गंगा प्रदूषित करना आध्यात्मिक दृष्टिसे अनुचित !

सारिणी


१. गंगामें प्रदूषण करना धर्मशास्त्रको अस्वीकार !

गंगाजल प्रदूषित करनेवालोंका कर्मोंके ब्रह्माण्डपुराणमें (अध्याय १, श्लोक ५३५ में) स्पष्ट शब्दोंमें निम्नानुसार निषेध किया गया है ।

शौचमाचमनं केशनिर्माल्यमघमर्षणम् ।

गात्रसंवाहनं क्रीडा प्रतिग्रहमथो रतिम् ।।

अन्यतीर्थरतिं चैव अन्यतीर्थप्रशंसनम् ।

वस्त्रत्यागमथाघातसंतारं च विशेषतः ।।

अर्थ : गंगाजीके समीप शौच करना, कुल्ला करना, केश संवारना अथवा विसर्जित करना, निर्माल्य विसर्जित करना (टिप्पणी १), कूडा फेंकना, मल-मूत्रविसर्जन, हास्यविनोद करना, दान लेना, मैथुन करना, अन्य तीर्थोंके प्रति प्रेम व्यक्त करना, अन्य तीर्थोंकी स्तुति करना, वस्त्र त्यागना, गंगाजल पटकना एवं गंगाजीमें जलक्रीडा करना, ऐसे कुल १४ कर्म गंगाजीमें अथवा गंगाजीके समीप करना निषिद्ध है ।

टिप्पणी १ – निर्माल्य बहते जलमें विसर्जित करना चाहिए, ऐसा धर्मशास्त्र कहता है, तब भी ‘गंगामें निर्माल्य विसर्जित करना’, धर्मशास्त्रकी दृष्टिसे निषिद्ध है । उपरोक्त १४ कर्मोंमेंसे ७ कर्म जलप्रदूषणसे संबंधित हैं । उन्हें टालनेसे धर्म-शास्त्रानुसार गंगाकी पवित्रता बनी रहेगी, ऐसा ही प्रत्येकका आचरण होना चाहिए । गंगाकी पवित्रताकी रक्षाके लिए प्रयत्न करना, एक प्रकारका धर्मपालन ही है ।

 

२. जल प्रदूषित न करनेकी धर्मशास्त्रकी आज्ञा !

हिंदू धर्मशास्त्र कहता है, ‘जल नारायणका है, इसलिए इसे कभी भी एवं कहीं भी प्रदूषित न होने दीजिए ।’ इसीलिए नदियोंकी पवित्रता बनाए रखना, हिंदुओंका धर्मकर्तव्य है ।

 

३. जल प्रदूषित करनेवालेको गोहत्याका पातक लगना

स्मृतिकार कहते हैं, ‘जल प्रदूषणसे मानवीय जीवन ही समाप्त हो जाएगा । जल प्रदूषित करनेवाला महापापी ही है । वह अनेक पातकोंसे लिप्त होता है । उसे गोहत्याका पाप लगता है ।’ – गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

 

 

४. प्रकृतिको देवताके रूपमें देखनेका धर्मशास्त्रोंका दृष्टिकोण

प्रकृतिकी हानि करना, हिंदू धर्ममें पाप माना गया है; क्योंकि धर्मशास्त्रने प्रकृतिको देवता माना है । तदनुसार हिंदू संस्कृतिमें प्रकृतिकी पूजा की जाती है । किंतु वर्तमानमें पश्चिमी संस्कृतिका अंधानुकरण करनेवाले विज्ञानवादी, व्यावसायिक वृत्तिके प्रदूषणकर्ता तथा उनसे आर्थिक लाभके लिए संबंधित राजनेता गंगा नदी जैसी देवीपर विजय पानेके इच्छुक हैं ।

 

५. आध्यात्मिक दृष्टिसे लाभकारी
गंगा नदी प्रदूषित न करनेका महत्त्व !

५ अ. अनिष्ट स्थान, सर्वसाधारण स्थान,
सात्त्विक देवालय, नदियां एवं तीर्थस्थलोंमें विद्यमान त्रिगुणोंकी मात्रा

  अनिष्ट स्थान सर्वसाधारण स्थान सात्त्विक देवालय,
नदियां एवं तीर्थक्षेत्र
१. सत्त्व
२. रज
३. तम (टिप्पणी १) ९८ ९६ ९४
कुल १०० १०० १००

टिप्पणी १ – तमोगुण बढनेमें प्रदूषण, अनैतिक विचार, अयोग्य कृत्य, अधर्माचरण, शासनकी धर्मविरोधी नीतियां इत्यादि घटक कारणभूत हैं ।

 

५ आ. सात्त्विक देवालय, नदियां एवं तीर्थस्थलोंकी तुलनामें गंगाका महत्त्व

अन्य सात्त्विक देवालय, नदियां एवं तीर्थस्थलोंकी तुलनामें गंगाकी सात्त्विकता ८ प्रतिशत है । इसलिए मनुष्यद्वारा उसे स्थूलसे प्रदूषित करनेपर, उसे ‘गटर’ स्वरूप बनाया गया, तब भी उसका सूक्ष्म-स्तरीय आध्यात्मिक महत्त्व कुछ मात्रामें बना रहता है ।

 

६. आध्यात्मिक हानि टालनेके लिए गंगाका शुद्ध रहना आवश्यक !

गंगाका शुद्ध रहना अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा प्रदूषणके कारण उसकी सात्त्विकता ४ प्रतिशततक घट जाती है तथा शारीरिक रोग भी होते हैं । प्रदूषणग्रस्त गंगा नदीसे कुछ मात्रामें आध्यात्मिक लाभ होता है, तब भी हानिकी मात्रा सर्वाधिक है ।’ – डॉ. आठवले (आश्विन शुक्ल पक्ष ६, कलियुग वर्ष ५११४ २०.१०.२०१२)

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘देवनदी गंगाकी रक्षा करें !’