अनुक्रमणिका
- १. गले में वेदना अथवा खुजलाना (खराश), या फिर किसी भी प्रकार की खांसी
- २. सूखी खांसी (वातज कास)
- ३. हल्का-सा ज्वर (बुखार) लगना अथवा ज्वर आना
- ४. सिर में वेदना
- ५. बद्धकोष्ठता
- ६. व्रण पर (घाव पर) आयुर्वेदीय प्राथमिक उपचार
- ७. चालिस के उपरांत घुटनों में वेदना न हो, इसलिए घुटनों पर नियमित तेल लगाएं !
- ८. वात एवं पित्त के विकार दूर करने में देसी घी सर्वश्रेष्ठ और अमृत समान है इसलिए उसे घर पर अवश्य रखें !
- ९. जलने पर आयुर्वेद में प्राथमिक उपचार
- १०. भोजन अधिक होने से अपचन पर आयुर्वेद के प्राथमिक उपचार

१. गले में वेदना अथवा खुजलाना (खराश), या फिर किसी भी प्रकार की खांसी
‘दिन में २ – ३ बार ‘चंद्रामृत रस’ औषधि की १ – २ गोलियां चुभलाएं ।’
– वैद्य मेघराज माधव पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२५.७.२०२२)

१ अ. अनुभव
‘अनेक बार किसी भी कारण से मेरे गले में वेदना होकर हल्का ज्वर-सा लगने से मैं तुरंत ही ‘चंद्रामृत रस’की १ गोली चुभलाता हूं । अनेक बार केवल एक गोली से ही मेरे गले की वेदना बंद होकर, हल्का-सा ज्वर (हरारत) भी चला जाता है और साथ ही आगे खांसी भी टल जाती है ।’
– (पू.) संदीप आळशी, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२५.७.२०२२)
२. सूखी खांसी (वातज कास)
‘कई बार केवल सूखी खांसी आती है; कफ नहीं गिरता अथवा गिरता भी है, तो अत्यंत ही अल्प । इस प्रकार की खांसी में ऐसा लगने लगता है कि श्वासनलिका अंदर से कहीं छिल गई है कि क्या ?’, खांसते-खांसते पसलियों एवं पेट में वेदना होने लगती है । कई बार खांसी की औषधि लेने के पश्चात भी कफ सूख जाने से ऐसी खांसी आती है । कई बार नींद में ठंडी हवा नाक एवं मुंह में जाने से ऐसी खांसी आती है । यह वात के कारण आनेवाली खांसी के लक्षण हैं । आयुर्वेद में इसे ‘वातज कास’ कहते हैं । ‘कास’ अर्थात ‘खांसी’ । ऐसे समय पर आगे दिए उपचार करें ।
आधी कटोरी गरम पानी पीएं । उसमें २ चम्मम (१० मि.ली) देशी घी एवं चिमटी पर नमक डालें और भली-भांति मिलाकर पीएं । (घी के स्थान पर तले हुए तेल का भी उपयोग कर सकते हैं । ‘तला हुआ तेल’ अर्थात ‘जिसमें बडे, पापड, पकौडी जैसे खाद्यपदार्थ तले गए हैं, ऐसा तेल !’) पीने के पश्चात गिलास में अंदर से लगा घी छुडाने हेतु थोडा-सा गरम पानी लें । ऐसा अनुभव है कि १ – २ बार ऐसा करने पर खांसी रुक जाती है । खांसी के साथ हल्का ज्वर (हरारत) होने पर घी के साथ चम्मचभर तुलसी का रस भी लें ।’
– वैद्य मेघराज माधव पराडकर (२५.७.२०२२)
२ अ. अनुभव
‘मेरी बेटी चि. मुक्ता साढे चार वर्ष की है । जुलाई २०२२ के तीसरे सप्ताह में उसे सर्दी होकर सूखी खांसी शुरू हो गई । खांसते-खांसते वह परेशान हो जाती थी । फिर मैंने उसे एक चम्मच तुलसी के रस में १ चम्मच (५ मि.ली.) घी और थोडा नमक मिलाकर उसे पिलाया । इससे उसकी खांसी काफी कम हो गई । तदुपरांत लगभग ४ घंटों में उसे थोडी खांसी आने पर उसे इसीप्रकार घी दिया । तत्पश्चात उसे खांसी नहीं आई और ज्वर भी उतर गया ।’
