नींदसे जागनेपर भूमिवंदना क्‍यों करते है ?

सारणी

१. ब्राह्ममुहूर्तमें उठना

१ अ. ब्राह्ममुहूर्तका महत्त्व

१ आ. नींदसे जागनेपर सर्वसाधारणतः उबासियां क्यों आती हैं ?

२. नींदसे जागनेपर की जानेवाली कृतियां

२ अ. श्रोत्राचमन

२ आ. श्‍लोकपाठ

२ इ. करदर्शन

२ ई. भूमिवंदना

 


 

१. ब्राह्ममुहूर्तमें उठना

धर्मशास्त्रमें बताए अनुसार ब्राह्ममुहूर्तमें उठें । ‘सूर्योदयसे पूर्वके एक प्रहरमें दो मुहूर्त होते हैं । उनमेंसे पहले मुहूर्तको ‘ब्राह्ममुहूर्त’ कहते हैं । उस समय मनुष्यकी बुद्धि और ग्रंथरचनाकी शक्ति उत्तम रहती है; इसलिए इस मुहूर्तको ‘ब्रह्म’ की संज्ञा दी गई है । (मनुस्मृति, ४.९२ पर कुल्लूक टीका)’

१ अ. ब्राह्ममुहूर्तका महत्त्व

१. ‘इस कालमें दैवी प्रकृतिके निराभिमानी जीवोंका संचार रहता है ।

२. यह काल सत्त्वगुणप्रधान रहता है । सत्त्वगुण ज्ञानकी अभिवृद्धि करता है । इस कालमें बुद्धि निर्मल और प्रकाशमान रहती है । `धर्म’ और `अर्थ’ के विषयमें किए जानेवाले कार्य, वेदमें बताए गए तत्त्व (वेदतत्त्वार्थ) के चिंतन तथा आत्मिंचतन हेतु ब्रह्ममुहूर्त उत्कृष्ट काल है ।

३. इस कालमें सत्त्वशुद्धि, कर्मरतता, ज्ञानग्राह्यता, दान, इंद्रियसंयम, तप, सत्य, शांति, भूतदया, निर्लोभता, निंद्यकर्म करनेकी लज्जा, स्थिरता, तेज और शुचिता (शुद्धता), ये गुण अंगीकार करना सुलभ होता है ।’

४. ‘इस कालमें मच्छर, खटमल और पिस्सू क्षीण होते हैं ।

५. इस कालमें अनिष्ट शक्तियोंकी प्रबलता क्षीण होती है ।’

– गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

१ आ. नींदसे जागनेपर सर्वसाधारणतः उबासियां क्यों आती हैं ?

‘मुख वायुतत्त्व बाहर निकलनेका द्वार है । जीवमें कार्यरत सत्त्व-उत्प्रेरक वायु शब्दोंके साथ निकलकर शब्दके सूक्ष्म स्वरूपको वायुधारणाकी गति प्रदान करती है । (वायुधारणाकी गति अर्थात् वायुस्वरूप गति, उस प्रकारकी गति; धारणा अर्थात् क्षमता) रातके समय जीवके देहमें निर्मित वायु मुखके माध्यमसे बाहर नहीं निकल पाती । इसलिए इस वायुका जीवके देहमें संग्रह होता है । प्रातःकाल यह वायु जीवके मुखसे बाहर निकलती है, इसलिए इस कालमें सर्वाधिक उबासियां आती हैं ।’ – एक ज्ञानी (श्री. निषाद देशमुखके माध्यमसे, १९.६.२००७, दोपहर ३.५१)

२. नींदसे जागनेपर की जानेवाली कृतियां

२ अ. श्रोत्राचमन

नींदसे जागते ही बिस्तरपर बैठकर श्रोत्राचमन करें ।

‘पासमें जल न हो, तो भी श्रोत्राचमन अवश्य करें ।’

– श्री गुरुचरित्र

 

श्रोत्राचमन अर्थात् दाहिने कानको हाथ लगाकर श्रीविष्णुके ‘ॐ श्री केशवाय नमः ।’… ऐसे २४ नामोंका उच्चारण करें । आदित्य, वसु, रुद्र, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम, अनिल इत्यादि सभी देवताओंका वास दाहिने कानमें रहता है, इसलिए दाहिने कानको केवल दाहिने हाथसे स्पर्श करनेसे भी आचमनका फल प्राप्त होता है । आचमनसे अंतर्शुद्धि होती है ।

 

२ आ. श्‍लोकपाठ

अ. श्री गणेशवंदना

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्‍नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।

