औद्योगिकीकरण और भागदौड के जीवन के कारण, इसके साथ ही भोगवादी रहन-सहन के कारण आज सामान्य लोगों के दैनंदिन जीवन का चक्र बदल गया है । इसके ही परिणामस्वरूप उन्हें विविध रोगों का सामना करना पड रहा है । इन रोगों का मूल कारण है त्रिदोष और इसे कम करने के लिए पंचकर्म चिकित्सा करते हैं । वर्तमान में लोकप्रिय हुई इस आयुर्वेदिक उपचार पद्धति के विषय में संक्षेप में देखेंगे ।

आयुर्वेद का प्रमुख उद्देश्य निरोगी मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी मनुष्य को रोगमुक्त करना है । पंचकर्म इसे साध्य करने का एक साधन है । रोगों से मुक्ति और निरोगी, दीर्घायुष्य देनेवाले यह एक आयुर्वेद की स्वतंत्र और विशेष चिकित्सापद्धति है ।
शरीर में दीर्घकाल जमा हुुए विषैले तत्वों से मुक्त कर, शरीर पुन: निरोगी करने का उद्देश्य पंचकर्म से साध्य होता है । जैसे अपने घर का कूडा-कचरा हम प्रतिदिन निकालते हैं, परंतु त्याेहार-उत्सव से पहले घर का पूरा सामान बाहर निकालकर पुन: झाडने-पोछने पर घर के कोनों में जमा हुआ भरपूर कचरा पुन: निकलता है । उसीप्रकार प्रतिदिन ही शौच-मार्जनादि क्रिया किए हुए शरीर में भी विशिष्ट समय में पंचकर्म करने से विशेष प्रतिकार क्षमता प्राप्त होती है । वमन, विरेचन, बस्ती, नस्य और रक्तमोक्षण, इन पांच उपचारों को पंचकर्म कहते हैं ।
– संकलक : वैद्य सुमुख नाईक, आयुर्वेदाचार्य (पुणे)
१. वमन
इसमें प्रथम रोगी को औषधि काढा/दूध/गन्ने का रस आदि पेय दिए जाते हैं । तदुपरांत उलटी होने की औषधि देने से दूषित कफ और पित्त बाहर निकल जाता है । वमन कर्म सर्दी, दमा, खांसी, आम्लपित्त, प्रमेह, मुंहासे, त्वचा के विकार, सिरदर्द, पचन के विकार, हृदय के विकारों में उपयुक्त है ।
२. विरेचन
इस कर्म में औषधि की सहायता से जुलाब करवाए जाते हैं । विरेचन पित्त के कारण होनेवाली बीमारियों के लिए उपयुक्त होता है । आम्लपित्त, जलोदर ( पेट में पानी भरना), कृमि विकार (पेट में कीडे), त्वचाविकार, पीलिया, बांझपन, पेट के विकार, मनोविकार, उच्च रक्तदाब पर उपयोगी है ।
३. बस्ती
इस कर्म में गुदमार्ग द्वारा शरीर में औषधि तेल/दूध/काढा/घी/मांसरस आदि द्रव्य प्रविष्ट किए जाते हैं । यह विशेषरूप से वातविकारों के लिए अत्यंत उपयुक्त चिकित्सा है । संधिवात, आमवात, पक्षाघात, रीढ की हड्डी के विकार, स्त्रियों के विकार, कृमि (पेट में कीडे होना), स्थौल्य (मोटापा), बद्धकोष्ठता आदि बीमारियों पर उपयुक्त होता है । वातविकार क्लिष्ट और दीर्घकाल से शरीर में हैं और जो बहुत ही कठिनाई से दूर होते हैं, इसके लिए बस्ती की जाती है ।
४. रक्तमोक्षण
जोंक अथवा अन्य उपकरणों की सहायता से शरीर से केवल दूषित रक्त ही शरीर के बाहर निकालने के कर्म को रक्तमोक्षण कहते हैं । दूषित रक्त के कारण सिरदर्द, जोडों में दर्द, उच्च रक्तदाब निर्माण होता है । रक्तमोक्षण से आश्चर्यकारक परिवर्तन होता है ।
५. नस्य
इस कर्म में औषधि तेल नाक द्वारा शरीर में प्रविष्ट किया जाता है । नस्य शिरोरोग, सिरदर्द, गर्दन में दर्द, कंधों का दर्द, समय से पहले केश गिरना, सफेद होना, चक्कर आना, दृष्टि के विकार, मानसिक रोग, सर्दी, निद्रानाश, स्मरणशक्ति अल्प होना आदि बीमारियों में, इसके साथ ही पुंसवन संस्कार, यह विशेष उपचार भी नस्य चिकित्सा से किया जाता है । रोगी का बल, उसकी आयु, रोग की अवस्था, ऋतु, रोगी की प्रकृति आदि घटकों का विचार कर पंचकर्म की और उसके लिए उपयोग की जानेवाली औषधि का चयन किया जाता है । इसके साथ ही पंचकर्म करने से पूर्व (पूरे शरीर में तेल से मर्दन) और स्वेदन (पूरे शरीर को वाष्प देना), ये कर्म करने पडते हैं । पंचकर्म के उपरांत कुछ दिन विशेष पद्धति से आहार लेना पडता है । यह पंचकर्म चिकित्सा वैद्यकीय मार्गदर्शन में करनी आवश्यक है ।
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