`हिन्दू धर्म में सगुण उपासनापद्धति की नींव अर्थात ‘देवपूजा’ ! ‘नित्य की भागदौड के दिनक्रम में देवपूजा के लिए इतना समय किसे है ?’, ऐसी नकारात्मक मानसिकता आजकल काफी लोगों में पाई जाती है । केवल एक नित्यकर्म पूरा करना है इसलिए भगवान पर जल्दी-जल्दी पानी डालना है, चंदन का तिलक लगाना और फूल चढाकर उदबत्ती दिखाना, हो गई ‘देवपूजा ’!, ऐसा चित्र सर्वत्र दिखाई देता है । सभी के पालनपोषण का ध्यान रखनेवाले भगवान की पूजा इसप्रकार ‘निबटाना’, इसे देवपूजा कह सकते हैं क्या ? ऐसा करने पर भगवान हम पर क्यों कृपा करें ? जैसे घर आनेवाले अतिति का हम आदरपूर्वक स्वागत करते हैं, इसीप्रकार भगवान का करें, अर्थात भगवान की यथाशक्ति और भक्तिभाव से पूजा करने पर ही वे हम पर प्रसन्न होकर हमें भरपूर आशीर्वाद देते हैं ।
प्रस्तुत लेख में हम जो भगवान की पूजा अर्थात क्या है, देवपूजा की निर्मिति, महत्त्व, प्रकार, कुछ देवताओं के पूजन की विशेषताएं और उनके पीछे के कारण, देवपूजा दिन में कितनी बार और किस समय करनी चाहिए , देवपूजा कब नहीं करनी चाहिए. इस विषय का शास्त्र देखेंगे ।

१. देवपूजा : व्याख्या
भगवान को श्रद्धायुक्त अंतःकरण और विधिविधान से किए गए उपचारसमर्पण अर्थात ‘देवपूजा’. ‘देवता की प्रतिमा अथवा मूर्ति की शास्त्रोक्त पद्धति से की जानेवाली पूजा देवता को अपेक्षित ऐसी करने पर वह सही अर्थ में ‘पूजा’ होती है ।’
– ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यम से, ५.१.२००५, रात्रि ८.१३)
२. निर्मिति
२ अ. पूजाविधि से संबंधित कृतियों की निर्मिति ब्रह्मांड की इच्छाशक्ति की सहायता से होना
‘पूजा करना, नैवेद्य दिखाने जैसी कर्मकांड से संलग्न कृतियां ब्रह्मांड की इच्छाशक्ति से संबंधित हैं । ये कृतियां करते समय जीव के भाव अनुसार उसे उस-उस कृति से देवता की इच्छाशक्ति से संबंधित तरंगें मिलती हैं ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, १७.१२.२००८, सवेरे ८.३५)
३. महत्त्व
३ अ. मूर्ति पर पूजादि संस्कारों के कारण देवत्त्व जागृत होना
प.पू. पागनीस महाराज एक देवता की मूर्ति की प्रतिदिन पूजा करते थे । उस पर होनेवाले सतत भावपूर्ण पूजन के संस्कारों के कारण उसमें देवता का ५ प्रतिशत तत्त्व बढ गया । संस्कारों में भाव होगा, अर्थात पूजा की कृतियों में भाव होगा, तो मूर्ति में देवता का तत्त्व बढ जाता है ।
३ आ. देवता की कृपा होना
देवपूजा के कारण देवता प्रसन्न होने से देवता की कृपा संपादन करना पूजक के लिए सुलभ हो जाता है ।
३ इ. पूजक में चैतन्य बढना
देवपूजा से पूजक द्वारा देवता का तत्त्व ग्रहण होकर उसमें रज- तम की मात्रा कम होने और चैतन्य बढने में सहायता होती है ।
३ ई. ‘देवपूजा से मिलनेवाली सात्त्विक तरंगों से दिनभर के काम करने की शुरुआत होती है ।’
– एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, २९.१०.२००७, सवेरे ९.४६)