– श्रीमती राघवी मयुरेश कोनेकर, ढवळी, फोंडा, गोवा. (२५.७.२०२२)
३. हल्का-सा ज्वर (बुखार) लगना अथवा ज्वर आना
‘२ दिन तुलसी के २ – २ पत्ते सवेरे-शाम चबाकर खाना । दिन में एक बार के भोजन के समय बिना कुछ खाए-पिए, उपवास रखें । फिर जब भूख लगे, तब थोडी सादी गरम दाल (बिना तडके के) १ चम्मच घी डाल कर पीएं । २ दिन अन्य कुछ भी न खाएं, केवल गरम-गरम दाल-चावल लें । दाल-चावल पर थोडा घी डालें । स्वाद के लिए थोडा आचार ले सकते हैं । पूर्णरूप से स्वस्थ होने तक यही आहार लें । अल्पाहार न करें । उसके स्थान पर चम्मचभर मनुके (किशमिश) चर्वण कर खाएं अथवा कटोरीभर गरम पानी में थोडा गुड डालकर पीएं । प्यास लगी हो, तब गरम पानी ही पीएं । विश्राम करें । ऐसा करने पर ज्वर ठीक होने में सहायता होती है । ज्वर यदि आ भी जाए, तो बहुत कष्ट नहीं होता और शीघ्र ही ठीक होने लगता है ।’
– वैद्य मेघराज माधव पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२५.७.२०२२)
४. सिर में वेदना
‘सूतशेखर रस’ की एक गोली का महीन (बारीक) चूर्ण करें । (एक थाली में गोली रखकर उसे गिलास अथवा कटोरी से दबाने पर, गोली का चूर्ण बन जाता है ।) यह चूर्ण नसवार खींचने (सुंघनी सूंघने) समान नाक में खींचें । ऐसा कर पाना संभव न हो, तो चम्मचभर पिघले हुए घी में इस गोली का चूर्ण मिलाएं । पीठ के बल लेटकर इस घी में मिली औषधि की २ – २ बूंदें दोनों नथुनों में डालकर २ मिनट लेटे रहें । तदुपरांत उठकर घी में मिलाई हुई शेष औषधि चाट लें ।’
५. बद्धकोष्ठता
‘बद्धकोष्ठता के लिए ‘गंधर्व हरीतकी वटी’ की २ से ४ गोलियां रात में सोने से पहले गुनगुने पानी के साथ लें । इसके साथ ही भूख न लगना, भोजन न कर पाना, अपचन होना, पेट में वायु (गैस) होना, ऐसे लक्षण होने पर ‘लशुनादी वटी’ की १ – २ गोलियां दोनों बार के भोजन के १५ मिनट पहले चुभलाकर खाएं । इससे पाचक स्राव अच्छी प्रकार से निर्माण होते हैं । बद्धकोष्ठता पर ये उपचार १५ दिन करें ।’
६. व्रण पर (घाव पर) आयुर्वेदीय प्राथमिक उपचार
‘किसी भी कारणवश (उदा. छिल जाना, कट जाना इत्यादि के कारण) व्रण (घाव) होने पर उस पर तुलसी का रस लगाएं । तुलसी का रस लगाने से घाव में जंतूसंसर्ग होने की संभावना न्यून हो जाती है एवं व्रण शीघ्र भरता है । तुलसी का रस निकालने से पहले हाथ साबुन से धो लें । तुलसी के ७ – ८ ताजे पत्ते स्वच्छ धोकर लगाएं । उनमें से पानी झटक दें । ये पत्ते दोनों हथेलियों में मसलें । इससे हथेली पर तुलसी का रस लगने लगता है । तब पत्ते उंगलियों से निचाडते हुए उससे आनेवाला रस व्रण पर लगाएं ।’
७. चालिस के उपरांत घुटनों में वेदना न हो, इसलिए घुटनों पर नियमित तेल लगाएं !
