सनातन संस्थाके आस्थाकेंद्र ‘प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजी’ – द्रष्टा धर्मगुरु एवं राष्ट्रसंत !

(पू.) श्री. संदीप आळशी

‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरु ।’ ऐसा क्यों कहा जाता है ?

गुरु श्रीकृष्णने शिष्य अर्जुनको न केवल मोक्षप्राप्तिके लिए धर्म सिखाया; अपितु ‘धर्मरक्षाके लिए अधर्मियोंसे लडना चाहिए’, यह क्षात्रधर्म भी सिखाया । शिष्यको मोक्षप्राप्तिके लिए साधना बतानेवाले आज अनेक गुरु हैं; परंतु ‘राष्ट्र एवं धर्मरक्षा कालानुसार आवश्यक साधना है’, ऐसी सीख देनेवाले गुरु गिने-चुने ही हैं । इनमें अग्रणी हैं सनातन संस्थाके संस्थापक प.पू. डॉ. जयंत बाळाजी आठवलेजी !

ईश्‍वरके अवतारोंमेंसे भगवान श्रीकृष्ण परिपूर्ण अवतार हैं । गोपियोंको भक्ति रसका अमृतपान करवानेवाले भगवान श्रीकृष्णने अधर्मी कंस, शिशुपाल आदि का वध भी किया । प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजीका जीवनचरित्र देखा जाए, तो उनमें भगवान श्रीकृष्णसमान ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज है । प.पू. डॉक्टरजीके आचार-विचार राष्ट्रभक्ति एवं धर्मप्रेमका धधकता यज्ञकुंड है, जबकि उनका जीवन इस यज्ञकी पवित्र आहुति है !

१. धर्मपालनके अभावमें सांस्कृतिक मूल्योंको भूलकर पश्‍चिमी प्रथाओंके अधीन हुए हिन्दू समाजको ग्रन्थोंके माध्यमसे हिन्दू आचार, संस्कृतिपालन, धर्माचरण एवं साधना सिखानेवाले प.पू. डॉक्टरजी, कलियुगमें महर्षि व्यासके ही अवतार हैं !

२. प.पू. डॉक्टरजीद्वारा किए अध्यात्म, हिन्दू धर्म व सूक्ष्म-विश्‍वसंबंधी वैज्ञानिक शोध तथा मार्गदर्शनके कारण विदेशियोंने भी हिन्दू धर्मानुसार साधना आरंभ की है । वे हिन्दू धर्मकी ध्वजा सात समुद्रपार फहरानेवाले दूसरे स्वामी विवेकानन्द ही हैं !

३. ‘हिन्दू धर्म, देवता, धर्मग्रन्थ, संत एवं राष्ट्रपुरुष, हिन्दू समाजके इन आस्थाकेंद्रों की अवमाननाका मुखर विरोध करना (आवाज उठाना), प्रत्येक हिन्दूका धर्मकर्तव्य ही है’, यह दृढतापूर्वक प्रतिपादित करनेवाले प.पू. डॉक्टरजी हिन्दू धर्मरक्षक ही हैं !

४. निद्रित हिन्दू मनमें राष्ट्ररक्षा एवं धर्मजागृतिका स्फुल्लिंग (चिंगारी) जगाने हेतु ग्रन्थ लिखनेवाले प.पू. डॉक्टरजी, वर्तमान समयके वास्तविक समाजसुधारक हैं !

५. स्वतन्त्रताके पूर्व प्रकाशित होनेवाले लोकमान्य तिलकके ‘केसरी’के पश्‍चात सहस्रों देशवासियोंके मनमें राष्ट्र एवं धर्मरक्षाकी वैचारिक क्रांतिकी ज्वाला प्रज्वलित करनेवाले ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक-समूहके संंस्थापक-सम्पादक प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजी, वर्तमान समयके वास्तविक लोकनायक हैं !

६. सर्वंकष हिन्दूहितके लिए हिन्दू राष्ट्रकी आवश्यकताका उद्घोष करनेवाले स्वातंत्र्यवीर सावरकरजीके उपरान्त देशकी सभी समस्याओंपर ‘धर्माधिष्ठित हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना’, यही एकमात्र प्रभावी उपाय है’, ऐसा दृढतापूर्वक प्रतिपादित करनेवाले तथा उस विषयमें मार्गदर्शन करनेवालेे प.पू. डॉक्टरजी, वर्तमान समयके द्रष्टा एवं देशके भाग्यविधाता हैं !

७. स्वतन्त्रतापूर्व कालमें महर्षि अरविन्द जैसे अनेक ज्ञात-अज्ञात संतोंकी आध्यात्मिक सहायताके कारण स्वतन्त्रता संग्रामको ईश्‍वरीय आधार प्राप्त हुआ तथा अंतमें यह स्वतन्त्रता संग्राम सफल हुआ । आज भ्रष्टाचार-निर्मूलनके लिए होनेवाला योगऋषि रामदेवबाबा तथा अण्णा हजारेजीका आन्दोलन होे, राजनेताओंके आर्थिक घोटाले उजागर करनेके लिए डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामीजीका न्यायालयीन संघर्ष हो अथवा संभावित तीसरे महायुद्धकी तीव्रता अल्प करनेकी सिद्धता हो… इन सब राष्ट्रवादी कार्योंमें आध्यात्मिक बलकी आपूर्ति करनेवाले प.पू. डॉक्टरजी, वर्तमान समयमें केवल भारतके धर्मगुरु नहीं, अपितु जगद्गुरु ही हैं !