३ उ. वातावरणशुद्धि
देवपूजा से वातावरण की सात्त्विकता बढने में सहायता होती है ।
४. देवपूजा के प्रकार
धर्मशास्त्र में देवपूजा करने के आगे दिए प्रकार बताए हैं । पहले दो प्रकार सामान्यत: जिसे हम ‘देवपूजा’ कहते हैं ऐसे स्थूल स्तर पर हैं, तो उसके आगे के दो प्रकार सूक्ष्म स्तर पर हैं ।
४ अ. पंचोपचार पूजा (मूर्ति अथवा चित्र की पूजा)
चंदन, फूल, धूप, दीप एवं नैवेद्य (भोगप्रसाद) ये पांच उपचार भगवान को समर्पित करना
४ आ. षोडशोपचार पूजा (मूर्ति अथवा चित्र की पूजा)
उपरोक्त पंचोपचारों सहित सोलह उपचारों का समावेश इसमें होता है ।
४ इ. मानसपूजा
मन से सगुण मूर्ति की कल्पना कर उसकी पूजा करना
४ ई. परापूजा
निर्गुण परब्रह्म की परावाणी से पूजा करना
५. कुछ देवताओं के पूजन की विशेषताएं और उसका कारण
अ. देवताओं को प्रसन्न करने के लिए उन्हें जो प्रिय लगे वह करना
पंचोपचार एवं षोडशोपचार पूजन से देवता प्रसन्न होते हैं । हिन्दू धर्म की एक विशेषता यह है कि कुछ देवताओं को विशिष्ट उपासनापद्धति विशेष प्रिय होती है । उसके अनुरूप करने पर वे देवता प्रसन्न होते हैं । हिन्दू धर्म की यह विशेषता दर्शाने के लिए आगे कुछ देवताओं के पूजन की विशेषताएं कारणों सहित दी हैं । इतना सखोल अध्यात्मचिंतन केवल हिन्दू धर्म में ही देखने मिलता है ।
दीपप्रियः कार्तवीर्यो मार्तण्डो नतिवल्लभः ।
स्तुतिप्रियो महाविष्णुर्गणेशस्तर्पणप्रियः ।।
दुर्गाऽर्चनप्रिया नूनमभिषेकप्रियः शिवः ।
तस्मात्तेषां प्रतोषाय विदध्यात्तत्तदादरात् ।।
दीपप्रियः ………….. विदध्यात्तत्तदादरात् ।।
– मन्त्रमहोदधि १७.११६-११७ आणि नारदपुराण, पूर्व. ७६.११५-११६
अर्थ : कार्तवीर्य को दीप, सूर्य को नमस्कार, श्रीविष्णु को स्तुति, श्री गणेश को तर्पण, श्री दुर्गादेवी को अर्चन और शिवजी को अभिषेक प्रिय है । इसलिए देवताओं को प्रसन्न करने के लिए उन्हें जो प्रिय है, वही करना चाहिए ।
आ. शिवपूजा में शंख का महत्त्व न होना
‘शिवपूजा में शंख की पूजा नहीं की जाती, इसके साथ ही भगवान शिव को शंख में पानी डालकर स्नान नहीं करवाया जाता । देवताओं की मूर्तियों में पंचायतन की स्थापना हो, तब बाणलिंग पर शंखोदक डाल सकते हैं; परंतु महादेव के पिंडी युक्त बाणलिंग पर शंखोदक से स्नान न करवाएं ।’
शास्त्र : शिवपिंडी में शाळुंका के रूप में स्त्रीकारकत्व होने से शंख का पानी पुन: डालने की आवश्यकता नहीं होती । बाणलिंग के साथ शाळुंका न होने से उसे शंख के पानी से स्नान करवाते हैं ।
इ. आरती के समय शंखनाद विहित
‘मंदिर में महादेव की पूजा करते समय शंखपूजा वर्जित है; परंतु आरती से पहले शंखनाद विहित है और अवश्य किया जाता है ।’
शास्त्र : शंखनाद से प्राणायाम का अभ्यास तो होता ही है; इसके अतिरिक्त शंखनाद जहां तक सुनाई देता है, उस परिसर में भूत, पिशाच इत्यादि अनिष्ट शक्तियों का कष्ट नहीं होता ।
६. देवपूजा दिन में कितनी बार और किस समय करनी चाहिए ?
