्ति का रूप मेरी आंखों में समा गया है । उनके तेज से मेरी आंखें चौंधिया रही हैं । (इस घटना से पता चलता है कि सूक्ष्मरूप में देवी के दर्शन कैसे किए जा सकते हैं । – संकलनकर्त्ता)

आ. अब मैं देवी का एक-एक अवयव निहार रही हूं, इससे मेरे भाव जागृत हो रहे हैं ।

इ. कुछ ही पलों में लगने लगा कि मेरा सिर देवी के चरणों पर है !’

३ आ. श्रीमती अंजली गाडगीळ कृत सूक्ष्म-ज्ञान का परीक्षण

१. पहले के समय में ईश्‍वरेच्छा से देवालयों का निर्माण होना

श्री महालक्ष्मीदेवी का यह मंदिर हेमाडपंथी लोगों ने सातवीं शताब्दी में बनवाया है । पहले के समय में देवता भक्त को दर्शन देकर, देवालय-निर्माण के विषय में मार्गदर्शन करते थे और उसमें उनका आसन कहां हो, यह भी बताते थे । इस प्रकार, देवालयों का निर्माण पूर्णतः ईश्‍वर की इच्छा से किया जाता था ।

२. देवालय की विशेषताएं

देवालयों का निर्माण, स्थान और काल का विचार कर, उद्देश्य के अनुरूप किया जाता था ।

३. श्री महालक्ष्मीदेवी का मंदिर सृष्टि के प्रत्येक घटनाक्रम का साक्षी

श्री महालक्ष्मीदेवी के मंदिर का निर्माण करते समय भी काल और उचित स्थान का विचार किया गया है । इसलिए, वह सृष्टि की प्रत्येक घटना का साक्षी (गवाह) है ।

३अ. ‘साक्षी’ शब्द की व्याख्या

किसी घटना को अपनी आंखों से देखने और कानों से सुननेवाले प्रगल्भ व्यक्ति को ‘साक्षी’ कहते हैं । यह साक्षी ही प्रत्येक घटना के विषय में विस्तार से बता सकता है ।

४. देवालय की विशेष रचना से, सूर्यमंडल में भ्रमण करनेवाली तेजतत्त्व-तरंगों को कालानुसार खींचकर मूर्ति में स्थित देवता-तत्त्व को जागृत रखना

इस मंदिर की रचना ऐसी है कि इससे प्रक्षेपित होनेवाली आकर्षणयुक्त तरंगें, सूर्यमंडल में भ्रमण करनेवाली तेजतत्त्व-तरंगों को कालानुसार अपनी ओर खींचती हैं, जिससे देवी की मूर्ति में स्थित देवता-तत्त्व प्राकृतिक रूप से जागृत रहता है ।

५. पूर्वकाल में देवता, भक्त की प्रत्येक इच्छा पूर्ण करते थे, इसका कारण ?

पूर्वकाल में देवता के मंदिर इस पद्धति से बनाए जाते थे कि उसमें स्थापित देवतामूर्ति का देवत्व सूर्यमंडल की प्राकृतिक तेजोमय तरंगों के स्पर्श से निरंतर जागृत रहे । इसलिए, उसमें भक्त की प्रत्येक इच्छा पूर्ण करने का सामर्थ्य होता था ।

६. देवी का एक वर्ष पहले ही सूक्ष्म-परीक्षण करने के विषय में सूर्यकिरणों के माध्यम से सूचना मिलना

यह सूक्ष्म-परीक्षण करने से एक वर्ष पहले कोल्हापुर के शक्ति उपासक परम पूज्य भगवानदास महाराज सनातन आश्रम में आए थे । एक दिन जब वे नामजप कर रहे थे, तब मैं आध्यात्मिक उपाय के लिए उनके सामने बैठी थी । उस समय मुझे लगा कि मैं श्री महालक्ष्मीदेवी के मंदिर में हूं और देवी की मूर्ति से निकलनेवाला प्रकाशपुंज आशीर्वाद के रूप में मेरे शरीर पर घूम रहा है । उस घटना का अर्थ मुझे अब समझा । क्योंकि, अब मुझे देवी के चरणों पर पडनेवाले सूर्यकिरणों का सूक्ष्म-परीक्षण करना है । देवी ने मुझे एक वर्ष पहले ही यह परीक्षण करने के लिए आशीर्वाद दिया था, यह बोध होने से मन कृतज्ञताभाव से भर गया है ।

