गंगा नदी का माहात्म्य

भारतवर्ष मेें अनेक पवित्र नदियां बहती हैं । प्रत्येक नदी की अपनी विशेषता है । ऐसी ही सर्व कल्याणकारी पवित्रतम गंगा नदी हिन्दुस्थान की राष्ट्रीय प्रतीक स्वरूप है ! हिन्दू संस्कृति, सभ्यता एवं परंपराओं का सार ! उत्तर एवं पूर्व भारत की जीवनरेखा ! गंगा अर्थात साक्षात देवी ! हिन्दू धर्म का मोक्ष तीर्थ ! ऐसी गंगामाता की महिमा क्या है ? यह समझ लेने के लिए आज ईश्‍वर ने हमें सत्संग के माध्यम से एक अवसर दिया है । वैशाख शुक्ल सप्तमी को ‘गंगा सप्तमी’ है । गंगा के स्मरणमात्र से पापों का नाश होता है । इसलिए ऐसे पावन अवसर पर हम गंगा स्मरण करते हुए, इस सत्संग में गंगामहिमा का गुणगान करेंगे ।

प्रार्थना : उससे पहले माता गंगा से प्रार्थना करेंगे कि, ‘चैतन्यस्वरूप होकर भी स्थूलरूप में प्रकट होनेवाली, हे भगवती, आपके जल की बूंदें शंकरजी के चरणों पर भी गिरी हैं, नानाविध पाप धोकर प्राणी को पवित्र करनेवाली गंगा मैया, आप प्रतिदिन संपूर्ण विश्‍व की अशुभ से रक्षा करें ।

हे श्री गंगादेवी, आपके चरणों में प्रार्थना है, आपकी महिमा का गान करने हेतु आवश्यक बुद्धि की शुद्धता एवं चित्त की पवित्रता आप ही हमें प्रदान करें एवं आपके आशीर्वाद से हम आपका गुणगान कर पाएं !’

 

१. गंगाजी का महत्त्व

१ अ. धर्मग्रंथों में वर्णित गंगाजी की महिमा

१ अ १. ऋग्वेद

इसके प्रसिद्ध नदीसूक्त में सर्वप्रथम गंगाजी का आवाहन तथा स्तुति की गई है ।

१ अ २. पद्मपुराण

श्रीविष्णु सर्व देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा गंगाजी श्रीविष्णु का ! इसमें गंगाजी की महिमा वर्णित करते हुए कहा कि पिता, पति, मित्र एवं आप्तजनों के व्यभिचारी, पतित, दुष्ट, चांडाल तथा गुरुघाती होने पर क्रमशः पुत्र, पत्नी, मित्र एवं आप्तजन उन्हें त्याग देते हैं; परंतु गंगाजी उन्हें कभी भी नहीं त्यागतीं ।

१ अ ३. महाभारत

‘जिस प्रकार देवताओं के लिए अमृत, उसी प्रकार मनुष्य के लिए गंगाजल (अमृत) है ।’

१ अ ४. श्रीमद्भगवद्गीता

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को (अध्याय १0, श्‍लोक ३१ में) विभूतियोग बताते हुए कहा ‘स्रोतसामस्मि जाह्नवी ।’, अर्थात ‘सभी प्रवाहों में मैं गंगा हूं ।’

१ आ. समस्त संप्रदायों में वंदनीय

भारत में सकल संत, आचार्य एवं महापुरुष, तथा समस्त संप्रदायों ने गंगाजल की पवित्रता को मान्यता दी है । शंकरजी ने गंगाजी को मस्तक पर धारण किया, इसलिए शैवों को एवं विष्णु के चरणकमलों से गंगाजी के उत्पन्न होने से वैष्णवों को वे परमपावन प्रतीत होती हैं । शाक्तों ने भी गंगाजी को आदिशक्ति का एक रूप मानकर उनकी आराधना की है ।

१ इ. महापुरुषों द्वारा की गई गंगास्तुति

१ इ १. वाल्मीकि ऋषि

इनके द्वारा रचा ‘गंगाष्टक’ नामक स्तोत्र विख्यात है । संस्कृत जाननेवाले श्रद्धालु स्नान के समय इसका पाठ करते हैं । उनकी ऐसी श्रद्धा है कि इससे गंगास्नान का फल प्राप्त होता है ।’

१ इ २. आद्यशंकराचार्यजी
इन्होंने गंगास्तोत्र रचा । इसमें वे कहते हैं –
वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।
अथवा श्‍वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥ (श्‍लोक ११)

अर्थ : हे गंगे, आपसे दूर जाकर कुलीन राजा बनने की अपेक्षा आपके इस जल में कच्छप (कछुआ) अथवा मछली होना अथवा आपके तट पर वास करनेवाला क्षुद्र रेंगनेवाला प्राणी अथवा दीन-दुर्बल चांडाल होना सदैव श्रेष्ठ है ।

१ इ ३. गोस्कामी तुलसीदासजी

इन्होंने अपनी ‘ककिताकली’ के उत्तरकाण्ड में तीन छंदों में ‘श्रीगंगामाहात्म्य’ वर्णित किया है । इसमें प्रमुखरूप से गंगादर्शन, गंगास्नान, गंगाजल सेवन इत्यादि की महिमा वर्णित है ।

१ इ ४. पंडितराज जगन्नाथ (वर्ष १५९० से १६६५)

इन्होंने ‘गंगालहरी’ (‘पीयूषलहरी’) नामक ५२ श्‍लोकों का काव्य रचा । इसमें गंगाजी के विविध लोकोत्तर गुणों का वर्णन कर अपने उद्धार के विषय में विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की है ।

१ इ ४ अ. पंडितराज जगन्नाथ का उद्धार करनेवाला काव्य ‘गंगालहरी’ !

