दिन में क्यों नहीं सोना चाहिए ?

सारणी

१. दिनचर्या का महत्‍व

१ अ. प्रकृति के नियमों के अनुरूप दिनचर्या आवश्यक

१ आ. आह्निक का यथार्थ पालन करनेवाला व्यक्ति बहुधा आपत्तियों से ग्रस्त न होना

२. दिनचर्या के अंतर्गत कुछ कर्म

२ अ. नित्यकर्म

२ आ. प्रातःकाल से सायाह्नकाल (सायंकाल) तक किए जानेवाले कर्म

२ इ. पंचमहायज्ञ

३. दिन का समय साधना के लिए अनुकूल होने से दिन में न सोएं


१. दिनचर्या का महत्‍व

प्रातः उठने से लेकर रात को सोने तक की गई कृतियों को एकत्रितरूप से ‘दिनचर्या’ कहते हैं ।

 

१ अ. प्रकृति के नियमों के अनुरूप दिनचर्या आवश्यक

संपूर्ण मानव जीवन स्वस्थ रहे, उसे कोई भी विकार न हों, इस दृष्टि से दिनचर्या पर विचार किया जाता है । कोई व्यक्ति दिनभर में क्या आहार-विहार करता है, कौन-कौनसी कृतियां करता है, इस पर उसका स्वास्थ्य निर्भर करता है । स्वास्थ्य की दृष्टि से दिनचर्या महत्त्वपूर्ण है । दिनचर्या प्रकृति के नियमों के अनुसार हो, तो उन कृतियों से मानव को कष्ट नहीं; लाभ ही होता है । इसलिए प्रकृति के नियमों के अनुसार (धर्म द्वारा बताए अनुसार) आचरण करना आवश्यक है, उदाहरणार्थ प्रातः शीघ्र उठना, मुखमार्जन करना, दांत स्वच्छ करना, स्नान करना इत्यादि ।

‘ऋषिगण सूर्य-गति के अनुसार ब्राह्ममुहूर्त में प्रातःविधि, स्नान और संध्या करते थे, तत्पश्चात् वेदाध्ययन और कृषिकार्य करते और रातको शीघ्र सो जाते थे; इसलिए वे शारीरिक रूप से स्वस्थ थे । आज लोग प्रकृति के नियमों के विरुद्ध आचरण करते हैं । इससे उनका शारीरिक स्वास्थ्य बिगड गया है । पशु-पक्षी भी प्रकृति के नियमों के अनुसार अपनी दिनचर्या व्यतीत करते हैं ।’ – प.पू. पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल.

 

१ आ. आह्निक का यथार्थ पालन करनेवाला व्यक्ति बहुधा आपत्तियों से ग्रस्त न होना

‘धर्मशास्त्र में आह्निक को प्रधानता दी गई है । एक ओर शरीर के लिए अत्यंत उपयुक्त और पोषक विज्ञान, तो दूसरी ओर मन की उत्क्रांति और विकास साधनेवाला मानसशास्त्र, ऐसा दोहरा विचार कर शास्त्र ने आह्निक के नियम बनाए हैं । बहुधा आह्निक का यथार्थ पालन करनेवाले व्यक्ति दरिद्रता, दुर्व्यसन, मनोविकृति इत्यादि आपत्तियों से ग्रस्त नहीं होते ।’

 

२. दिनचर्या के अंतर्गत कुछ कर्म

२ अ. नित्यकर्म

‘नित्यकर्म’ वे हैं, जिन्हें करने से केवल चित्तशुद्धि ही होती है; परंतु न करने से दोष लगता है, उदा. ब्राह्मण व्यक्ति के लिए संध्या करना तथा गायत्री मंत्र का जप करना नित्य कर्म है ।

वर्णानुसार नित्यकर्म

अ. ब्राह्मण का नित्यकर्म है – अध्ययन और अध्यापन (अध्यात्म सीखना और सिखाना) |

आ. क्षत्रिय का नित्यकर्म है – दुर्जनों से समाज की रक्षा करना |

इ. वैश्य का नित्यकर्म है – गोपालन एवं कृषि और व्यापार द्वारा समाज की सेवा करना |

ई. शूद्र का नित्यकर्म है – ब्राह्मण और क्षत्रिय के विशिष्ट व्यवसाय के अतिरिक्त कोई भी व्यवसाय करना ।