७. पूर्वकाल में बने मंदिरों के शिखरों में सूक्ष्म-छिद्ररूप में स्थित झरोखे, सूर्यमंडल के कार्यकारी भाव से निकलनेवाली तेजोमय तरंगों को घनीभूत करनेवाले होना और देवताआें का उनके माध्यम से काल के अनुरूप कार्य करना

पूर्वकाल में देवालयों के शिखरों में स्थित सूक्ष्म छिद्ररूपी झरोखे, सूर्यमंडल के कार्यकारी भाव से निकलनेवाली तेजोमय तरंगों से संबंधित होते थे । इसलिए, वे छिद्र उस-उस काल में कालबोध से युक्त होकर भूमंडल की ओर आनेवाली सूर्यतरंगों को खींचकर देवीमूर्ति में काल के अनुरूप कार्य करनेवाली तेज-तत्त्व तरंगों को घनीभूत करते थे । इसलिए, देवलोक के देवता भूमंडल में आकर काल के अनुरूप भक्तों का कल्याण करते थे ।

८. श्री महालक्ष्मीदेवी के मंदिर में आनेवाली कालानुरूप तारक-मारक तत्त्वों से सुसज्जित सूर्यकिरणों का देवी के शक्तिरूपी कार्य से संबंधित होना

श्री महालक्ष्मीदेवी के मंदिर में आनेवाली कालानुरूप तारक-मारक तत्त्वों से सुसज्जित सूर्यकिरणें देवी के शक्तिरूपी कार्य से संबंधित हैं और उस काल में वायुमंडल को शुद्ध करती हैं । यह, एक प्रकार से वायुमंडल में रज-तम की प्रबलता दूर करने के लिए की गई प्राकृतिक व्यवस्था है ।

९. सूर्य का जिस समय दक्षिणायन में प्रवेश होता है, उस समय सूक्ष्मरूप से अध्ययन कर, चैतन्य प्राप्त करने के लिए किस प्रकार उपयोग किया गया, यह किरणोत्सव की प्रक्रिया से समझ में आता है ।

सूर्यमंडल में सूर्य का उत्तरायण से दक्षिणायन में प्रवेश करते समय १७ अंश का कोण बनता है । इस भ्रमणकाल में सूर्यमंडल से प्रक्षेपित होनेवाली ऊर्जा का वेग आघातकारी होता है तथा वह भूतल को भेदकर उसमें जडता के रूप में घनीभूत होती है ।

किरणोत्सव प्रक्रिया का सूक्ष्मरूप से अध्ययन करने पर समझ में आता है कि उससे किस प्रकार चैतन्य प्राप्त किया गया है ।

१०. आश्रम में रहकर साधिका का दूसरे स्थान पर घटी घटना के विषय में बताना

सायंकाल ५.४८ पर ऐसा लग रहा है ये सूर्यकिरणें देवी के चरणों के प्रति आकर्षण के कारण वेग से मंदिर के महाद्वार से गर्भगृह में जा रही हैं । (कोल्हापुर में पूछने पर पता चला कि वहां देवी के चरणों पर सूर्य-किरणें उसी समय पडी थीं । साधिका ने यह परिक्षण गोवा में रहकर किया था । इससे साधना का महत्त्व ध्यान में आता है । – संकनकर्ता)

११. किरणोत्सव की सूक्ष्म कार्यकारी प्रक्रिया के प्रभाव से प्रतीत हुआ कि सूर्यकिरणें देवी के चरणों को स्पर्श कर रही हैं और उस क्षण तलवों में गुदगुदी होना

