गुरु का छायाचित्र घर में लगाने से क्या लाभ होता है ?

१. गुरु का छायाचित्र घर में लगाने से क्या लाभ होता है ?

सम्भव हो तो छायाचित्र पूजाघर में स्थापित करें । गुरु के निरंतर स्मरण हेतु बैठक, रसोईघर अथवा कार्यालय इत्यादि में उनका छायाचित्र लगाया हो, तो अन्य छायाचित्र समान उसे मात्र छायाचित्र न समझकर, वहां प्रत्यक्ष गुरु ही हैं, ऐसा समझना चाहिए ।; क्योंकि शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध एवं उनकी शक्ति के सदा एकत्रित होने के कारण गुरु के छायाचित्र में उनका चैतन्य भी होता है । गुरु के छायाचित्र को प्रत्येक दिन पोंछकर, देवताओं की पूजा करते समय जब अगरबत्ती दिखाते हैं, तो उन्हें भी अगरबत्ती दिखाएं तथा पूजा समाप्त होने पर जब नमस्कार करते हैं तो उन्हें भी नमस्कार करें । कार्यालय में छायाचित्र को अगरबत्ती नहीं दिखा सकते, इसलिए मन से नमस्कार करें । बटुए, जेब, लॉकेट इत्यादि में चित्र रखा हो, तो उसे भी प्रतिदिन बाहर निकालकर मनोभाव से नमस्कार करना चाहिए ।

 

२. गुरु के छायाचित्र पर हार क्यों चढाते हैं ?

‘गुरु सगुणरूप में स्वयं ईश्‍वर हैं’, इसलिए जिस प्रकार देवताओं को हार पहनाते हैं, उसी प्रकार गुरु को भी पहनाते हैं ।’

परात्पर गुरु डॉ. आठवले : जीवित व्यक्तियों के छायाचित्र को हार नहीं पहनाया जाता, मृत्युके पश्‍चात ही हार पहनाते हैं । ऐसे में जीवित सन्तोंके छायाचित्रको हार क्यों पहनाते हैं ?

बाबा (प.पू. भक्तराज महाराज) : सन्तोंके छायाचित्रको हार पहनाते हैं, क्योंकि वे जीवित नहीं होते, मृत ही हैं । (उनका अहंभाव मर चुका होता है ।)

 

३. गुरुकृपा किस प्रकार कार्य करती है ?

जब कोई कार्य हो रहा हो, तब वह कितनी मात्रा में सफल होगा, यह उसमें कार्यरत विविध घटकोंपर निर्भर करता है । स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म अधिक सामर्थ्यवान होता है, जैसे अणुबमसे अधिक शक्तिशाली परमाणुबम होता है । इस सिद्धान्तका यहांपर उपयोग किया गया है । यह सूत्र शत्रुनाशके इस उदाहरणसे स्पष्ट होगा । आगे दिए विविध प्रकारसे शत्रुका नाश किया जा सकता है । ये चरण महत्त्वानुसार आरोही (बढते) क्रम में दिए गए हैं ।

१. पंचभौतिक (स्थूल)

शत्रु कहां है, यह पंचज्ञानेन्द्रियोंद्वारा ज्ञात होनेपर, उदा. उसके दिखाई देनेपर अथवा उसकी गतिविधि की जानकारी होनेपर उसे बन्दूक की गोलीसे मारा जा सकता है । यदि वह थोडी भी गतिविधि न कर किसी आवरणके पीछे छुप जाए और दृष्टिगोचर न हो, तब ऐसी स्थिति में बन्दूकधारी उसे नहीं मार पाएगा । यहां मारनेके लिए केवल स्थूल शस्त्रका प्रयोग किया गया है । विभिन्न कार्योंके लिए विभिन्न स्थूल वस्तुओंका प्रयोग किया जाता है, उदा. रोगके कीटाणुओंको मारने हेतु औषधि इत्यादि । केवल स्थूलद्वारा काम न बने, तब अगले चरण में बताई गई सूक्ष्म की जोड देना अति आवश्यक है ।

२. पंचभौतिक (स्थूल) एवं मन्त्र (सूक्ष्म) एक साथ

पूर्वकाल में मन्त्रोच्चारण करते हुए धनुषपर लगाया बाण छोडते थे । मन्त्रद्वारा बाणपर शत्रुका नाम अंकित हो जाता था एवं वह किसी भी आवरणके पीछे क्यों न हो, त्रिलोक में कहीं भी छुपा हो, तब भी बाण उसका वध करने में सक्षम होता था । यहां स्थूल अस्त्रको (बाणको) सूक्ष्म की (मन्त्र की) सन्धि दी गई है । आयुर्वेद में मन्त्रका उच्चारण करते हुए औषधि बनानेका यही उद्देश्य है । इसी प्रकार भूत उतारने में मन्त्रके साथ काली उडद, बिब्बा, लाल मिर्च, नींबू, सुई आदि वस्तुओंका प्रयोग करते हैं । कभी-कभी स्थूल एवं सूक्ष्म एकत्रित होनेपर भी कार्य सम्पन्न नहीं होता; ऐसे में अगले चरणानुसार सूक्ष्मतर, अर्थात अधिक शक्तिशाली मन्त्रका प्रयोग करना पडता है ।