‘चालीस वर्ष की आयु होने के पश्चात आरोग्य की विविध समस्याएं होने लगती हैं । इनमें अनेक लोगों को सतानेवाली समस्या है घुटनों में वेदना । घुटनों में वेदना न हो अथवा वह सुसह्य हो, इसलिए चालीस के उपरांत प्रत्येक को ही प्रतिदिन दिन में कम से कम एक बार घुटनों में तेल लगाना चाहिए । इसके लिए कोई भी खाद्य तेल अथवा औषधि तेल का उपयोग कर सकते हैं । रात में सोने से पहले अथवा सवेरे स्नान से पहले तेल लगाएं । घुटनों में लगा तेल न्यूनतम ३० मिनट रहना चाहिए । तदुपरांत उसे धो सकते हैं ।’
७ अ. घुटनों के पीछे भी तेल लगाएं !
‘सामान्य तौर पर घुटनों के दर्द पर उपचारस्वरूप तेल लगाएं कहते ही अधिकांश लोग केवल घुटनों के सामने ही तेल लगाते हैं, अर्थात घुटने के ‘नीकैप’ को ही तेल लगाते हैं । घुटनों को तेल लगाते समय उसे घुटनों के सर्व ओर लगाएं ।’
८. वात एवं पित्त के विकार दूर करने में देसी घी सर्वश्रेष्ठ और अमृत समान है इसलिए उसे घर पर अवश्य रखें !
सर्पिः वातपित्तप्रशमनानाम् (श्रेष्ठम्) ।’ ऐसा चरकसंहिता में (अध्याय २५, श्लोक ४० में चुनिंदा अंश) बताए हैं । ‘देसी घी यह वात एवं पित्त के विकार दूर करने में सर्वश्रेष्ठ है’, ऐसा इसका अर्थ है । दैनंदिन आहार में, इसके साथ ही विविध रोगों की आत्ययिक अवस्थाओं में (इमर्जन्सी में) देसी घी का बहुत अच्छा उपयोग होता है । ऐसा घी प्रत्येक के पास होना ही चाहिए । अनेक लोगों को लगता है कि देसी घी मंहगा होता है । हमारे बस की बात नहीं; परंतु ‘देसी घी भले ही मंहगा हो, तब भी शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक है’, यह ध्यान में रखना चाहिए । चॉकलेट, बिस्किट, चिप्स, सेव, चिवडा, अथवा अन्य स्नैक्स या फिर पकौडे, वडापाव, पिज्जा इत्यादि आरोग्य की दृष्टि से अनावश्यक पदार्थाें पर होनेवाला (अप)व्यय बचाकर, वह व्यय (खर्च) घी पर करें । घर में घी बनाने के लिए दूध की मलाई को दही लगाएं । उसे मथकर मक्खन निकालें । फिर इसे पानी में स्वच्छ धोकर यदि घर का घी मिले तो उत्तम, अन्यथा हाट में बिकनेवाला देसी घी लें । देसी गाय का घी खाना आदर्श है; परंतु वह संभव न हो, तो हाट में मिलनेवाला सामान्य गाय का घी खरीद लें । प्रत्येक के घर में सदैव न्यूनतम आधा किलो घी होना ही चाहिए ।’
९. जलने पर आयुर्वेद में प्राथमिक उपचार
‘किसी भी कारणवश जलने पर जले हुए भाग पर तुरंत ही घी लगाएं । दाह उसी क्षण थम जाता है । वैद्य लोग पैर में होनेवाले गोखरू (फुट कॉर्न) जलाकर निकालने के लिए ‘अग्निकर्म’ करते हैं । इसमें लोहे की सलाई लाल होने तक गरम कर, उससे गोखरू जलाया जाता है । तप्त (गरम की हुई) लोहे की सलाई का तापमान ७०० अंश (डिग्री) सेल्सिअस होता है । एक गोखरू निकालने के लिए यह उपचार एक बार ही करना होता है । तपती हुई सलाई के पश्चात वैद्य उस स्थान पर तुरंत ही देसी घी लगाते हैं । इतनी गरम सलाई से जल जाने पर भी देसी घी लगाने पर अगले ही क्षण दाह शांत हो जाता है, इतना देसी घी प्रभावशाली है ।’
देसी घी अमृत समान होने से उसे घर पर अवश्य रखें !