आश्रमानुसार नित्यकर्म

ब्रह्मचर्याश्रम में ‘धर्म का पालन कैसे करें’ इसका अभ्यास करना; गृहस्थाश्रम में देव, ऋषि, पितर और समाज ऋण चुकाना; वानप्रस्थाश्रम में शरीरशुद्धि और तत्त्वज्ञान के अभ्यास के उद्देश्य से साधना करना तथा संन्यासाश्रम में भिक्षाटन, जप, ध्यान इत्यादि कर्म करना, ऐसे नित्यकर्म बताए गए हैं ।

 

२ आ. प्रातःकाल से सायाह्नकाल (सायंकाल) तक किए जानेवाले कर्म

दिन के (१२ घंटों के) पांच विभाग हैं – प्रातःकाल, संगवकाल (दिनका ७ से १२ घटिका काल (दुग्धदोहन काल), माध्यंदिन अथवा मध्याह्नकाल, अपराह्नकाल और सायाह्नकाल । प्रत्येक विभाग तीन मुहूर्त के समान होता है । २४ घंटों के दिन में ३० मुहूर्त होते हैं । एक मुहूर्त अर्थात् दो घटिका, अर्थात् ४८ मिनट । संक्षेप में प्रत्येक विभाग २ घंटे २४ मिनट का होता है । प्रत्येक विभाग में की जानेवाली कृतियां इस प्रकार हैं ।

१. प्रातःकाल (सूर्योदय से आरंभ) : संध्यावंदना, देवतापूजन और प्रातर्वैश्वेदेव

२. संगवकाल : उपजीविका के साधन

३. मध्याह्नकाल : मध्याह्नस्नान, मध्याह्नसंध्या, ब्रह्मयज्ञ और भूतयज्ञ

४. अपराह्नकाल : पितृयज्ञ (तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध इत्यादि)

५. सायाह्नकाल : पुराणश्रवण तथा उस पर चर्चा करना और सायंवैश्वदेव और संध्या ।

 

२ इ. पंचमहायज्ञ

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् ।
होमोदैवोबलिर्भौतोनृयज्ञोऽतिथिपूजनम्।।

अर्थ : शिष्य को शिक्षित करना (अध्यापन) – ब्रह्मयज्ञ; पितरों को तर्पण – पितृयज्ञ; वैश्वदेव – देवयज्ञ; बलिप्रदान – भूतयज्ञ तथा अतिथिपूजन – मनुष्ययज्ञ है ।

अ. ब्रह्मयज्ञ : वेदों का अध्ययन (अर्थात् स्वाध्याय) तथा देवता और ऋषियों को तर्पण – ब्रह्मयज्ञ है ।

आ. पितृयज्ञ : पितरों को तर्पण करना (जिन ऋषियों की पूर्वजों में गणना की गई है, उदा. सुमंतु, जैमिनी, वैशंपायन जैसे ऋषियों के तथा अपने पूर्वजों के नाम पर जल देने की विधि)

इ. देवयज्ञ : वैश्वदेव, अग्निहोत्र और नैमित्तिक यज्ञ देवयज्ञ के भाग हैं ।

१. नित्य होनेवाली ‘पंचसूना’ जीवहिंसा के प्रायश्चितस्वरूप वैश्वदेव करना

नित्य उपजीविका करते समय मनुष्य द्वारा अनजाने में होनेवाली जीवहिंसा को शास्त्र में ‘पंचसूना’ कहा गया है ।

वैश्वदेवः प्रकर्तव्यः पन्चसूनापनुत्तये ।
कण्डनी पेषणी चुल्ली जलकुम्भोमार्जनी ।। – धर्मसिंधु

अर्थ और विवरण : कूटना, पीसना, चूल्हे का उपयोग करना, पानी भरना तथा बुहारना, ये पांच क्रियाएं करते समय सूक्ष्म जीवजंतुओं की हिंसा अटल है । इस हिंसा को ‘पंचसूना’ जीवहिंसा कहते हैं । ऐसी हिंसा हो जाए, तो ध्यानपूर्वक ‘वैश्वदेव’ प्रायश्चित का अंगभूत कर्म नित्य करें । उक्त हिंसा के परिणामस्वरूप हमारे मन पर हुआ पापसंस्कार दूर होता है ।