३. मन्त्र (सूक्ष्मतर)

अगले चरण में बन्दूक, धनुष-बाण इत्यादि स्थूल अस्त्र की सहायताके बिना ही, केवल विशिष्ट मन्त्रद्वारा शत्रुका नाश किया जा सकता है । विभिन्न कार्योंको साध्य करने हेतु, उदा. विवाह, धनप्राप्ति इत्यादि हेतु विभिन्न मन्त्र हैं । कभी-कभी मन्त्रद्वारा भी कार्य नहीं होता । ऐसी दशा में अगले चरणका प्रयोग करना पडता है ।

४. व्यक्त संकल्प (सूक्ष्मतम)

‘अमुक कार्य सम्पन्न हो’ केवल यह विचार किसी (आध्यात्मिक दृष्टिसे) उन्नत पुरुषके मन में आते ही, वह कार्य सम्पन्न हो जाता है । इसके अतिरिक्त उन्हें और कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं होती । ७० प्रतिशतसे अधिक आध्यात्मिक स्तरके उन्नत पुरुषद्वारा ही यह सम्भव है । ‘शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति हो’, ऐसा संकल्प गुरुके मन में आनेपर ही शिष्य की खरी प्रगति होती है । इसे गुरुकृपा कहते हैं; अन्यथा शिष्य की उन्नति नहीं होती । उसका आदिभ्रम नष्ट नहीं होता ।
संकल्प कैसे कार्य करता है ?

संकल्पद्वारा कार्य सिद्ध होने हेतु न्यूनतम ७० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर आवश्यक है । (सामान्य व्यक्तिका स्तर २० प्रतिशत एवं मोक्ष अर्थात १०० प्रतिशत) संकल्प कैसे कार्य करता है, यह आगे दिए उदाहरणसे स्पष्ट होगा । मान लीजिए मन की शक्ति १०० इकाई (युनिट) है । प्रत्येक व्यक्तिके मन में दिनभर विचार आते हैं । कुछ कार्यालयसम्बन्धी, कुछ घरसम्बन्धी, कुछ संसारके आदि । प्रत्येक विचारके कारण एवं विचार की पूर्ति हेतु (उदा. मुझे कार्यालय जाना है, कार्य करना है, किसीसे मिलना है ।) कुछ मात्रा में शक्ति व्यय होती रहती है । दिनभर में ऐसे १०० विचार आएं, तो उसकी उस दिन की अधिकांश शक्ति समाप्त हो जाएगी; परंतु उसके मन में विचार ही न आएं, मन निर्विचार रहे और उसके मन में एक ही विचार आए, ‘अमुक हो जाए’, तो उस विचारके पीछे पूरी १०० इकाई शक्ति होती है, इसलिए वह विचार (संकल्प) सिद्ध हो जाता है । वह विचार सत्का हो, तो स्वयं की साधना भी उसमें व्यय नहीं होती । ईश्‍वर ही उस कार्य को पूर्ण करते हैं; क्योंकि वह सत्का अर्थात, ईश्‍वरका कार्य होता है । अर्थात यह साध्य करनेके लिए नाम, सत्संग, सत्सेवा, सत्के लिए त्याग, इस मार्गद्वारा साधना कर साधकको ऐसी स्थिति प्राप्त कर लेनी चाहिए, जिसमें असत्के विचार ही मन में न आएं ।

अव्यक्त संकल्प (सूक्ष्मातिसूक्ष्म) क्या होता है ?

इसमें ‘शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति हो जाए’, ऐसा संकल्प गुरुके मन में न आते हुए भी, शिष्य की अपनेआप उन्नति होती है । इसका कारण यह है कि उसके पीछे गुरुका अव्यक्त संकल्प होता है । ८० प्रतिशतसे अधिक आध्यात्मिक स्तरके उन्नत पुरुषोंद्वारा ही यह सम्भव है ।

५.अस्तित्व (अति सूक्ष्मातिसूक्ष्म)

इस अन्तिम चरण में मन में संकल्प करना भी आवश्यक नहीं है । गुरुके केवल अस्तित्वसे, सान्निध्यद्वारा अथवा सत्संग द्वारा शिष्य की साधना एवं उन्नति अपनेआप होती है । ९० प्रतिशत स्तरके गुरुका कार्य इस पद्धति का होता है । यह ‘मेरे कारण हुआ है; परंतु मैंने नहीं किया’, इसका जिसे ज्ञान हो गया, वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो गया । – ज्ञानेश्‍वरी, अध्याय ४, पंक्ति ८१ का अर्थ यहां पर ‘मेरे कारण हुआ’ अर्थात, मेरे अस्तित्व से हुआ; इसमें ‘मैं’पन परमेश्‍वर का है । ‘मैंने नहीं किया है’, अर्थात मैं इसका कर्ता नहीं हूं । सूर्य इस बात का एक सुंदर उदाहरण है । सूर्य उगने पर सभी जाग जाते हैं, फूल खिलते हैं इत्यादि । यह केवल सूर्य के अस्तित्व से होता है । सूर्य न ही किसी को उठने के लिए कहता है और न ही फूलों से खिलने के लिए कहता है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ “शिष्य”