देवपूजा नित्य कर्म है । प्रतिदिन त्रिकाल (प्रातःकाल, माध्यान्ह यानी दोपहर और सूर्यास्त के उपरांत) षोडशोपचार (सोलह उपचारों से) पूजा करनी चाहिए; परंतु त्रिकाल पूजा करना संभव न होने से सवेरे षोडशोपचार पूजा करें और दोपहर और रात को सूर्यास्त के उपरांत पंचोपचार (पांच उपचारों से) पूजा करनी चाहिए । त्रिकाल पूजा करना संभव न हो तो कम से कम सवेरे एक बार तो पूजा करनी चाहिए । षोडशोपचार और पंचोपचार पूजा करना संभव न हो, तो चंदन और पुष्प, ये दो उपचारों से तो पूजा करनी चाहिए । धर्मशास्त्र में इसप्रकार पर्याय बताए हैं; कारण किसी भी परिस्थिति में उपासक से देवपूजा होनी चाहिए, यह उसके पीछे का उद्देश्य है !
६ अ. ‘भगवान की त्रिकाल पूजा करनी चाहिए’, ऐसे शास्त्र में बताया है, इसलिए कलियुग में ‘केवल कम से कम सवेरे पूजा अवश्य करें’, ऐसे प्रचलित होने के कारण
प्रातर्मध्यन्दिने सायं देवपूजां समाचरेत् ।
अर्थ : संभव हो तो भगवान की त्रिकाल पूजा करें ।
६ अ १. कलियुग में सात्त्विकता का लोप होने से कर्मकांड समान धर्म के सभी आचारों का पालन करना संभव न होने से रूढीवाद प्रस्थापित होना
‘पूर्व का काल सात्त्विक होने से त्रिकाल पूजा कर दिनभर के तीन प्रहरों में होनेवाले ब्रह्मांड के रज-तमात्मक ऊत्सर्जनात्मक धारणा को नष्ट कर वायुमंडल शुद्ध रखना संभव था; परंतु अब कलियुग में सात्त्विकता का लोप होने से कर्मकांड समान धर्म के सभी आचारों का पालन करना संभव नहीं होता । इसलिए कम से कम सवेरे के समय भावपूर्ण पूजा कर भगवान से प्रक्षेपित होनेवाला चैतन्य वास्तु में टिके रहने के लिए किया गया यह रूढिवाद है ।
कलियुग में मानव ने देवधर्म छोडना आरंभ करने से संतों द्वारा कम से कम प्रातःसमय पूजा करने की दी गई सीख देखने मिलती है ।
६ अ २. भक्तियोग में प्रत्यक्ष कर्म के पीछे भाव, मानसपूजा और नामजप को अधिक महत्त्व दिया जाना
६ अ २ अ. भाव एवं मानसपूजा
उपासनाकांड में प्रत्यक्ष उस उस समय पर कर्म करना अत्यंत योग्य माना जाता है; परंतु भक्तियोग में प्रत्यक्ष कर्म के पीछे भाव को अधिक महत्त्व दिए जाने से मानसपूजा समान उपासनापद्धति की निर्मिति हुई ।
६ अ २ आ. नामजप
कलियुग में माया के कर्मों को विशेष महत्त्व प्राप्त होने से ‘कर्म करते समय मुख से नाम लेना’, यही सर्वश्रेष्ठ प्रकार की साधना मानी गई है और त्रिकाल पूजा करना संभव न होने से एक बारे सवेरे पूजा कर सतत जाते-आते अथवा कर्म करते समय नामजप करना उपयुक्त माना गया है । इसलिए पूजाकांड की तुलना में संतों ने कहा है कि कलियुग में नामसाधना सरल है ।
‘जैसा काल, वैसा उपदेश’, इसी प्रधान सूत्र का उपयोग कर, संत उस-उस काल में समष्टि का कल्याण साधने का कैसे प्रयत्न करते हैं, यही इससे ध्यान में आता है ।’- एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, चैत्र शुद्ध १४, कलियुग वर्ष ५११० (८.४.२००९), दोपहर ३.१२)
७. देवपूजा कब न करें ?