प.पू. डॉक्टरजीके मार्गदर्शनानुसार ‘हिन्दू राष्ट्र’की स्थापना होगी, यह सुनिश्‍चित जानिए !

१. हिन्दू राष्ट्र अर्थात धर्मराज्य, ईश्‍वरीय राज्य, रामराज्य, आदर्श राज्य । प्रभु श्रीराम सात्त्विक एवं धर्मपालक थे, इसलिए वे आदर्श रामराज्य स्थापित कर सके । उसी प्रकार धर्म ही जिनका जीवन बन गया है, ऐसे संत ही धर्मराज्य अर्थात हिन्दू राष्ट्र स्थापित कर सकते हैं । प.पू. डॉक्टरजीके मार्गदर्शनानुसार साधना करनेसे तथा उनकी कृपासे सनातनके २९ साधक मात्र १०-१५ वर्षोंमें ही संत बने एवं २६९ साधक अब संत बननेके मार्गपर हैं । प.पू. डॉक्टरजी तथा संतोंका यह समुच्चय होनेपर हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाका ध्येय अब दूर नहीं, यह सुनिश्‍चित जानिए !

२. धर्मराज्य स्थापित करने हेतु आवश्यक है धार्मिक आधार एवं धर्मराज्य स्थापित करनेकी निर्मल आकांक्षा, आवश्यक है ध्येयवाद एवं प्रयत्नोंकी पराकाष्ठा ! प.पू. डॉक्टरजीके मार्गदर्शनमें सनातनके सैकडों साधक ‘साधना’के रूपमें हिन्दू राष्ट्र की स्थापनाके लिए समर्पित हैं । सनातनके साधकोंके साथ अब विविध हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनोंके संत-महंत, कार्यकर्ता, तथा अन्य धर्माभिमानी एवं राष्ट्राभिमानी भी राष्ट्रीय स्तरपर संगठित होकर हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना हेतु आगे आए हैं । ‘यतो धर्म, ततो जय’, इसके अनुसार विजय धर्मकी ही, अर्थात हमारी ही है, इस शाश्‍वत सत्यको समझें !

३. यमुनातटपर बालमित्रोंके साथ खेलनेवाले गोपालकृष्णको देखकर एक बार ब्रह्मदेवको भी सन्देह हुआ था एवं उन्होंने ‘कृष्ण वास्तवमें भगवान हैं अथवा नहीं’, इसकी परीक्षा लेनेका प्रयत्न किया । प.पू. डॉक्टरजीसमान उच्च कोटिके संत सहजभावमें रहते हैं, इसलिए सामान्यजनोंको उनमें विद्यमान देवत्व समझमें नहीं आता । साधकोंको अनुभूतियोंद्वारा उनके देवत्वकी प्रतीति होती है ।

धर्मरक्षा एवं राष्ट्रोद्धार करनेवाले प.पू. डॉक्टरजीके मार्गदर्शनानुसार साधना करें !

कालानुसार साधनाके रूपमें राष्ट्र एवं धर्म कार्य करनेका महत्त्व आपने समझ लिया । हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए अंतःकरण गुरुचरणोंमें अर्पित कर गुरुके मार्गदर्शनानुसार ध्येयकी दिशामें अविरत मार्गक्रमण करना, यही आज गुरुको अपेक्षित है; क्योंकि कालको भी यही अभिप्रेत है ।

प.पू. डॉक्टरजीकी महानताको भी आपने समझ लिया है । श्रीकृष्ण ही जिनके आराध्य देवता हैं, ऐसे सनातन संस्थाके साधकोंको प.पू. डॉक्टरजी श्रीकृष्ण प्रतीत होते हैं । उनका राष्ट्र एवं धर्मरक्षाका महान कार्य देखकर समर्थभक्तोंको वे रामदासस्वामी प्रतीत होते हैं । रामराज्यकी भांति आदर्श हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए उनका कार्य देखकर रामभक्तोंको वे प्रभु राम लगते हैं । ऐसे अवतारस्वरूप गुरुके मार्गदर्शनानुसार कालानुसार उचित साधना करनेपर यह सुनिश्‍चित है कि ‘भगवान हमारा शीघ्र उद्धार करेंगे ।’
जिस प्रकार फूल तथा उसकी गंध पृथक नहीं कर सकते, उसी प्रकार प.पू. डॉक्टरजी एवं ‘सनातन संस्था’का है । इसलिए सनातन संस्थाके मार्गदर्शन अनुसार साधना करें एवं शीघ्र गुरुकृपा प्राप्त करें ! ‘ईश्‍वरकृपासे ऐसा करनेकी सद्बुद्धि एवं प्रेरणा आपको हो’, यह श्री गुरुचरणोंमें प्रार्थना है !’

– (पू.) श्री. संदीप आळशी, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष ४, कलियुग वर्ष ५११४ (९.५.२०१२)

स्त्रोत : सनातनका ग्रंथ ‘ गुरुका महत्त्व, प्रकार एवं गुरुमंत्र ‘