ब्रह्मांड में गंगा नदी की उत्पत्ति एवं भूलोक में उनका अवतरण

पुण्यसलिला गंगा की महिमा अपरंपार है ! भौगोलिक दृष्टि से गंगा नदी भारतवर्ष की हृदयरेखा है ! इतिहास की दृष्टि से प्राचीन काल से अर्वाचीनकाल तक तथा गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा की कथा हिंदू सभ्यता एवं संस्कृति की अमृतगाथा है । राष्ट्रीय दृष्टि से भिन्न आचार-विचार, वेशभूषा, जीवनपद्धति एवं जातियों से युक्त समाज को एकत्रित लानेवाली गंगा नदी हिंदुस्थान की राष्ट्रीय-प्रतीक ही है । धार्मिक दृष्टि से इतिहास के उषःकाल से कोटि-कोटि हिंदू श्रद्धालुओं को मोक्ष प्रदान करनेवाली गंगा विश्‍व का सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है । आध्यात्मिक क्षेत्र में जो स्थान गीता का है, वही स्थान धार्मिक क्षेत्र में गंगा का है । प्रस्तुत ग्रंथ में प्रमुखरूप से गंगा नदी की महिमा वर्णित की गई है ।

 

१. ‘गंगा’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ

अ. गमयति भगवत्पदम् इति गङ्गा ।

अर्थ : गंगा वे हैं जो (स्नान करनेवाले जीव को ) ईश्‍वर के चरणों तक पहुंचाती हैं ।

आ. गम्यते प्राप्यते मोक्षार्थिभिः इति गङ्गा ।

अर्थ : जिनकी ओर मोक्षार्थी अर्थात मुमुक्षु जाते हैं, वही गंगाजी हैं ।

 

२. ब्रह्मांड में गंगा नदी की उत्पत्ति एवं भूलोक में उनका अवतरण

२ अ. ब्रह्मांड में उत्पत्ति

‘वामनावतार में श्रीविष्णु ने दानवीर बलीराजा से भिक्षा के रूप में तीन पग भूमि का दान मांगा । राजा इस बात से अनभिज्ञ था कि श्रीविष्णु ही वामन के रूप में आए हैं, उसने उसी क्षण वामन को तीन पग भूमि दान की । वामन ने विराट रूप धारण कर पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी तथा दूसरे पग में अंतरिक्ष व्याप लिया। दूसरा पग उठाते समय वामन के (श्रीविष्णुके) बाएं पैर के अंगूठे के धक्के से ब्रह्मांड का सूक्ष्म-जलीय कवच (टिप्पणी १) टूट गया । उस छिद्र से गर्भोदक की भांति ‘ब्रह्मांड के बाहर के सूक्ष्म-जल ने ब्रह्मांड में प्रवेश किया । यह सूक्ष्म-जल ही गंगा है !

गंगाजी का यह प्रवाह सर्वप्रथम सत्यलोक में गया । ब्रह्मदेव ने उसे अपने कमंडलु में धारण किया । तदुपरांत सत्यलोक में ब्रह्माजी ने अपने कमंडलु के जल से श्रीविष्णु के चरणकमल धोए । उस जल से गंगाजी की उत्पत्ति हुई । तत्पश्‍चात गंगाजी की यात्रा सत्यलोक से क्रमशः तपोलोक, जनलोक, महर्लोक, इस मार्ग से स्वर्गलोक तक हुई ।

टिप्पणी १ – हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार ब्रह्मांड भूलोकादि सप्तलोक एवं सप्तपातालों को मिलाकर 14 भुवनों से बना है । ब्रह्मांड अंडाकार है तथा उसके बाहर चारों दिशाओं से क्रमशः सूक्ष्म-पृथ्वी, सूक्ष्म-जल, सूक्ष्म-तेज, सूक्ष्म-वायु, सूक्ष्म-आकाश, अहम्तत्त्व, महत्तत्त्व एवं प्रकृति के कुल 8 कवच होते हैं । इन कवचों में से ‘सूक्ष्म-जलीय कवच’ अर्थात गंगा । अतएव आयुर्वेद में गंगाजल को ‘अंतरिक्षजल’ कहा गया है ।’ (१)

२ आ. भूलोक में अवतरण

भगीरथजी की कठोर तपस्या के कारण गंगाजी का पृथ्वी पर अवतरित होना एवं सगरपुत्रों का उद्धार करना : ‘सूर्यवंश के राजा सगर ने अश्‍वमेध यज्ञ आरंभ किया । उन्होंने दिग्विजय के लिए यज्ञीय अश्‍व भेजा एवं अपने ६० सहस्र पुत्रों को भी उस अश्‍व की रक्षा हेतु भेजा । इस यज्ञ से भयभीत इंद्रदेव ने यज्ञीय अश्‍व को कपिलमुनि के आश्रम के निकट बांध दिया । जब सगरपुत्रों को वह अश्‍व कपिलमुनि के आश्रम के निकट प्राप्त हुआ, तब उन्हें लगा, ‘कपिलमुनि ने ही अश्‍व चुराया है ।’ इसलिए सगरपुत्रों ने ध्यानस्थ कपिलमुनि पर आक्रमण करने की सोची । कपिलमुनि को अंतर्ज्ञान से यह बात ज्ञात हो गई तथा अपने नेत्र खोले । उसी क्षण उनके नेत्रों से प्रक्षेपित तेज से सभी सगरपुत्र भस्म हो गए । कुछ समय पश्‍चात सगर के प्रपौत्र राजा अंशुमन ने सगरपुत्रों की मृत्यु का कारण खोजा एवं उनके उद्धार का मार्ग पूछा । कपिलमुनि ने अंशुमन से कहा, ‘‘गंगाजी को स्वर्ग से भूतल पर लाना होगा । सगरपुत्रों की अस्थियों पर जब गंगाजल प्रवाहित होगा, तभी उनका उद्धार होगा !’’ मुनिवर के बताए अनुसार गंगा को पृथ्वी पर लाने हेतु अंशुमन ने तप आरंभ किया ।’ (२)