सूर्यमंडल से निकलनेवाला तेजस्वी प्रकाशपुंज कालानुसार भूमंडल की ओर वेग से आकर्षित हो रहा है । उसी समय प्रतीत हुआ कि देवालय से निकलनेवाली शक्ति-तत्त्व की आकर्षणशक्ति से युक्त ऊर्जा कालरूपी विश्‍व का आकाशमंडल में आलिंगन करने जा रही है । जब इस ऊर्जा का कालरूपी सूर्यमंडल की कार्यकारी तेजस्वी ऊर्जा से मिलन हुआ, तब उनके घर्षण से अनेक तेजोमय नाद उत्पन्न हुए और इन नादों से वायुमंडल का इच्छाशक्ति से युक्त रज-तमरूपी आवरण नष्ट हो रहा है । उसके पश्‍चात प्रतीत हो रहा है कि वायुमंडल अचानक शक्तिदायी ऊर्जा से भर गया है । इस सूक्ष्म प्रक्रिया के प्रभाव के रूप में सूर्य-किरणें देवी के चरणों पर पड रही हैं और मेरे तलवों में गुदगुदी हो रही है ।

१२. सूर्यमंडल से निकलकर उत्तरायण से दक्षिणायन जानेवाली ऊर्जा पहले चरण में आघातकारी, दूसरे चरण में प्रकाशकारी और तीसरे चरण में नादकारी होना तथा इन सबके सम्मिलित प्रभाव से मूर्ति के अवयवों पर सूर्य-किरणें क्रमशः पहुंचने में तीन दिन लगना

सूर्य की तेजस्वी किरणों का सूर्यमंडल से निकलकर उत्तरायण से दक्षिणायन में पहुंचने की क्रिया तीन चरणों में पूरी हुई । पहले चरण में इच्छाशक्ति के बल पर तेजस्वी ऊर्जा का वायुमंडल में भ्रमण हुआ । दूसरे चरण में, क्रिया और तीसरे चरण में ज्ञानरूपी ऊर्जा की सहायता से तेजस्वी ऊर्जा का वायुमंडल में भ्रमण हुआ । इनका सम्मिलित प्रभाव वायुमंडल में स्थित आकाश पर पडा है । परंतु यह ऊर्जा पहले चरण में आघातकारी, दूसरे चरण में प्रकाशकारी और तीसरे चरण में नादकारी है । इनके सम्मिलित प्रभाव से, मूर्ति के उन-उन अवयवों पर सूर्यकिरणें क्रमशः पडने में तीन दिन लगे ।

१३. आघातकारी ऊर्जा देवी के चरणों पर पडती है, प्रकाशकारी ऊर्जा छाती पर तथा नादकारी ऊर्जा मस्तक पर मुकुटसमान विराजमान है । यह इस किरणोत्सव की विशेषता है !

१४. किरणोत्सव के तीन दिनों में मूर्ति का देवत्व पंचतत्त्वों के आधार पर प्रकट होना और मूर्ति में घनीभूत शक्ति-तत्त्व समष्टि को मिलना

आघातकारी ऊर्जा देवी के आसपास स्थित पृथ्वी-तत्त्व और आप-तत्त्व से संबंधित शक्ति-तत्त्वात्मक आवरण जागृत करती है, प्रकाशकारी ऊर्जा तेज-तत्त्व से संबंधित आवरण जागृत करती है तथा नादकारी ऊर्जा समाज का कल्याण करने में सहायक आसपास की वायु और आकाश से संबंधित आवरण जागृत करती है । इस प्रकार, इन तीन दिनों में मूर्ति का देवत्व पंचतत्त्वों के आधार पर प्रकट होता है और उसमें घनीभूत शक्ति-तत्त्व से समाज को लाभ होता है ।

१५. मूर्ति में, इच्छाशक्ति से संबंधित देवी-तत्त्व की जागृति से शक्ति की अनुभूति, क्रिया से संबंधित देवी-तत्त्व की जागृति से आनंद की अनुभूति तथा ज्ञान से संबंधित देवीतत्त्व की जागृति से शांति की अनुभूति होना