अ. बिना स्नान किए इसके साथ ही व्यसनी अवस्था में
आ. जननाशौच-मरणशौच लगने से दस दिनों तक सूतक लगने के पश्चात दस दिनों अशौच होता है । ग्यारहवें दिन शुद्धि कर पूजा की जा सकती है । सूतक के समय कर्ता १२ वें दिन के उपरांत ही पूजा कर सकता है ।)
इ. घर की स्त्री रजःस्वला होने पर और उसका पूजाघरवाले कक्ष में यदि घूमना-फिरना न हो, तो घर के ज्येष्ठ व्यक्ति को स्नान कर पूजा करनी चाहिए । जगह के अभाव में पूजा घर को भिन्न स्थान पर रखना संभव न हो, तो चार दिन (स्त्री का रजोकाल समाप्त होने तक) देवघर पर्दे से ढककर रखें । विशिष्ट कारण के लिए इसप्रकार भगवान को पर्दे में रखना गलत नहीं । वैष्णव सांप्रदायिकों के मंदिरों में भी ‘भगवान स्नान कर रहे हैं, भगवान सो रहे हैं’ इत्यादि कारणों के लिए भगवान की मूर्ति पर्दे में रखने की पद्धति है । यह एकप्रकार से भगवान के लिए अलग-सा कक्ष बनाने समान ही है ।
स्त्री के रजोकाल के दिनों में पूजाघर पर्दे से ढककर रखने के कारण
१. रजोकाल में स्त्री का रजोगुण बढा हुआ होता है । पूजाघर खुला होने से भगवान से सात्त्विक स्पंदन बाहर आने की मात्रा अधिक होती है । इस सात्त्विक शक्ति का स्त्री को कष्ट हो सकता है ।
२. रजोकाल में स्त्री में बढे हुए रजोगुण, उसके साथ ही अशुचिता होने से कुल मिलाकर वास्तु राजसिक स्पंदनों से प्रभारित होती है । राजसिक स्पंदनों का आवरण भगवान की मूर्ति पर भी आता है ।
उपरोक्त कारणवश चार दिन देवपूजा न करें; परंतु मानसपूजा अवश्य करें । पांचवें दिन घर में गोमूत्र (उपलब्ध न हो तो विभूति का पानी) छिडककर और धूप दिखाकर वास्तुशुद्धि करें और तदुपारंत हमेशा की भांति देवपूजा आरंभ करें ।
८. देवपूजा किस दिशा में करनी चाहिए ?
पूर्व दिशा का विशेष महत्त्व है, इसलिए उस दिशा में मुख कर पूजाविधि करने के लिए बताया गया है; इसीलिए देवघर सदैव पूर्व-पश्चिम दिशा में होना योग्य होता है ।
संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘पंचोपचार आणि षोडशोपचार पूजनामागील शास्त्र’
वास्तुशास्त्रानुसार घर में देवघर कैसे होना चाहिए ?
पूजा करते समय भाव कैसा रखें ?
देवघर में देवताओं की रचना कैसे करनी चाहिए ?
पूजाविधि के संदर्भ में शंकानिरसन – भाग २
पूजा की थाली में विभिन्न घटकों की रचना किस प्रकार करें ?