सर्पिः वातपित्तप्रशमनानाम् (श्रेष्ठम्) ।’ ऐसा चरकसंहिता में (अध्याय २५, श्लोक ४० में चुनिंदा अंश) बताए हैं । ‘देसी घी यह वात एवं पित्त के विकार दूर करने में सर्वश्रेष्ठ है’, ऐसा इसका अर्थ है । दैनंदिन आहार में, इसके साथ ही विविध रोगों की आत्ययिक अवस्थाओं में (इमर्जन्सी में) देसी घी का बहुत अच्छा उपयोग होता है । ऐसा घी प्रत्येक के पास होना ही चाहिए । अनेक लोगों को लगता है कि देसी घी मंहगा होता है । हमारे बस की बात नहीं; परंतु ‘देसी घी भले ही मंहगा हो, तब भी शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक है’, यह ध्यान में रखना चाहिए । चॉकलेट, बिस्किट, चिप्स, सेव, चिवडा, अथवा अन्य स्नैक्स या फिर पकौडे, वडापाव, पिज्जा इत्यादि आरोग्य की दृष्टि से अनावश्यक पदार्थाें पर होनेवाला (अप)व्यय बचाकर, वह व्यय (खर्च) घी पर करें । घर में घी बनाने के लिए दूध की मलाई को दही लगाएं । उसे मथकर मक्खन निकालें । फिर इसे पानी में स्वच्छ धोकर यदि घर का घी मिले तो उत्तम, अन्यथा हाट में बिकनेवाला देसी घी लें । देसी गाय का घी खाना आदर्श है; परंतु वह संभव न हो, तो हाट में मिलनेवाला सामान्य गाय का घी खरीद लें । प्रत्येक के घर में सदैव न्यूनतम आधा किलो घी होना ही चाहिए ।’
– वैद्य मेघराज माधव पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२७.७.२०२२)
१०. भोजन अधिक होने से अपचन पर आयुर्वेद के प्राथमिक उपचार
‘कई बार (उदा. तीज-त्योहार के दिन) अधिक भोजन करने से पेट भारी होकर अपचन की संभावना होती है । ऐसे में ‘लशुनादी वटी’ इस औषधि की १ – २ गोलियां चुभलाकर खाएं । इससे अपचन दूर होने में सहायता होती है ।’
| यहां ‘प्राथमिक उपचार’ दिए हैं । औषधि लेकर ठीक न लगे तो तुरंत स्थानीय वैद्य से मिलें । |
सर्दियों के विकारों पर सरल उपचार
शरीर में कमजोरी का इलाज : आयुर्वेद के प्राथमिक उपचार
आयुर्वेद की अनमोल देन अनेक रोगों पर उपयुक्त औषधि !
उष्णता के विकारों पर घरेलु औषधियां
बडे रोगों पर आयुर्वेद की औषधियां !
त्वचा के दाद-खाज संक्रमण पर (‘फंगल इन्फेक्शन’पर) आयुर्वेद के उपचार