मूर्ति की इच्छाशक्ति से संबंधित देवी-तत्त्व की जागृति से शक्ति की अनुभूति होती है, तो क्रिया से संबंधित देवी-तत्त्व की जागृति से आनंद की अनुभूति होती है । उस समय मूर्ति के अनाहतचक्र से आनंद-तरंगें ब्रह्मांडमंडल की ओर प्रक्षेपित होती हैं । शांति की अनुभूति देनेवाली मस्तक पर विराजमान तेजदायी ऊर्जा, ज्ञानमयी होती है । यह ऊर्जा, श्रद्धालु जीव के मन में देवी के विषय में निष्काम भाव जागृत करनेवाली होती है ।

१६. वायुमंडल में रज-तम का प्रकोप तीव्र होना, देवालय के आसपास लगभग आठ-दस फुट मोटा काला आवरण बनना और तेजस्वी किरणें भूमंडल में प्रवेश कर, इस रज-तमात्मक आवरण से युद्ध कर रही हैं, ऐसा लगना

देवी के चरणों पर पडी हुई सूर्यकिरणें, कोहरे में पडनेवाली धूप की भांति फीकी हैं, ऐसा लगा । इसी प्रकार अब वायुमंडल में रज-तम प्रकोप बहुत बढ गया है; इसलिए मंदिर के आसपास लगभग आठ-दस फुट मोटा काला आवरण बन गया है । अब सूर्यकिरणें भूमंडल में इस रज-तमात्मक से युद्ध करते हुए आगे बढ रही हैं । इसलिए, इनकी ऊर्जा का लगभग ७५ प्रतिशत भाग इस युद्ध में ही व्यय हो रहा है और शेष ऊर्जा किसी प्रकार देवी के चरणों तक पहुंच रही है । इस अल्प ऊर्जा से देवीमूर्ति का देवत्व थोडा ही जागृत हुआ है । ऐसी स्थिति में देवी के चरणों पर अथवा उस-उस भाग में किरणें स्पष्टता से नहीं दिखाई दे रही हैं; अन्य समय स्पष्ट दिखाई देती हैं ।

१७. पहले के पीढियों की सात्त्विकता की तुलना में आजकल सात्त्विकता अत्यल्प और भ्रष्टाचार तथा रज-तम अत्यधिक होने से किरणोत्सव के लाभ से समूचा विश्‍व वंचित रहना

आज से १०-२० वर्ष पहले लोगों के मन में देवी के विषय में थोडा-बहुत तो भी भाव होता था । इससे, मंदिर का वायुमंडल शुद्ध रहता था और सूर्यमंडल की किरणों का देवी के चरणों से तुरंत संपर्क होता था । परंतु अब सब ओर भ्रष्टाचार तथा रज-तम फैला हुआ है । इसलिए, किरणोत्सव के लाभ से समूचा विश्‍व वंचित होता जा रहा है ।

१८. मूर्ति की देवत्वरूपी ऊर्जा जागृत न रहने का मुख्य कारण कलियुग के मनुष्य का अनुचित आचरण

कलियुग के मनुष्य ने अपने अनुचित आचरण से संपूर्ण वायुमंडल को दूषित बना दिया है । इसलिए, अब सूर्यमंडल से कालानुसार भूतल पर आनेवाली किरणें देवी के चरणों तक अल्प मात्रा में ही पहुंच पाती हैं । फलतः, मूर्ति की देवत्वरूपी ऊर्जा पूर्णतः नहीं जागृत हो पाती । इसलिए, संपूर्ण मानवजाति अद्भुत कल्याणकारी और चैतन्यदायी अनुभव से वंचित हो गई है ।

१९. किरणोत्सव समाप्त होने का बोध भीतर से होने पर, मैंने देवालय की मानसिक प्रदक्षिणा की, देवी को नमस्कार किया और उनके चरणों में कृतज्ञता व्यक्त कर, इस परीक्षण को विराम दिया ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित लघुग्रंथ करवीरनिवासिनी श्री महालक्ष्मीदेवी (उपासना का शास्त्र और उत्सव)’