अर्थ : जिसकी सूंड टेढी और शरीरका आकार बडा है तथा जिसमें करोडों सूर्योंके प्रकाशका तेज है, उस विघ्नहर्ता श्री गजाननकी कार्यसिद्धि हेतु मैं वंदना करता हूं ।

 

आ. देवतावंदना

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरांतकारिर्भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।
गुरुश्चशुक्रःशनिराहुकेतवःकुर्वन्तुसर्वेममसुप्रभातम्।।

अर्थ : निर्माता ब्रह्मदेव; पालनकर्ता और ‘मुर’ नामक दानवका वध करनेवाले श्रीविष्णु; संहारक और ‘त्रिपुर’ राक्षसका वध करनेवाले शिव, ये प्रमुख तीन देवता तथा सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु, ये नवग्रह मेरी प्रभातको शुभ बनाएं ।

 

इ. पुण्यपुरुषोंका स्मरण

पुण्यश्लोको नलो राजा पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः ।
पुण्यश्लोकोविदेहश्चपुण्यश्लोकोजनार्दनः।।

अर्थ : पुण्यवान नल, युधिष्ठिर, विदेह (जनक राजा) तथा भगवान जनार्दनका मैं स्मरण करता हूं ।

 
ई. सप्तचिरंजीवोंका स्मरण

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च बिभीषणः ।
कृपःपरशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ।।

अर्थ : द्रोणाचार्यके पुत्र अश्वत्थामा, दानशील बलिराजा, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और पृथ्वीको इक्कीस बार दुर्जन क्षत्रियोंसे निःशेष करनेवाले परशुराम, ये सात चिरंजीवी हैं । (मैं इनका स्मरण करता हूं ।)

 

उ. पंचमहासतियोंका स्मरण

अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मंदोदरी तथा ।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ।।

अर्थ : गौतमऋषिकी पत्नी अहिल्या, पांडवोंकी पत्नी द्रौपदी, प्रभु रामचंद्रकी पत्नी सीता, राजा हरिश्चंद्रकी पत्नी तारामती और रावणकी पत्नी मंदोदरी, इन पांच महासतियोंका जो स्मरण करता है, उसके महापातक नष्ट होते हैं ।

 

ऊ. सात मोक्षपुरियोंका स्मरण

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका ।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः ।।

अर्थ : अयोध्या, मथुरा, मायावती (हरिद्वार), काशी, कांची, अवन्तिका (उज्जयिनी) तथा द्वारका, मोक्ष (टीप)  प्रदान करनेवाली सात नगरियां हैं । इनका मैं स्मरण करता हूं ।

 

२ इ. करदर्शन

दोनों हाथोंकी अंजुलि बनाकर उसपर मन एकाग्र कर निम्नांकित श्लोक उच्चारित करें ।

 

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती ।
करमूले तु गोविंदः प्रभाते करदर्शनम् ।।

अर्थ : हाथके अग्रभागमें लक्ष्मीका वास है । हाथके मध्यभागमें सरस्वती है और मूल भागमें गोविंद हैं; इसलिए प्रातः उठते ही हाथके दर्शन करें । (पाठभेद : हाथके मूल भागमें ब्रह्मा हैं ।)

 

भावार्थ १

अ. लक्ष्मीका महत्त्व

‘हाथके अग्रभाग (कराग्र) पर लक्ष्मी (टीप) है, इसलिए बाह्य भौतिक भाग लक्ष्मीरूपमें विलसित है । अर्थात् भौतिक व्यवहार हेतु लक्ष्मीकी (धनकी ही नहीं, अपितु पंचमहाभूत, अन्न, वस्त्र इत्यादिकी) आवश्यकता है ।

आ. सरस्वतीका महत्त्व

धन अथवा लक्ष्मी (टीप)  प्राप्त करते समय ज्ञान और विवेक न हो, तो लक्ष्मी (टीप) अलक्ष्मी बनकर नाशका कारण बनती है; इसलिए सरस्वतीकी आवश्यकता है ।

इ. सबकुछ गोविंद ही है

सरस्वतीरूपमें मध्यभागमें और लक्ष्मीरूपमें अग्रभागमें, गोविंद ही विराजमान हैं । संत ज्ञानेश्वर महाराज अमृतानुभवमें शिव-पार्वती स्तवनमें कहते हैं, ‘मूल, मध्य और अग्र, यद्यपि ये तीनों अलग दिखाई देते हैं, तब भी इन तीनोंमें गोविंद ही उस विशिष्ट स्वरूपमें कार्य करते हैं । लगभग सभी उद्योग हाथकी उंगलियोंके अग्रभागसे होते हैं, इसलिए वहां लक्ष्मीका वास है; परंतु उस हाथमें मूल स्रोतसे अनुभवी ज्ञान ही प्रवाहित न हो, तो वह उसके बिना कार्य भी नहीं कर सकता ।’