२ आ १. गंगाजी के भूलोक पर अवतरित होने का दिन !
दशमी शुक्लपक्षे तु ज्येष्ठे मासि कुजेऽहनि ।
अवतीर्णा यतः स्वर्गात् हस्तर्क्षे च सरिद्वरा ॥ – वराहपुराण

अर्थ : ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, भौमवार (मंगलवार) एवं हस्त नक्षत्र के शुभ योग पर गंगाजी स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुईं ।

गंगावतरण की तिथि का उल्लेख कुछ पुराणों में वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया, तो कुछ पुराणों में कार्तिक पूर्णिमा किया गया है, तब भी अधिकांश पुराणों में ‘ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी’ ही गंगावतरण की तिथि उल्लेखित की गई है तथा वही सर्वमान्य है।

 

३. गंगाजी के कुछ अन्य नाम

३ अ. ब्रह्मद्रवा

ब्रह्मदेव ने गंगाजी को अपने कमंडलु में धारण किया इसलिए उन्हें ‘ब्रह्मद्रवा’ कहते हैं ।

३ आ. विष्णुपदी अथवा विष्णुप्रिया

गंगाजी के विष्णुपद को स्पर्श कर भूलोक में अवतरित होने से उन्हें ‘विष्णुपदी’ अथवा ‘विष्णुप्रिया’ नाम प्राप्त हुए ।

३ इ. भागीरथी

राजा भगीरथ की तपस्या के कारण गंगा नदी पृथ्वीवर अवतीर्ण हुईं; इसलिए उन्हें ‘भागीरथी (भगीरथ की कन्या)’ कहते हैं ।

३ ई. जाह्नवी

‘हिमालय से नीचे उतरते समय गंगाजी अपने साथ राजषिर्र् एवं तपस्वी जह्नुऋषि की यज्ञभूमि बहा ले गईं । इस बात से क्रोधित होकर जह्नुऋषिनेे उनके संपूर्ण प्रवाह का प्राशन कर लिया । तत्पश्‍चात जब भगीरथ ने जह्नुऋषि से प्रार्थना की, तब उन्होंने गंगाजी के प्रवाह को अपने एक कान से बाहर छोडा । इससे वे ‘जाह्नवी (जह्नुऋषि की कन्या)’ कहलाने लगीं ।’ (वायुपुराण, अध्याय ९१, श्‍लोक ५४ से ५८)

३ उ. त्रिपथगा

‘भूतल पर अवतरित होने के पश्‍चात गंगाजी की धारा को शिवजी ने अपनी जटा में थाम लिया । उस समय उनके तीन प्रवाह हुए । इन प्रवाहों में से पहला स्वर्ग में गया, दूसरा भूतल पर रह गया तथा तीसरा पाताल में बह गया; इसलिए उन्हें ‘त्रिपथगा’ अथवा ‘त्रिपथगामिनी’ कहते हैं ।’ (४)

३ ऊ. गंगाजी के त्रिलोक में नाम

गंगाजी को स्वर्ग में ‘मंदाकिनी’, पृथ्वी पर ‘भागीरथी’ तथा पाताल में ‘भोगावती’ कहते हैं ।

३ ए. ‘गैंजेस्’ – पाश्‍चात्यों द्वारादिया गया विकृत नाम

ग्रीक, अंग्रेजी आदि यूरोपीय भाषाओं में गंगा का उच्चारण विकृतरूप से अर्थात ‘गैंजेस्’ ऐसा किया जाता है । आंग्लदासता की मानसिकता रखनेवाले भारतीय भी इसी नाम से उच्चारण करते हैं।

‘शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध तथा उनसे संबंधित शक्तियां एकत्रित होती हैं’, यह अध्यात्मशास्त्रीय सिद्धांत है । ‘गंगा’ शब्द का अनुचित पद्धतिसेे उच्चारण करनेवालों को गंगाजी के स्मरण का आध्यात्मिक लाभ कैसे प्राप्त होगा ? इसीलिए विदेशी भाषा में बोलते एवं लिखते समय उन्हें ‘गंगा’ के नाम से ही संबोधित करें !

स्त्रोत : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘श्री गंगाजीकी महिमा (आध्यात्मिक विशेषताएं एवं उपासनासहित)’