२. वैश्वदेव विधि

अग्निकुंड में ‘रुक्मक’ अथवा ‘पावक’ नामक अग्नि की स्थापना कर अग्नि का ध्यान करें । अग्निकुंड के चारों ओर छः बार जल घुमाकर अष्टदिशाओं को चंदन-पुष्प अर्पित करें तथा अग्नि में चरुकी (पके चावलोंकी) आहुति दें । तदुपरांत अग्निकुंड के चारों ओर पुनः छः बार जल घुमाकर अग्नि की पंचोपचार पूजा करें तथा विभूति धारण करें ।

उपवास के दिन बिना पके चावल की आहुति दें । (उपवास के दिन चावल पकाए नहीं जाते; इसलिए आहुतियां चरू की न देकर, चावल की देते हैं ।)

अत्यधिक संकटकाल में केवल उदक (जल) से भी (देवताओं के नामों का उच्चारण कर ताम्रपात्र में जल छोडना), यह विधि कर सकते हैं ।

यदि यात्रा में हों, तो केवल वैश्वदेवसूक्त अथवा उपरोक्त विधि के मौखिक उच्चारण मात्र से भी पंचमहायज्ञ का फल प्राप्त होता है ।

ई. भूतयज्ञ (बलिहरण) : वैश्वदेव हेतु लिए गए अन्न के एक भाग से देवताओं को बलि दी जाती है । भूतयज्ञ में बलि अग्नि में न देकर, भूमि पर रखते हैं ।

उ. नृयज्ञ अथवा मनुष्ययज्ञ : अतिथि का सत्कार करना अर्थात् नृयज्ञ अथवा मनुष्ययज्ञ, ऐसा मनु ने (३.७०) कहा है । ब्राह्मण को अन्न देना भी मनुष्ययज्ञ है ।

पंचमहायज्ञ का महत्त्व

जिस घर में पंचमहायज्ञ नहीं होते, वहां का अन्न संस्कारित नहीं होता; इसलिए संन्यासी, सत्पुरुष और श्राद्ध के समय पितर उसे ग्रहण नहीं करते । जिस घर में पंचमहायज्ञ करने पर शेष अन्न का सेवन किया जाता है, वहां गृहशांति रहती है तथा अन्नपूर्णादेवी का वास रहता है ।

 

३. दिन का समय साधना के लिए अनुकूल होने से दिन में न सोएं

आरोहणं गवां पृष्ठे प्रेतधूमं सरित्तटम् ।
बालतपं दिवास्वापं त्यजेद्दीर्घं जिजीविषुः ।। – स्कंदपुराण, ब्रह्म. धर्मा. ६. ६६-६७

अर्थ : जो दीर्घकाल जीवित रहना चाहता है, वह गाय-बैल की पीठपर न बैठे, चिता का धुंआ अपने शरीर को न लगने दे, (गंगा के अतिरिक्त दूसरी) नदी के तटपर न बैठे, उदयकालीन सूर्य की किरणों का स्पर्श न होने दे तथा दिन में सोना छोड दे ।

दिन में क्यों नहीं सोना चाहिए, इसका शास्त्र

‘दिन और रात, इन दो मुख्य कालों में से रात के समय साधना करने में हमारी शक्ति का अधिक व्यय होता है; क्योंकि इस काल में वातावरण में अनिष्ट शक्तियों का संचार बढ जाता है । इसलिए यह काल साधना के लिए प्रतिकूल रहता है । यह काल पाताल के मांत्रिकों के लिए (मांत्रिक अर्थात् बलवान आसुरी शक्ति) पोषक होता है; इसलिए सभी मांत्रिक इस तमकाल में साधना करते हैं । इसके विपरीत, सात्त्विक जीव सात्त्विक काल में (दिन के समय) साधना करते हैं । ‘दिन में अधिकाधिक साधना कर, उस साधना का रात के समय चिंतन करना तथा दिनभर में हुई चूक सुधारने का संकल्प कर, पुनः दूसरे दिन परिपूर्ण साधना करने का प्रयास करना’, यह ईश्वर को अपेक्षित है । इसलिए दिन में सोने से बचें ।’ – सूक्ष्म-जगत के एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, २१.३.२००५, दोपहर ३.०९)

 

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘दिनचर्यासे संबंधित आचार एवं उनका शास्त्रीय आधार’