 

– प.पू. परशराम पांडे महाराज

 

भावार्थ २

अ. ‘ऐश्वर्यसंपन्न और मोहमयी व्यक्त स्वरूपकी माया अर्थात् लक्ष्मी (टीप) तथा मूल अव्यक्त स्वरूपमें गोविंद, ये दोनों भिन्न नहीं; अपितु एक ही हैं । यह बोध प्रदान करनेवाली कल्याणमयी, ज्ञानदायी सरस्वती हैं ।

आ. लक्ष्मीका अर्थ है कर्म, सरस्वती अर्थात् ज्ञान और गोविंद अर्थात् भक्ति । इन तीनोंके एकत्रीकरणसे ही ईश्वरसे एकरूप हो सकते हैं ।

इ. ज्ञानसहित भक्तिपूर्ण कर्म करनेसे ही जीवनमें प्रवृत्ति और निवृत्तिका संतुलन रखते हुए चातुर्वर्ण्याश्रमोचित सर्वांगसुंदर और परिपूर्ण जीवन व्यतीत कर, अंतमें ईश्वरसे एकरूप हो सकते हैं ।

ई. ऐसा जीव निष्काम कर्मयोगी बनता है ।

‘गुरुकृपायोगानुसार साधना’ नामक साधनामार्गमें यही भाग बताया गया है । इसलिए इस मार्गानुसार साधना करनेवाले जीवको अन्य साधनामार्गियोंकी तुलनामें ज्ञानप्राप्ति अल्पावधिमें होती है । ऐसे जीवकी आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र होती है । (सनातन संस्था ‘गुरुकृपायोगानुसार साधना’ सिखाती है । इस साधनाके विषयमें जानकारी सनातनकी ग्रंथमाला ‘गुरुकृपायोगानुसार साधना’ में दी है ।)’

 

– श्रीमती अंजली कणगलेकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा

 

हाथोंकी अंजुलिसे ब्रह्ममुद्रा बनाना, इससे देहकी सुषुम्ना नाडी कार्यरत होना तथा रातभर निद्राके कारण देहमें निर्माण हुए तमोगुणके उच्चाटनमें यह सहायक होना

‘हाथोंकी अंजुलि बनाकर उसपर मन एकाग्र कर ‘कराग्रे वसते लक्ष्मीः …’ यह श्लोकपाठ करनेसे ब्रह्मांडकी देवत्वजन्य तरंगें अंजुलिकी ओर आकृष्ट होती हैं । ये तरंगें अंजुलिमें ही घनीभूत होती हैं । अंजुलिरूपी रिक्तिमें आकाशरूपी व्यापकत्व लेकर वे मंडराती रहती हैं । हाथोंकी अंजुलिमें ब्रह्ममुद्रा निर्माण होती है तथा देहकी सुषुम्ना नाडी कार्यरत होती है । यह नाडी जीवकी आध्यात्मिक उन्नतिके लिए पोषक है । यदि रातभरकी तमोगुणी निद्राके कारण देहमें तमोगुणका संवर्धन हुआ हो, तो सुषुम्नाकी जागृति उसका उच्चाटन करनेमें सहायक होती है ।’ – सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)

 

२ ई. भूमिवंदना

‘कराग्रे वसते लक्ष्मीः …’ श्लोकपाठके उपरांत भूमिसे प्रार्थना कर, यह श्लोक बोलकर, तदुपरांत भूमिपर पैर रखें ।

 

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडले ।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ।।

अर्थ : समुद्ररूपी वस्त्र धारण करनेवाली, पर्वतरूपी स्तनवाली और भगवान श्रीविष्णुकी पत्नी हे पृथ्वीदेवी, मैं आपको नमस्कार करता हूं । आपको पैरोंका स्पर्श होगा, इसके लिए आप हमें क्षमा करें ।

 

रात्रिकालमें तमोगुण प्रबल होता है । ‘भूमिसे प्रार्थना कर ‘समुद्रवसने देवी…’ श्लोक कहकर भूमिपर पैर रखनेसे, रात्रिकालमें देहमें आवेशित कष्टदायक स्पंदन भूमिमें विसर्जित हो जाते हैं ।’

 

– सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)

 

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘दिनचर्यासे संबंधित आचार एवं उनका शास्त्रीय आधार’ – See more at: https://www.sanatan.org/hindi1/18.html#sthash.jdKuJS1x.dpuf

 

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘दिनचर्यासे संबंधित आचार एवं उनका शास्त्रीय आधार’