‘पंडितराज जगन्नाथ अपनी आयु के उत्तरार्ध में काशी पहुंचे । उन्होंने ‘लवंगी’ नामक यवनकन्या से विवाह किया था; इसलिए काशी के पंडितों ने उनका बहिष्कार किया । वे अत्यंत त्रस्त होकर गंगाघाट पहुंचे और अत्यधिक ज्वर से वे मूर्च्छित हो गए । कुछ समय उपरांत चेतना लौटने पर उन्होंने आत्मकल्याण के लिए आर्द्र अंतःकरणसेे गंगाजी को पुकारना प्रारंभ किया । उन्होंने एक श्‍लोक पूर्ण किया एवं गंगाजी का जल-स्तर एक सीढी ऊपर चढा । इस प्रकार प्रत्येक श्‍लोक से गंगा नदी प्रसन्न होेती गईं तथा उनका जल-स्तर एक-एक सीढी ऊपर चढने लगा । बावनवें अर्थात अंतिम श्‍लोक के उच्चारण के पश्‍चात बावनवीं सीढी चढकर गंगाजी ने जगन्नाथ एवं उनकी पत्नी लवंगी को अपने में समा लिया । जगन्नाथ पंडित भवसागर से तर गए । उनके इस ‘गंगालहरी’ ने सैकडों भक्तों को भवसागर पार करवाया ।’ – गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (११)

२. हिंदू जीवनदर्शन में गंगोदक का स्थान

२ अ. दैनिक जीवन – नित्य स्नान के समय स्मरण

नित्य स्नान करते समय गंगाजीसहित पवित्र नदियों का स्मरण किया जाता है । (स्नान के समय उच्चारण करनेयोग्य श्‍लोक सूत्र क्र. ‘११ इ २.’ में दिए हैं ।)

गंगोदक से स्नान करना अधिकांश लोगों के लिए संभव नहीं होता, इसलिए पूर्वकाल में महाराष्ट्र में तांबे अथवा पीतल से बने बडे मुंहवाले ‘गंगाळ’ नामक बर्तन में पानी लेकर उस पानी से स्नान किया जाता था ।

२ आ. धार्मिक जीवन

२ आ १. करोडों हिंदुओं की इच्छा होती है कि गंगा में एक बार तो स्नान करें ।

२ आ २. यात्री हरिद्वार, प्रयाग (इलाहाबाद) आदि तीर्थस्थानों से गंगाजल घर में लाकर उसकी पूजा करते हैं । साथ ही अपने परिजनों को आमंत्रित कर उन्हें वह तीर्थ देते हैं।

२ आ ३. धार्मिक परंपराएं

अ. स्थान एवं जलशुद्धि के लिए भी गंगाजल का उपयोग करते हैं । नए खोदे कुएं में गंगाजल डालते हैं ।

आ. गंगाजल हाथ में लेकर शपथ लेते हैं ।

इ. नवविवाहित दंपति पर गंगाजल का अभिषेक करते हैं ।

२ इ. मृत्यु के समय एवं मृत्युपरांत के क्रियाकर्म

२ इ १. मृत्यु के समय मुख में गंगाजल डालना

मृत्यु के उपरांत सद्गति मिले; इस हेतु मृत्यु के समय व्यक्ति के मुख में गंगाजल डालते हैं एवं उस समय ऐसा करना संभव न होे; तो मृत्यु के उपरांत व्यक्ति के मुख में गंगाजल डालते हैं । ऐसा करना संभव हो, इस हेतु घर-घर में गंगाजल रखा जाता है । (उसके न होने पर तुलसीयुक्त जल का प्रयोग करते हैं ।)

२ इ २. मृतदेह पर अग्निसंस्कार करना

‘गंगातट पर जिन मृत व्यक्तियों का दहन होता है, वे मृतात्माएं स्वर्ग प्राप्त करती हैं; अतः श्रद्धालु अत्यंत दूर से अग्निदहन के लिए मृत व्यक्तियों को यहां पर लाते हैं ।

२ इ ३. अस्थिविसर्जन

गंगाजी में अस्थियों का विसर्जन करना, एक महत्त्कपूर्ण अंत्यविधि है । ‘गंगाजी में विसर्जित अस्थियां जितने वर्ष गंगाजी में रहती हैं, उतने वर्षों तक वह मृतात्मा स्वर्ग में वास करती है’, ऐसा पद्मपुराण, नारदीय पुराण, स्कंदपुराण एवं अग्निपुराण, तथा महाभारत में कहा गया है ।

२ इ ४. श्राद्ध

पितरों का उद्धार करने हेतु उनका श्राद्ध गंगातट पर किया जाता है ।

स्त्रोत : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘श्री गंगाजीकी महिमा (आध्यात्मिक विशेषताएं एवं उपासनासहित)’

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